पुस्तक समीक्षा :_बागेश्वर एम. एल. ए. बन गया, लेखक :डॉ.संजीव कुमार, 9810066431, इंडिया नेट बुक्स, नोएडा
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लेखक संजीव कुमार में कई खूबियां हैं। वह अठारह अठारह घंटे पढ़ने,लिखने में लगे रहते हैं। लॉ,विज्ञान से लेकर पौराणिक महाकाव्य,काव्य,व्यंग्य आलोचना सभी में पिछले पच्चीस वर्षों से सक्रिय हैं।
यह रोचक उपन्यास भारतीय राजनीति और आम आदमी के संघर्ष को सामने रखता है। किस तरह दुनियादारी व्यक्ति को तिकड़मी,अवसरवादी और तेज बना देती है,इसकी यह कहानी है। किसी बाबा आदि से दूर तलक कोई संबंध इसका नहीं है।
संजीव कुमार कहानी प्रारंभ करते हैं तीन बार के ग्राम प्रधान बने शख्स बागेश्वर,उनके कारनामों और टोली से। अलग अलग क्षेत्र के अलग अलग स्किल वाले लोग। कोई खेतीबाड़ी देखता है तो कोई उनके शत्रुओं की खोज खबर रख मरम्मत करता है। कोई उनके फॉर्म पर आर्गेनिक सब्जियां उगवाता और शहर में बिक्री कर पैसा देता है तो कोई उनके राजनीतिक कार्यों की तैयारी करता है।बखूबी स्थापित होता है कि राजकाज ,भले ही प्रधानी का हो चल रहा है। इसमें बालेश्वर अपने जुगाड़ू स्वभाव से एसडीएम,कलेक्टर से लेकर विधायक,सांसद सभी से बनाकर रखते हैं। उनके माध्यम से देश के सभी ग्रामों की असलियत और जमीनी सच्चाई संजीव बता देते हैं।
बीच में उनकी पत्नी नीता,साली, सखी सुनयना आदि की कहानी भी चलती है। जिसमें भांजा सूरज भी शामिल है। फ्रायड के सिद्धांत से कुछ अतृप्त इच्छाएं, स्त्रियों की,उभरती हैं और वह अपने सुविधा से शांत करती हैं।
कुछ जगह छोटे छोटे अध्यायों के माध्यम से कथा आगे बढ़ती है। बागेश्वर आगे एमएलए के टिकट के लिए जुगाड़ में है।
प्रतीकात्मक रूप से गम्भीर बात कहती कथा
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इसे अभिधा रूप में ले तो भारतीय जनमानस की जुगाड़ू,सहज और सहनीय छवि सामने आती है। जो कमियों और अपने हक के लिए लड़ता नहीं बल्कि वैकल्पिक व्यवस्था की ओर मुड़ जाता है। हमारी लंबे और स्थाई समाधान में रुचि नहीं बल्कि येन केन प्रकरण काम निकल जाए,यह मनोवृत्ति है।
बड़ी बारीकी से संजीव कुमार अपने इस प्रथम उपन्यास में यह बात रखते हैं। स्त्रियां आज की जनता है जो सूरज जैसे अस्थाई व्यवस्था से संतुष्ट हैं।वह स्थाई समाधान और लड़कर अपना हक नहीं पाना चाहती। भले ही वह राजनीति में हो या घर में। क्या कारण है? उपन्यास कुछ वजह बताता है पहली सुविधा भोगी होना।यदि एक दो,भले ही वह बड़ी कमियां हो,के साथ बाकी सुविधा मिल रही है तो गुस्सा शांत रहता है। दूसरे एक कठिन और लंबी लड़ाई, जोड़तोड़ जो लोकतंत्र में अब सामान्य व्यक्ति के बस की बात नहीं।क्योंकि अच्छे लोग एकत्र नहीं होते और बुरे लोग अपने स्वार्थ के लिए तुरंत एकजुट हो जाते हैं।
दरअसल भारत में ही नहीं पूरे विश्व में यह रेडिकल समय है।इसमें आम व्यक्ति,चाहे ईरान,यूक्रेन,खाड़ी का हो,वह महज अपनी जगह भर रहा है। उसकी विचारधारा,सोच अब किनारे कर दी गई है।खासकर प्रगतिशील,विकसित देशों में। कभी कभी युवा पीढी बदलाव करती है जैसे नेपाल में युवा रैपर और एक्टिविस्ट बालेन शाह प्रधानमंत्री बने और उनकी नई पार्टी सत्ता में आई।लेकिन यह अपवाद है। उपन्यास के अध्यायों और शब्दों के पीछे से यह गम्भीर प्रश्न हमारे सामने आता है कि "यह हम कहां जा रहे हैं? क्या कोई और रास्ता नहीं?"
हालांकि लेखक बड़ी सहजता से नेताओं के चरित्र विचलन और खूंखारता से बचे हैं। और मीडियॉकर नेता के माध्यम से यह चिंता उठाते हैं कि किस तरह सत्ता धीरे धीरे आदमी को टॉक्सिक और क्रूरता की तरफ ले जाती है। और बागेश्वर उस राह पर अभी मध्य में है।
कथा में कुछ दिलचस्प यौन घटनाएं हैं जो बताती हैं कि अपनी इच्छाओं और भावनाओं को एक सीमा से अधिक नहीं दबाया जा सकता।
उनकी आपूर्ति के कई जरिए परमात्मा हमको देता है। यहां नैतिकता का प्रश्न बाद में पहले जरूरत का प्रश्न है।
जिंदगी में कुछ चीजें कम हैं तो हैं। कुछ लोग विद्रोह करते,शादी तोड़ते हैं तो कुछ उसी हालात में रहकर अपना रास्ता बनाते हैं।
एक नई ,सही राह दिखाता कथानक
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जगदम्बा बाबू गांव आ रहे हैं, (चित्रा मुद्गल),महाभोज (मन्नू भंडारी),राग दरबारी, (श्रीलाल शुकुल) जैसे बहुत से क्लासिक उपन्यास हुए हैं जिनमें बारम्बार भ्रष्टाचार और उसी में डूबती,तड़पती जनता को वैसे ही छोड़ दिया है। कथा पूरी हुई और आम आदमी सहमकर पीछे हट गया या "पैसे खिलाने से ही काम होता है" ,इस सोच में आ गया।इसी फ्रेम में अधिकतर इस प्रकार की कथाएं घूमती हैं। नई पीढ़ी के चंद ओवररेटेड, पचास वर्ष से ऊपर के "युवा लेखकों" को देखें तो उनकी लगभग सारी कहानियों में करप्ट व्यवस्था,तरसते लोग हैं। अपने आउटडेटेड हो चुके आकाओं के इशारे पर नकारात्मकता के इस नाले में वह खुद घिर जाते हैं। जबकि अपने आसपास देखें हर व्यक्ति ,कार्य कर रहा,भले ही छोटा हो,पैसे कमा रहा और परिवार का पेट भर रहा। अब तो जो बीपीएल वर्ग,निम्नतम, गरीब है उसे कई सुविधाएं राशन,तेल,गैस,धान सब हर माह नाम मात्र के मूल्य में मिल रहा। ऊपर से स्त्रियों के खाते में निश्चित धन राशि भी सरकार भेज रही। मेरे ही बिल्डिंग में गांव से आई युवती पांच घरों में सफाई आदि का काम करके आठ हजार रुपए तक कमा रही। चार माह में उसने सेकंड हैंड स्कूटी भी ले ली। तो इन पर कौन लिखेगा?
संजीव कुमार प्रस्तुत उपन्यास में इसी लीक को तोड़ते हैं,जो बेहद दिलचस्प और सत्य भी है। वह बागेश्वर के रूप में आज ,इक्कीसवीं सदी का ऐसा जागरूक युवक को लाते हैं जो समझता है कि गुंडागर्दी, बेइमानी करके सभी का के वोट नहीं पाए जा सकते। वह तीसरी बार ग्राम प्रधान है। कैसे है? वह सारी योजनाएं प्रधानमंत्री आवास योजना,जन धन उज्ज्वला,स्वास्थ्य,निशुल्क कम्प्यूटर प्रशिक्षण सभी को बाकायदा लागू करता है। वह अपने क्षेत्र के पात्र गरीबों को इनके लाभ दिलाता है। उसकी जेब से कुछ नहीं जाता सब सरकार भेज रही, पर योजनाओं के क्रियान्वयन में वह कुशलता दिखाता है और आम लोगों में लोकप्रिय है।
यह वह महीन रेशा है जिसकी अनदेखी लगभग सभी समकालीन लेखक करते हैं। सही क्रियान्वयन से आप अपनी भी जमीन और वोट बैंक मजबूत करते हो।
वह जमाना गया जब बाहुबल ही सब कुछ था। एक बार आप धमकाकर जीतोगे फिर अगली बार? संघर्ष,अपराध और सजा। वह दूध का धुला नहीं है।अफसरों को चतुराई से साधता है,अपने लिए जमीनें इक्कठी करता है, बाकायदा हर बीमारी खेत,गांव,विरोधी और जासूसी के लिए उसने अलग अलग गुर्गे तैनात किए हैं। फॉर्म हाउस पर शराब शबाब पार्टी अफसरों, नेताओं के लिए करता है। पर योजनाओं को लोगों तक पहुंचाता भी है।
यह पात्र रचकर एक नई बहस और सोच को जन्म दिया है। यह पिछले कुछ वर्षों के भारत की बदलती छवि है। समझदारी से राजनीति हो रही तो वहीं अपने को मजबूत भी बनाया जा रहा।
उपन्यास ऐसे मोड़ पर लेखक ने समाप्त किया है कि अगले भाग की संभावना बनी रहती है। यौन दृश्यों को कहानी में ऐसे बुना गया है कि वह कथा प्रवाह के साथ चलते हैं। थ्रीसम जैसे प्रयोग से बचना चाहिए या नहीं यह पाठकों पर छोड़ता हूं।
लेखक भाषा पर थोड़ा और काम करें तो लगेगा हर पात्र थोड़ा अलग है। शिल्प, वातावरण और ग्राम्य जीवन,को और बेहतर किया जा सकता था। इसके बावजूद भी उपन्यास एक ही बैठक में पठनीय है।मूल्य भी वाजिब है। इसे ऊपर लिखे नंबर से ,लेखक के ऑटोग्राफ के साथ मंगवाया जा सकता है। जिनके अगले उपन्यास की हिंदी जगत को प्रतीक्षा रहेगी।
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(डॉ.संदीप अवस्थी,आलोचक,फिल्म लेखक, मुंबई और राजस्थान निवास
मो 7737407061)