Money Vs Me - Part 11 fiza saifi द्वारा मानवीय विज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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Money Vs Me - Part 11

 
मैं एक बार फिर से उसी सिचुएशन में खड़ा था, जहाँ 8 साल पहले था। तब मैंने अपना घर छोड़ा था, और आज फिर से वही सब रिपीट हुआ। एक बार फिर सब कुछ पीछे छोड़कर मैं दूसरे अनजान शहर आ गया। मुझे नहीं पता था कि इस बार क्या होने वाला है, किस्मत मुझे कहाँ तक आज़माने वाली है।

लेकिन फिलहाल मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल फिर से वही था—रहने के लिए घर और खाने के लिए दो वक्त की रोटी का।

3-4 दिन फिर से परेशान रहने के बाद मुझे आखिर रहने और खाने का बंदोबस्त हो ही गया। एक कॉल सेंटर में मुझे जॉब मिल गई थी। वह डोमेस्टिक कस्टमर केयर का काम था, इलेक्ट्रॉनिक अप्लायंसेज़ का। काफी महंगा ब्रांड था, जिसे सिर्फ अमीर लोग ही अफोर्ड कर सकते थे। कॉल सेंटर की शिफ्ट दिन और रात, दोनों ही चलती थीं।

एक कलीग, जिसका नाम विजय था, यहीं पास में एक रूम लेकर रहता था और अकेला ही रहता था। जब उसे पता चला कि मैं भी अकेला हूँ और मेरे पास रहने के लिए जगह भी नहीं है, तो उसने रूम रेंट शेयर पर मुझे अपने साथ रहने का ऑफर दे दिया। मैंने वह ऑफर मान लिया, क्योंकि इसके सिवा मेरे पास कोई और चारा भी नहीं था।
 
 मैं अपने पिछले एक्सपीरियंस के बारे में सोचता था, जो बहुत बुरा रहा था। एक दिन मैं उसी किताब के बारे में सोच रहा था। क्या वह सच में बेकार थी, या उसके तरीके सचमुच काम आ सकते थे? मेरे साथ जो हुआ था, वह तो पूरी तरह बेकार साबित हुआ था। फिर भी मन में सवाल उठता था—क्या मुझे किताब में लिखा दूसरा तरीका आज़माना चाहिए?

आप सोच रहे होंगे कि मेरे सिर से जल्दी पैसा कमाने और अमीर बनने का जुनून शायद उतर चुका होगा। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं था। मैं बस एक मौके की तलाश में था। वह किताब अब भी मेरे पास थी, और मैं इंतज़ार कर रहा था कि दूसरा चांस कब लेना चाहिए। मैं अपने मकसद से बिल्कुल नहीं हटा था।

उस किताब में लिखे दस आइडियाज़ में से मुझे सिर्फ तीन कुछ हद तक कारगर लगे थे। पहला तरीका मैं आज़मा चुका था और बुरी तरह असफल हुआ था। ऐसे में सवाल यह था कि क्या मुझे अब भी उस किताब पर भरोसा करना चाहिए? शायद कोई दूसरा इंसान होता तो नहीं करता। एक ही बार में सबक सीखकर अपनी ज़िंदगी की चिंता करता। लेकिन मेरा इरादा कुछ और ही था।

किताब में लिखा दूसरा तरीका था—किसी ऐसे अमीर इंसान को ढूँढो जिसका कोई वारिस न हो और जिसे अपनी दौलत के लिए किसी वारिस की तलाश हो।

जब मैंने इस बात पर दोबारा गौर किया, तो यह मुझे बेहद बेवकूफी भरी सोच लगी। भला कोई इंसान अपनी जायदाद और दौलत किसी ऐसे व्यक्ति को क्यों देगा, जिससे उसका कोई रिश्ता ही न हो? और फिर किसी अमीर आदमी का भरोसा जीतना इतना आसान भी तो नहीं था। इस किताब के तरीके जितने अजीब थे, उन पर अमल करके सफल होना उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल था।

एक बार तो मैंने जी भरकर उस किताब के लेखक को कोसा। क्या अमीर आदमी सड़कों पर बिखरे मिलते हैं? और वह भी ऐसे, जिनका कोई वारिस न हो? उनका भरोसा जीतना कोई आसान काम नहीं था। मुझे यह तरीका पहले वाले से भी ज़्यादा फालतू और बकवास लगा।

मैं एक ग्रेजुएट नौजवान था। अगर चाहता, तो किसी अच्छी कंपनी में अप्लाई कर सकता था और एक अच्छी नौकरी हासिल कर सकता था, जिससे अपनी ज़िंदगी अच्छे तरीके से जी सकता था। लेकिन न जाने क्यों, मैं वह सब करना ही नहीं चाहता था। मुझे तो बस ज़िंदगी में एक शॉर्टकट चाहिए था, जिससे मैं जल्दी से अपने सपने पूरे कर सकूँ।

मैंने अपने इरादे फिर से मज़बूत कर लिए और सोचा कि एक बार फिर खुद को आज़माने में कोई बुराई नहीं है।

अब समस्या यह थी कि इतने बड़े शहर में बड़े बिज़नेसमैन और अमीर लोगों तक पहुँचा कैसे जाए। यह एक बहुत मुश्किल, बल्कि लगभग नामुमकिन काम था। बिना किसी वजह के किसी से बात नहीं की जा सकती थी, और न ही किसी की ज़िंदगी का हिस्सा बना जा सकता था। हाँ, किसी लड़की से दोस्ती करना शायद अलग बात होती, लेकिन किसी बड़े आदमी को अपने जाल में फँसाना इस बार कहीं ज़्यादा मुश्किल था।

फिर भी मैं यह जोखिम उठाने के लिए तैयार था। मैं ऐसे ही किसी मौके की तलाश में था। और फिर एक दिन ऐसा लगा जैसे वह मौका खुद मेरा पता ढूँढता हुआ मेरे पास आ गया हो।

उस रात मेरी नाइट शिफ्ट थी।

रात के 1 बज चुके थे। नाइट शिफ्ट में कॉल्स ज़रा कम ही आती थीं, इसलिए मैं आराम से अपनी सीट पर बैठा कंप्यूटर पर गाने सुन रहा था। तभी मुझे एक कॉल रिसीव हुई।

“गुड इवनिंग, सहारा कस्टमर केयर। हाउ कैन आई हेल्प यू?”

दूसरी तरफ से जो आवाज़ आई, वह किसी बुज़ुर्ग व्यक्ति की लग रही थी। उन्हें अपने प्रोडक्ट के संबंध में मदद चाहिए थी। मैं उन्हें फोन पर सारी सेटिंग्स समझाता रहा। कॉल तकरीबन 15 मिनट से कनेक्ट थी। वे हर बार मेरी बात ध्यान से सुनकर निर्देशों का पालन कर रहे थे, लेकिन फिर भी कोई तकनीकी खराबी थी जो बार-बार सामने आ रही थी।

आखिर मैंने कहा,

“सर, मुझे लगता है कि आपको इसे सर्विस सेंटर भेजना चाहिए। अगर कोई तकनीकी खराबी है, तो वह फोन पर ठीक नहीं हो पाएगी।”

मैं यह कह ही रहा था कि अचानक दूसरी तरफ से एक हल्की-सी चीख सुनाई दी। उसके तुरंत बाद फोन के गिरने जैसी आवाज़ आई।

मैं चौंक गया।

“हेलो... हेलो सर! क्या आप मुझे सुन रहे हैं? हेलो...”

मैंने दो-तीन बार पुकारा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

कस्टमर केयर में एक नियम था कि कॉल ग्राहक की तरफ से ही डिस्कनेक्ट होनी चाहिए, इसलिए मैं कॉल काट नहीं सकता था। मैं इंतज़ार कर रहा था कि शायद वे दोबारा बोलें।

तभी मुझे एक बहुत धीमी और काँपती हुई आवाज़ सुनाई दी—

“हेल्प... प्लीज़... मेरी मदद करो...”

यह सुनकर मैं घबरा गया। साफ़ था कि वे किसी मुसीबत में थे।

मैंने तुरंत वह कॉल अपने फोन के ऐप पर ट्रांसफर की, मेज़ से गाड़ी की चाबी उठाई और जल्दी से ऑफिस से बाहर निकल आया। मैंने अपने टीम लीडर को भी सूचना नहीं दी थी। उस समय मुझे बस इतना ज़रूरी लगा कि वह इंसान परेशानी में है और मदद माँग रहा है।

मैं तेजी से बाहर निकलते हुए फोन पर बोला,

“सर, घबराइए मत... मैं आ रहा हूँ।”
 

 यह बिल्कुल कस्टमर केयर के नियमों के खिलाफ था। हम व्यक्तिगत रूप से किसी ग्राहक के घर नहीं जा सकते थे। लेकिन उनकी लोकेशन यहाँ से सिर्फ 20 किलोमीटर दूर दिखाई दे रही थी, इसलिए मैं बिना कुछ सोचे-समझे उनकी मदद के लिए निकल पड़ा था।

चाहता तो मैं पुलिस को फोन करके भी उनके लिए मदद भेज सकता था, लेकिन न जाने क्यों मुझे ऐसा लगा कि वह मुझे ही मदद के लिए बुला रहे हैं और मुझे वहाँ जाना चाहिए।

मुझे पता था कि अगर मेरे मैनेजर को इस बारे में पता चल गया, तो मेरी नौकरी जा सकती थी। इसके साथ भारी जुर्माना भी लग सकता था। लेकिन उस समय मैंने इन सब बातों की बिल्कुल परवाह नहीं की।

ऑफिस से बाहर निकलकर मैं सड़क पर आया और एक टैक्सी रोक ली।

“जल्दी से इस एड्रेस पर चलो,” मैंने ड्राइवर को लोकेशन दिखाते हुए कहा।

कॉल अभी भी कनेक्ट थी।

“हेलो सर... आप सुन रहे हैं ना? जवाब दीजिए...”

मैं लगातार उनसे संपर्क बनाए रखने की कोशिश कर रहा था। दूसरी तरफ से कभी-कभार बस हल्की-सी “हूँ...” या “हाँ...” जैसी आवाज़ सुनाई दे जाती थी, जिससे मुझे यकीन हो जाता था कि वह अभी होश में हैं।

आखिरकार लगभग चालीस मिनट बाद मैं उस लोकेशन पर पहुँच गया।

लेकिन वहाँ पहुँचते ही मेरे होश उड़ गए।

मेरे सामने एक बेहद आलीशान बंगला खड़ा था। उसे देखकर मुझे अचानक संजना के घर का बंगला याद आ गया।

मैंने जल्दी से टैक्सी वाले को पैसे दिए और दौड़ते हुए मुख्य गेट की तरफ बढ़ा। गेट पर बैठे गार्ड ने तुरंत मुझे रोक लिया।

“क्या बात है? कौन हैं आप?”

उसकी आवाज़ सख्त थी।

बंगले के बाहर लगी महँगी ग्रेनाइट की नेमप्लेट पर मेरी नज़र गई।

‘ठाकुर उदय प्रताप सिंह’

मैंने जल्दी से पूछा,

“इस वक्त अंदर कौन है? मुझे उनसे मिलना है।”

गार्ड ने मुझे सिर से पाँव तक अजीब नज़रों से देखा।

“अंदर कोई नहीं है। जाओ यहाँ से।”

उसने बेहद बदतमीज़ी से जवाब दिया।

मैंने खुद को शांत रखते हुए कहा,

“देखिए, मेरी अभी उनसे फोन पर बात हो रही है। मुझे उनका नाम भी ठीक से नहीं पता, क्योंकि कस्टमर केयर कॉल पर ग्राहक का नाम और नंबर नहीं दिखाई देता। लेकिन जो भी अंदर हैं, वे किसी खतरे में हैं।”

मेरी बात सुनते ही गार्ड के चेहरे का रंग बदल गया।

शायद उसे मेरी बात पूरी तरह समझ नहीं आई थी, लेकिन उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ उभर आईं।

उसने तुरंत गेट खोला और तेज़ कदमों से अंदर बढ़ते हुए मुझे भी अपने पीछे आने का इशारा किया।

मेरी बात सुनते ही गार्ड के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई देने लगी थी। ऐसा लग रहा था कि उसे भी अंदाज़ा हो गया था कि अंदर कुछ गड़बड़ है।

बंगला जितना बाहर से आलीशान था, उससे कहीं ज़्यादा अंदर से खूबसूरत था। एक पल के लिए तो मैं उस चकाचौंध को देखकर भूल ही गया कि आखिर मैं यहाँ किस काम से आया था।

गार्ड ने मुझे रोकते हुए कहा,

“तुम यहीं रुको, मैं ठाकुर साहब को देखकर आता हूँ।”

यह कहकर वह तेजी से सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ ऊपर चला गया।

लेकिन मुश्किल से दो मिनट ही बीते होंगे कि वह घबराया हुआ वापस लौटा।

“ठाकुर साहब को शायद दिल का दौरा पड़ा है। आपको मेरी मदद करनी पड़ेगी। आइए!”

यह सुनते ही मैं उसके पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँच गया।

ऊपर का बेडरूम भी बेहद आलीशान था। कमरे की हर चीज़ विदेशी और बेहद महँगी लग रही थी। मेरी आँखें जैसे उस वैभव को देखकर चौंधिया गईं।

बिस्तर से कुछ दूर, एक कुर्सी के पास, एक व्यक्ति औंधे मुँह ज़मीन पर गिरा पड़ा था।

मैं तुरंत समझ गया कि यही ठाकुर उदय प्रताप सिंह हैं, जिनसे अभी कुछ देर पहले मेरी फोन पर बात हो रही थी।

मैंने हैरानी से गार्ड की ओर देखा।

“इतने बड़े बंगले में इस समय इनके अलावा कोई नहीं है?”

गार्ड ने सिर हिलाकर कहा,

“नहीं। इनके भाई का परिवार कई साल पहले अमेरिका शिफ्ट हो गया था। ठाकुर साहब यहाँ अकेले ही रहते हैं। कारोबार और सारी जायदाद भी खुद ही संभालते हैं।”

उसकी बात सुनकर मैं और भी हैरान रह गया।

कुछ ही देर बाद डॉक्टर और एक नर्स वहाँ पहुँच गए।

अंदर आते ही डॉक्टर ने पूछा,

“क्या हुआ ठाकुर साहब को? और तुम लोग कहाँ थे?”

मैं और गार्ड मिलकर ठाकुर साहब को उठाकर बिस्तर पर लिटा चुके थे।

लेकिन डॉक्टर मरीज को देखने के बजाय गार्ड पर ही बरस पड़े।

“मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि इन्हें अकेला मत छोड़ा करो!”

गार्ड ने घबराकर सफाई दी,

“डॉक्टर साहब, मैं बस थोड़ी देर पहले ही नीचे गया था। दवाइयाँ देकर आया था, लेकिन शायद ठाकुर साहब सोए नहीं थे।”

डॉक्टर ने अपने चश्मे के पीछे से मुझे घूरकर देखा।

“और ये कौन है?”

मैं कुछ बोलता, उससे पहले ही मैंने कहा,

“डॉक्टर साहब, पहले आप इनका चेकअप कीजिए। देखिए इन्हें क्या हुआ है।”

मुझे डॉक्टर का रवैया अजीब लगा। पहले मरीज की चिंता होनी चाहिए थी, लेकिन वह बेकार की बातों में समय गंवा रहे थे।

आखिरकार उन्होंने ठाकुर साहब का परीक्षण शुरू किया।

नर्स ने उनके हाथ में ड्रिप लगा दी और ब्लड प्रेशर चेक करने लगी।

गार्ड बेचैनी से पूछ बैठा,

“डॉक्टर साहब... क्या इन्हें फिर से हार्ट अटैक आया है?”

डॉक्टर ने मशीन की रिपोर्ट देखते हुए कहा,

“नहीं, हार्ट अटैक नहीं है। इनका ब्लड प्रेशर बहुत ज़्यादा बढ़ गया था। अगर थोड़ी और देर हो जाती, तो कार्डियक अटैक हो सकता था।”

यह सुनकर गार्ड ने राहत की साँस ली।

डॉक्टर ने कुछ इंजेक्शन लगाए और दवाइयाँ लिखीं। फिर गार्ड की तरफ देखकर बोले,

“आज रात तुम यहीं इनके पास रहोगे। नीचे दूसरा गार्ड है न?”

गार्ड ने तुरंत सिर हिलाकर मना कर दिया।

“नहीं डॉक्टर साहब। उसकी तबीयत ठीक नहीं है। इसलिए आज नीचे ड्यूटी पर भी मैं ही था।”

डॉक्टर कुछ क्षण चुप रहे। फिर उनकी नज़र मेरी तरफ गई, जैसे अब उन्हें याद आया हो कि कमरे में एक तीसरा व्यक्ति भी मौजूद है। उनकी आँखों में सवाल था—आखिर यह अनजान लड़का आधी रात को ठाकुर साहब के कमरे तक पहुँचा कैसे?

ठीक है, तुम नहीं रुक सकते तो ये रुक जाएंगे।

डॉक्टर को शायद लगा कि मैं ठाकुर साहब का कोई जानने वाला हूँ। इसलिए वह मुझे उनकी दवाइयों, इंजेक्शनों और बाकी ज़रूरी बातों के बारे में समझाने लगे। मैंने भी बिना कुछ कहे उनकी सारी बातें ध्यान से सुन लीं।

रात के चार बज चुके थे। सुबह होने में अभी थोड़ा समय बाकी था।

कुछ देर बाद डॉक्टर वहाँ से चले गए।

डॉक्टर के जाते ही गार्ड ने सवालिया नज़रों से मेरी तरफ देखा।

मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“कोई बात नहीं, मैं थोड़ी देर यहीं रुक जाता हूँ। तुम चिंता मत करो।”

मेरी बात सुनकर उसने राहत की साँस ली।

“पता नहीं ठाकुर साहब को क्या हो गया था। मैंने तो उन्हें दवाई भी दे दी थी। आपका बहुत-बहुत शुक्रिया कि आप समय पर आ गए। अगर देर हो जाती तो न जाने क्या हो जाता।”

मैंने कमरे में चारों तरफ नज़र दौड़ाते हुए पूछा,

“लेकिन इतने बड़े घर में अगर कोई इमरजेंसी हो जाए, तो ठाकुर साहब तुम्हें कैसे बुलाते हैं? इसके लिए यहाँ कोई इंतज़ाम होना चाहिए था न?”

गार्ड ने तुरंत जवाब दिया,

“है साहब। ठाकुर साहब के बेड के पास एक बेल लगी हुई है। जब भी उन्हें कुछ चाहिए होता है, वह उसे बजा देते हैं। लेकिन आज शायद अचानक तबीयत खराब हुई होगी, इसलिए वहाँ तक पहुँच ही नहीं पाए।”

गार्ड की बात सुनकर मैंने सिर हिला दिया।

कुछ देर तक वह मेरे साथ कमरे में ही बैठा रहा। फिर बंगले का चक्कर लगाने और नीचे की निगरानी करने के लिए चला गया।

अब कमरे में सिर्फ मैं और ठाकुर साहब रह गए थे।

कमरे में गहरी खामोशी पसरी हुई थी। सिर्फ ए.सी. की हल्की आवाज़ और मॉनिटर की धीमी बीप सुनाई दे रही थी।

मैं कुर्सी पर बैठा ठाकुर साहब को देख रहा था।

उनके चेहरे पर उम्र और अनुभव की गहरी लकीरें थीं। साफ़ पता चलता था कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी में बहुत कुछ देखा होगा।

मेरी नज़र अनायास ही कमरे में रखी महँगी सजावट, विदेशी फर्नीचर और आलीशान सामान पर चली गई।

तभी अचानक मुझे उस किताब में लिखा दूसरा तरीका याद आ गया।

"किसी ऐसे अमीर इंसान को ढूँढो जिसका कोई वारिस न हो..."

यह सोचकर मैं खुद ही हल्का-सा मुस्कुरा दिया।

कुछ घंटे पहले तक मुझे वह सलाह दुनिया की सबसे बेवकूफी भरी बात लग रही थी।

लेकिन इस वक्त मेरे सामने करोड़ों की जायदाद का मालिक एक बूढ़ा आदमी बेहोश पड़ा था, जो इस विशाल बंगले में लगभग अकेला रहता था।

मैंने तुरंत अपने मन को झटका।

“क्या सोच रहा हूँ मैं?” मैंने खुद से कहा।

जिस इंसान की जान बचाने के लिए मैं आधी रात को यहाँ तक भागा चला आया था, उसके बारे में ऐसे विचार आना भी गलत था।

फिर भी कहीं न कहीं मेरे मन के किसी कोने में एक अजीब-सा एहसास जन्म ले चुका था—जैसे किस्मत ने मेरे सामने कोई नया दरवाज़ा खोल दिया हो, और मैं अभी समझ नहीं पा रहा था कि उसके पीछे क्या छिपा है।