Ishq ka Ittefaq - 11 Alok द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

Ishq ka Ittefaq - 11

रात के दो बज रहे थे जब कबीर की काली एसयूवी मेहरा मेंशन के भारी गेट को खोलती हुई अंदर दाखिल हुई. हेडलाइट्स की तेज रोशनी में सफेद गुलाब के पौधे थरथरा रहे थे, मानो वो भी इस नई हलचल को महसूस कर रहे हों. कबीर ने गाडी का इंजन बंद किया, पर उसका हाथ स्टीयरिंग व्हील पर ही जमा रहा. उसके बगल वाली सीट पर सिया बैठी थी, जिसकी नजरें बाहर अंधेरे में कहीं खोई हुई थीं.

पूरे रास्ते दोनों के बीच एक शब्द का भी लेन- देन नहीं हुआ था. कबीर ने बिना सिया की तरफ देखे, ठंडी आवाज में कहा, पहुँच गए हम. सुनील तुम्हारा सामान अंदर रखवा देगा। सिया ने एक गहरी सांस ली. उसके चेहरे पर न तो वापस आने की खुशी थी और न ही कोई डर. उसने अपनी उंगलियों से साडी का पल्लू कसकर पकडा और दरवाजा खोलकर बाहर निकल गई.


कबीर उसके पीछे- पीछे अंदर आया. जैसे ही दोनों ने हॉल में कदम रखा, सामने का नजारा देखकर सिया के कदम ठिठक गए. हॉल की लाइटें पूरी तरह जली हुई थीं. सोफे पर काम्या बुआ अपने हाथ में जूस का गिलास लिए बैठी थीं, और उनके पास मिसेज खन्ना और घर के दो- तीन और रिश्तेदार मौजूद थे.


शायद वो लोग रात के इस पहर भी कबीर के आने का इंतजार कर रहे थे या फिर सिया की' हार' का तमाशा देखना चाहते थे। वाह! तो आखिर लौट ही आई तुम? काम्या बुआ अपनी जगह से उठीं, उनके स्वर में वही पुरानी जहरीली मिठास थी.


" कबीर बेटा, मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि तुम इसे फिर से इस घर में ले आए. लखनऊ में क्या कम बदनामी हुई थी जो अब दिल्ली में भी इसे पाल रहे हो? सिया ने कबीर की तरफ नहीं देखा, उसने सीधे काम्या बुआ की आँखों में आँखें डालीं. उसकी आवाज आज पहले से कहीं ज्यादा स्थिर और भारी थी. काम्या जी, अपनी गलतफहमी दूर कर लीजिये. मैं यहाँ अपनी मर्जी से या इस आलीशान महल की चमक देखकर नहीं आई हूँ. मैं यहाँ सिर्फ और सिर्फ गायत्री दादी के लिए आई हूँ.


मेरे लिए मेरा मरीज सबसे ऊपर है, और रही बात आपके इस घर की, तो इसकी दिवारों से मुझे आज भी उतनी ही नफरत है जितनी उस रात थी।


हॉल में सन्नाटा पसर गया. मिसेज खन्ना ने कुछ कहना चाहा, पर सिया ने उन्हें मौका ही नहीं दिया. मैं यहाँ एक डॉक्टर के तौर पर आई हूँ, और जब तक दादी खतरे से बाहर नहीं होतीं, मैं यहीं रुकूँगी. लेकिन याद रहे, मेरी और आपकी सीमाएँ अलग हैं. मेरे काम के बीच में कोई नहीं आएगा।

कबीर, जो अब तक पीछे खडा था, अपनी जेबों में हाथ डाले आगे बढा. उसका चेहरा आज भी पत्थर जैसा सख्त था. उसने बुआ की तरफ देखा और कडक आवाज में बोला, बुआ, सिया ने जो कहा वो आपने सुन लिया होगा. दादी की हालत नाजुक है और इस वक्त सिया के अलावा उन पर किसी और का हाथ असर नहीं कर रहा. तो बेहतर होगा कि आप और आपके ये मेहमान अपने- अपने कमरों में जाएँ और सिया को अपना काम करने दें.


कबीर ने माफी नहीं माँगी, न ही उसने सिया का बचाव किया. उसने बस अपनी' हुकूमत' दिखाई. वह अब भी वही कबीर मेहरा था जो आदेश देना जानता था. सिया बिना एक पल गंवाए सीधे गायत्री दादी के कमरे की तरफ बढ गई. कमरे का दरवाजा खोलते ही उसे दवाइयों की वही कडवी गंध महसूस हुई.


दादी ऑक्सीजन मास्क लगाए बेजान सी पडी थीं. मॉनिटर पर उनकी दिल की धडकनें बहुत धीमी चल रही थीं. बलराज दादाजी कोने में एक कुर्सी पर बैठे सिर झुकाए हुए थे। दादाजी. सिया ने मद्धम आवाज में पुकारा. दादाजी ने जैसे ही सिर उठाया,

उनकी थकी हुई आँखों में एक नई उम्मीद जाग उठी. सिया बिटिया! तू आ गई? मुझे पता था कबीर तुझे जरूर ढूँढ लाएगा। सिया ने उनके पैर छुए और तुरंत दादी के बेड के पास जाकर उनकी नब्ज Check करने लगी. उसने देखा कि दादी का शरीर ठंडा पड रहा था. सिया ने तुरंत अपना मेडिकल बैग खोला.


अगले एक घंटे तक कमरे में सिर्फ खामोशी और सिया की तेज हरकतें थीं. उसने दादी के पैरों की मालिश शुरू की, उन्हें एक विशेष इंजेक्शन दिया जो वह हमेशा अपने पास रखती थी, और धीरे- धीरे उनके कानों में कुछ बुदबुदाने लगी। दादी, मैं आ गई हूँ. देखिये, आपकी सिया यहाँ है.


आपको मेरे लिए उठना होगा। करीब तीन बजे के आसपास, मॉनिटर पर एक चमत्कार सा हुआ. वो सीधी होती हुई लकीरें अचानक ऊपर- नीचे होने लगीं. गायत्री दादी की उंगलियों में हरकत हुई. उन्होंने धीरे से अपनी आँखें खोलीं और सामने सिया का धुंधला सा चेहरा देखकर उनके सूखे होंठों पर एक बहुत ही हल्की सी मुस्कान आई। दवा. दवा दे. दादी ने फुसफुसाया.


सिया ने अपने हाथों से दादी को पानी पिलाया और दवा दी. बलराज दादाजी ने ये नजारा देखा तो उनकी आँखों से आँसू छलक पडे. कबीर दरवाजे पर खडा ये सब देख रहा था. उसके चेहरे पर अब भी कोई भाव नहीं था, पर उसकी मुट्ठियाँ जो अब तक कसी हुई थीं, थोडी ढीली पड गईं

सिया कमरे से बाहर निकली. उसका चेहरा थकान से पीला पड रहा था. कबीर वहीं गैलरी में खडा था. उसने सिया का रास्ता रोका. दादी अब ठीक हैं? कबीर ने सीधे सवाल किया। खतरे से बाहर हैं, पर पूरी तरह ठीक नहीं. उन्हें अभी बहुत देखभाल की जरूरत है, सिया ने रूखेपन से जवाब दिया. वह कबीर के बगल से निकलना चाहती थी, पर कबीर ने अपनी बांह फैलाकर रास्ता रोक दिया.

तुमने कहा था कि तुम सिर्फ दादी के लिए आई हो, कबीर ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा. अच्छी बात है. क्योंकि मैं भी तुम्हें यहाँ सिर्फ उन्हीं के लिए लाया हूँ. मेहरा मेंशन में तुम्हारी जगह वही रहेगी जो एक कर्मचारी की होती है. ये मत सोचना कि दादी के ठीक होने से तुम्हारे और मेरे बीच कुछ बदल जाएगा।


सिया ने अपनी नजरें नहीं झुकाईं. उसने कबीर के सीने पर उंगली रखकर उसे पीछे धकेला. मिस्टर मेहरा, आपकी इस गलतफहमी को दूर कर दूँ— मुझे आपसे या आपके इस नामी खानदान से कोई लगाव नहीं है. मैं यहाँ अपनी ड्यूटी कर रही हूँ.


और जिस दिन दादी अपने पैरों पर खडी हो गईं, उस दिन मैं इस घर की धूल भी अपने साथ नहीं ले जाऊँगी. अपनी ये' अकड' संभाल कर रखिये, शायद आपके बिजनेस में काम आए, मेरे सामने इसकी कोई कीमत नहीं है। सिया अपने पुराने कमरे की तरफ बढ गई और कबीर वहीं गलियारे में अकेला खडा रह गया.


उसने कभी किसी लडकी को अपने सामने इतना ऊँचा बोलते नहीं सुना था. उसका ईगो उसे कह रहा था कि सिया को उसकी' औकात' दिखाए, पर उसका अंतर्मन जानता था कि इस लडकी के बिना उसका घर श्मशान बन गया था.

रात अब ढलने को थी, पर मेहरा मेंशन की दिवारों के पीछे नफरत और स्वाभिमान की एक नई जंग शुरू हो चुकी थी. कबीर ने खिडकी से बाहर देखते हुए अपनी जेब से वो सिया का पुराना दुपट्टा निकाला जो उसने लखनऊ में पकडा था, और उसे तेज झटके के साथ दराज में बंद कर दिया.


प्रिय पाठकों, इस कहानी के हर शब्द को मैंने अपनी भावनाओं और कडी मेहनत से पिरोया है. एक- एक दृश्य को जीवंत करने और उसे लिखने में बहुत समय और हृदय की गहराई लगती है. मुझे इस सफर में आप सबके साथ और अटूट प्रेम की बहुत आवश्यकता है. यदि आपको मेरी यह छोटी सी कोशिश अच्छी लग रही है, तो कृपया अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें.


आपका एक लाइक, कमेंट और फॉलो मुझे और भी बेहतर लिखने की प्रेरणा प्रदान करता है. आपके स्नेह के बिना यह कहानी अधूरी है.

क्या सिया की वापसी से काम्या बुआ कोई नया षड्यंत्र रचेंगी ?

क्या कबीर का ईगो उसे सिया की अच्छाई देखने देगा या वो उसे और नीचा दिखाने की कोशिश करेगा ?

क्या दादी की सेहत में सुधार कबीर और सिया के रिश्तों की बर्फ को पिघला पाएगा ?

आगे का एपिसोड काफी धमाकेदार है, जानने के लिए देखिए अगला अध्याय,,,,,,