Part 4: खिंचाव जो रोका ना गया
सुबह बीत गई थी, मगर कबीर के भीतर की बेचैनी कम नहीं हुई।
हर बार जब वो खुद को समझाने की कोशिश करता, Myra का चेहरा उसके सामने आ खड़ा होता।
वो नाम अब उसके लिए सिर्फ एक याद नहीं था…
एक खिंचाव बन चुका था।
कबीर बालकनी में खड़ा शहर को देख रहा था।
नीचे वही भागती हुई ज़िंदगी थी, मगर उसके लिए सब कुछ जैसे थम गया था।
“दुश्मन…”
उसने धीरे से खुद से कहा।
क्या सच में Myra सिर्फ उसकी दुश्मन थी?
या उस एक मुलाकात में कुछ ऐसा था, जो इस दुश्मनी से भी बड़ा था?
उसने अपनी आँखें बंद कीं…
और अगला ही पल, उसने फैसला ले लिया।
“मुझे उससे मिलना होगा।”
ये सिर्फ एक चाहत नहीं थी…
ये अब ज़रूरत बन चुकी थी।
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शाम ढल चुकी थी।
आसमान में हल्का अंधेरा घुल रहा था, और वही पुरानी गली फिर से अपने सन्नाटे में डूबी हुई थी।
कबीर एक बार फिर उसी जगह खड़ा था।
उसके कदमों में इस बार हिचकिचाहट नहीं थी…
बस एक अजीब सा यकीन था, कि वो उसे फिर से देखेगा।
उसने धीरे-धीरे उस पुराने मकान की तरफ कदम बढ़ाए।
दरवाज़ा इस बार बंद था।
कबीर ने कुछ पल उसे देखा…
फिर हल्के से दस्तक दी।
कोई जवाब नहीं आया।
उसने फिर दस्तक दी…
इस बार थोड़ी जोर से।
अंदर से हल्की सी आहट हुई।
कबीर की सांसें तेज़ हो गईं।
कुछ सेकंड बाद…
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
और सामने…
Myra खड़ी थी।
उनकी नजरें मिलीं।
कुछ पल के लिए जैसे दुनिया थम गई।
“Myra…”
कबीर के होंठों से उसका नाम खुद-ब-खुद निकल गया।
Myra के चेहरे पर हैरानी थी… और साथ ही डर भी।
“तुम यहाँ क्यों आए हो?” उसकी आवाज़ धीमी थी, मगर उसमें घबराहट साफ थी।
कबीर ने एक कदम आगे बढ़ाया।
“क्योंकि मैं नहीं आ पाता तो शायद खुद से ही हार जाता।”
Myra ने इधर-उधर देखा, जैसे कोई उन्हें देख ना ले।
“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था,” उसने फिर कहा।
“ये बात तुम पहले भी कह चुकी हो,” कबीर ने शांत आवाज़ में जवाब दिया।
“मगर वजह आज भी नहीं बताई।”
Myra कुछ पल चुप रही।
“वजह तुम जानते हो,” उसने धीरे से कहा।
“हम दुश्मन हैं।”
कबीर हल्का सा मुस्कुराया…
मगर उसकी मुस्कान में दर्द था।
“दुश्मनी आँखों में नहीं दिखती, Myra,” उसने कहा।
“और तुम्हारी आँखों में… मुझे कुछ और ही दिखा था।”
Myra की सांसें रुक सी गईं।
वो कुछ कहना चाहती थी…
मगर शब्द जैसे उसके साथ छोड़ चुके थे।
“तुम वापस क्यों आए हो, कबीर?” उसने आखिरकार पूछा।
कबीर ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
“सच जानने के लिए… और शायद तुम्हें समझने के लिए।”
Myra ने नजरें झुका लीं।
“कुछ सच ऐसे होते हैं, जिन्हें जानना आसान नहीं होता,” उसने कहा।
“तो मुश्किल सही,” कबीर ने तुरंत जवाब दिया।
“मैं तैयार हूँ।”
Myra ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में अब एक जंग चल रही थी—दिल और दिमाग की।
“अगर किसी ने तुम्हें यहाँ देख लिया…” उसने कहा,
“तो इस बार मैं तुम्हें बचा नहीं पाऊंगी।”
“तो मुझे बचाने की कोशिश मत करो,” कबीर ने धीरे से कहा।
Myra चौंक गई।
“मैं खुद को संभाल सकता हूँ,” उसने आगे कहा।
“मगर तुमसे दूर रहना… ये शायद मैं नहीं कर पाऊंगा।”
ये शब्द जैसे हवा में ठहर गए।
Myra का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
“तुम नहीं जानते तुम क्या कह रहे हो,” उसने धीरे से कहा।
“शायद नहीं जानता,” कबीर ने माना।
“मगर इतना जरूर जानता हूँ कि… उस रात के बाद सब कुछ बदल गया है।”
Myra ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
वो खुद से लड़ रही थी।
“ये गलत है…” उसने खुद से फुसफुसाया।
“तो फिर सही क्या है?”
कबीर की आवाज़ ने उसे रोका।
Myra ने आँखें खोलीं।
दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।
“सही ये है कि तुम यहाँ से चले जाओ,” उसने कहा।
“और फिर कभी वापस मत आना।”
कबीर ने एक कदम और आगे बढ़ाया।
“और अगर मैं ना जाऊं तो?”
Myra पीछे हट गई।
“तो तुम अपनी मौत को खुद बुलाओगे,” उसने सख्ती से कहा।
कबीर ने उसकी आँखों में देखा।
“अगर तुम्हें खोना ही मेरी किस्मत है…”
उसने धीमे से कहा,
“तो शायद ये मौत इतनी भी बुरी नहीं होगी।”
Myra का दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया।
“कबीर…”
उसने उसका नाम इस तरह लिया, जैसे उसमें हजार भाव छुपे हों।
तभी…
अंदर से किसी के कदमों की आवाज़ आई।
Myra का चेहरा एकदम बदल गया।
“तुम्हें जाना होगा,” उसने जल्दी से कहा।
“अभी।”
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
इस बार उसके कदम खुद-ब-खुद पीछे हट गए।
वो मुड़ा…
मगर जाते-जाते रुक गया।
“Myra…”
उसने पीछे मुड़े बिना कहा,
“मैं फिर आऊंगा।”
Myra ने कुछ नहीं कहा।
बस उसे जाते हुए देखती रही।
दरवाज़ा धीरे से बंद हो गया।
बाहर अंधेरा और गहरा हो चुका था।
और उस अंधेरे में…
दो दिलों के बीच एक रिश्ता बन रहा था,
जो जितना खूबसूरत था… उतना ही खतरनाक भी।