Ishq ka Ittefaq - 14 Alok द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Ishq ka Ittefaq - 14

मेहरा मेंशन की उन आलीशान और ठंडी दीवारों के पीछे छिपे रहस्यों का सबसे भयावह अध्याय उस रात फार्महाउस पर खुलना था. कबीर मेहरा, जिसे लगता था कि वह दुनिया के हर इंसान की फितरत अपनी उंगलियों के पोरों से पढ सकता है, आज खुद अपनी ही बनाई गई धारणाओं के चक्रव्यूह में फंसा हुआ था. उसकी काली एसयूवी जब फार्महाउस के अंधेरे अहाते में रुकी, तो सन्नाटा इतना गहरा था कि टायरों की रगड भी किसी चीख जैसी सुनाई दे रही थी. गाडी के भीतर की हवा एसी की वजह से बर्फीली थी, लेकिन कबीर और सिया के बीच का तनाव उस हवा को जला देने के लिए काफी था.


कबीर के हाथ स्टीयरिंग पर इतनी विश्वास की राख और लहू की पुकारजोर से जकडे हुए थे कि उसकी नसें नीली पड गई थीं. उसे बार- बार वही धुंधली और अनाजभरी तस्वीर याद आ रही थी जो काम्या बुआ ने बडी चतुराई से उसके फोन तक पहुँचाई थी.

उस तस्वीर में सिया—वही शांत, सरल और मासूम दिखने वाली सिया—लखनऊ की किसी सडक पर एक रसूखदार आदमी का कॉलर पकडकर उस पर हावी हो रही थी.

कबीर के लिए यह केवल एक तस्वीर नहीं थी, यह उसके उस विश्वास पर किया गया एक और प्रहार था जो उसने बहुत मुश्किल से सिया पर जताना शुरू किया था. वह बचपन से ही अपनों के धोखे और साजिशों के बीच पला- बढा था, इसलिए उसका मन किसी पर भी पूरी तरह यकीन करने से पहले हजार बार संदेह की दीवारें खडी कर देता था। मिस्टर मेहरा, अगर आप अपनी मुट्ठियाँ इसी तरह भींचते रहेंगे और स्टीयरिंग को तोडना चाहेंगे,


तो शायद आप अपनी मंजिल का रास्ता भूल जाएंगे, सिया ने खिडकी के बाहर भागते पेडों को देखते हुए बहुत ही सधी हुई और धीमी आवाज में कहा. उसकी आवाज में एक अजीब सी उदासी और भारीपन था, जैसे वह पहले से ही जानती हो कि आज उसके सब्र का बांध टूटने वाला है और उसकी सादगी पर सवाल उठने वाले हैं.


कबीर ने गाडी को एक झटके के साथ सडक के किनारे रोका और उसकी तरफ मुडा. उसकी आँखें गुस्से और नींद की कमी से लाल थीं. रास्ता मैं नहीं भूला हूँ सिया, रास्ता शायद तुम भूल गई हो. मुझे लगा था कि तुम इस घर की खोई हुई शांति हो, पर तुम तो खुद एक जलता हुआ अतीत हो जो हम सबको राख कर सकता है. तुम कौन हो ?


और लखनऊ की उन गलियों में तुम इस तरह एक गुंडे की तरह क्यों लड रही थी? सिया ने कोई जवाब नहीं दिया. उसने बस अपनी पलकें झुका लीं, जिससे कबीर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया.


उसे सिया की यह खामोशी अब किसी साजिश की तरह लगने लगी थी. फार्महाउस के ड्राइंग हॉल में कदम रखते ही माहौल किसी पुरानी अदालत जैसा बोझिल हो गया. काम्या बुआ पहले से ही वहाँ अपनी विजयी मुस्कान लिए खडी थीं.


उन्होंने कबीर को देखते ही अपनी आँखों से एक गुप्त इशारा किया, जैसे कह रही हों कि' शिकार जाल में फंस गया है' गायत्री दादी, जो अभी तक सिया को अपनी आँखों का तारा और घर की लक्ष्मी समझती थीं,

हॉल के एक कोने में सोफे पर बैठी बहुत चिंतित और कमजोर लग रही थीं. उनके चेहरे की झुर्रियां आज तनाव की वजह से और भी गहरी और डरावनी लग रही थीं.

सब यहाँ बैठो! आज फैसला होकर रहेगा, कबीर की दहाड हॉल की ऊंची छतों से टकराकर गूँजी. उसने जेब से अपना फोन निकाला और पूरी ताकत से कांच की मेज के बीचों- बीच पटक दिया. सिया, आज सबके सामने सच आना चाहिए. यह तस्वीर देखो.

क्या यह तुम नहीं हो ?

लखनऊ की उन बदनाम गलियों में तुम इस आदमी के साथ क्या कर रही थी? क्या यह तुम्हारा कोई पुराना साझीदार है या तुम्हारा कोई प्रेमी जिसे तुम यहाँ आने से पहले पीछे छोड आई थी ? बोलो!


सिया ने कांपते हुए हाथों से फोन उठाया. जैसे ही उसकी नजर उस तस्वीर पर पडी, उसकी रूह तक कांप गई. वह पल, वह चीखें, वह सडक पर फैला हुआ खून और वह बारिश—सब कुछ उसकी आँखों के सामने किसी खौफनाक फिल्म की तरह दोबारा शुरू हो गया. उसकी आँखों से आँसू की एक मोटी और भारी बूंद गिरी और सीधे फोन की स्क्रीन पर उस आदमी के चेहरे पर जा ठहरी। बोलती क्यों नहीं ?


क्या हुआ, जुबान को लकवा मार गया या सच कडवा है? कबीर फिर से चिल्लाया. सिया की गर्दन धीरे से ऊपर उठी. उसकी आँखों में अब वह डर नहीं था जो कबीर ने हमेशा देखा था. वहाँ एक ऐसी दहकती हुई आग थी जो शायद कबीर के पूरे साम्राज्य को एक पल में भस्म कर देने की ताकत रखती थी.

मिस्टर मेहरा, आपने इस तस्वीर को देखा, पर शायद आपने उस दर्द को नहीं देखा जो इस तस्वीर के फ्रेम के बाहर खडा था.

आप पूछ रहे हैं कि यह आदमी कौन है ? यह आदमी. यह आदमी वह दरिंदा है जिसने मेरे सगे भाई' आर्यन' की बेरहमी से जान ली थी। हॉल में एक ऐसा सन्नाटा छा गया जैसा शायद किसी श्मशान घाट पर चिता जलने के बाद होता है. गायत्री दादी के हाथ से पानी का गिलास छूटकर कालीन पर गिर गया और पानी सिया के पैरों तक फैल गया. कबीर के पैर जैसे जमीन में धंस गए हों.


भाई ? उसके शब्द उसके गले में ही किसी कांटे की तरह फंस गए. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह क्या सुन रहा है.

हाँ! मेरा छोटा भाई आर्यन, सिया की आवाज अब चीख में बदल गई थी, उसकी सिसकियाँ अब एक बहन के विलाप में तब्दील हो चुकी थीं जिसने सब कुछ खो दिया हो. वो सिर्फ उन्नीस साल का था. उसकी आँखों में डॉक्टर बनने के सपने थे,

वो माँ- बाप का सहारा बनना चाहता था. उसने बस एक रईस के बेटे की बदतमीजी के खिलाफ आवाज उठाई थी, और इनाम में उसे मौत मिली.

इस रसूखदार आदमी के बेटे ने उसे अपनी तेज रफ्तार गाडी के नीचे कुचल दिया था. जिस दिन की यह तस्वीर है, उस दिन पुलिस उस कातिल को ससम्मान उसके घर छोड रही थी और मैं अकेली. मैं अकेली उस गाडी के सामने अपनी जान की परवाह किए बिना खडी होकर इस आदमी का कॉलर पकडकर पूछ रही थी कि मेरे भाई का कसूर क्या था ?

क्या गरीब होना ही उसकी सबसे बडी गलती थी ? सिया ने कबीर की तरफ अपनी जलती हुई आँखें उठाईं, जिनमें नफरत और दर्द का सैलाब था.

आप जैसे अमीर और ताकतवर लोगों के लिए इंसाफ शायद एक बंद कमरे का सौदा हो सकता है, पर हमारे जैसे लोगों के लिए यह पूरी जिंदगी की सबसे बडी और कडवी लडाई है.

मेरा भाई सडक पर तडप- तडप कर दम तोड गया और मैं उसका हाथ पकडे उसे अस्पताल तक नहीं ले जा सकी क्योंकि इन रईसों के लठैतों ने रास्ते रोक दिए थे. क्या अब भी आपको लगता है कि मैं कोई अपराधी हूँ ?

क्या एक बहन का अपने भाई के हत्यारे से सवाल करना गुंडागर्दी है? कबीर का अहंकार एक पल में चकनाचूर होकर मिट्टी में मिल गया. उसे अपनी हर वो बात याद आने लगी जो उसने सिया को नीचा दिखाने के लिए कही थी.

उसे याद आया कि कैसे उसने उसे' चरित्रहीन' धोखेबाज' और' बाजारू' जैसे शब्दों से नवाजा था. आज उसे पहली बार अपनी इस बेहिसाब दौलत और खानदानी नाम से घृणा होने लगी. वह कुछ कहना चाहता था,

उसके चरणों में गिरकर माफी मांगना चाहता था, पर उसके शब्द उसका साथ छोड चुके थे. काम्या बुआ का चेहरा फक पड गया. उनकी सारी साजिश अब उनके ही गले की फाँस बन गई थी. उन्होंने बात को संभालने की नाकाम कोशिश की, लेकिन कबीर, वो पचास लाख की भारी रकम ? जो इसके खाते में आई ? उसका जवाब कौन देगा ?

सिया कबीर के और भी करीब आई, उसकी सांसें कबीर के चेहरे को छू रही थीं. रकम? वो रकम मेरे भाई के खून की कीमत लगाने की एक घटिया कोशिश थी जो इन लोगों ने मेरे खाते में जबरदस्ती डलवाई थी ताकि मैं अपना केस वापस ले लूँ और खामोश हो जाऊँ. मैंने आज तक उस रकम का एक रुपया भी नहीं छुआ है और न ही कभी छूऊँगी.

मिस्टर मेहरा, आपकी दादी की सेवा मैंने पैसों के लिए नहीं की थी, मैंने इसलिए की थी क्योंकि उनमें मुझे अपनी दिवंगत माँ की छवि दिखी थी.


पर मुझे क्या पता था कि इस घर के मालिक का दिल लोहे से भी ज्यादा ठंडा और पत्थर से भी ज्यादा कठोर है। सिया ने मुडकर रोती हुई दादी के पैर छुए और अपना छोटा सा पुराना बैग उठाया. माफ करना दादी, जहाँ इंसानियत से ज्यादा शक को तवज्जो दी जाए, वहाँ मेरी रूह का दम घुटने लगेगा।

कबीर वहीं बुत बनकर खडा रहा. वह अपनी जगह से एक इंच भी हिल नहीं सका. उसने देखा कि कैसे वह लडकी, जिसे वह धूल समझ रहा था,

असल में एक ऐसी चट्टान थी जो टूट गई पर झुकी नहीं. बाहर बारिश अब और तेज हो चुकी थी. बिजली की कडक में सिया की परछाईं घर के भारी दरवाजे से बाहर निकलती दिखी. कबीर के मन में एक भीषण युद्ध छिड गया था—उसका ईगो उसे रोक रहा था,

पर उसका दिल उसे चीख- चीख कर कह रहा था कि उसे रोको, उसे जाने मत दो. क्या कबीर अपनी इस हिमालय जैसी गलती को सुधार पाएगा?

या सिया का यह दर्द मेहरा साम्राज्य के पतन की शुरुआत है ?

मुझे इस कहानी के सफर में आपके समर्थन और प्यार की बहुत जरूरत है. सिया और कबीर की यह दास्तान अब एक ऐसे मोड पर खडी है जहाँ से हर अगला कदम बहुत भारी होने वाला है. अगर आपको मेरा यह प्रयास और सिया का वह गहरा दर्द महसूस हुआ हो, तो कृपया अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें.

क्या कबीर अब खुद को माफ कर पाएगा और सिया के भाई के असली कातिलों को ढूंढकर उन्हें उनके अंजाम तक पहुँचाएगा?

क्या काम्या बुआ की असलियत अब पूरे मेहरा खानदान के सामने बेनकाब होगी?

क्या सिया कभी इस गहरे अपमान और जख्म को भुलाकर इस चौखट पर वापस कदम रखेगी?

अगला एपिसोड जरूर देखें,,,,,, ।।