मंजिले - भाग 49 Neeraj Sharma द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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मंजिले - भाग 49

परिक्रमा की ही साथ चलती पटरी की तरा है, एक से गाड़ी उतरी दूसरे पड़ चढ़ जाये, तो कहा पहुचे पता ही नहीं.... रास्ते पे --------------परीक्षा 49  वी कहानी है। ये कहानी का तीसरा खंड है। शाम से पहले पहले ही वो इतने खुश वो व्यक्ति थे पूछो मत। बाके जी का प्रशाद बनवारी के लिए धोती कुड़ता नया ला कर उनके हाथ मे थमा दिया था..... बनवारी हकबका सा देख रहा था " यजमानो कया है ये। " तभी उनमे से एक बोला " पंडित जी हम सुबह वाले चोर आपके पास अरदास लगाने नहीं आये थे, हम जीत गए, पता कैसे जज ने केस को डिसमिस कर दिया, नहीं तो आज हम जेल होते पक्का, श्री कृष्णा ने हम को बचा लिया, पंडित जी गुणगान करुँगा मै तो इनका। " इतना उच्ची बोले, सब संगत घबरा सी गयी। " चोर है... चोर है। " पर मस्ती मे वो सब भूल चुके थे। बनवारी ने पर्दा किया, बाके जी को भोग लगा दिया, घंटी वजायी.... राधे राधे करते पंडित जी सीट पर बिराज गए। गोधली का समय था। शाम थी। तीनो खुश थे... फिर परिक्रमा की और बनवारी ने कहा ----" सुधर जाओ, कृष्णा भगती मे लग जाओ। " बनवारी खुद डर रहा था, कैसा कर्म चल रहा था गती से।                    राम रुसवाई गंभीर मुद्रा मे बैठे थे, कुछ परेशान से। बनवारी ने पूछा " अकल कया हुआ " अकल बोला "सवा लाख का घाटा पड़ गया है। " बनवारी हस पड़ा। अगर चोरो के केस को डिसमिस करा सकता है तो आपके पैसे भी कर देगा.... तभी फोन वजा.... " अकल जमा घटा मे फर्क था --- निकल गया... घाटा नहीं प्रॉफ्ट है। " राम रुसवाई खुश हो गया... जैसे बोझ उतर गया। बनवारी जाओ, " तुम ही पांच सौ का नोट लो, किलो पेड़े लेते आना। बजार से।उसके बाद "आज ही निकलते है अम्बाला.... " बनवारी पेड़े लेने बजार से निकल गया ----- अकल राधे राधे करता वही अंदर बैठ गया। संगत धीरे धीरे आ रही थी, जा रही थी।                                    सत्य घटक होता है आँखो के आगे, तो बंदा हैरत मे पड़, एक अन्होने भय से डर जाता है। कितना सभाविक होता है। बनवारी का शैतान मन एक वार फिर झपटा ----" एक किलो पेड़े ले, 180 के हुए, बाकी घीस कर जा.... बनबारी टस से मस नहीं हुआ, " नहीं परायी अमानत पे मेरा कोई हक़ नहीं --" बनवारी मंदिर पहुंच गया। मन परेशान करता रहा। "बात करे भी तो किस से... "  पैसे और पेड़ो का डिब्बा अकल को थमा दिया। अकल ने बाकी पैसे उसको रखने को दे दिये... भोग लगा दो... बनवारी भोग लगाते यही सोच रहा था, " जो मन झपटा ,वही किसी तूफान की तरा थम गया... पहली बार उसकी कनखियो मे आंसू थे, हे कृष्णा मुझे मेरी गलतियों को माफ करना ---" मन मन ही प्रश्चित था उसका। अकल जी आपके साथ मे भी परिक्रमा करता हूँ.... सोचा बनवारी ने " कि उसकी परीक्षा मे पास हो जाऊ शायद.... " वो वापस आपने किनारे पे आ गया था.... अकल धयान मुद्रा मे बैठे, बनवारी राधे राधे कर रहा था, सब भूल गए थे, घड़ी, वक़्त सब थम गया था.... जैसे कुछ बासुरी वाला सिखाना चाहता था, वो सीख गया......अगली कड़ी मे इंतज़ार करे.....
"❤️नीरज शर्मा ❤️🚩