दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-8) Shivraj Bhokare द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-8)

Part 8: वक्त के खिलाफ दौड़

“इसे खत्म कर दो…”

ये शब्द कमरे में गूंजे… और जैसे हर चीज़ ठहर गई।

कबीर ने आँखें बंद कर लीं।
उसके चेहरे पर अजीब सा सुकून था, जैसे उसने अपना फैसला कब का कर लिया हो।

“Myra…”

उसके होंठों पर बस यही नाम था।

एक आदमी आगे बढ़ा।
उसके हाथ में चमकती हुई लोहे की रॉड थी।

वो कबीर के सामने आकर रुका।
एक पल… बस एक पल की दूरी थी सब खत्म होने में।

तभी—

“रुको!”

दरवाज़े पर गूंजती हुई आवाज़ ने सबको रोक दिया।

सभी की नजरें एक साथ उस तरफ मुड़ीं।

दरवाज़े पर…
Myra खड़ी थी।

उसकी सांसें तेज़ थीं…
चेहरा घबराया हुआ…
मगर आँखों में एक अजीब सी हिम्मत थी।

“Myra…”
कबीर के होंठों से धीमी आवाज़ निकली।

वो सच में आ गई थी।

विक्रम वर्मा की भौंहें सिकुड़ गईं।

“तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
उनकी आवाज़ ठंडी थी।

Myra धीरे-धीरे अंदर आई।

उसकी नजरें सिर्फ कबीर पर थीं।

“उसे छोड़ दीजिए,” उसने कहा।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

“तुम मुझे हुक्म दे रही हो?”
विक्रम की आवाज़ अब और खतरनाक हो गई।

Myra ने उनकी आँखों में देखा।

“मैं आपसे विनती कर रही हूँ,” उसने कहा।

कबीर ने उसे देखा।

वो समझ गया—
ये वही Myra नहीं थी, जो हमेशा मजबूत दिखती थी।

आज वो डर रही थी।

उसके लिए।

“तुम्हें पता है ये कौन है?”
विक्रम ने पूछा।

Myra ने बिना झिझक जवाब दिया—
“हाँ।”

“और फिर भी?”
उनकी आवाज़ और गहरी हो गई।

Myra कुछ पल चुप रही।
फिर उसने धीरे से कहा—

“और फिर भी…”

ये दो शब्द…
कमरे की हवा को और भारी कर गए।

विक्रम ने गुस्से में कदम आगे बढ़ाए।

“तुम्हें अंदाज़ा भी है तुम क्या कर रही हो?”
उन्होंने कहा,
“तुम अपने दुश्मन के लिए खड़ी हो रही हो!”

Myra की आँखों में आँसू आ गए…
मगर उसकी आवाज़ नहीं टूटी।

“मैं एक इंसान के लिए खड़ी हूँ,” उसने कहा।

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में पहली बार…
अपने लिए इतना डर देखा।

“उसे छोड़ दीजिए…”
Myra ने फिर कहा।

विक्रम कुछ पल तक उसे देखते रहे।

फिर उन्होंने हल्की सी हंसी निकाली।

“तुम उससे मोहब्बत करती हो?”

Myra चुप रही।

उसकी खामोशी ही उसका जवाब थी।

कमरे में मौजूद हर इंसान ने वो जवाब सुन लिया था।

विक्रम की आँखों में अब गुस्सा नहीं…
कुछ और था—धोखा।

“तुमने हमारी इज्जत के साथ ये किया है…”
उन्होंने धीरे से कहा।

Myra ने सिर झुका लिया।

“अगर इज्जत का मतलब ये है कि मैं किसी को मरते हुए देखूं…”
उसने कांपती हुई आवाज़ में कहा,
“तो ऐसी इज्जत मुझे नहीं चाहिए।”

एक पल के लिए सब कुछ थम गया।

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

वो अब सिर्फ एक लड़की नहीं थी…
वो उसके लिए सब कुछ बन चुकी थी।

विक्रम ने गहरी सांस ली।

फिर धीरे से बोले—

“ठीक है…”

Myra ने उनकी तरफ देखा।

“अगर तुम्हें इसकी जान इतनी प्यारी है…”
उन्होंने कहा,
“तो तुम्हें एक कीमत चुकानी होगी।”

Myra का दिल जोर से धड़का।

“कौन सी कीमत?” उसने पूछा।

विक्रम ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

“आज के बाद…
तुम उससे कभी नहीं मिलोगी।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

कबीर की सांस रुक गई।

“Myra…”
उसने धीरे से कहा।

Myra की आँखों में आँसू भर आए।

“और अगर तुमने ये वादा तोड़ा…”
विक्रम ने आगे कहा,
“तो अगली बार… मैं उसे नहीं छोड़ूंगा।”

Myra का दिल टूट रहा था।

एक तरफ उसका प्यार…
और दूसरी तरफ उसकी जान।

उसने धीरे से आँखें बंद कीं।

कुछ पल…

और फिर—

“ठीक है,”
उसने बहुत मुश्किल से कहा।

कबीर का दिल जैसे किसी ने तोड़ दिया।

“Myra… नहीं,”
उसने कहा।

Myra ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में दर्द था…
मगर साथ ही एक फैसला भी।

“तुम्हें जीना है, कबीर…”
उसने धीरे से कहा।

“मेरे बिना नहीं,” कबीर ने जवाब दिया।

Myra की आँखों से आँसू गिर गए।

“कभी-कभी…”
उसने कहा,
“इश्क का मतलब साथ रहना नहीं होता…”

“बल्कि किसी को जिंदा देखना होता है।”

कबीर चुप हो गया।

उसके पास अब कोई शब्द नहीं थे।

विक्रम ने अपने आदमी को इशारा किया।

“इसे छोड़ दो।”

रस्सियाँ खोली गईं।

कबीर मुश्किल से खड़ा हुआ।

उसकी नजरें सिर्फ Myra पर थीं।

“Myra…”
उसने फिर कहा।

Myra पीछे हट गई।

“मत आना अब…”
उसने धीमे से कहा।

कबीर के कदम रुक गए।

“कभी नहीं…”

ये शब्द जैसे उसके दिल में उतर गए।

कबीर कुछ पल तक उसे देखता रहा।

फिर धीरे-धीरे मुड़ा…

और बाहर चला गया।

दरवाज़ा बंद हो गया।

Myra वहीं खड़ी रही…

टूटी हुई।

उसने अपना वादा निभा लिया था।

मगर उस वादे ने…
उससे उसका सब कुछ छीन लिया था।

और शायद…

यही इस इश्क की पहली असली कीमत थी।