दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-5) Shivraj Bhokare द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-5)

Part 5: वो एहसास, जिसे नाम मिल गया

रात गहरी हो चुकी थी।
आसमान पर चाँद था, मगर उसकी रोशनी भी जैसे अधूरी लग रही थी।
शायद इसलिए… क्योंकि कुछ कहानियाँ चाँदनी में नहीं, अँधेरे में लिखी जाती हैं।

कबीर अपने कमरे में था।
खिड़की के पास खड़ा, दूर शहर की लाइट्स को देख रहा था।
हर चमकती हुई रोशनी उसे Myra की याद दिला रही थी।

उसकी आँखें… उसकी आवाज़…
और वो अनकहा डर, जो हर बार उसकी बातों में छुपा होता था।

“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था…”

उसके कानों में फिर वही शब्द गूंजे।

कबीर ने गहरी सांस ली।

“फिर भी मैं गया…”
उसने खुद से कहा।

क्यों?

इस सवाल का जवाब उसके पास नहीं था।
या शायद था… मगर वो मानना नहीं चाहता था।

उसने अपनी आँखें बंद कीं।

और उसी पल…
उसे समझ आ गया।

“ये इश्क है…”

शब्द उसके होंठों से धीरे-धीरे निकले।
जैसे वो खुद भी इस सच को महसूस कर रहा हो।

एक अजनबी लड़की…
दो मुलाकातें…
और दिल का ये हाल।

कबीर हल्का सा मुस्कुराया…
मगर उस मुस्कान में सुकून नहीं था।

क्योंकि उसे ये भी पता था—
ये इश्क आसान नहीं होगा।


---

उधर…

Myra अपने कमरे में बैठी थी।
उसके हाथों में वही पुरानी डायरी थी, जिसमें वो अक्सर अपने दिल की बातें लिखा करती थी।

उसने पन्ना खोला।

कुछ पल तक खाली पन्ने को देखती रही…
जैसे शब्द खुद उसके पास आने का इंतज़ार कर रहे हों।

फिर उसने लिखना शुरू किया—

“आज फिर वो आया था…”

उसके हाथ हल्के-हल्के कांप रहे थे।

“और इस बार… मैं उसे रोक नहीं पाई।”

उसकी आँखों में हल्की नमी आ गई।

“ये गलत है…
मगर दिल को कैसे समझाऊं, कि जो महसूस हो रहा है… वो नहीं होना चाहिए?”

उसने पेन रोक दिया।

कुछ पल तक चुप रही।

फिर धीरे से फुसफुसाई—

“कबीर…”

उसका नाम लेते ही जैसे सब कुछ बदल गया।

उसने डायरी बंद कर दी।

“मुझे ये सब खत्म करना होगा,” उसने खुद से कहा।

मगर उसके दिल ने उसी पल उसे जवाब दिया—

“अगर ये खत्म हो सकता… तो शुरू ही क्यों होता?”

Myra ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

वो जानती थी—
अब वो इस एहसास से भाग नहीं सकती।


---

अगले दिन…

शहर अपनी रफ्तार में था।
लोग अपने काम में लगे थे…
मगर दो लोग ऐसे भी थे, जिनकी दुनिया अब बदल चुकी थी।

कबीर कॉलेज के बाहर खड़ा था।

उसके दोस्त कुछ बात कर रहे थे…
मगर उसका ध्यान कहीं और था।

“Myra…”

नाम जैसे उसके दिमाग में बार-बार घूम रहा था।

“किस सोच में डूबा है?”
उसके दोस्त अर्जुन ने उसे टोकते हुए पूछा।

कबीर ने हल्का सा सिर हिलाया।
“कुछ नहीं।”

“कुछ तो है,” अर्जुन ने मुस्कुराते हुए कहा।
“तू कल से अजीब behave कर रहा है।”

कबीर चुप रहा।

वो जानता था—
ये बात वो किसी को नहीं बता सकता।

“छोड़… तू नहीं बताएगा,” अर्जुन ने कंधे उचकाए।
“वैसे आज शाम को पार्टी है, आ रहा है ना?”

कबीर ने बिना सोचे जवाब दिया—
“नहीं।”

अर्जुन चौंक गया।
“तू और पार्टी miss कर रहा है? मामला serious है।”

कबीर हल्का सा मुस्कुराया…
मगर कुछ बोला नहीं।

क्योंकि उसे खुद नहीं पता था—
ये मामला कितना serious है।


---

शाम…

कबीर फिर उसी गली में था।

जैसे उसके कदम अब खुद रास्ता पहचान चुके थे।

उसने दरवाज़े के सामने खड़े होकर गहरी सांस ली।

आज कुछ अलग था।

आज वो सिर्फ मिलने नहीं आया था…
आज वो अपने दिल का जवाब लेने आया था।

उसने दरवाज़े पर दस्तक दी।

कुछ सेकंड…

और फिर दरवाज़ा खुला।

Myra सामने थी।

दोनों कुछ पल तक चुप रहे।

फिर कबीर ने धीरे से कहा—

“मुझे तुमसे कुछ कहना है।”

Myra की सांसें तेज़ हो गईं।

“कबीर…”
उसने उसे रोकना चाहा।

मगर इस बार कबीर नहीं रुका।

“मैं नहीं जानता ये सही है या गलत,”
उसने कहा,
“मगर इतना जानता हूँ कि… अब मैं तुमसे दूर नहीं रह सकता।”

Myra की आँखों में हलचल थी।

“ये इश्क है, Myra…”
कबीर की आवाज़ धीमी थी, मगर साफ।

“और शायद ये मेरी सबसे बड़ी गलती है…
मगर मैं इसे छोड़ना नहीं चाहता।”

खामोशी।

गहरी… भारी खामोशी।

Myra कुछ पल तक उसे देखती रही।

उसकी आँखों में आँसू थे…
मगर वो गिर नहीं रहे थे।

“तुम नहीं जानते ये क्या है,” उसने धीरे से कहा।

“तो बता दो,” कबीर ने तुरंत कहा।

Myra ने सिर हिलाया।

“ये इश्क नहीं है…”
उसकी आवाज़ कांप रही थी,
“ये बर्बादी है।”

कबीर एक कदम और आगे बढ़ा।

“अगर ये बर्बादी है…
तो मैं इसे खुशी-खुशी स्वीकार करता हूँ।”

Myra की आँखों से आखिरकार एक आंसू गिर गया।

उसने खुद को संभालने की कोशिश की।

“तुम क्यों नहीं समझते?”
उसने कहा,
“हमारा कोई अंजाम नहीं है…”

कबीर ने उसकी बात काट दी।

“हर कहानी का अंजाम जरूरी नहीं होता,” उसने कहा।
“कुछ कहानियाँ बस जीने के लिए होती हैं।”

Myra ने उसकी तरफ देखा।

उसके शब्द… उसके जज़्बात…
सब कुछ उसे तोड़ रहे थे।

“कबीर…”
उसने धीरे से कहा,
“अगर तुम सच में मुझसे…”

वो रुक गई।

शब्द उसके साथ छोड़ चुके थे।

कबीर ने उसकी आँखों में देखा।

“Myra… मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”

ये शब्द जैसे हवा में गूंज गए।

Myra की सांसें थम गईं।

उसने कुछ नहीं कहा।

बस उसे देखती रही।

और उसी पल…
उसे समझ आ गया—

वो भी हार चुकी है।

“Myra…”
कबीर ने धीरे से कहा।

कुछ सेकंड बाद…
Myra ने अपनी नजरें झुका लीं।

और बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

“मैं भी…”

कबीर की धड़कन रुक सी गई।

“मैं भी तुमसे…”

उसने वाक्य पूरा नहीं किया।

मगर उसे पूरा करने की जरूरत भी नहीं थी।

क्योंकि जो कहना था…
वो उनकी खामोशी ने कह दिया था।

उस रात…
दो दुश्मनों के बीच एक रिश्ता बन चुका था।

जिसे अब कोई नाम मिल चुका था—

इश्क।

मगर…

हर इश्क की तरह…
इस इश्क की भी एक कीमत थी।

और वो कीमत…
अभी बाकी थी।