Part 6: सच का खुला जख्म
इश्क जब अपने नाम तक पहुँचता है…
तो उसके बाद सबसे पहले जिस चीज़ से सामना होता है,
वो है—हकीकत।
और हकीकत अक्सर खूबसूरत नहीं होती।
उस रात के बाद सब कुछ बदल गया था।
कबीर और Myra… अब सिर्फ दो अजनबी नहीं थे।
वो एक ऐसे रिश्ते में बंध चुके थे,
जिसे ना वो समझ पा रहे थे…
और ना ही उससे बाहर निकल पा रहे थे।
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सुबह…
कबीर की आँखें खुलीं, मगर उसके चेहरे पर सुकून नहीं था।
कल रात के हर पल उसकी यादों में जिंदा था।
“Myra…”
उसने धीरे से नाम लिया।
उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आई…
मगर अगले ही पल, उसके पिता की आवाज़ उसके दिमाग में गूंज उठी—
“वो हमारे दुश्मन की बेटी है…”
मुस्कान गायब हो गई।
कबीर बिस्तर से उठा और आईने के सामने आकर खड़ा हो गया।
उसने खुद को देखा…
“तू क्या कर रहा है?”
उसने अपने ही अक्स से पूछा।
कोई जवाब नहीं आया।
क्योंकि कभी-कभी दिल के फैसलों के सामने
हर सवाल छोटा पड़ जाता है।
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उधर…
Myra पूरी रात नहीं सोई थी।
उसकी आँखें लाल थीं, और चेहरा थका हुआ।
उसके सामने वही डायरी खुली थी…
मगर आज वो कुछ लिख नहीं पा रही थी।
क्योंकि आज उसके पास शब्द नहीं थे…
सिर्फ डर था।
“मैं भी तुमसे…”
उसने धीरे से खुद से कहा।
वो तीन शब्द…
जिन्हें उसने पूरा भी नहीं किया था,
मगर जिनका मतलब दोनों समझ चुके थे।
Myra ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
“ये नहीं होना चाहिए था…”
मगर दिल…
दिल अब उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।
तभी दरवाज़ा खुला।
विक्रम वर्मा अंदर आए।
उनकी नजरें सीधी Myra पर थीं।
“तुम ठीक नहीं लग रही,” उन्होंने कहा।
Myra ने नजरें झुका लीं।
“मैं ठीक हूँ।”
“झूठ,” विक्रम ने तुरंत कहा।
कमरे का माहौल ठंडा हो गया।
“तुम उससे मिली थीं… फिर से,”
उन्होंने धीरे-धीरे कहा।
Myra की सांसें थम गईं।
“मैंने मना किया था,” उनकी आवाज़ अब सख्त थी।
“फिर भी तुमने वही गलती दोहराई।”
Myra ने हिम्मत करके उनकी तरफ देखा।
“वो गलती नहीं है,” उसने कहा।
विक्रम की आँखों में गुस्सा चमका।
“दुश्मन से मोहब्बत करना… गलती नहीं है?”
उन्होंने पूछा।
Myra चुप रही।
उसकी खामोशी ही उसका जवाब थी।
विक्रम आगे बढ़े।
“तुम्हें पता भी है तुम क्या कर रही हो?”
उन्होंने कहा,
“ये सिर्फ तुम्हारी जिंदगी नहीं है, Myra…
ये हमारे खानदान की इज्जत का सवाल है।”
Myra की आँखों में आँसू आ गए।
“और मेरा दिल?”
उसने धीरे से पूछा।
विक्रम कुछ पल के लिए चुप हो गए।
फिर उन्होंने सख्त लहज़े में कहा—
“दिल को समझाना पड़ता है…
खानदान के सामने दिल की कोई कीमत नहीं होती।”
ये शब्द Myra के दिल पर वार जैसे लगे।
“तो फिर…
मैं क्या करूं?”
उसने टूटती हुई आवाज़ में पूछा।
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
“उससे मिलना बंद कर दो,” उन्होंने साफ कहा।
“आज से… अभी से।”
कमरे में खामोशी छा गई।
Myra ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
“और अगर मैं ना कर पाई तो?”
उसने धीमे से पूछा।
विक्रम की आँखें ठंडी हो गईं।
“तो मैं खुद उसे खत्म कर दूंगा।”
ये शब्द जैसे हवा में जम गए।
Myra का दिल जोर से धड़का।
“नहीं…”
उसके होंठों से खुद-ब-खुद निकला।
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
“तो फैसला तुम्हारा है,” उन्होंने कहा।
“या तो तुम उससे दूर रहो…
या फिर उसकी मौत की वजह बनो।”
इतना कहकर वो कमरे से बाहर चले गए।
दरवाज़ा बंद हुआ।
और Myra वहीं बैठ गई…
टूटी हुई।
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उधर…
कबीर अपनी कार में बैठा था।
उसके हाथ स्टीयरिंग पर थे…
मगर उसका ध्यान कहीं और था।
“Myra…”
वो फिर से उसी गली की तरफ जा रहा था।
मगर इस बार…
उसके अंदर एक अजीब सा डर भी था।
जैसे कुछ गलत होने वाला हो।
उसने कार रोकी।
और बाहर निकला।
गली आज पहले से ज्यादा खामोश थी।
जैसे तूफान आने से पहले की शांति।
कबीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
मगर इस बार…
कुछ अलग था।
कुछ गलत।
उसने चारों तरफ देखा।
तभी…
उसे महसूस हुआ—
कोई उसे देख रहा है।
उसने पलटकर पीछे देखा…
मगर वहाँ कोई नहीं था।
“शायद मेरा वहम है…”
उसने खुद से कहा।
मगर वो वहम नहीं था।
अंधेरे में…
कुछ परछाइयाँ खामोशी से उसका पीछा कर रही थीं।
और उसे अभी तक इसका अंदाज़ा भी नहीं था।
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उधर…
Myra अपने कमरे में खड़ी थी।
उसकी आँखों में अब डर साफ दिख रहा था।
“कबीर…”
उसने धीरे से नाम लिया।
“तुम्हें कुछ नहीं होना चाहिए…”
उसने जल्दी से अपना फोन उठाया।
कबीर का नंबर उसके पास नहीं था।
मगर दिल उसे कह रहा था—
आज कुछ गलत होने वाला है।
बहुत गलत।
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गली के उस मोड़ पर…
कबीर अभी भी आगे बढ़ रहा था।
और अंधेरे में छुपे लोग…
अब उसके और करीब आ चुके थे।
एक कदम…
दो कदम…
और फिर—
पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
कबीर पलटा…
और उसी पल—
एक जोरदार वार उसके सिर पर हुआ।
उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
वो गिर पड़ा।
और अंधेरे में…
कुछ लोग उसे घसीटते हुए ले जाने लगे।
उसकी आखिरी सोच…
“Myra…”
और फिर…
सब कुछ खत्म हो गया।
या शायद…
अभी असली कहानी शुरू हुई थी।