Ishq ka Ittefaq - 10 Alok द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Ishq ka Ittefaq - 10

लखनऊ की नवाबी शाम अपनी पूरी रंगत में थी, पर कबीर मेहरा के लिए इस शहर की हर आवाज एक शोर की तरह थी. दिल्ली की बडी- बडी सडकों पर राज करने वाला कबीर आज चौक की उन संकरी और बदबूदार गलियों में खुद को बेबस महसूस कर रहा था. उसके महंगे जूतों पर लखनऊ की धूल जम चुकी थी और माथे पर पसीने की बूंदें, पर उसकी नजरें सिर्फ एक बोर्ड ढूँढ रही थीं—' सेवा सदन' कबीर यहाँ किसी प्यार की तलाश में नहीं आया था, कम से कम वो खुद को तो यही समझा रहा था.


उसके आने की वजह साफ थी— गायत्री दादी. जब से सिया गई थी, दादी ने जैसे जीने की इच्छा ही छोड दी थी. उन्होंने दवाइयाँ खानी बंद कर दी थीं और उनका ब्लड प्रेशर लगातार बढ रहा था. कबीर को अहसास था कि अगर दादी को कुछ हुआ, तो मेहरा खानदान का आखिरी स्तंभ गिर जाएगा.

और उसी एक स्तंभ को बचाने के लिए, कबीर अपनी सारी अकड जेब में रखकर आज इस छोटे से क्लीनिक के बाहर खडा था. क्लीनिक के अंदर की हालत देखकर कबीर का दिल बैठ गया. एक टूटी हुई मेज, पुरानी कुर्सियाँ और मरीजों की लंबी कतार.


जैसे ही कबीर अंदर पहुँचा, उसने देखा कि सिया एक छोटे बच्चे को पट्टी बाँध रही थी. उसकी सादगी और उसकी सेवा भाव देखकर कबीर एक पल के लिए वहीं रुक गया. सिया के चेहरे पर एक थकावट थी, पर उसकी आँखों में वो शांति थी जो मेहरा मेंशन के करोडों के कमरों में भी नहीं मिलती थी. जैसे ही सिया की नजर कबीर पर पडी, उसके हाथ में पकडी पट्टी छूट गई. उसकी आँखों में हैरानी नहीं, बल्कि एक तेज गुस्सा और नफरत उभरी.


" आप यहाँ क्या कर रहे हैं Mister मेहरा? क्या वहाँ की बेइज्जती काफी नहीं थी जो यहाँ तक चले आए? सिया की आवाज नीची थी पर उसमें जहर घुला हुआ था. कबीर ने अपना गला साफ किया और सीधा मुद्दे पर आया. सिया, मैं यहाँ कोई ड्रामा करने नहीं आया हूँ. दादी की तबीयत बहुत खराब है. उन्होंने दो दिन से दवा नहीं ली है और वो सिर्फ तुम्हारा नाम ले रही हैं.

तुम्हें मेरे साथ अभी दिल्ली चलना होगा। सिया के होंठों पर एक कडवी मुस्कान आई. दादी की तबीयत? तो आप फिर से मुझे एक कर्मचारी की तरह लेने आए हैं?

आपको क्या लगता है Mister मेहरा, कि आप जब चाहें मुझे धक्के मारकर बाहर कर देंगे और जब जरूरत होगी तो हुक्म देकर वापस बुला लेंगे? मैं आपकी खरीदी हुई कोई चीज नहीं हूँ। मैंने हुक्म नहीं दिया, मैं कह रहा हूँ! कबीर की आवाज थोडी तेज हुई, पर उसने तुरंत खुद को संभाला. देखो सिया, पुरानी बातों को बाद में सुलझा लेंगे. अभी दादी की जान का सवाल है.


उनकी रिपोर्ट बिगड रही है। दादी से मुझे लगाव है, और उनके लिए मेरा दिल आज भी उतना ही तडपता है,

पर मैं उस घर में कभी कदम नहीं रखूँगी जहाँ मेरी इज्जत की कोई कीमत नहीं है, सिया ने फाइल समेटते हुए कहा. आप यहाँ से जा सकते हैं। अभी उनकी ये तल्ख बहस चल ही रही थी कि बाहर एक काली गाडी जोरदार ब्रेक के साथ रुकी. गाडी से वही रसूखदार गुंडे उतरे जो पिछले कई दिनों से सिया का पीछा कर रहे थे. सिया का चेहरा सफेद पड गया. वो. वो लोग फिर आ गए, वह फुसफुसाई. कबीर ने बाहर देखा और फिर सिया की तरफ मुडा.


" कौन हैं ये लोग? ये वही लोग हैं Mister मेहरा, जिनके बारे में मिसेज खन्ना ने आपकी पार्टी में जहर उगला था. ये उस मंत्री के पालतू गुंडे हैं जिसे मैंने बेनकाब किया था, सिया की आवाज कांप रही थी.

गुंडे क्लीनिक के अंदर दाखिल हुए. अरे डॉक्टर साहिबा, ये दिल्ली वाला बाबू आपका रक्षक बनेगा क्या? चलिए, भैया इंतजार कर रहे हैं। गुंडों ने जैसे ही सिया का हाथ पकडने की कोशिश की, कबीर का हाथ बिजली की फुर्ती से आगे बढा. उसने गुंडे की कलाई को इतनी जोर से मरोडा कि उसकी हड्डियों के चटकने की आवाज साफ सुनाई दी।


मेहरा खानदान की अमानत पर हाथ डालने से पहले अपनी जान का बीमा करवा लेना चाहिए था, कबीर की आवाज इतनी ठंडी और खौफनाक थी कि गुंडे एक पल के लिए सहम गए. हॉल में हंगामा शुरू हो गया. कबीर ने सुनील को इशारा किया और खुद उन गुंडों से भिड गया.

कबीर कोई मामूली बिजनेसमैन नहीं था, उसने अपनी सुरक्षा के लिए बरसों Training ली थी. एक के बाद एक मुक्कों की बरसात ने उन गुंडों को जमीन सुंघा दी. पूरे क्लीनिक में सामान बिखर गया, पर कबीर ने सिया को एक खरोंच तक नहीं आने दी. जब गुंडे अधमरी हालत में वहाँ से भागे, तब सिया अपनी कुर्सी का सहारा लेकर खडी हुई.


वह बुरी तरह कांप रही थी. कबीर उसके पास गया और उसे सहारा देने की कोशिश की, पर सिया ने उसे पीछे धकेल दिया। आप क्यों आए? आपकी वजह से उन्हें मेरा ठिकाना पता चल गया! अब वो मुझे चैन से नहीं रहने देंगे! सिया चीख पडी.

कबीर ने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा, वो तुम्हें वैसे भी चैन से नहीं रहने देते सिया. और अब जबकि उन्हें पता चल गया है कि तुम कहाँ हो, तुम यहाँ सुरक्षित नहीं हो. लखनऊ की इन गलियों में तुम उनका मुकाबला नहीं कर पाओगी। सिया खामोश थी, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे.

कबीर ने आवाज को थोडा नरम किया, सिया, मैं तुम्हें माफी के लिए मजबूर नहीं करूँगा. मैं आज भी वही कबीर मेहरा हूँ जिसके लिए साख सब कुछ है. पर मैं अपनी दादी को मरते हुए नहीं देख सकता. और मैं तुम्हें इन भेडियों के सामने अकेला नहीं छोड सकता.

दिल्ली चलो, कम से कम मेहरा मेंशन की दीवारें तुम्हें सुरक्षा तो देंगी. दादी का इलाज करो और जब वो ठीक हो जाएं, तो तुम जहाँ चाहो वहाँ जा सकती हो. मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं। सिया ने कबीर के चेहरे को देखा. उसमें पछतावा था या सिर्फ दादी की फिक्र, ये समझना मुश्किल था. पर उसे पता था कि कबीर सही कह रहा है. अब वह लखनऊ में सुरक्षित नहीं थी।

मैं चलूँगी, सिया ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा. पर याद रखिएगा Mister मेहरा, मैं सिर्फ गायत्री दादी के लिए आ रही हूँ, आपके लिए नहीं.

हमारे बीच जो था, वो उस रात उस हॉल में ही खत्म हो गया था। कबीर ने सिर्फ सिर हिलाया. उसे पता था कि उसने एक जंग जीत ली थी, पर दिल जीतना अभी बहुत दूर की बात थी. उसने सुनील को गाडी तैयार करने का इशारा किया. लखनऊ की वो शाम अब एक नए और खतरनाक सफर की शुरुआत कर रही थी.


प्रिय पाठकों, इस कहानी के हर शब्द को मैंने अपनी भावनाओं और कडी मेहनत से पिरोया है.
एक- एक दृश्य को जीवंत करने और उसे लिखने में बहुत समय और हृदय की गहराई लगती है. मुझे इस सफर में आप सबके साथ और अटूट प्रेम की बहुत आवश्यकता है. यदि आपको मेरी यह छोटी सी कोशिश अच्छी लग रही है, तो कृपया अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें. आपका एक लाइक, कमेंट और फॉलो मुझे और भी बेहतर लिखने की प्रेरणा प्रदान करता है. आपके स्नेह के बिना यह कहानी अधूरी है.

क्या कबीर सिया को सुरक्षित दिल्ली पहुँचा पाएगा

मेहरा मेंशन में सिया की वापसी पर काम्या बुआ का क्या रिएक्शन होगा?

क्या गायत्री दादी सिया को देखकर ठीक हो पाएंगी
क्या होगा मेहरा कुल का भविष्य ?

जुडे रहिये हमारे साथ. अगला अध्याय और भी रोमांचक होने वाला है!