फार्महाउस के बाहर बिजली अभी भी कडक रही थी, लेकिन कबीर मेहरा के भीतर जो तूफान उठ रहा था, वह उस आसमानी बिजली से कहीं ज्यादा घातक और विनाशकारी था. सिया के जाने के बाद हॉल में पसरा सन्नाटा कबीर को किसी जहरीले सांप की तरह डस रहा था. उसे रह- रहकर सिया का वो चेहरा याद आ रहा था—आंसुओं से भीगा हुआ, लेकिन स्वाभिमान से तना हुआ.
कबीर ने अपने हाथ की मुट्ठी पूरी ताकत से दीवार पर दे मारी, जिससे वहाँ लगा कीमती प्लास्टर झड गया. उसका खून खौल रहा था, खुद पर नहीं, बल्कि उस सडे हुए तंत्र पर और उन दरिंदों पर जिन्होंने एक मासूम लडकी की जिंदगी को श्मशान बना दिया था. कबीर ने अपना सैटेलाइट फोन निकाला. यह वह फोन था जिसका इस्तेमाल वह तब करता था जब उसे किसी देश की सरकार हिलानी होती थी या किसी बडे युद्ध को रोकना होता था.
उसने एक ऐसा नंबर डायल किया जिस पर कॉल जाते ही दूसरी तरफ हडकंप मच गया। कबीर मेहरा बोल रहा हूँ, कबीर की आवाज में बर्फ जैसी ठंडक थी, लेकिन उसमें मौत का पैगाम और सत्ता का अहंकार छिपा था। जी. जी मेहरा साहब! जय हिंद सर! आदेश कीजिए, दूसरी तरफ से उत्तर प्रदेश के सबसे बडे पुलिस अधिकारी यानी डीजीपी की आवाज आई. उसकी आवाज में वो घबराहट थी जो तब होती है जब कोई यमराज से बात कर रहा हो.
वह जानता था कि कबीर मेहरा का एक गलत मूड उसकी वर्दी और उसकी पूरी खानदान की पहचान मिटा सकता है। लखनऊ का' आर्यन मर्डर केस' जिसे तुम लोगों ने चंद रुपयों की खातिर एक' एक्सीडेंट' बताकर फाइलों के ढेर में दफन कर दिया था. मुझे उस केस का मुख्य आरोपी, ठाकुर दिग्विजय सिंह और उसका वो बिगडैल बेटा, अगले दो घंटों के अंदर मेरे फार्महाउस की चौखट पर चाहिए.
और सुनो कमिश्नर, कबीर की आवाज और भी गहरी और डरावनी हो गई, अगले दस मिनट के अंदर उस आदमी की जितनी भी कंपनियां हैं, जितने विदेशी बैंक अकाउंट्स हैं, जितनी बेनामी संपत्तियाँ और यहाँ तक कि उसके नाम पर रजिस्टर्ड एक इंच जमीन भी फ्रीज (Freeze) हो जानी चाहिए. कल सुबह जब वो दरिंदा सोकर उठे, तो उसके पास भीख माँगने के लिए कटोरा भी अपना न हो.
और अगर इसमें एक मिनट की भी देरी हुई, तो कल सुबह लखनऊ का नया कमिश्नर कोई और होगा. क्या मैं साफ हूँ? बिल्कुल साफ हैं सर! बस दो घंटे. धरती- आसमान एक कर देंगे लेकिन वो आपके पास होगा, कमिश्नर ने थरथराते हुए जवाब दिया. कबीर ने बिना' थैंक यू' कहे फोन काट दिया. कबीर बालकनी में आकर खडा हो गया. उसने अपनी सिक्योरिटी टीम के हेड, मेजर विक्रम को इशारा किया.
" सिया कहाँ है? सर, वो फार्महाउस के बाहर वाले पुराने मंदिर की सीढियों पर बैठी है. वो कहीं नहीं जा रही, बस खाली नजरों से बारिश को देख रही है। नजर रखो उस पर. उसकी परछाईं को भी खरोंच आई या उसे ठंडी हवा भी लग गई, तो तुम सबके सिर कलम कर दूँगा, कबीर के इस आदेश ने वहां मौजूद ट्रेंड कमांडो की रीढ में भी सिहरन पैदा कर दी. कबीर का यह रूप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था. आज वह एक प्रेमी नहीं,
एक शिकारी था. उधर लखनऊ में प्रलय शुरू हो चुका था. जिस आदमी ने आर्यन की जान ली थी, उसका नाम था' ठाकुर दिग्विजय सिंह' वह खुद को लखनऊ का बेताज बादशाह समझता था,
जिसके एक इशारे पर नवाबों का शहर झुकता था. लेकिन जैसे ही कबीर मेहरा का नाम' सिस्टम' की नसों में गूँजा, पासा ही पलट गया.
दिग्विजय सिंह के आलीशान बंगले पर जब पुलिस की पचास गाडियाँ सायरन बजाती पहुँची, तो वह अपने ड्राइंग Room में शराब के नशे में चूर था। कमिश्नर! तुम्हारी शामत आई है क्या?
मेरी दहलीज पर कदम रखने की हिम्मत कैसे हुई? दिग्विजय सिंह अपनी सत्ता के नशे में दहाडा. कमिश्नर ने बिना एक शब्द कहे उसके चेहरे पर एक ऐसा तमाचा जडा कि वह सोफे से नीचे गिर गया. चुप कर कुत्ते! तेरी शामत नहीं, तेरा काल आया है. तूने उस इंसान से पंगा ले लिया है जिसके एक Call पर दिल्ली का सिंहासन हिल जाता है. कबीर मेहरा का हुक्म है—
तू आज सडक पर आएगा और घिसटता हुआ जाएगा.
अगले पंद्रह मिनटों के अंदर दिग्विजय सिंह की सारी अकड मिट्टी के ढेर की तरह ढह गई. कबीर के' फाइनेंशियल कमांडो' ने डिजिटल
स्ट्राइक कर दी थी. उसके सारे बैंक खाते एक- एक करके बंद हो रहे थे, उसके दिल्ली और मुंबई के आलीशान फ्लैट्स पर सरकारी ताला लटक गया और उसकी लग्जरी गाडियाँ क्रेन से उठाकर जब्त कर ली गईं.
वह आदमी जो कल तक करोडों की घडियों और रूतबे का मालिक था, अब फटे कपडों में पुलिस की जीप के पीछे वाली लोहे की जाली में बैठा अपनी जान की भीख माँग रहा था.
ठीक दो घंटे बाद, फार्महाउस के उसी भव्य ड्राइंग हॉल में जहाँ कुछ देर पहले सिया के चरित्र पर कीचड उछाला गया था, पुलिस की दो गाडियाँ चीखती हुई रुकीं. कबीर सोफे पर पैर पर पैर रखकर बैठा था, उसके हाथ में एक महंगा सिगार था जिसे उसने सुलगाया नहीं था, बस उसे अपनी आँखों की आग से जला देना चाहता था.
दिग्विजय सिंह को घसीटते हुए अंदर लाया गया. उसकी आँखों में पट्टी बंधी थी और उसके हाथ- पैर जंजीरों से जकडे हुए थे.
कौन. कौन हो तुम ?
क्यों तबाह कर दिया मुझे ?
दिग्विजय की आवाज में अब सिर्फ खौफ का कंपन था. कबीर अपनी जगह से उठा. उसके इतालवी जूतों की आवाज हॉल के सन्नाटे में किसी मौत की दस्तक जैसी गूँजी. उसने दिग्विजय के चेहरे के पास जाकर अपनी आवाज को फुसफुसाहट में बदला,
जो किसी तलवार की धार जैसी तेज थी. मैं वो हूँ जिसे तूने चुनौती दी थी. अनजाने में. तूने जिस आर्यन को सडक पर कीडे की तरह कुचला था, वो मेरा भाई था. और उसकी बहन, जिसे तूने लखनऊ से भागने पर मजबूर किया, वो कबीर मेहरा की सल्तनत की होने वाली मल्लिका है.
तूने सिर्फ एक लडके को नहीं मारा, तूने अपनी मौत के वारंट पर Sign किए थे। कबीर ने दिग्विजय के चेहरे पर अपना भारी जूता रखा और उसे धीरे- धीरे दबाया. दिग्विजय दर्द से चीख उठा, पर उस चीख को सुनने वाला कोई नहीं था. आज तेरा पैसा, तेरी साख और तेरा नाम सब राख हो चुका है. अब तू एक ऐसा जिंदा लाश है जिसे दुनिया थूकेगी।
कबीर ने अपने कमांडो को इशारा किया. इसे घसीटते हुए बाहर ले चलो. उस मंदिर तक, जहाँ इंसाफ का असली मंदिर इंतजार कर रहा है। सिया वहां पत्थर की मूरत बनी बारिश में भीग रही थी,
जब कबीर वहां पहुँचा. उसके पीछे कमांडो उस आधे मरे हुए और मिट्टी से सने दिग्विजय सिंह को कुत्तों की तरह घसीट रहे थे. कबीर ने उसे सिया के पैरों के ठीक पास पटक दिया. सिया ने चौंककर अपनी नजरें उठाईं। सिया! कबीर की आवाज में इस बार वो रूतबा नहीं, बल्कि एक रूहानी दर्द और पछतावा था.
ये रहा तुम्हारे भाई का कातिल. आज ये लखनऊ का बाहुबली नहीं है, आज ये सिर्फ एक भिखारी है जिसकी सांसें भी मेरी इजाजत की मोहताज हैं. इसका साम्राज्य, इसका घमंड और इसका वजूद—सब मैंने मिट्टी में मिला दिया है.
अब तुम तय करो कि इसके साथ क्या करना है. तुम चाहो तो इसे मार दो, तुम चाहो तो इसे हर दिन मरने के लिए छोड दो. कबीर मेहरा के हाथ अब तुम्हारे आदेश के गुलाम हैं। सिया ने अपनी धुंधली और सूजी हुई आँखों से उस आदमी को देखा.
वही आदमी जिसने आर्यन की लाश पर खडे होकर ठहाका लगाया था, आज उसी की बहन के पैरों की धूल चाट रहा था. सिया की रूह कांप गई, लेकिन उसे एक अजीब सा सुकून महसूस हुआ—ये सुकून बदले का नहीं, ये सुकून इंसाफ का था.
उसने कबीर की तरफ देखा, जिसकी आँखों में अब भी वही एक सवाल था—" क्या तुम अब भी मुझे पत्थर समझती हो ?
सत्ता का ये तांडव और एक भाई का ऐसा भीषण प्रतिशोध—क्या आपने कभी कल्पना की थी कि कबीर मेहरा सिया के सम्मान के लिए पूरे प्रदेश के' सिस्टम' को अपने जूतों के नीचे ले आएगा ?
सिया के एक आँसू की कीमत ने लखनऊ के सबसे बडे और पुराने साम्राज्य को एक पल में राख के ढेर में तब्दील कर दिया.
आज कबीर ने अपनी शक्ति का वो विकराल रूप दिखाया है जिसे देखकर उसके दुश्मन भी अपनी कब्रें खुद खोद लेंगे. लेकिन क्या एक दरिंदे को पैरों में गिरा देने से सिया के दिल का वो गहरा जख्म भर पाएगा?
क्या कबीर का ये खौफनाक प्रायश्चित सिया के टूटे हुए विश्वास को फिर से जोड पाएगा ?
क्या सिया उस कातिल को मौत की सजा देगी या उसे कानून के हवाले करके तिल- तिल मरने के लिए छोड देगी ?
काम्या बुआ, जो इस साजिश की असली सूत्रधार थीं,
क्या वो कबीर के इस खौफनाक रूप को देखकर भाग जाएंगी ?
आर्यन का अधूरा इंसाफ क्या अब कबीर और सिया के बीच की दूरियों को मिटा पाएगा ?
अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें. क्या आप कबीर के इस' डार्क और पावरफुल' अवतार से सहमत हैं ?
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