Money Vs Me - Part 2 fiza saifi द्वारा मानवीय विज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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Money Vs Me - Part 2

“बिना मेहनत के अमीर बनने के दस तरीके।”
मैं सोचने लगा—ये किताब आखिर मेरे किस काम आने वाली थी? शायद किसी लेखक ने टाइम पास करने के लिए ही इसे लिख दिया होगा। इसमें लिखे तरीके मुझे इतने बेढंगे और गैर-तार्किक लगे, जैसे किसी ने अपनी कल्पनाओं को बस किताब का रूप दे दिया हो।

मैंने मन ही मन सोचा—“क्या किसी ने सच में इन तरीकों को कभी आज़माया भी होगा?”
लेकिन सच तो यह था… कि मैं खुद इन्हें आज़माने वाला था।

मैं—क्षितिज के. चौधरी।

मुझे बिना मेहनत के अमीर बनना था। मैं इस दुनिया को करीब से देखना चाहता था, पैसे की असली ताकत को महसूस करना चाहता था। वही पैसा, जिसके बिना जीवन का कोई आराम, कोई सुख संभव नहीं बताया जाता।

मैं आपको बता रहा था कि किताब में वैसे तो दस तरीके थे, जिनसे अमीर बनने का दावा किया गया था। लेकिन उनमें से तीन तरीके मुझे सबसे ज्यादा दिलचस्प लगे… और मैंने उन्हें आज़माने का पक्का इरादा कर लिया।

पहला तरीका, जो किताब में सातवें नंबर पर था, कुछ इस तरह लिखा था—

“अगर आपको जल्दी अमीर बनना है, तो आप किसी अमीर लड़की को ढूंढकर उससे शादी कर सकते हैं।”

इसके फायदे भी बड़े विस्तार से बताए गए थे। लेकिन उससे पहले एक शर्त थी—
आपको उस लड़की का दिल जीतना होगा। इतना विश्वास बनाना होगा कि जब आप उसे प्रपोज करें, तो सब कुछ बिल्कुल स्वाभाविक लगे।

आखिर एक करोड़पति लड़की के लिए रिश्तों की कोई कमी तो नहीं होगी…

लेकिन यहाँ एक अजीब सा ट्विस्ट भी था—
लड़की अमीर तो हो… लेकिन खूबसूरत न हो।

यह पढ़कर मैं कुछ देर के लिए चुप हो गया।

क्या सच में कोई ऐसा सोच सकता है?
क्या पैसा इंसान को इतना अंधा बना देता है कि वह रिश्तों को भी सौदे की तरह देखने लगे?

लेकिन फिर मेरे अंदर की वही आवाज़ आई—
“तुम्हें अमीर बनना है… और जल्दी बनना है।”

और शायद… मैं इस अजीब से रास्ते पर पहला कदम रखने के लिए तैयार हो चुका था।

मुझे ये आसान लगा।

मैंने धीरे से अपनी आंखें बंद कीं… और मन ही मन सोचा—
“अगर खूबसूरती नहीं होगी… तो उसके पास विकल्प भी कम होंगे… और वहीं से मेरा रास्ता आसान हो जाएगा…”

उस पल मुझे खुद से डर लगना चाहिए था…
पर नहीं लगा।

क्योंकि उस वक्त…
मैं इंसान कम… और पैसे का भूखा एक सोच बन चुका था।

और शायद…
यही मेरी कहानी का सबसे खतरनाक मोड़ था।
 
 
 

मैंने धीरे से कहा—
“ये कोई गलत काम नहीं है… अगर दोनों को फायदा हो रहा है, तो इसमें बुरा क्या है?”

बस… यही वो पल था…
जब मैंने अपने अंदर की आखिरी हिचकिचाहट को भी खत्म कर दिया।

अगले कुछ दिन मैंने सिर्फ एक ही काम किया—
खोज।

मैंने अमीर लोगों की दुनिया को समझना शुरू किया। सोशल मीडिया, पार्टियां, हाई-प्रोफाइल जगहें… जहां पैसे की चमक दूर से ही दिखाई देती थी।

मैं अब पहले जैसा नहीं रहा था।
मैं हर किसी को इंसान की तरह नहीं…
एक मौके की तरह देखने लगा था।