Part 3: नाम जो दीवार बन गया
रात बीत चुकी थी, मगर कबीर की आँखों से नींद कोसों दूर थी।
सुबह की हल्की रोशनी कमरे में दाखिल हो रही थी, लेकिन उसके भीतर अब भी वही अँधेरा था… वही सवाल, जो रात से उसका पीछा कर रहे थे।
“Myra…”
उसने फिर से उसका नाम धीरे से दोहराया।
एक अजनबी लड़की…
एक खतरनाक जगह…
और वो अजीब सा एहसास, जो उसे अब तक महसूस हो रहा था।
कबीर ने अपने बालों में हाथ फेरा और बिस्तर से उठ गया।
वो खुद को समझाने की कोशिश कर रहा था कि ये सब एक इत्तेफाक था…
मगर उसका दिल मानने को तैयार नहीं था।
नीचे हॉल से आवाज़ें आ रही थीं।
उसके घर में सुबह कभी खामोश नहीं होती थी।
कबीर सीढ़ियों से नीचे उतरा।
डाइनिंग टेबल पर उसके पिता बैठे थे—राघव मलिक।
उनका चेहरा हमेशा की तरह सख्त था, और आँखों में वही ठंडा आत्मविश्वास।
“तुम देर से आए थे कल रात,” राघव ने बिना उसकी तरफ देखे कहा।
कबीर एक पल के लिए रुका।
“हाँ… कुछ काम था।”
“काम?”
राघव ने अखबार मोड़ते हुए उसकी तरफ देखा।
“कौन सा काम तुम्हें उस तरफ ले गया, जहाँ जाने की इजाज़त मैंने कभी नहीं दी?”
कबीर का दिल एक पल के लिए तेज़ धड़का।
“आप क्या कहना चाहते हैं?”
राघव की आँखें अब सीधी उसकी आँखों में थीं।
“मुझे सब पता होता है, कबीर।”
कमरे का माहौल अचानक भारी हो गया।
“तुम उस पुरानी हवेली के पास थे,” राघव ने धीरे से कहा।
“जहाँ कदम रखना भी हमारे लिए मना है।”
कबीर चुप रहा।
वो समझ गया था कि अब झूठ बोलना बेकार है।
“वहाँ क्या देखा तुमने?” राघव ने पूछा।
कबीर के दिमाग में Myra का चेहरा उभर आया।
उसकी आँखें… उसकी आवाज़… उसकी चेतावनी।
“कुछ खास नहीं,” कबीर ने नजरें हटाते हुए कहा।
राघव हल्का सा मुस्कुराए।
मगर वो मुस्कान सुकून देने वाली नहीं थी।
“झूठ बोलना तुम्हें आता नहीं, बेटा,” उन्होंने कहा।
कबीर ने गहरी सांस ली।
“वहाँ एक लड़की थी।”
राघव का चेहरा एकदम बदल गया।
उनकी आँखों में एक पल के लिए गुस्सा चमका।
“उसका नाम क्या था?” उन्होंने तुरंत पूछा।
कबीर कुछ पल चुप रहा।
फिर धीरे से बोला,
“Myra.”
जैसे ही ये नाम कमरे में गूंजा…
एक खामोशी छा गई।
राघव ने अपनी मुट्ठी कस ली।
उनकी आँखों में अब सिर्फ गुस्सा नहीं था… कुछ और भी था… पुरानी नफरत।
“Myra…”
उन्होंने नाम को जैसे जहर की तरह दोहराया।
“तुम्हें अंदाज़ा भी है तुम किससे मिलकर आए हो?”
कबीर ने सीधे उनकी आँखों में देखा।
“आप बताइए।”
राघव उठ खड़े हुए।
उनकी आवाज़ अब पहले से ज्यादा सख्त थी।
“वो लड़की… हमारे सबसे बड़े दुश्मन की बेटी है।”
कबीर के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई।
“दुश्मन?”
उसने धीरे से पूछा।
“वर्मा खानदान,” राघव ने कहा,
“जिनसे हमारी दुश्मनी सालों पुरानी है… और खून से लिखी गई है।”
कमरे की हवा भारी हो गई।
कबीर के दिमाग में कल रात की हर बात गूंजने लगी—
“Myra… मैं तुम्हारी दुश्मन हूँ।”
वो सच बोल रही थी।
“और तुम…”
राघव की आवाज़ गूंजी,
“तुम उसी दुश्मन की बेटी के साथ खड़े थे।”
कबीर कुछ नहीं बोला।
“कबीर, ये खेल नहीं है,” राघव आगे बढ़े।
“इस दुश्मनी ने बहुत कुछ छीना है हमसे।”
“तो खत्म क्यों नहीं करते इसे?”
कबीर के मुंह से अचानक निकल गया।
राघव रुक गए।
“क्या कहा तुमने?”
“मैंने कहा… अगर ये सब इतना गलत है… तो खत्म क्यों नहीं कर देते?”
कबीर ने दोहराया।
राघव की आँखों में अब गुस्सा साफ दिख रहा था।
“कुछ दुश्मनियाँ खत्म नहीं होतीं, कबीर,” उन्होंने ठंडे लहज़े में कहा।
“उन्हें बस जिया जाता है… जब तक उनमें से कोई एक खत्म ना हो जाए।”
कबीर के भीतर कुछ टूट रहा था।
“और अगर मैं उसे फिर से मिला तो?” उसने धीरे से पूछा।
राघव उसकी तरफ बढ़े।
उनकी आवाज़ अब धीमी थी… मगर खतरनाक।
“तो याद रखना…
उस दिन से तुम सिर्फ मेरे बेटे नहीं रहोगे…
बल्कि मेरे दुश्मन के साथ खड़े इंसान बन जाओगे।”
कबीर की सांसें भारी हो गईं।
ये सिर्फ एक चेतावनी नहीं थी…
ये एक फैसला था।
और अब उसे तय करना था…
वो किस तरफ खड़ा होगा।
कुछ देर बाद…
कबीर अपने कमरे में था।
उसके हाथ में उसका फोन था… मगर उसकी नजरें कहीं और थीं।
“Myra…”
उसने फिर से नाम लिया।
उसका दिल उसे खींच रहा था।
और उसका दिमाग उसे रोक रहा था।
मगर कुछ चीजें ऐसी होती हैं…
जिन्हें ना दिल समझता है, ना दिमाग।
कबीर ने अचानक फैसला लिया।
“मैं उसे फिर से मिलूंगा,” उसने खुद से कहा।
उसे सच जानना था।
उस दुश्मनी का… उस लड़की का… और अपने दिल का।
उधर…
Myra अपने कमरे में खिड़की के पास खड़ी थी।
उसकी आँखें बाहर देख रही थीं…
मगर उसका ध्यान कहीं और था।
कबीर।
उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
“ये गलत है…” उसने खुद से कहा।
मगर दिल… दिल कुछ और ही कह रहा था।
तभी दरवाज़ा खुला।
उसके पिता अंदर आए—विक्रम वर्मा।
उनका चेहरा सख्त था, और आँखों में वही पुरानी नफरत।
“Myra,” उन्होंने कहा,
“तुम्हें पता है तुमने क्या किया है?”
Myra चुप रही।
“तुमने दुश्मन के बेटे को बचाया,” उन्होंने आगे कहा।
Myra ने धीरे से उनकी तरफ देखा।
“वो बस एक इंसान था…”
विक्रम हंसे।
मगर उनकी हंसी में ठंडापन था।
“नहीं, Myra… वो सिर्फ इंसान नहीं था,”
उन्होंने कहा,
“वो मलिक खानदान का वारिस है।”
Myra का दिल एक पल के लिए रुक गया।
“और अब…”
विक्रम उसकी तरफ बढ़े,
“अब वो हमारे लिए खतरा है।”
Myra की आँखों में डर और बेचैनी दोनों थे।
“अगर वो फिर से यहाँ आया…”
विक्रम की आवाज़ धीमी हो गई,
“तो इस बार हम उसे जिंदा नहीं जाने देंगे।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
Myra ने अपनी नजरें झुका लीं।
किस्मत ने जो धागा जोड़ा था…
अब वो और उलझने वाला था।
और शायद…
अब ये सिर्फ इश्क की कहानी नहीं रही थी।