Ishq ka Ittefaq - 3 Alok द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Ishq ka Ittefaq - 3

कॉरिडोर का वो अंधेरा कोना अब भी कबीर मेहरा की भारी साँसों से सुलग रहा था.

सिया तो अपने सधे हुए कदमों से गेस्ट- हाउस की तरफ जा चुकी थी, लेकिन उसकी आखिरी बात—" देखते हैं पहले किसका गुरूर टूटता है" —कबीर के कानों में किसी पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थी.
कबीर ने गुस्से में अपने हाथ की मुट्ठी भींची और पास लगी नक्काशीदार दीवार पर दे मारी.

दर्द की एक तीखी लहर उसकी उंगलियों से होती हुई कंधे तक गई, पर उसका ध्यान अपनी हथेलियों के दर्द पर नहीं, बल्कि दिल के उस कोने पर था जो सिया के छूने भर से अजीब तरह से धडक उठा था.

तुम मेरा गुरूर तोडोगी सिया? जिस कबीर मेहरा के सामने बडी- बडी कॉपोरेट कंपनियाँ घुटने टेक देती हैं, उसे तुम मिट्टी में मिलाओगी? बहुत बडी भूल कर दी तुमने इस शेर के इलाके में कदम रखकर, कबीर ने खुद से फुसफुसाते हुए कहा.

उसकी आँखें नफरत और एक अनजानी कशिश के मिले- जुले सैलाब से लाल हो रही थीं। सुबह की पहली किरण जब मेहरा मेंशन के विशाल बगीचे पर पडी, तो घर का माहौल हमेशा से थोडा अलग था.

आज दिल्ली की उस तपती गर्मी में भी मेंशन के भीतर एक ठंडी खामोशी पसरी हुई थी. वजह थी—मेहरा खानदान के सबसे बडे और कडक मुखिया, यानी कबीर के दादाजी बलराज मेहरा का लंदन से अचानक वापस लौटना. बलराज मेहरा वो इंसान थे जिनके जूतों की आहट से भी पूरा मेहरा मेंशन कांप जाता था.

उनके साथ उनकी सगी छोटी बहन काम्या मेहरा और उनका बेटा विक्रम भी आए थे. काम्या हमेशा महंगे शिफॉन की साडियाँ पहनती थीं,

गले में मोतियों का हार रहता था, पर उनका दिमाग हमेशा से कबीर की कामयाबी से जलता था, और वो मेहरा एम्पायर में अपने बेटे विक्रम के लिए हिस्सा चाहती थीं.

डायनिंग टेबल पर नाश्ता लग चुका था. कबीर अपने थ्री- पीस सूट में हमेशा की तरह रौबदार लग रहा था, लेकिन उसकी आँखों के नीचे की हल्की सी सूजन गवाही दे रही थी कि वो रात भर सो नहीं पाया था.

तो कबीर, सुना है तुमने घर में किसी ऐरी- गैरी लडकी को माँ जी की फिजियोथैरेपिस्ट बनाकर रख लिया है? काम्या ने चाय का कप उठाते हुए अपनी पतली सी आवाज में जहर घोला. उनके चेहरे की बनावटी मुस्कान में चालाकी साफ झलक रही थी.

कबीर ने अपनी ब्रेड- टोस्ट काटने वाली छुरी को प्लेट पर थोडा जोर से रखा. इससे पहले कि वो कुछ बोलता, बलराज मेहरा ने अपनी कडक आवाज में कहा, काम्या! मेहरा मेंशन का फैसला कबीर करता है. अगर उसने किसी को रखा है, तो सोच- समझकर ही रखा होगा.

हालांकि बलराज जी की आँखों में कबीर के लिए गर्व था, लेकिन कडा अनुशासन भी साफ दिख रहा था। अरे बडे पापा, बात रखने की नहीं है, विक्रम ने अपनी प्लेट में ऑमलेट लेते हुए तंज कसा, बात साख की है.

मैंने सुना है कि उस लडकी ने पहले ही दिन भाई साहब की महँगी गाडी का शीशा तोडा और फिर भी वो इस घर में ऐश कर रही है. कहीं ऐसा तो नहीं कि कबीर भाई. उस लडकी के किसी जाल में.
विक्रम!
कबीर की आवाज डाइनिंग हॉल में बब्बर शेर की दहाड की तरह गूंजी. उसने अपनी सीट से उठते हुए विक्रम की तरफ देखा, उसकी आँखों में साफ गुस्सा दिख रहा था। अपनी जुबान को लगाम दो. कबीर मेहरा किसी के जाल में नहीं फंसता. और वो लडकी यहाँ सिर्फ दादी के इलाज के लिए है. जिस दिन उसका काम खत्म, वो यहाँ से बाहर.


ठीक उसी वक्त, हॉल के बडे दरवाजे से सिया ने प्रवेश किया. उसने हल्के नीले रंग का साधारण सा सूट पहना हुआ था, बाल पीछे बंधे थे और हाथ में मेडिकल फाइल थी. उसके चेहरे पर सुबह की ताजगी और एक अजीब सा ठहराव था. डाइनिंग टेबल पर बैठे नए चेहरों को देखकर वो एक पल के लिए रुकी, पर उसने अपने कदम डगमगाने नहीं दिए.
उसने डरते- डरते दरवाजा खोला. सामने मोबाइल की फ्लैशलाइट के धुंधलके में कोई लंबा सा साया खडा था. जैसे ही रोशनी उस चेहरे पर पडी, सिया के होश उड गए. वो कोई और नहीं, बल्कि कबीर मेहरा था.

उसके हाथ में एक बडी सी जलती हुई लालटेन थी और उसके चेहरे पर एक अजीब सी, रहस्यमयी खामोशी थी. कबीर ने बिना कुछ बोले कमरे के भीतर कदम रखा. लालटेन की पीली, कांपती रोशनी ने दोनों के चेहरों को एक बेहद खूबसूरत और डरावने उजाले से भर दिया था। तुम. तुम यहाँ इस वक्त क्या कर रहे हो?

सिया ने अपनी आवाज को मजबूत करने की कोशिश की, पर उसकी सांसें फूल रही थीं. कबीर ने लालटेन को टेबल पर रखा, जहाँ फाइलों का ढेर लगा था. वह धीरे- धीरे सिया की तरफ बढा. कमरे में सिर्फ आंधी का शोर था और उन दोनों के दिलों की धडकनें.

कबीर ने सिया को सीधे दीवार की तरफ धकेलना शुरू किया, जब तक कि सिया की पीठ ठंडी दीवार से नहीं टकरा गई. कबीर ने अपने दोनों हाथ सिया के सिर के दोनों तरफ दीवार पर टिका दिए. सिया पूरी तरह कबीर के मजबूत जिस्म के घेरे में कैद हो चुकी थी.

मैं यह देखने आया था, सिया. कि तुम्हारी बर्दाश्त की कीमत कितनी है. बिजली जा चुकी है, लैपटॉप बंद होने वाला है. अब कैसे पूरा करोगी मेरा टास्क? कबीर की आवाज बेहद धीमी, गहरी और सिया के कानों के पास किसी मदहोश कर देने वाले संगीत की तरह गूंजी. उसकी गर्म सांसें सिया के गालों को छू रही थीं.

सिया ने अपनी नजरें कबीर की उन भूरी, गहरी आँखों में गडा दीं. इस बेहद करीबी फासले ने दोनों के बीच की नफरत को एक पल के लिए पिघलाकर रख दिया था.

दोनों के बीच की कशिश इतनी बढ चुकी थी कि हवा में भी एक अजीब सा तनाव महसूस हो रहा था. यहाँ से उनके बीच की वो नफरत की दरार हल्की सी सिमटने लगी थी। मिस्टर मेहरा. आंधियां सिर्फ दीये बुझाती हैं,

इरादे नहीं, सिया ने कबीर के ठीक सामने अपनी सांसों को काबू करते हुए कहा. कबीर ने कुछ नहीं कहा. वह बस सिया के चेहरे को देखता रहा, जहाँ डर का एक कतरा भी नहीं था, सिर्फ एक गजब की कशिश थी.

कबीर का हाथ धीरे से दीवार से हटा और उसकी उंगलियां सिया के चेहरे पर बिखरी एक आवारा जुल्फ को छूते हुए उसके कान के पीछे ले गईं. कबीर का यह स्पर्श इतना अनपेक्षित और कोमल था।.

कि सिया की आँखें अपने आप बंद हो गईं. दोनों के दिलों की धडकनें एक सुर में बजने लगी थीं. नफरत के पीछे छुपा वो अनदेखा प्यार अब धीरे- धीरे सिर उठा रहा था.

क्या कबीर की यह नजदीकी सिया को झुकाने की कोई नई साजिश थी,

या उसके अपने पत्थर दिल के पिघलने की शुरुआत? क्या काम्या और विक्रम की मौजूदगी मेहरा मेंशन में इन दोनों की जिंदगी में कोई नया तूफान लाने वाली थी?

क्या सुबह होने तक सिया इस नामुमकिन चुनौती को पूरा कर पाएगी, या कबीर के इस खामोश वार के आगे हार मान जाएगी. ??

क्या दोनों के बीच की ये गहरी दरार अब मिटकर एक अनजाने और खूबसूरत प्यार में बदलने वाली थी?

,,,,,जानने के लिए देखिए अगला अध्याय! ????,,,,,