Part 2: सच का पहला वार
दरवाज़ा जैसे ही ज़ोर से खुला, कमरे की खामोशी एक झटके में टूट गई।
भारी कदमों की आवाज़, साथ में हथियारों की हल्की झनकार… और कुछ ऐसे चेहरे, जिन्हें देखकर ही समझ आ जाए कि वो मज़ाक करने नहीं आए।
कबीर ने पलटकर दरवाज़े की तरफ देखा।
तीन आदमी अंदर आए थे। उनकी आँखों में सख्ती थी, और चेहरे पर वही ठंडा गुस्सा… जो सिर्फ दुश्मनी में दिखता है।
“Myra…”
उनमें से एक ने कड़े लहज़े में उसका नाम लिया।
Myra का चेहरा सख्त हो गया।
वो एक कदम पीछे हटी, मगर उसकी नज़रें कबीर से हट नहीं रही थीं।
“तुम यहाँ क्या कर रही हो?” उस आदमी ने फिर पूछा।
कबीर ने Myra की तरफ देखा।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि ये कोई आम लड़की नहीं है।
उसकी खामोशी में भी एक कहानी थी… और उस कहानी में खतरा भी।
“Myra, ये लोग कौन हैं?” कबीर ने धीमे मगर साफ आवाज़ में पूछा।
Myra कुछ बोलती, उससे पहले ही उनमें से एक आदमी कबीर की तरफ बढ़ा।
“तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए,” उसने ठंडे लहज़े में कहा।
कबीर ने उसकी आँखों में देखते हुए जवाब दिया,
“ये बात मैं भी कह सकता हूँ।”
कमरे का माहौल और भारी हो गया।
जैसे हर सांस के साथ कोई अनहोनी करीब आ रही हो।
“Myra, पीछे हटो,” उस आदमी ने आदेश दिया।
मगर Myra वहीं खड़ी रही।
उसकी आँखों में अब डर के साथ-साथ एक अजीब सी जिद भी थी।
“वो यहाँ से चला जाएगा,” उसने धीरे से कहा।
“अभी,” उसने कबीर की तरफ देखते हुए जोड़ा।
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
“मैं कहीं नहीं जा रहा जब तक मुझे ये नहीं पता चल जाता कि ये सब हो क्या रहा है।”
Myra की आँखों में एक पल के लिए कुछ टूटा।
जैसे वो चाहकर भी उसे सच नहीं बता पा रही थी।
“तुम्हें सच जानने की कीमत नहीं पता, कबीर,” उसने कहा।
कबीर ने कदम आगे बढ़ाया।
“तो बता दो… मैं खुद तय कर लूंगा कि वो कीमत चुकानी है या नहीं।”
उन आदमियों में से एक ने गुस्से में मुट्ठी भींच ली।
“बहुत बोलता है ये लड़का।”
वो आगे बढ़ा, मगर Myra उसके सामने आकर खड़ी हो गई।
“कोई इसे हाथ नहीं लगाएगा,” उसकी आवाज़ अब सख्त थी।
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
जैसे सब उसकी बात का मतलब समझ रहे हों।
“तुम्हें पता है तुम क्या कर रही हो, Myra?”
उस आदमी ने धीमे मगर खतरनाक अंदाज़ में कहा।
Myra ने बिना पलक झपकाए उसकी तरफ देखा।
“हाँ… और ये भी पता है कि अगर इसे कुछ हुआ, तो सब कुछ बदल जाएगा।”
कबीर ये सब देख रहा था।
हर शब्द, हर नज़र… जैसे कोई पहेली बनती जा रही थी।
“Myra…”
उसने धीरे से पुकारा।
Myra ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में अब एक ही बात थी—चेतावनी।
“कबीर, यहाँ से चले जाओ,” उसने लगभग फुसफुसाते हुए कहा।
“अभी।”
“और अगर मैं ना जाऊं तो?” कबीर ने पूछा।
Myra की सांसें तेज़ हो गईं।
“तो तुम वो देखोगे, जो तुम्हें नहीं देखना चाहिए।”
बाहर से और कदमों की आवाज़ें आने लगीं।
जैसे पूरा घर अब जाग चुका हो।
कबीर ने एक पल के लिए सोचा।
उसका दिल कह रहा था कि वो यहीं रुके… सच जाने।
मगर उसकी समझ उसे चेतावनी दे रही थी।
“Myra… क्या तुम मुझसे झूठ बोल रही हो?” उसने पूछा।
Myra की आँखें भर आईं, मगर उसने उन्हें गिरने नहीं दिया।
“मैं सिर्फ तुम्हें बचाने की कोशिश कर रही हूँ,” उसने कहा।
“और अगर तुम यहीं रहे… तो मैं तुम्हें नहीं बचा पाऊंगी।”
कबीर के लिए ये सब समझना मुश्किल था।
एक तरफ ये लड़की थी, जिसे वो अभी-अभी मिला था…
और दूसरी तरफ वो अजीब सा यकीन, जो उसे उसके शब्दों पर हो रहा था।
“ठीक है,” कबीर ने आखिरकार कहा।
Myra की आँखों में हल्की सी राहत आई।
“मैं जा रहा हूँ… मगर ये यहीं खत्म नहीं होगा,” कबीर ने उसकी तरफ देखते हुए कहा।
“Myra… मैं वापस आऊंगा।”
Myra कुछ नहीं बोली।
बस उसे देखती रही… जैसे वो जानती हो कि ये कहानी यहीं नहीं रुकेगी।
कबीर धीरे-धीरे पीछे हटा।
उसकी नज़रें अब भी Myra पर टिकी थीं।
फिर वो मुड़ा… और दरवाज़े की तरफ बढ़ गया।
जैसे ही वो बाहर निकला, ठंडी हवा ने उसका स्वागत किया।
मगर अब उसके भीतर जो चल रहा था, वो किसी तूफान से कम नहीं था।
वो गली से बाहर आया।
मगर उसके कदम भारी थे।
“Myra…”
उसने खुद से कहा।
वो नाम अब उसके लिए सिर्फ एक नाम नहीं था…
एक सवाल बन चुका था।
और उस सवाल का जवाब उसे चाहिए था।
उधर, कमरे के अंदर…
दरवाज़ा बंद होते ही माहौल बदल गया।
“Myra, ये क्या था?”
उस आदमी की आवाज़ अब गुस्से से भरी थी।
Myra ने उसकी तरफ देखा।
“कुछ नहीं।”
“कुछ नहीं?”
वो हंसा, मगर उसकी हंसी में गुस्सा था।
“तुम्हें पता भी है वो कौन था?”
Myra चुप रही।
“वो कबीर था…”
उसने धीरे-धीरे कहा,
“खानदान-ए-मलिक का बेटा।”
Myra की सांस एक पल के लिए रुक गई।
“और तुम…”
उसने उसकी तरफ उंगली उठाई,
“तुम उसी दुश्मन के बेटे को बचा रही थीं।”
कमरे में खामोशी छा गई।
Myra ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
किस्मत ने जो खेल शुरू किया था…
अब वो और खतरनाक होने वाला था।
और शायद…
अब लौटने का कोई रास्ता नहीं था।