Part 7: अंधेरे के बीच नाम
जब होश और बेहोशी के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है…
तो इंसान सच और सपनों में फर्क नहीं कर पाता।
कबीर की आँखें भारी थीं।
सिर में तेज़ दर्द धड़क रहा था, जैसे हर धड़कन के साथ कोई अंदर से चोट दे रहा हो।
सब कुछ अंधेरा था।
कुछ पल… या शायद कई मिनट…
उसे खुद भी नहीं पता।
फिर धीरे-धीरे…
उसने अपनी आँखें खोलने की कोशिश की।
हल्की सी रोशनी…
धुंधली आकृतियाँ…
और एक ठंडी, सीलन भरी हवा।
कबीर ने पलकें झपकाईं।
वो एक कमरे में था।
कमरा पुराना था…
दीवारों पर दरारें…
छत से लटकता हुआ एक बल्ब, जो हर कुछ सेकंड में टिमटिमा रहा था।
उसके हाथ बंधे हुए थे।
पीछे… एक कुर्सी से।
कबीर ने हिलने की कोशिश की…
मगर उसके शरीर में ताकत नहीं थी।
“होश आ गया इसका…”
एक भारी आवाज़ गूंजी।
कबीर ने सिर उठाने की कोशिश की।
आवाज़ की दिशा में देखा।
तीन आदमी खड़े थे।
वही… जो उस रात Myra के घर पर थे।
उसकी सांसें तेज़ हो गईं।
“तो तुम लोग…”
उसने मुश्किल से कहा।
उनमें से एक आदमी आगे बढ़ा।
“हमने कहा था… यहाँ मत आना,”
उसने ठंडे लहज़े में कहा।
कबीर ने हल्की सी हंसी निकाली।
“और मैंने कहा था… मैं वापस आऊंगा।”
उस आदमी की आँखों में गुस्सा चमका।
“बहुत हिम्मत है तुममें,” उसने कहा।
“या फिर बहुत बड़ी बेवकूफी।”
कबीर ने उसकी आँखों में देखते हुए जवाब दिया—
“शायद दोनों।”
कमरे में खामोशी छा गई।
“तुम्हें पता है तुम कहाँ हो?”
दूसरे आदमी ने पूछा।
कबीर चुप रहा।
“ये वो जगह है… जहाँ से लोग वापस नहीं जाते,”
उसने कहा।
कबीर ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं।
“Myra…”
नाम उसके होंठों से धीरे से निकला।
उन आदमियों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
“देखा?”
पहला आदमी हंसा,
“मोहब्बत आदमी को कितना कमजोर बना देती है।”
कबीर ने आँखें खोलीं।
“मोहब्बत कमजोर नहीं बनाती,”
उसने धीमे मगर साफ लहज़े में कहा,
“बल्कि इतना मजबूत बना देती है… कि इंसान मौत से भी नहीं डरता।”
एक पल के लिए सब चुप हो गए।
फिर उनमें से एक आदमी आगे आया।
उसने कबीर के चेहरे पर जोर से थप्पड़ मारा।
कबीर का सिर एक तरफ झटका…
मगर उसने कोई आवाज़ नहीं निकाली।
“ये ताकत तुम्हें बचा नहीं पाएगी,”
उसने कहा।
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में दर्द था…
मगर उससे ज्यादा जिद।
“मुझे बचना नहीं है…”
उसने कहा,
“बस उसे कुछ नहीं होना चाहिए।”
“किसे?”
उस आदमी ने पूछा,
हालांकि वो जवाब जानता था।
“Myra…”
कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया।
तभी…
दरवाज़ा खुला।
सभी की नजरें उस तरफ गईं।
और अंदर आए—
विक्रम वर्मा।
उनका चेहरा हमेशा की तरह सख्त था…
मगर आँखों में इस बार कुछ और भी था—खतरा।
कबीर ने उन्हें देखा।
तो ये थे… Myra के पिता।
“तो तुम हो… कबीर मलिक,”
विक्रम ने धीरे-धीरे कहा।
कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।
विक्रम उसके सामने आकर खड़े हो गए।
“हिम्मत है तुममें,” उन्होंने कहा,
“दुश्मन के घर तक आने की।”
कबीर ने उनकी आँखों में देखा।
“आपकी बेटी ने बुलाया नहीं था…”
उसने कहा,
“मैं खुद आया था।”
विक्रम हल्का सा मुस्कुराए।
“मोहब्बत…”
उन्होंने जैसे उस शब्द का मज़ाक उड़ाया,
“कितनी अजीब चीज़ है।”
कबीर चुप रहा।
“तुम जानते हो इसका अंजाम क्या होगा?”
विक्रम ने पूछा।
“हाँ,” कबीर ने बिना सोचे जवाब दिया।
विक्रम थोड़ा हैरान हुए।
“और फिर भी…”
उन्होंने कहा।
“फिर भी,”
कबीर ने उनकी बात काट दी,
“मैं पीछे नहीं हटूंगा।”
कमरे में तनाव और बढ़ गया।
विक्रम कुछ पल तक उसे देखते रहे।
फिर धीरे से बोले—
“तुम्हें लगता है Myra तुम्हें बचा लेगी?”
कबीर के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई।
“नहीं,”
उसने कहा,
“मगर मैं उसे बचा लूंगा।”
ये सुनकर सब हंस पड़े।
मगर विक्रम नहीं हंसे।
उन्होंने अपने आदमी की तरफ इशारा किया।
“इसे खत्म कर दो,” उन्होंने शांत आवाज़ में कहा।
कमरे की हवा जम गई।
कबीर ने आँखें बंद कर लीं।
उसके चेहरे पर डर नहीं था…
बस एक ही नाम था—
“Myra…”
---
उधर…
Myra बेचैन होकर कमरे में इधर-उधर चल रही थी।
उसका दिल तेज़ धड़क रहा था।
“कुछ गलत हो रहा है…”
उसने खुद से कहा।
तभी…
दरवाज़े के बाहर से किसी की आवाज़ आई—
“साहब ने उस लड़के को पकड़ लिया है…”
Myra के कदम वहीं रुक गए।
उसकी सांसें थम गईं।
“कौन सा लड़का?”
उसने दरवाज़ा खोलते हुए पूछा।
मगर उसके दिल को पहले ही जवाब मिल चुका था।
“कबीर मलिक…”
ये नाम सुनते ही जैसे उसकी दुनिया रुक गई।
“Myra…”
उसके होंठों से आवाज़ भी नहीं निकली।
अगले ही पल…
वो दौड़ पड़ी।
उसे नहीं पता था वो कहाँ जा रही है…
बस इतना पता था—
उसे कबीर तक पहुंचना है।
किसी भी कीमत पर।
क्योंकि इस बार…
अगर वो देर कर गई…
तो शायद सब खत्म हो जाएगा।