मेहरा मेंशन की सुबह आज कुछ ज्यादा ही हलचल भरी थी. गायत्री दादी अब बिना सहारे के हॉल तक आने लगी थीं, और इसका पूरा श्रेय सिया की उस कडी मेहनत और दिन- रात की थेरेपी को जाता था. बलराज दादाजी के चेहरे पर बरसों बाद एक सुकून वाली मुस्कान थी,
पर इस सुकून के नीचे एक बहुत बडी आग सुलग रही थी. काम्या बुआ, जो सुबह से ही घर से गायब थीं, वो किसी पार्टी की शॉपिंग करने नहीं, बल्कि सिया की जडों को खोदने निकली थीं. उन्हें यकीन था कि इस मासूम चेहरे के पीछे कोई न कोई काला राज जरूर छिपा है। दिल्ली की चिलचिलाती धूप में, काम्या बुआ ने अपना चेहरा एक महंगे रेशमी दुपट्टे से ढका हुआ था.
वह एक संकरी और धूल भरी गली में खडी थीं, जहाँ छोटे- छोटे मकान एक- दूसरे से सटे हुए थे और चारों तरफ शोर- शराबा था. यह वो मोहल्ला था जहाँ सिया मेहरा मेंशन आने से पहले एक बहुत ही साधारण से किराए के कमरे में रहती थी. काम्या ने एक पान की दुकान वाले के पास जाकर अपनी आवाज को थोडा धीमा किया और आँखों पर काला चश्मा चढा लिया.
" भैया, जरा सुनना. यहाँ वो डॉक्टर लडकी रहती थी ना, सिया. उसके बारे में कुछ पता है क्या?
मैं उसकी दूर की रिश्तेदार हूँ और उसे कुछ जरूरी कागजात देने आई हूँ। पान वाले ने अपनी पीक पास की नाली में थूकी और काम्या को ऊपर से नीचे तक शक की नजरों से देखा.
काम्या का रईसी अंदाज उस गली के लिए बिल्कुल अजनबी था। अरे मालकिन, उस लडकी की बात मत पूछिए. बहुत रहस्यमयी थी वो. मोहल्ले में किसी से ज्यादा बात नहीं करती थी. फिर एक रात चुपचाप अपना बैग उठाया और रातों- रात गायब हो गई.
लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि उसके पीछे उसके पुराने शहर के कुछ' खतरनाक' और रसूखदार लोग पडे थे. वो यहाँ भी किसी डर के साए में छुपकर ही रह रही थी, पान वाले ने अपनी दुकान का गल्ला सहेजते हुए बताया. काम्या की आँखों में एक जहरीली चमक आ गई. उनकी मेहनत रंग ला रही थी. खतरनाक लोग?
किस तरह के लोग ? क्या वो यहाँ किसी से मिलती थी?
अब ये तो हमें नहीं पता मालकिन, पर सुना है किसी बहुत बडे खानदानी रसूख वाले बंदे से अपनी जान और इज्जत बचाकर भाग रही थी वो. यहाँ भी जब कोई अजनबी गाडी आती थी, तो वो कमरा अंदर से बंद कर लेती थी. बाकी तो आप उस कोने वाली चाची से पूछिए, वो हर किसी के घर में ताक- झांक करती रहती हैं, पान वाले ने उंगली से इशारा किया.
काम्या बुआ के चेहरे पर एक डरावनी और विजयी मुस्कान आई. उन्होंने मन ही मन बुना, तो सिया रानी. तुम सिर्फ डॉक्टर नहीं हो, तुम एक भगोडी हो. कबीर को जब पता चलेगा कि वो जिस लडकी को' इमानदार और शरीफ' समझ रहा है,
उसका पास्ट इतना दागदार है, तो वो खुद तुम्हें धक्के मारकर घर से निकालेगा. मेहरा खानदान की साख उसे अपनी जान से ज्यादा प्यारी है.
इधर मेहरा मेंशन में, कबीर अपने स्टडी Room में बैठा था. उसका मूड आज कुछ उखडा- उखडा सा था. दादी की तबीयत सुधरने की खुशी तो थी, पर सिया का वो बेबाक अंदाज, उसकी वो ऊँची आवाज और उसका निडर होकर बात करना कबीर को अब भी चुभता था. कबीर को आदत थी कि लोग उसके सामने झुककर बात करें,
पर सिया उसकी आँखों में आँखें डालकर उसे आईना दिखा देती थी. कबीर ने अपने मैनेजर को केबिन में बुलाया. सुनील, कल शाम के लिए एक छोटी सी पार्टी ऑर्गनाइज करो. सिर्फ हमारे बहुत ही करीबी लोग और खास बिजनेस पार्टनर्स ही आएंगे.
दादी अब बिना सहारे के चलने लगी हैं, तो उनकी इस रिकवरी की खुशी में यह जश्न जरूरी है. और हाँ. सादगी का खास ध्यान रखना, मुझे फालतू का दिखावा जरा भी पसंद नहीं है.
जैसे ही यह खबर पूरे मेंशन में फैली, नौकर- चाकर काम में जुट गए. बगीचे में नई लाइटें लगने लगीं और हॉल के बडे झाड- फानूस साफ होने लगे. सिया जब गायत्री दादी को दोपहर की दवाई देकर नीचे आ रही थी,
तो उसने कबीर को हॉल के बीच में खडे होकर नौकरों को निर्देश देते देखा. कबीर ने आज एक सफेद लिनन की शर्ट पहनी थी जिसके ऊपर के दो बटन खुले थे.
उसका वही पुराना' मेहरा वाला गुरूर' उसके चेहरे और खडे होने के अंदाज में साफ दिख रहा था. वह किसी राजा की तरह आदेश दे रहा था। लगता है जश्न की तैयारियाँ बहुत जोरों पर हैं? मुझे लगा कबीर मेहरा को सिर्फ अपनी जीत का शोर पसंद है,
दादी की मुस्कान का नहीं, सिया ने सीढियों से उतरते हुए अपनी आदत के मुताबिक तंज कसा. कबीर अपनी जगह रुका और अपनी तीखी, बाज जैसी नजरें सिया पर टिका दीं.
अपनी इस तीखी जुबान को थोडा लगाम दो डॉक्टर. ये जश्न मेरी दादी के लिए है, और उनकी सेहत में सुधार की खुशी में है. इसमें तुम्हारा भी छोटा सा योगदान है, पर इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि तुम मेरी बराबरी करने की कोशिश करो या मेरे फैसलों पर टिप्पणी करो। सिया ने भी अपनी आँखें सिकोडीं और सीढियों की रेलिंग को कसकर पकडा.
" बराबरी? Mister मेहरा, बराबरी तो दिल की और सोच की होती है, और वो आपके पास कितनी है, इसमें मुझे शुरू से ही शक है. आप हर चीज को बिजनेस और साख के तराजू में तौलते हैं।
कबीर दो कदम आगे बढा और सिया के बिल्कुल करीब आकर खडा हो गया. दोनों के बीच फासला इतना कम था कि सिया को कबीर की साँसों की गर्मी और उसके महंगे परफ्यूम की कडक खुशबू महसूस होने लगी. हॉल की हवा में एक अजीब सा तनाव और बिजली सी दौड गई। शक पालना तुम्हारी सेहत के लिए बुरा हो सकता है सिया,
कबीर ने अपनी आवाज को बहुत ही धीमा पर भारी करते हुए कहा. कल की पार्टी में तुम भी मौजूद रहोगी, क्योंकि दादी की जिद है. पर याद रहे. अपनी लिमिट मत भूलना. मेहमानों के सामने अपनी ये डॉक्टर वाली अकड और बेबाकी घर के बाहर ही छोडकर आना। मेरी फिक्र मत कीजिये Mister मेहरा. मुझे भी आप जैसे घमंडी और अमीर लोगों के बीच रहने का कोई शौक नहीं है.
मैं सिर्फ दादी के लिए वहां आउंगी, क्योंकि वो मेरी मरीज होने से पहले एक बहुत अच्छी इंसान हैं, सिया ने कबीर की आँखों में आँखें डालकर करारा जवाब दिया और पैर पटकती हुई रसोई की तरफ बढ गई. कबीर वहीँ खडा उसे जाते हुए देखता रह गया.
उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस लडकी की बातें उसे इतना गुस्सा क्यों दिलाती हैं, या फिर उसके भीतर एक अनजानी सी हलचल क्यों पैदा करती हैं.
दोपहर ढल चुकी थी और मेंशन में शाम के जश्न की तैयारियाँ अपने चरम पर थीं. काम्या बुआ वापस मेंशन पहुँच चुकी थीं और उनके चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जिसे देख कोई भी भांप जाता कि वो कोई बडी साजिश रचकर आई हैं. उन्होंने कबीर को बगीचे में अकेले खडे देखा और दबे पाँव उनके पास पहुँच गईं.
कबीर बेटा, तैयारी तो बहुत शानदार है. पर क्या तूने उस डॉक्टर लडकी की पूरी जानकारी ली है? मेरा मतलब है कि क्या हमें पता है कि वो वाकई कौन है? काम्या ने अपनी आवाज में बनावटी चिंता घोलकर पूछा. कबीर ने अपनी फाइल बंद की और बुआ की तरफ देखा. क्या मतलब बुआ? आप कहना क्या चाहती हैं? बेटा,
मैं आज अपनी एक पुरानी सहेली से मिलने उसी इलाके में गई थी जहाँ ये सिया रहती थी. वहां के लोग इसके बारे में जो बातें कर रहे थे, उसे सुनकर मेरे तो कान जल गए. सुना है ये लडकी अपने पुराने शहर से किसी बहुत बडे' कांड' में फंसकर जान बचाकर भागकर आई है. कबीर, मेहरा खानदान की साख का सवाल है.
कहीं ऐसा न हो कि कल को पुलिस हमारे दरवाजे पर खडी हो और हमें पता भी न चले कि हमने किसे पनाह दी है, काम्या ने अपना जहर बडी ही खूबसूरती से उगल दिया. कबीर का चेहरा पत्थर जैसा सख्त हो गया. बुआ की बातों ने उसके मन में संदेह का एक छोटा सा काँटा चुभा दिया था. बुआ, उसने दादी की जान बचाई है और फिलहाल वो एक अच्छी प्रोफेशनल है.
उसका अतीत जो भी हो, जब तक वो अपना काम सही कर रही है, मुझे फर्क नहीं पडता. प्लीज, कल की पार्टी का मजा खराब मत कीजिये। कबीर वहां से तो चला गया, पर काम्या बुआ के वो शब्द उसके दिमाग में हथौडे की तरह बज रहे थे. क्या वाकई सिया कुछ छुपा रही थी? कबीर को पहली बार गुस्सा आया कि उसे उस लडकी के बारे में कुछ भी नहीं पता था.
पार्टी की शाम आ गई. मेहरा मेंशन को हजारों सफेद गुलाबों और मद्धम लाइटों से सजाया गया था. कबीर अपने ब्लैक टक्सीडो में हमेशा की तरह रौबदार और किसी राजा की तरह लग रहा था.
दिल्ली के बडे- बडे व्यापारी, रईस औरतें और कबीर के बिजनेस पार्टनर्स हॉल में जमा होने लगे थे.
सिया ने एक बहुत ही साधारण सी सफेद और सुनहरी किनारी वाली साडी पहनी थी. उसने गले में कोई गहना नहीं पहना था, बस कानों में छोटी सी बालियां थीं
और माथे पर एक छोटी सी बिंदी. वह जैसे ही सीढियों से नीचे उतरी, हॉल में मौजूद कई लोगों की नजरें उस पर ठहर गईं. उसकी सादगी उस भीड में किसी चमकते सितारे जैसी थी. कबीर ने भी उसे देखा, पर उसने तुरंत अपना चेहरा फेर लिया. उसके दिमाग में अब भी बुआ की वो बातें गूँज रही थीं. पार्टी में संगीत का शोर था
और लोग गायत्री दादी को घेरकर उन्हें बधाई दे रहे थे. काम्या बुआ मेहमानों के बीच किसी जासूस की तरह घूम रही थीं. उन्होंने अपनी एक चालाक और मुंहफट सहेली, मिसेज खन्ना को पहले ही सारा मसाला दे दिया था. जब पार्टी अपने पूरे शबाब पर थी, तब मिसेज खन्ना ने जानबूझकर सिया के पास जाकर अपनी आवाज ऊँची की ताकि सब सुन सकें.
अरे काम्या! ये वही लडकी है ना जो तुम्हारे घर में फिजियोथैरेपिस्ट बनकर आई है? चेहरा तो बडा मासूम है, पर सुना है इसके कारनामे इतने मासूम नहीं हैं. क्या ये वही लडकी नहीं है जो पिछले साल लखनऊ (सिया का पुराना शहर) के एक बहुत बडे स्कैंडल में फंसी थी और रातों- रात गायब हो गई थी?
लोग तो कह रहे थे कि इस पर किसी की अमानत लेकर भागने का इल्जाम है, मिसेज खन्ना ने कडवाहट के साथ कहा.
पूरे हॉल में अचानक सन्नाटा पसर गया. संगीत की आवाज जैसे बैकग्राउंड में कहीं खो गई. मेहमानों के बीच कानाफूसी शुरू हो गई और सबकी नजरें सिया पर एक बोझ की तरह टिक गईं.
सिया का चेहरा ओस की तरह सफेद पड गया. उसके हाथ कांपने लगे और उसकी फाइल उसके हाथ से छूटते- छूटते बची. उसने बेबसी में कबीर की तरफ देखा, यह उम्मीद करते हुए कि कबीर उसका बचाव करेगा. पर कबीर चुपचाप खडा था.
उसकी आँखों में कोई जज्बात नहीं थे, बस एक ठंडी कशिश थी. वह सिया को ऐसे देख रहा था जैसे वह खुद उन सवालों का जवाब चाहता हो. कबीर का यह मौन सिया को किसी खंजर की तरह चुभ रहा था। ये आप क्या कह रही हैं मिसेज खन्ना?
हमारी डॉक्टर बिटिया ऐसी नहीं है, बलराज दादाजी ने बीच- बचाव करने की कोशिश की, पर उनकी आवाज में भी संशय था। मैं सच कह रही हूँ भाई साहब. कबीर, तुम्हें ऐसे संदिग्ध लोगों को घर में रखने से पहले उनकी पूरी छानबीन करनी चाहिए थी.
मेहरा खानदान की इज्जत इतनी सस्ती नहीं है कि कोई भी भगोडी यहाँ आकर रहने लगे, मिसेज खन्ना ने आग में घी डालते हुए कहा. सिया की आँखों में आँसू भर आए.
उसे महसूस हुआ कि मेंशन की ये चमकती दीवारें अब उसे निगलने वाली हैं. उसे कबीर की खामोशी से सबसे ज्यादा तकलीफ हो रही थी. वह अपमान के उस बोझ को और नहीं सह सकी और वहां से भागने के लिए मुडी, तभी उसके पैर लडखडाए।
क्या कबीर सबके सामने सिया का साथ देगा ?
क्या काम्या बुआ की ये साजिश सिया को हमेशा के लिए मेंशन से बाहर कर देगी?
या फिर कबीर इस बार भी अपने एटीट्यूड के पीछे छुपे उस रक्षक को बाहर लाएगा?
जश्न की ये रात किसी बडे तूफान की शुरुआत थी.
क्या सिया अपनी बेगुनाही साबित कर पाएगी या कबीर का ये शक उनके बीच की दरार को हमेशा के लिए गहरा कर देगा?
जानने के लिए देखिए अगला अध्याय!
कबीर और सिया का ये सफर आपके साथ के बिना अधूरा है. प्लीज फॉलो करें और अपनी राय कमेंट में जरूर दें. आपकी एक प्रतिक्रिया मुझे और बेहतर लिखने की प्रेरणा देती है! शुक्रिया।
क्या कबीर का खामोश रहना सही था?
क्या उसे सिया का साथ देना चाहिए था? काम्या बुआ की इस साजिश का अगला मोड क्या होगा?
क्या सिया को अपना अतीत कबीर को बता देना चाहिए?
कृपया देखते रहे,,,,,