अध्याय 1: वीरान हवेली की पहली आहट
पहाड़ों के बीच बसी वह जगह जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही डरावनी भी। दूर-दूर तक फैली घनी चीड़ की जंगलों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी—नीलगिरी हवेली। दिन के उजाले में भी उसकी खिड़कियाँ ऐसी लगती थीं जैसे कोई अंदर से लगातार देख रहा हो।
गाँव के लोग उसे “छोड़ी हुई हवेली” कहते थे। कोई वहाँ जाने की हिम्मत नहीं करता था। कहा जाता था कि कई साल पहले वहाँ एक परिवार रहा करता था, लेकिन एक ही रात में पूरा घर रहस्यमय तरीके से गायब हो गया।
लेकिन आज… कोई वापस आया था।
मैं, आर्या, पत्रकार होने के नाते उस कहानी की सच्चाई खोजने आई थी। शहर की भागदौड़ से दूर, मैं इस हवेली की सच्चाई लिखना चाहती थी। मेरे हाथ में सिर्फ एक नोटबुक, कैमरा और एक सवाल था—क्या सच में यहाँ कुछ अलौकिक है?
जैसे ही मैं हवेली के बड़े लोहे के दरवाज़े के पास पहुँची, हवा अचानक ठंडी हो गई। ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी गर्दन के पीछे धीरे से सांस ली हो। मैंने पलटकर देखा—कोई नहीं था।
दरवाज़ा हल्का सा खुला हुआ था।
अंदर कदम रखते ही धूल की एक मोटी परत मेरे जूतों के नीचे चरमराई। दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरें टेढ़ी होकर लटकी थीं, जैसे वे भी समय के साथ डर गई हों। हर कदम के साथ एक अजीब सी फुसफुसाहट सुनाई देती थी—जैसे कोई बहुत धीरे-धीरे मेरा नाम ले रहा हो।
“आर्या…”
मैं अचानक रुक गई। मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा। मैंने खुद को समझाया कि यह सिर्फ हवा की आवाज़ है।
लेकिन तभी ऊपर की मंज़िल से एक हल्की सी खटखट की आवाज़ आई।
टिक… टिक… टिक…
जैसे कोई लकड़ी के फर्श पर धीरे-धीरे चल रहा हो।
मैंने कैमरा ऑन किया और सीढ़ियों की तरफ बढ़ी। हर सीढ़ी के साथ आवाज़ और तेज़ होती जा रही थी। हवा अब और भारी लगने लगी थी।
और फिर अचानक… सब कुछ शांत हो गया।
इतना शांत कि मेरी अपनी सांसों की आवाज़ गूंजने लगी।
मैंने ऊपर देखा।
और वहीं, अंधेरे में, मुझे पहली बार महसूस हुआ कि मैं अकेली नहीं हूँ।
कोई था… जो मुझे देख रहा था।
बंद दरवाज़े के पीछे की फुसफुसाहट
ऊपर की मंज़िल पर छा गया सन्नाटा किसी भी सामान्य सन्नाटे जैसा नहीं था। वह ऐसा सन्नाटा था, जो कानों को नहीं… दिल को सुनाई देता है। आर्या कुछ पल वहीं सीढ़ियों के पास खड़ी रही, अपनी सांसों को नियंत्रित करने की कोशिश करती हुई।
“शायद ऊपर कुछ नहीं है…” उसने खुद से कहा, लेकिन उसकी आवाज़ भी उसे भरोसा नहीं दिला पा रही थी।
उसने धीरे-धीरे पहला कदम ऊपर रखा। लकड़ी की सीढ़ी हल्की सी चरमराई, जैसे किसी ने उसकी मौजूदगी का विरोध किया हो। हर कदम के साथ हवा और भारी होती जा रही थी। ऊपर की मंज़िल का गलियारा लंबा और अंधकार से भरा था।
दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरें अब और डरावनी लग रही थीं। हर तस्वीर में एक ही परिवार था—एक आदमी, एक औरत और एक छोटी लड़की। लेकिन अजीब बात यह थी कि हर तस्वीर में उनकी आँखें अलग दिशा में देख रही थीं, जैसे वे किसी चीज़ से बचने की कोशिश कर रहे हों।
आर्या ने अपनी टॉर्च ऑन की और गलियारे में रोशनी फैलाई। रोशनी पड़ते ही एक अजीब दृश्य सामने आया—एक दरवाज़ा, जो बाकी सभी दरवाज़ों से थोड़ा अलग था। उस पर गहरा काला ताला लगा हुआ था, और उसके चारों ओर किसी अजीब तरह के निशान बने हुए थे।
वो दरवाज़ा बाकी हवेली से बिल्कुल अलग महसूस हो रहा था।
तभी फिर वही आवाज़ आई—
टिक… टिक… टिक…
इस बार आवाज़ साफ थी। जैसे कोई उस दरवाज़े के पीछे मौजूद हो और जानबूझकर कुछ संकेत दे रहा हो।
आर्या का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने कैमरा उठाकर उस दरवाज़े की तस्वीर लेने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही उसने क्लिक किया, कैमरे की स्क्रीन अचानक काली हो गई।
“क्या हो रहा है यहाँ?” उसने घबराकर कहा।
और तभी… दरवाज़े के पीछे से एक धीमी आवाज़ आई।
“खोल दो…”
आर्या एक पल के लिए जम गई। आवाज़ किसी इंसान की नहीं लग रही थी—न पूरी तरह पुरुष, न महिला। उसमें एक अजीब गहराई थी, जैसे वह आवाज़ कई सालों से बंद किसी जगह से आ रही हो।
उसने पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन उसके पैरों ने जैसे ज़मीन पकड़ ली हो।
“कौन है वहाँ?” उसने हिम्मत जुटाकर पूछा।
कुछ सेकंड तक कोई जवाब नहीं आया।
फिर वही आवाज़, और भी धीमी लेकिन साफ—
“तुम आ चुकी हो… अब वापस जाना मुमकिन नहीं।”
हवेली की दीवारों में हल्का सा कंपन हुआ। ऊपर की छत से धूल गिरने लगी। और उसी पल गलियारे की आखिरी लाइट खुद-ब-खुद बुझ गई।
अब अंधेरा पूरी तरह छा चुका था।
आर्या ने अपनी टॉर्च फिर से ऑन करने की कोशिश की, लेकिन वह भी काम नहीं कर रही थी।
अचानक, उसी बंद दरवाज़े के नीचे से एक पुरानी, पीली किताब सरकती हुई बाहर आई और उसके पैरों के पास आकर रुक गई।
किताब के कवर पर लिखा था—
“अधूरी दास्तान”
आर्या ने जैसे ही उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, दरवाज़े के पीछे से किसी ने हल्के से फुसफुसाया—
“अब कहानी शुरू हो चुकी है…”