"शितिज, मुझे संजना ने बताया कि तुम और मीरा एक-दूसरे को पसंद करते हो... और तुम उससे शादी करना चाहते हो।"
संजना के पापा की आवाज़ सुनकर मैं अपनी उलझी हुई सोचों से बाहर आया।
मेरे मन में अभी भी कई सवाल घूम रहे थे, लेकिन मैंने खुद को संभालते हुए कहा,
"जी अंकल, यह बात सही है। और इसी वजह से मेरे अंकल, कुलदीप जी, मेरे साथ आए हैं ताकि आगे की बात हो सके।"
मैंने कुलदीप सेठ की तरफ इशारा करते हुए कहा।
संजना के पापा ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
"कुलदीप जी, आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। और जहाँ तक शितिज की बात है, मुझे यह लड़का पसंद आया। मुझे लगता है कि मीरा और शितिज की जोड़ी अच्छी रहेगी।"
उनकी बात सुनकर मेरे चेहरे पर हल्की मुस्कान तो आई, लेकिन मन की उलझन अभी भी खत्म नहीं हुई थी।
फिर उन्होंने आगे कहा,
"मैंने मीरा और उसकी माँ को भी बुलाया है। वे बस आते ही होंगे।"
बस, उनकी यह बात सुनते ही मेरी एक और गलतफहमी दूर हो गई।
अब मैं समझ चुका था कि यह सचमुच संजना का घर है, मीरा का नहीं।
लेकिन फिर भी मेरे मन में सवाल था कि आखिर हमें यहाँ क्यों बुलाया गया? सीधे मीरा के घर जाकर बात करने में क्या परेशानी थी?
शायद मेरे मन की बात समझते हुए उन्होंने खुद ही आगे कहना शुरू कर दिया।
"कुलदीप जी, मीरा बहुत अच्छी लड़की है। उसके पिता मेरी ही कंपनी में अकाउंटेंट थे।"
मैं ध्यान से उनकी बात सुनने लगा।
"करीब दो साल पहले एक कार हादसे में उनकी मृत्यु हो गई थी। उसके बाद से मीरा की माँ उनकी जगह मेरे ऑफिस में नौकरी कर रही हैं।"
मेरे चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे गायब होने लगी।
"और मीरा अभी पढ़ाई कर रही है। संजना और मीरा बहुत अच्छी दोस्त हैं।"
उन्होंने आराम से बात जारी रखी।
"जब संजना ने मीरा की माँ से इस रिश्ते के बारे में बात की, तो उन्होंने कहा कि वे अकेले इतना बड़ा फैसला नहीं ले पाएँगी। अगर मीरा के पिता ज़िंदा होते तो शायद आप लोग उनके घर जाकर सारी बातें तय कर लेते। इसलिए मैंने सोचा कि पहले आप लोगों से मैं मिल लूँ और यहीं बैठकर आराम से सारी बात हो जाए।"
संजना बड़े उत्साह और खुशी से अपने पिता की बातें सुन रही थी।
लेकिन...
उसी समय ऐसा लग रहा था जैसे मेरे भीतर कुछ टूट रहा हो।
कुछ मिनट पहले तक जो सपने मैं इस बंगले, इस दौलत और इस रईसी को लेकर देख रहा था, वे एक-एक करके बिखरने लगे थे।
मेरे दिमाग में जैसे तूफान उठ खड़ा हुआ।
क्या...?
मीरा... इस आदमी की बेटी नहीं है...?
उसके पिता तो इस कंपनी में अकाउंटेंट थे...?
मैं भीतर ही भीतर सन्न रह गया।
अचानक मुझे महसूस हुआ कि शायद मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी थी।
मैंने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि मीरा का असली पारिवारिक बैकग्राउंड क्या है।
मैं तो सिर्फ उसके रहन-सहन, उसके कपड़ों और उसके आत्मविश्वास को देखकर यही मान बैठा था कि वह किसी बहुत बड़े और अमीर घर की बेटी होगी।
अब मुझे अपनी ही जल्दबाज़ी पर गुस्सा आने लगा था।
तो क्या यह सब सिर्फ मेरा भ्रम था...?
क्या मैं बिना कुछ जाने ही सपनों के महल बनाता रहा...?
मेरे कानों में अब भी संजना के पिता की आवाज़ गूँज रही थी, लेकिन शब्द जैसे समझ से बाहर होते जा रहे थे।
मेरे सारे सुनहरे सपने, जिनमें बंगले, दौलत, घर-जमाई बनने की कल्पनाएँ और आलीशान ज़िंदगी शामिल थी, एक ही झटके में ढहते हुए महसूस हो रहे थे।
मैं सामने बैठा था, लेकिन मेरा ध्यान अब उस कमरे में नहीं था।
मेरे भीतर सिर्फ एक ही बात बार-बार गूँज रही थी—
"मीरा किसी अरबपति की बेटी नहीं है..."
और उस एक सच ने जैसे मेरे सारे विचारों को सुन्न कर दिया था।
अब आगे क्या कहा जा रहा था, मेरे कान जैसे उसे सुनने से ही इंकार कर चुके थे।
तभी दरवाज़े की तरफ से आहट सुनाई दी।
"ओह... मीरा भी आ गई!"
संजना खुशी से लगभग उछलते हुए बोली।
उसकी आवाज़ सुनकर कमरे में बैठे सभी लोगों की नज़र दरवाज़े की तरफ उठ गई।
दरवाज़े पर सचमुच मीरा अपनी माँ के साथ खड़ी थी।
आज मीरा को देखकर मैं कुछ पल के लिए उसे पहचान ही नहीं पाया।
वह हमेशा की तरह बहुत साधारण कपड़ों में थी। उसने हल्के रंग का एक सादा-सा कॉटन सूट पहन रखा था। चेहरे पर न कोई खास मेकअप था, न किसी तरह का दिखावा। बस एक सीधी-सादी, सहज और शांत-सी लड़की।
उसके खुले चेहरे पर वही मासूमियत थी जो हमेशा रहती थी।
उसकी माँ भी उसके साथ खड़ी थीं। उन्होंने साधारण-सी कॉटन की साड़ी पहन रखी थी। आँखों पर चश्मा था और चेहरे पर एक संकोची मुस्कान।
उन्हें देखकर साफ समझा जा सकता था कि वे बेहद सामान्य जीवन जीने वाले लोग हैं।
कुछ ऐसा ही सादापन मीरा में भी था।
सच तो यह था कि मीरा की यही सादगी मुझे हमेशा अच्छी लगती थी।
उसका बनावटीपन से दूर रहना, छोटी-छोटी बातों में खुश हो जाना, बिना किसी दिखावे के जीना...
ये सारी बातें मुझे उसकी तरफ खींचती थीं।
लेकिन शायद मैं हमेशा जानबूझकर उसकी उन बातों को नजरअंदाज करता रहा था।
उसका सांवला रंग...
उसकी सादगी...
उसकी साधारण जिंदगी...
इन सबके ऊपर मैंने अपने मन में उसकी दौलत और हैसियत की एक चमकदार तस्वीर बना ली थी।
और आज...
जब वह तस्वीर टूट चुकी थी...
तो वही सांवला रंग, वही सादगी और वही साधारणपन मुझे चुभने लगा था।
अभी कुछ देर पहले तक मैं इसी बंगले का दामाद बनने के सपने देख रहा था।
लेकिन अब सच्चाई मेरे सामने खड़ी थी।
और उस सच्चाई ने मेरे सारे सपनों को जैसे पल भर में बिखेर दिया था।
मीरा धीरे-धीरे कमरे के अंदर आई।
उसकी आँखें सबसे पहले मुझे ही ढूँढ़ रही थीं।
जैसे ही हमारी नज़रें मिलीं, उसके चेहरे पर एक खूबसूरत मुस्कान खिल उठी।
वह मुस्कान किसी ऐसे इंसान की थी जो अपने सबसे प्रिय व्यक्ति को देखकर खुश हो गया हो।
उसकी आँखों में चमक थी।
उम्मीद थी।
और शायद आने वाले भविष्य के कुछ प्यारे सपने भी थे।
लेकिन...
मैं चाहकर भी मुस्कुरा नहीं पाया।
मेरे होंठ जैसे पत्थर के हो गए थे।
चेहरे पर एक अजीब-सी कठोरता आ गई थी, जिसे मैं लाख कोशिश करने के बाद भी छिपा नहीं पा रहा था।
एक पल के लिए मीरा की मुस्कान हल्की-सी डगमगाई।
शायद उसे भी महसूस हो गया था कि आज मेरे चेहरे पर वह अपनापन नहीं था जिसकी उसे उम्मीद थी।
लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभाल लिया और अपनी माँ के साथ आकर बैठ गई।
उधर संजना पूरे उत्साह से इस मुलाकात को आगे बढ़ाने में लगी हुई थी।
कमरे में मौजूद बाकी लोग शायद आने वाले रिश्ते और खुशियों के बारे में सोच रहे थे।
लेकिन मैं...
मैं उस कमरे में बैठा जरूर था, मगर मेरा मन जैसे कहीं और भटक रहा था।
अभी कुछ देर पहले तक जो भविष्य मुझे बेहद सुनहरा दिखाई दे रहा था, वह अचानक धुंधला पड़ चुका था।
और पहली बार मुझे एहसास हो रहा था कि इंसान कभी-कभी सपनों में इतना खो जाता है कि हकीकत सामने आने पर उसे स्वीकार करना भी मुश्किल लगने लगता है।
कुलदीप सेठ उठकर मीरा की माँ को नमस्ते करने लगे और फिर उनके बीच कुछ बातचीत शुरू हो गई। लेकिन मेरा दिमाग जैसे वहाँ था ही नहीं।
उनकी बातें मेरे कानों तक पहुँच तो रही थीं, पर समझ में कुछ नहीं आ रहा था। मेरा मन बस यही कर रहा था कि यह सब जल्दी खत्म हो और मैं किसी तरह यहाँ से निकल जाऊँ।
मैं अंदर ही अंदर बुरी तरह बेचैन हो रहा था।
तभी संजना ने कहा,
"शितिज, चलो बाहर लॉन में चलते हैं। बड़ों को बातें करने दो।"
मीरा ने भी मेरी तरफ देखकर हल्की मुस्कान दी। उसकी आँखों में सवाल था—जैसे वह पूछ रही हो कि मेरा चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों है।
मैंने किसी तरह अपने चेहरे पर जबरदस्ती एक मुस्कान ला दी और उठ खड़ा हुआ।
लेकिन अंदर ही अंदर मेरा मन पूरी तरह उलझा हुआ था।
मैं संजना को देखकर सोच रहा था कि काश मैंने शुरू में ही अपना फैसला बदल लिया होता और शायद उसी दिन संजना को ही अपनी जिंदगी में चुन लिया होता। तो आज यह सब देखने की नौबत नहीं आती।
क्या अब भी कोई रास्ता है?
मैंने चुपके से एक बार फिर संजना की तरफ देखा।
वह मीरा के साथ हँस-हँसकर बातें कर रही थी, जैसे उसे इस पूरे माहौल का कोई तनाव ही न हो।
और मैं…
मैं अंदर ही अंदर यह मान चुका था कि अब कुछ भी बदलने वाला नहीं है।
हम बाहर लॉन में आ गए।
कुछ देर बाद संजना हमें वहीं छोड़कर कहने लगी,
"तुम दोनों बातें करो, मैं अभी आती हूँ।"
और वह अंदर चली गई।
मीरा और मैं अकेले रह गए।
थोड़ी देर तक एक अजीब-सी खामोशी हमारे बीच फैल गई थी।
फिर मीरा ने सामान्य से अंदाज़ में कहा,
"ये क्या हो गया शितिज? ये कोई अजनबी मीटिंग तो है नहीं। तुम ऐसे क्यों बैठ रहे हो जैसे किसी अनजान जगह आ गए हो?"
उसकी आवाज़ में हल्की-सी चिंता थी।
मैंने खुद को संभालते हुए कहा,
"नहीं… ऐसी कोई बात नहीं है। तुम बैठो, संजना भी तो जानती है सब कुछ… और अंदर बातें तो वैसे भी हो ही रही हैं।"
लेकिन सच यह था कि मेरे अंदर कुछ भी ठीक नहीं था।
अब यह मुलाकात एक रिश्ते की शुरुआत कम और एक अनकहे तनाव की तरह ज्यादा लगने लगी थी।
और पहली बार मुझे एहसास हो रहा था कि सामने बैठा इंसान उतना ही अनजान लग सकता है, जितना हम खुद उसे बना लेते हैं।
संजना हमारे बार-बार रोकने पर वहीं हमारे साथ बैठ गई।
"शितिज, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है," उसने मुस्कुराते हुए कहा, "तुम हमेशा मीरा को खुश रखोगे।"
फिर उसका चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया।
"मीरा ने अपनी ज़िंदगी में बहुत दुख देखे हैं। अंकल के जाने के बाद आंटी ने अकेले ही सब कुछ संभाला है। बहुत संघर्ष किया है उन्होंने।"
मीरा चुपचाप बैठी थी। अपने पिता का ज़िक्र आते ही उसकी आँखों में उदासी उतर आई थी।
संजना आगे कहती रही,
"अंकल बहुत अच्छे इंसान थे। ईमानदार, मेहनती और अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित। पापा की कंपनी में उन्होंने बहुत कुछ संभाल रखा था। आज भी पापा उनकी तारीफ करते हैं।"
मैं बस सिर हिलाए जा रहा था।
लेकिन सच यह था कि अब मेरा ध्यान उनकी बातों में बिल्कुल नहीं था।
न मुझे मीरा के अतीत में कोई दिलचस्पी रह गई थी, न उसके संघर्षों में, और न ही उसके पिता की दुखद मृत्यु की कहानी में।
यह सोचते ही मैं खुद से ही चौंक गया।
क्या मैं इतना स्वार्थी हो गया था?
एक पल के लिए मेरे भीतर अपराधबोध-सा जागा।
मैंने सामने बैठी मीरा की तरफ देखा।
उसके चेहरे पर सच्चाई थी, मासूमियत थी और मेरे लिए भरोसा भी।
मुझे लगा जैसे मैं उसके साथ बहुत बड़ा अन्याय कर रहा हूँ।
लेकिन अगले ही पल मेरा मन फिर उलझ गया।
मैंने गहरी साँस ली और अचानक कहा,
"मुझे लगता है अब हमें चलना चाहिए। काफी समय हो गया है।"
मेरी बात सुनकर मीरा थोड़ा चौंक गई।
"क्या हुआ शितिज?"
मैंने तुरंत अपने चेहरे के भाव सामान्य किए।
"कुछ नहीं, मीरा। बस कुलदीप अंकल की शाम को एक जरूरी बिज़नेस मीटिंग है। कहीं उन्हें देर न हो जाए।"
फिर मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"डोंट वरी, कल मिलते हैं। बाकी सारी बातें तो अंदर बड़े लोग तय ही कर रहे होंगे।"
मेरी बात सुनकर वह संतुष्ट हो गई और धीरे से सिर हिला दिया।
जब हम वापस कमरे के अंदर पहुँचे तो कुलदीप सेठ भी उठ चुके थे।
लगता था उनकी बातचीत पूरी हो चुकी थी।
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
"अच्छा सुनिता जी, अब हमें इजाज़त दीजिए। घर जाकर मैं भी शितिज से आराम से बात करूँगा। फिर कोई अच्छा-सा मुहूर्त निकलवाकर सगाई की तारीख तय कर लेते हैं।"
उनकी बात सुनते ही मेरे पेट में जैसे एक अजीब-सा डर उठ खड़ा हुआ।
मुझे महसूस हुआ कि हालात मेरी सोच से कहीं ज्यादा आगे बढ़ चुके हैं।
तभी मीरा की माँ मेरे पास आईं।
उन्होंने स्नेह से मेरे सिर पर हाथ रखा और बोलीं,
"खुश रहो बेटा। भगवान तुम्हें बहुत तरक्की दे।"
फिर उन्होंने कुछ नोट निकालकर मेरी तरफ बढ़ाए।
"ये क्या आंटी..." मैंने तुरंत हाथ पीछे खींच लिए।
"नहीं बेटा, मना नहीं करते। यह शगुन है। पहली बार मिले हो।"
उनके चेहरे पर सच्चा अपनापन था।
आखिरकार मुझे वह शगुन लेना पड़ा।
लेकिन नोट हाथ में लेते हुए मेरे मन में एक कड़वा विचार उठा—
"और शायद आखिरी बार भी..."
यह सोचकर मैं खुद ही भीतर से असहज हो गया।
कुछ देर बाद हम सबसे विदा लेकर बाहर आ गए और वापस कुलदीप सेठ की कार में बैठ गए।
गाड़ी सड़क पर दौड़ रही थी।
लेकिन कार के भीतर अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी।
मैं चाहकर भी कुलदीप सेठ की तरफ नहीं देख पा रहा था।
क्योंकि मुझे पता था कि बंगला देखकर उनके मन में भी यही धारणा बनी होगी कि लड़की किसी बहुत बड़े और संपन्न परिवार से होगी।
लेकिन अब सारी तस्वीर बदल चुकी थी।
जो महल मुझे अपना भविष्य लग रहा था, वह किसी और का निकला।
और जिस रिश्ते को मैं अपनी किस्मत समझ बैठा था, उसे लेकर अब मेरे मन में पहले जैसी खुशी नहीं बची थी।
मैं खिड़की से बाहर भागती सड़कों को देखता रहा।
जबकि मेरे भीतर उम्मीदों, लालच, अपराधबोध और उलझनों का एक अजीब तूफान चल रहा था।