मेहरा मेंशन की रात की उस खामोश बातचीत के बाद, अगली सुबह का सूरज कुछ नई उलझनों के साथ आया. कबीर रात भर सो नहीं पाया था. उसे बार- बार सिया की वो बातें याद आ रही थीं—" बदलना आसान नहीं होता कबीर मेहरा। उसने आज तक खुद को एक चट्टान की तरह समझा था, जिसे कोई हिला नहीं सकता, पर सिया की सादगी उस चट्टान में दरारें पैदा कर रही थी.
कबीर सुबह जल्दी तैयार होकर नीचे आया. हॉल में सन्नाटा था, पर रसोई से बर्तनों के टकराने की धीमी आवाज आ रही थी. वो अनजाने में ही रसोई की तरफ मुड गया. उसने देखा कि सिया गायत्री दादी के लिए दलिया बना रही थी. धूप की एक किरण खिडकी से आकर उसके चेहरे पर पड रही थी, जिससे उसका शांत चेहरा और भी मासूम लग रहा था. कबीर वहीं रुक गया. उसने देखा कि सिया किस तरह तन्मयता से काम कर रही थी, जैसे उसे पता ही न हो कि कोई उसे देख रहा है.
तभी सिया घूमी और कबीर को वहाँ खडा देखकर ठिठक गई। कुछ चाहिए आपको? सिया ने बिना किसी भाव के पूछा. कबीर ने अपनी आवाज को सख्त किया. दादी की दवाइयों का नया स्टॉक आ गया है. उसे चेक कर लेना. मैं नहीं चाहता कि किसी पुरानी दवा की वजह से उनकी तबीयत फिर बिगडे। सिया ने हल्की सी मुस्कान के साथ जवाब दिया, फालतू की चिंता करना आपकी आदत बन गई है मिस्टर मेहरा.
मैं कल ही सब चेक कर चुकी हूँ. दादी अब बेहतर हैं, और उनके लिए दवाइयों से ज्यादा घर की शांति जरूरी है। कबीर को उसका ये' शांति' वाला तंज समझ आ गया. तुम हर बात को घुमा- फिराकर मुझ पर क्यों ले आती हो? मैं सिर्फ अपना फर्ज निभा रहा हूँ। फर्ज और जिद में बहुत बारीक फर्क होता है.
काश आप उसे समझ पाते, सिया ने दलिया कटोरे में निकाला
और कबीर के बगल से होकर गुजर गई. कबीर वहीं खडा उसे जाते हुए देखता रहा. उसे अपनी हार बर्दाश्त नहीं थी, पर सिया के सामने वो हमेशा निरुत्तर हो जाता था.
उधर, काम्या बुआ के कमरे में साजिशों का दौर फिर से शुरू हो गया था. कल रात कबीर ने जिस तरह सबके सामने बुआ की चोरी पकडी थी, उसने उनके ईगो को बुरी तरह जख्मी कर दिया था. वो अपने फोन पर मिसेज खन्ना से बात कर रही थीं.
नहीं, अब चुप बैठने से काम नहीं चलेगा. कबीर उस लडकी के प्रभाव में आता जा रहा है. अगर उसे अभी नहीं रोका, तो वो इस घर की मालकिन बन जाएगी. हमें कुछ ऐसा करना होगा जिससे कबीर खुद उसे धक्के मारकर बाहर निकाले, बुआ की आवाज में नफरत साफ झलक रही थी. दोपहर के वक्त, जब गायत्री दादी बगीचे में बैठी धूप सेंक रही थीं, कबीर भी वहाँ आ गया. बलराज दादाजी किसी काम से बाहर गए थे.
सिया दादी के पैरों की मालिश कर रही थी और उन्हें कोई पुरानी कहानी सुना रही थी। कबीर, यहाँ बैठ, दादी ने बडे प्यार से पुकारा. कबीर जाकर दादी के पास बैठ गया. कैसी हैं आप अब? मैं तो ठीक हूँ बेटा, पर इस घर की रौनक कुछ फीकी है.
कल शाम हम सब बाहर खाना खाने जाएंगे. बहुत दिन हो गए हम सब साथ बाहर नहीं निकले, दादी ने अपनी जिद रखी. कबीर ने सिया की तरफ देखा. सिया ने अपनी नजरें नीची रखीं.
" दादी, आपकी सेहत अभी बाहर का खाना खाने की इजाजत नहीं देती, कबीर ने तर्क दिया। अरे, तो घर का खाना पैक करके ले चलेंगे! बस कहीं बाहर खुली हवा में बैठेंगे. सिया भी हमारे साथ चलेगी, दादी ने साफ कर दिया. सिया ने तुरंत मना किया, नहीं दादी, मेरा जाना ठीक नहीं होगा. मैं यहीं रुककर आपकी बाकी तैयारियाँ देख लूँगी। नहीं! अगर तू नहीं जाएगी,
तो मैं भी नहीं जाऊँगी, दादी अपनी बात पर अड गईं. कबीर को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे. उसका ईगो नहीं चाहता था कि सिया उनके पारिवारिक समय का हिस्सा बने, पर दादी की खुशी के लिए वो मना भी नहीं कर सकता था. ठीक है दादी, जैसा आप चाहें. कल शाम हम फार्महाउस चलेंगे, कबीर ने आखिरकार हार मान ली.
शाम को जब कबीर अपने कमरे में था, काम्या बुआ अंदर आईं. उनके हाथ में एक पुरानी फोटो एल्बम थी. कबीर, देखो ये तुम्हारी माँ की पसंदीदा तस्वीरें हैं. आज उन्हें देख रही थी तो तुम्हारी बहुत याद आई. तुम बिल्कुल अपनी माँ पर गए हो, स्वाभिमानी और कडक.
कबीर ने एल्बम की तरफ देखा, पर कुछ बोला नहीं. बुआ ने अपनी चाल चली, बेटा, कल जो तुम उस लडकी का पक्ष ले रहे थे, उससे मुझे बुरा नहीं लगा. मैं तो बस घर की शांति चाहती हूँ. पर जरा सोचो, अगर वो लडकी कल फार्महाउस पर किसी अजनबी से मिली या उसने फिर से कोई तमाशा किया, तो दादाजी का क्या होगा? उनकी इज्जत ही तो सब कुछ है। कबीर के माथे पर बल पड गए. बुआ, आप कहना क्या चाहती हैं?
बस इतना कि अपनी आँखें खुली रखना. जो लडकियाँ लखनऊ जैसे कांड से भागकर आती हैं, वो कभी सीधी नहीं होतीं. कहीं ऐसा न हो कि वो तुम्हें अपनी मासूमियत के जाल में फंसा ले, बुआ ने अपना जहर उगल दिया और कमरे से बाहर निकल गईं. कबीर को गुस्सा तो आया, पर बुआ की बातों ने उसके मन में संदेह का एक छोटा सा बीज फिर से बो दिया. क्या वाकई सिया वैसी ही थी जैसी दिख रही थी?
या ये सब उसकी कोई बडी योजना थी? अगले दिन शाम को सब फार्महाउस जाने के लिए तैयार थे. सिया ने एक बहुत ही साधारण सी नीले रंग की साडी पहनी थी, जिसमें वो बिना किसी गहने के भी बहुत गरिमामय लग रही थी. कबीर ने सफेद शर्ट और ब्लैक ट्राउजर पहना था. जैसे ही वो गाडी के पास पहुँचे, कबीर ने देखा कि सिया दादी को सहारा देकर ला रही थी।
सिया, तुम मेरे साथ आगे वाली गाडी में बैठो. दादी और दादाजी पीछे वाली गाडी में आराम से आएंगे,
कबीर ने आदेश दिया. सिया रुक गई. मैं दादी के साथ ही ठीक हूँ। ये आदेश है, सुझाव नहीं, कबीर ने रुखाई से कहा. सिया ने एक लंबी सांस ली और बिना बहस किए गाडी की अगली सीट पर बैठ गई. पूरी राह गाडी में खामोशी छाई रही. कबीर गाडी चला रहा था, पर उसकी नजरें बार- बार साइड मिरर में सिया को देख रही थीं. सिया बाहर डूबते हुए सूरज को देख रही थी.
तुम हमेशा इतनी खामोश क्यों रहती हो? कबीर ने अचानक चुप्पी तोडी। क्योंकि बोलने के लिए आपके पास सिर्फ आदेश होते हैं, और मेरे पास सुनने के लिए वक्त नहीं है, सिया ने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया। तुम्हें लगता है मैं बहुत बुरा हूँ, है ना?
कबीर ने स्टीयरिंग व्हील पर अपनी पकड मजबूत की. सिया ने मुडकर उसे देखा. आप बुरे नहीं हैं Mister मेहरा. आप बस बहुत डरे हुए हैं.
आपको डर लगता है कि अगर आपने अपना ये सख्त मुखौटा उतार दिया, तो लोग आपको कमजोर समझेंगे. पर सच तो ये है कि असली ताकत दूसरों को समझने में होती है, उन्हें दबाने में नहीं। कबीर ने झटके से ब्रेक मारा. गाडी सडक के किनारे रुक गई. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे कमजोर कहने की?
कबीर की आवाज में गूँज थी. सिया बिल्कुल विचलित नहीं हुई. उसने कबीर की आँखों में आँखें डालकर कहा, सच हमेशा कडवा होता है.
आपने मुझे यहाँ लाकर सुरक्षा देने का दावा किया है, पर हकीकत ये है कि आप खुद अपनी सोच के कैदी हैं. जिस दिन आप खुद को माफ कर पाएंगे, उस दिन आप दूसरों पर शक करना छोड देंगे।
कबीर का हाथ स्टीयरिंग पर कांपने लगा. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो इस लडकी को डांटे या उसकी बातों की गहराई को समझे. तभी पीछे से दादाजी की गाडी का हॉर्न बजा. कबीर ने बिना कुछ बोले गाडी आगे बढा दी. फार्महाउस पहुँचने पर माहौल थोडा खुशनुमा था,
पर कबीर और सिया के बीच का तनाव साफ महसूस किया जा सकता था. काम्या बुआ दूर से उन्हें देख रही थीं और उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी. उन्हें पता था कि उन्होंने कबीर के मन में जो शक डाला है, वो धीरे- धीरे इस रिश्ते की जडों को खोखला कर देगा. रात के खाने के वक्त, जब सब मेज पर बैठे थे, कबीर के फोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया.
उसमें सिया की लखनऊ वाली कुछ धुंधली तस्वीरें थीं, जिनमें वो किसी अनजान शख्स के साथ बहस कर रही थी. कबीर का चेहरा एकदम से सख्त हो गया. उसने अपनी नजरें सिया पर टिकाईं, जो दादी को खाना खिला रही थी. क्या ये तस्वीरें वाकई सिया का कोई नया राज थीं या काम्या बुआ की किसी बडी साजिश का हिस्सा? कबीर का ईगो एक बार फिर उसके विश्वास से लडने लगा था.
प्रिय पाठकों, इस कहानी के हर शब्द को मैंने अपनी भावनाओं और कडी मेहनत से पिरोया है. एक- एक दृश्य को जीवंत करने और उसे लिखने में बहुत समय और हृदय की गहराई लगती है. मुझे इस सफर में आप सबके साथ और अटूट प्रेम की बहुत आवश्यकता है.
यदि आपको मेरी यह छोटी सी कोशिश अच्छी लग रही है, तो कृपया अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें. आपका एक लाइक, कमेंट और फॉलो मुझे और भी बेहतर लिखने की प्रेरणा प्रदान करता है. आपके स्नेह के बिना यह कहानी अधूरी है.
क्या कबीर उन तस्वीरों का सच जानने की कोशिश करेगा या फिर से सिया पर शक करेगा ?????
काम्या बुआ का अगला कदम क्या होगा जो फार्महाउस की इस शांति को भंग कर देगा ??????
क्या सिया कबीर के बदलते व्यवहार का कारण समझ पाएगी ??????
क्या होगा मेहरा कुल का भविष्य? जुडे रहिये हमारे साथ. अगला अध्याय और भी रोमांचक होने वाला है!