दिल्ली के सबसे महंगे इलाके में खडा आलीशान मेहरा मेंशन. कबीर मेहरा की आँखों में सुलगता बदला और सिया का वो स्वाभिमान जो किसी के आगे झुकने को तैयार नहीं था. कबीर ने सिया को इस घर से भगाने के लिए जो पहली चाल चली, क्या सिया उसमें फंस जाएगी? या फिर कबीर का ये दांव उसी पर उल्टा पडने वाला है?
दिल थाम कर बैठिए, क्योंकि नफरत और जिद की ये जंग अब और भी खतरनाक मोड लेने वाली है!
दिल्ली की उमस भरी रात आज कुछ ज्यादा ही भारी लग रही थी।.
हवा में एक अजीब सी घुटन थी, ठीक वैसी ही घुटन जैसी इस वक्त कबीर मेहरा के दिल के अंदर महसूस हो रही थी. कबीर अपने आलीशान कमरे की बालकनी में खडा था. हाथ में ब्लैक कॉफी का मग था, पर उसकी कडवाहट भी कबीर के दिमाग को शांत नहीं कर पा रही थी. उसकी आँखें गुस्से से लाल थीं और रह- रहकर उसकी मुट्ठी कडकडा रही थी. उसने नीचे बडे से Garden की तरफ देखा, जहाँ सिया एक पुराना सा छाता लेकर गेस्ट- हाउस की तरफ जा रही थी.
अचानक हुई बूंदाबांदी के बीच वह तेज कदमों से बढ रही थी, पर रुकी नहीं. कबीर ने ठंडी सांस ली और कॉफी का एक घूंट भरा. कबीर ने अपने हाथ की मुट्ठी जोर से भींची. दादी की कसम देकर तुमने इस घर में कदम तो रख लिया सिया, पर ये मेहरा मेंशन अब तुम्हारे लिए एक ऐसा पिंजरा बनेगा जहाँ से तुम खुद भागने का रास्ता ढूंढोगी, कबीर ने खुद से बुदबुदाया. वह हार मानने वालों में से नहीं था.
उसके लिए सिया सिर्फ एक मामूली लडकी नहीं थी, बल्कि उसके आत्मसम्मान पर लगा एक दाग थी जिसे वह हर हाल में मिटाना चाहता था. उधर, गेस्ट- हाउस के छोटे से कमरे में सिया अपनी फटी हुई स्कूटी की चाबी को देख रही थी. उसके घुटने पर पट्टी बंधी थी, जिसमें से हल्का- हल्का दर्द अब भी उभर रहा था.
उसकी आँखों में आंसू थे, पर वो कमजोरी के नहीं, बल्कि संघर्ष के थे. उसने खिडकी से मुख्य मेंशन की ओर देखा, जहाँ कबीर के कमरे की लाइट अभी भी जल रही थी. उसने खुद से कहा, तुमने आज तक सिर्फ लोगों को झुकना सिखाया है Mister मेहरा, पर इस बार पाला एक ऐसी लडकी से पडा है जो टूट सकती है,
पर झुक नहीं सकती. उसे पता था कि आने वाली सुबह उसके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगी, और उसे हर वार का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।
अगली सुबह: पहली चाल,,,,,,,,,
सुबह के ठीक छह बजे थे. दिल्ली की सडकों पर अभी गाडियों का शोर शुरू नहीं हुआ था, पर मेहरा मेंशन के अंदर एक खामोश जंग की शुरुआत हो चुकी थी. कबीर अपने पर्सनल जिम से एसी की ठंडक के बीच वर्कआउट करके पसीने में लथपथ बाहर निकला.
उसके बदन की नसें खिंची हुई थीं और उसका मूड हमेशा की तरह उखडा हुआ था. जैसे ही वह नीचे आया, उसने देखा कि सिया किचन में खडी दादी के लिए कोई हर्बल काढा तैयार कर रही थी. उसकी सादगी और उसका शांत चेहरा कबीर को और ज्यादा उकसा रहा था. कबीर ने अपनी तौलिया कंधे परडाली और दबे पाँव उसके पीछे जाकर खडा हो गया.
बिल्कुल सही जगह पर हैं और कमरा भी साफ है, सिया ने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा. उसकी आवाज में थकान थी, पर गर्व भी था. कबीर ने टेबल की तरफ कदम बढाया. उसने फाइलों को देखा, उसकी जिद को गहरी ठेस पहुँची थी कि इस लडकी ने इतनी जल्दी हार क्यों नहीं मानी.
उसका अहंकार जाग उठा. उसने जानबूझकर अपना हाथ आगे बढाया और' गलती' से अपनी पूरी गरम कॉफी उन जरूरी फाइलों पर गिरा दी, जिन्हें सिया ने अभी- अभी काफी समय लगाकर साफ किया था. ओह! आई एम सो सॉरी. मेरा हाथ फिसल गया. वैसे भी मुझे ये फाइलें कुछ खास पसंद नहीं आ रही थीं, कबीर ने बहुत ही बनावटी, ठंडे और क्रूर लहजे में कहा.
कॉफी की वजह से सारे कागज काले पड गए और सिया की मेहनत पल भर में खराब हो गई. सिया का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा. उसकी आँखों में अंगारे दहक रहे थे और वह कांपने लगी. यह आपने जानबूझकर किया है कबीर मेहरा! आप इतने गिर सकते हैं, मैंने अपने सपनों में भी नहीं सोचा था! आप इंसान नहीं, पत्थर हैं!
साबित कर सकती हो कि मैंने जानबूझकर किया? कबीर ने उसकी आँखों में झांकते हुए चुनौती दी, उसकी आवाज में एक अजीब सी जीत का नशा था. अब ये गंदी फाइलें मुझे नहीं चाहिए. इन्हें फिर से सुखाओ, नए कवर चढाओ और दोबारा सेट करो.
रात के खाने तक ये टेबल साफ होनी चाहिए, वरना दादी से शिकायत करूँगा कि तुम अपना काम ठीक से नहीं कर रही हो और कामचोर हो. कबीर के जाने के बाद सिया के सब्र का बांध टूट गया. वह जमीन पर बैठ गई और उसकी आँखों से एक आंसू टपका, पर उसने तुरंत अपनी हथेली से उसे पोंछ लिया.
उसने सोचा, अगर मैं आज भाग गई, तो इस अकडू का घमंड कभी नहीं टूटेगा. माँ ने कहा था कि हक के लिए लडना पडता है. उसने हार मानने के बजाय उन भीगी हुई फाइलों को फिर से उठाना शुरू कर दिया।.
रात का सन्नाटा और पलटवार रात के नौ बज रहे थे.
मेंशन के डाइनिंग हॉल में झूमर की रोशनी जगमगा रही थी. कबीर डाइनिंग टेबल पर बैठा दादी के साथ डिनर कर रहा था. उसके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी. उसे पूरा यकीन था कि सिया अभी तक ऊपर कमरे में रो रही होगी, भूखी- प्यासी होगी और अपना सामान पैक कर रही होगी. तभी सीढियों से उतरने की आवाज आई.
कबीर ने हाथ में पकडा हुआ चम्मच रोका और सिर उठाकर देखा. सिया नीचे आ रही थी. उसके कपडे धूल से सने थे, बाल थोडे बिखरे थे, लेकिन उसके चेहरे पर हार का कोई निशान नहीं था. उसकी चाल में वही पुराना आत्मविश्वास था.
वह सीधे डाइनिंग एरिया में आई और कबीर के सामने खडी हो गई. Mister मेहरा, आपकी कॉफी वाली फाइलें बिल्कुल साफ हो चुकी हैं. मैंने उनके पन्नों को सुखाकर नए कवर चढा दिए हैं. अब वो पहले से भी ज्यादा बेहतर और साफ लग रही हैं.
आपकी टेबल बिल्कुल रेडी है, सिया ने मुस्कुराकर बहुत ही शांत आवाज में कहा. कबीर का निवाला उसके गले में अटक गया. उसकी भृकुटियाँ तन गईं और चेहरा गुस्से से काला पड गया. तुम. तुमने फिर से कर दिया? दादी ने सिया को देखा और चिंतित हो गईं, अरे सिया बेटी, तुम इतनी थकी हुई क्यों लग रही हो? चेहरे पर इतनी धूल क्यों है? क्या हुआ है तुम्हें? कुछ नहीं दादी, बस Mister मेहरा के कुछ जरूरी कागजात ठीक कर रही थी, वो थोडे बिखर गए थे, सिया ने कबीर को बहाना बनाने का मौका ही नहीं दिया.
चलिए दादी, आप खाना खाइए, मैं आपको दवाई देती हूँ. पूरे डिनर के दौरान कबीर सिर्फ सिया को घूरता रहा, जैसे वह कोई पहेली हो. उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस मामूली सी लडकी में इतनी हिम्मत, जिद और बर्दाश्त करने की ताकत कहाँ से आ रही है. वह जितना उसे तोडना चाह रहा था, वह उतनी ही मजबूती से सामने खडी हो रही थी.
वहीं सिया चुपचाप अपना काम कर रही थी, पर उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो कबीर के अंदर एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर रही थी. डिनर के बाद, जब सिया अपने कमरे की तरफ जा रही थी, कबीर ने उसे कॉरिडोर के अंधेरे कोने में रोक लिया. उसने आगे बढकर सिया का रास्ता रोका और उसे दीवार से सटा दिया.
ये तो बस पहला दिन था सिया. कल इससे भी बुरा होगा. कबीर मेहरा की नफरत झेलना आसान नहीं है, तुम टूट जाओगी, कबीर ने बहुत धीमी और डरावनी आवाज में उसे चेतावनी दी. सिया रुकी, उसने कबीर के हाथ को धीरे से झटका देकर दूर किया और उसकी आँखों में आँखें डालकर निडरता से बोली, Mister मेहरा, आप मुझे जितना गिराने की कोशिश करेंगे, मैं उतना ही ऊपर उठूँगी.
आपने अपनी गाडी के शीशे की कीमत तो देख ली, अब जरा मेरी बर्दाश्त की कीमत भी देख लीजिये. देखते हैं पहले किसका गुरूर टूटता है? सिया वहाँ से पलटकर सीधे गेस्ट- हाउस की तरफ चली गई, पर कबीर वहीं अंधेरे में खडा रह गया.
दिल्ली की इस भारी और गर्म हवा में भी उसका बदन गुस्से और एक अजीब सी कशिश से तप रहा था. पहली बार किसी ने उसे उसकी ही भाषा में चुनौती दी थी और उसका दिल जोर से धडक रहा था.
मेहरा मेंशन की दीवारों ने आज एक नए और भयानक युद्ध की शुरुआत देख ली थी।. क्या कबीर का अगला वार सिया को हमेशा के लिए तोड पाएग ?? या क्या सिया कबीर के इस पत्थर दिल को पिघलाने में कामयाब होगी ???? जानने के लिए देखिए अगला ,,,,,,??,,,,,,, अध्याय,,,,,,,,