दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-18) Shivraj Bhokare द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-18)

Part 18: अतीत का दरवाज़ा

दरवाज़े के बाहर कदमों की आहट…
धीरे-धीरे तेज़ हो रही थी।

अंदर…
कबीर और Myra एक-दूसरे के सामने खड़े थे।

दोनों समझ चुके थे—
अब छुपना मुमकिन नहीं।
---
“Myra…”
कबीर ने धीमे स्वर में कहा,
“पीछे का रास्ता देखो… शायद कोई रास्ता हो।”

Myra तुरंत मुड़ी।

गोदाम के पीछे अंधेरा था…
मगर एक टूटी हुई खिड़की दिखाई दी।

“यहाँ से निकल सकते हैं!”
उसने कहा।

कबीर ने सिर हिलाया।

“चलो!”

दरवाज़े पर अब जोर से दस्तक होने लगी थी।

“दरवाज़ा खोलो!”
बाहर से आवाज़ आई।

विक्रम के आदमी…

और शायद खुद विक्रम भी।

---
दोनों जल्दी से खिड़की की तरफ बढ़े।

कबीर पहले बाहर कूदा…
फिर उसने Myra का हाथ पकड़ा।

“आओ!”

Myra बाहर आई…

और दोनों अंधेरे में भागने लगे।
---
बाहर…

हवा तेज़ थी।

रात और गहरी हो चुकी थी।

“किधर?”
Myra ने दौड़ते हुए पूछा।

कबीर ने कहा—

“जहाँ सच मिलेगा…”
---
कुछ देर बाद…

दोनों एक पुराने इलाके में पहुँचे।

टूटी-फूटी गलियाँ…
पुराने मकान…

जैसे वक्त यहाँ रुक गया हो।

“Myra…”
कबीर ने कहा,
“मुझे लगता है… हमें अपने परिवारों के अतीत के बारे में यहीं कुछ मिलेगा।”

Myra ने आसपास देखा।

उसके दिल में अजीब सी बेचैनी थी।

“ये जगह…”
उसने कहा,
“जानी-पहचानी लग रही है…”

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

“तुम यहाँ पहले आई हो?”

Myra ने सिर हिलाया।

“नहीं…
मगर फिर भी…”

उसकी बात अधूरी रह गई।
---
तभी…

एक बूढ़ा आदमी उनके सामने आ गया।

उसकी आँखें गहरी थीं…
जैसे वो बहुत कुछ जानता हो।

“तुम दोनों…”
उसने धीमे से कहा,
“आखिर यहाँ आ ही गए।”

कबीर और Myra चौंक गए।

“आप हमें जानते हैं?”
कबीर ने पूछा।

बूढ़ा आदमी हल्का सा मुस्कुराया।

“तुम दोनों को नहीं…”
उसने कहा,
“मगर तुम्हारे नामों को जरूर जानता हूँ।”

Myra की सांसें तेज़ हो गईं।

“क्या मतलब?”

बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे उनके करीब आया।

“तुम्हारे खानदानों की कहानी…”
उसने कहा,
“आज की नहीं है…”

“सालों पुरानी है…”
---
कबीर ने पूछा—

“क्या हुआ था?”

बूढ़े आदमी की आँखों में अतीत झलकने लगा।

“दो दोस्त थे…”
उसने कहना शुरू किया,
“एक—तुम्हारे दादा…
और दूसरा—Myra के दादा…”

दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।
---
“दोनों ने मिलकर एक साम्राज्य खड़ा किया…”
वो बोला,
“मगर फिर…”

उसने गहरी सांस ली—

“एक धोखा हुआ…”

“Myra के दादा ने…”
उसने कहा,
“तुम्हारे परिवार को बर्बाद कर दिया।”

Myra की आँखें फैल गईं।

“नहीं…”
उसने धीरे से कहा।

कबीर चुप था।

“और तब से…”
बूढ़ा आदमी बोला,
“ये दुश्मनी चल रही है।”
---
Myra की आँखों में आँसू आ गए।

“तो… ये सब सच है?”
उसने पूछा।

बूढ़ा आदमी बोला—

“सच हमेशा अधूरा होता है…”

दोनों चौंक गए।

“मतलब?”
कबीर ने पूछा।

बूढ़ा आदमी उनकी आँखों में देखता हुआ बोला—

“जो तुम जानते हो…
वो सिर्फ आधा सच है…”

कमरे में सन्नाटा छा गया।
---
“पूरा सच जानना है?”
उसने पूछा।

कबीर और Myra ने एक साथ सिर हिलाया—

“हाँ…”

बूढ़ा आदमी मुड़ा…

और एक पुराने दरवाज़े की तरफ इशारा किया।

“तो इस दरवाज़े के पार जाओ…”

“Myra…”
उसने कहा,
“तुम्हारे पिता…
वो नहीं हैं जो तुम समझती हो।”

Myra का दिल जोर से धड़कने लगा।
---
उसी समय…

दूर से गाड़ियों की आवाज़ फिर सुनाई दी।

विक्रम…
फिर उनके करीब आ रहा था।
---
कबीर ने Myra का हाथ पकड़ा।

“अब पीछे नहीं हट सकते…”
उसने कहा।

Myra ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में डर था…

मगर उससे ज्यादा हिम्मत।

“चलो…”
उसने कहा।

दोनों उस पुराने दरवाज़े की तरफ बढ़े।

और जैसे ही उन्होंने उसे खोला…

एक नया अंधेरा उनके सामने था।
---
कहानी अब उस मोड़ पर थी…

जहाँ अतीत के राज खुलने वाले थे…

और वो सच…

जो सब कुछ बदल देगा।


पुराने दरवाज़े के खुलते ही…
एक ठंडी हवा का झोंका अंदर आया।

जैसे उस कमरे में सालों से बंद पड़ा अतीत…
अब बाहर निकलने को तैयार हो।

कबीर और Myra धीरे-धीरे अंदर गए।

कमरा अंधेरा था…
दीवारों पर पुराने फोटो…
और बीच में एक बड़ी लकड़ी की मेज़।

“Myra…”
कबीर ने धीमे से कहा,
“सावधान रहना…”

Myra ने सिर हिलाया।

उसकी नजरें दीवार पर टंगी एक तस्वीर पर जाकर ठहर गईं।

दो आदमी…

हँसते हुए…
एक साथ खड़े।

“Myra…”
उसने फुसफुसाया,
“ये… पापा हैं…”

कबीर ने गौर से देखा।

“और ये…”
उसने कहा,
“शायद मेरे दादा…”

दोनों चौंक गए।

“तो ये सच है…”
Myra ने धीरे से कहा,
“वो दोनों दोस्त थे…”
---
तभी…

पीछे से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई।

दोनों ने तुरंत मुड़कर देखा।

वही बूढ़ा आदमी अंदर आ चुका था।

“दोस्ती…”
वो बोला,
“इतनी गहरी थी… कि लोग मिसाल देते थे…”

“Myra…”
उसने कहा,
“तुम्हारे पिता भी उस वक्त…
उन्हें अपना परिवार मानते थे…”

Myra की आँखों में उलझन थी।

“फिर… क्या हुआ?”
उसने पूछा।

बूढ़े आदमी की आँखों में साया गहरा हो गया।

“लालच…”
उसने कहा।

“पैसा…
पावर…”

कबीर ने मुट्ठी भींच ली।

“तो Myra के दादा ने धोखा दिया?”
उसने पूछा।

बूढ़ा आदमी मुस्कुराया।

“यही तो तुम्हें बताया गया है…”
उसने कहा।

दोनों एक साथ चौंक गए।

“मतलब?”
Myra ने पूछा।

बूढ़ा आदमी आगे बढ़ा।

“असली धोखा…”
उसने धीमे से कहा,
“तुम्हारे दादा ने दिया था, कबीर।”

कमरे में सन्नाटा जम गया।

“क्या?”
कबीर की आवाज़ भारी हो गई।

“Myra के दादा को फँसाया गया…”
बूढ़ा बोला,
“उन पर झूठा इल्जाम लगाया गया…”

Myra की सांसें तेज़ हो गईं।

“तो… मेरे दादा बेगुनाह थे?”
उसने पूछा।

बूढ़े आदमी ने सिर हिलाया।

“हाँ…”

कबीर पीछे हट गया।

उसके दिमाग में सब कुछ उलट-पुलट हो गया।

“तो… ये सारी दुश्मनी…”
उसने कहा,
“एक झूठ पर बनी है?”

बूढ़ा आदमी बोला—

“नहीं…”

“झूठ पर नहीं…
साजिश पर बनी है।”
--
“Myra…”
उसने उसकी तरफ देखा,
“तुम्हारे पिता…”

उसने कुछ पल रुककर कहा—

“वो इस साजिश का हिस्सा हैं।”

Myra का दिल जैसे रुक गया।

“नहीं…”
उसने तुरंत कहा।

“पापा ऐसा नहीं कर सकते…”

बूढ़ा आदमी शांत रहा।

“तुम्हें सच जानना है…”
उसने कहा,
“तो दिल मजबूत करना होगा।”
---
उसी समय…

दरवाज़ा जोर से खुला।

सबकी नजर उधर गई।

विक्रम वर्मा अंदर आ चुके थे।

उनकी आँखों में गुस्सा नहीं…
बल्कि एक ठंडी सच्चाई थी।

“Myra…”
उन्होंने कहा,
“मैंने तुम्हें मना किया था…”

Myra पीछे हट गई।

“पापा…”
उसने कांपते हुए कहा,
“ये सब… सच है?”

विक्रम कुछ पल चुप रहे।

फिर उन्होंने कहा—

“सच… वो नहीं होता जो सुनने में अच्छा लगे…”

“Myra…”
उन्होंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
“ये दुनिया… भरोसे पर नहीं चलती…”

“पावर पर चलती है।”

कबीर ने गुस्से में कहा—

“तो आपने ये सब किया?”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

“मैंने सिर्फ… अपना हक वापस लिया है।”
---
Myra की आँखों से आँसू बहने लगे।

“तो आपने… हमें अलग किया…”
उसने कहा।

विक्रम ने बिना झिझक कहा—

“हाँ।”

“क्योंकि तुम्हारा साथ…”
उन्होंने कहा,
“कमजोरी था।”
---
कबीर ने आगे बढ़कर कहा—

“ये कमजोरी नहीं…
हमारी ताकत है!”

विक्रम हंसे।

“ताकत?”
उन्होंने कहा,
“ताकत वो होती है…
जो सामने वाले को झुका दे…”

“Myra…”
उन्होंने सख्ती से कहा,
“मेरे साथ चलो।”

कमरे में तनाव भर गया।

Myra ने कबीर की तरफ देखा…

और फिर अपने पिता की तरफ।

ये पल…

फिर से एक फैसला मांग रहा था।
---
“Myra…”
कबीर ने धीरे से कहा।

उसकी आवाज़ में भरोसा था।

Myra की आँखों में आँसू थे…

मगर इस बार…

उसके अंदर कुछ बदल चुका था।

उसने धीरे से कहा—

“अब मैं सच जान चुकी हूँ…”

“और अब…”
उसने अपने पिता की तरफ देखते हुए कहा—

“मैं आपके साथ नहीं जाऊंगी।”
---
कमरे में सन्नाटा छा गया।

विक्रम की आँखों में पहली बार…

गुस्से के साथ एक झटका भी था।
---
कहानी अब अपने अंतिम मोड़ की तरफ बढ़ रही थी…

जहाँ सच सामने आ चुका था…

और अब फैसला होना बाकी था—

इश्क जीतेगा…
या फिर नफरत।