दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-17) Shivraj Bhokare द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-17)

Part 17: इश्क बनाम इज़्ज़त

हॉल में खामोशी थी…
मगर उस खामोशी के अंदर तूफान उठ चुका था।

एक तरफ कबीर…
दूसरी तरफ विक्रम वर्मा…
और बीच में खड़ी Myra—

जिसे अब फैसला लेना था।
---
“मैं रोकूंगा…”

कबीर के ये शब्द अब भी हवा में गूंज रहे थे।

विक्रम की आँखों में गुस्सा साफ था।

“ये कोई फिल्म नहीं है,”
उन्होंने सख्त आवाज़ में कहा,
“जहाँ हीरो आकर सब बदल देगा।”

कबीर ने एक कदम आगे बढ़ाया।

“ये मेरी जिंदगी है,”
उसने कहा,
“और मैं इसे बदलने आया हूँ।”

मेहमानों में हलचल बढ़ गई।

हर कोई इस टकराव को देख रहा था।
---
Myra के हाथ ठंडे पड़ चुके थे।

उसकी नजरें कभी कबीर पर जातीं…
तो कभी अपने पिता पर।

“बस करो…”
उसने धीमे से कहा।

मगर दोनों में से किसी ने नहीं सुना।
---
“तुम्हें लगता है…”
विक्रम ने कहा,
“कि तुम यहाँ आकर मेरी बेटी की सगाई रोक दोगे?”

कबीर ने सीधा जवाब दिया—

“अगर वो खुद नहीं चाहती… तो हाँ।”

ये शब्द…
सीधे Myra के दिल तक पहुँचे।

सबकी नजरें अब उस पर थीं।
---
“बोलो, Myra…”
विक्रम ने सख्ती से कहा,
“तुम क्या चाहती हो?”

कमरे की हर सांस रुक गई।

Myra का दिल जोर से धड़क रहा था।

उसने कबीर की तरफ देखा।

उसकी आँखों में भरोसा था…
और एक सवाल—

“क्या तुम मेरे साथ हो?”

फिर उसने अपने पिता की तरफ देखा।

उनकी आँखों में आदेश था।

“परिवार… या प्यार…”

ये पल…
उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला था।
---
कुछ सेकंड…

जो घंटों जैसे लगे।

और फिर—

“Myra…”
कबीर ने धीरे से कहा।

उसकी आवाज़ में विनती नहीं…
भरोसा था।

Myra की आँखों से आँसू गिर पड़े।

उसने धीरे से अपना हाथ उठाया…

और—

अपनी सगाई की अंगूठी उतार दी।

पूरा हॉल सन्न रह गया।
---
“मैं ये सगाई नहीं कर सकती,”
उसने कांपती आवाज़ में कहा।

विक्रम की आँखों में गुस्सा भर गया।

“तुम्हें अंदाज़ा भी है तुम क्या कर रही हो?”
उन्होंने गरजते हुए कहा।

Myra ने पहली बार बिना डरे जवाब दिया—

“हाँ…”

“मैं अपने दिल की सुन रही हूँ।”

---
आर्यन पीछे हट गया।

उसके चेहरे पर निराशा थी…
मगर वो चुप रहा।

उसे सब समझ आ गया था।
---
विक्रम अब पूरी तरह गुस्से में थे।

“आज के बाद…”
उन्होंने कहा,
“तुम मेरी बेटी नहीं हो।”

ये शब्द…

Myra के दिल पर वार जैसे लगे।

मगर इस बार…
वो नहीं टूटी।

उसने आँसू पोंछे…

और धीरे से कहा—

“अगर बेटी होने का मतलब…
अपने दिल को मारना है…”

“तो मैं ऐसी बेटी नहीं बन सकती।”

पूरा हॉल खामोश था।
---
कबीर ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

“Myra…”
उसने कहा।

Myra ने बिना हिचकिचाए उसका हाथ पकड़ लिया।

उस पल…

सब कुछ तय हो गया।
---
विक्रम ने गुस्से में अपने आदमी की तरफ देखा।

“उन्हें रोको!”

मगर इस बार…

कोई आगे नहीं बढ़ा।

क्योंकि ये अब सिर्फ आदेश नहीं था…

ये दो लोगों का फैसला था।
---
कबीर और Myra…

एक साथ हॉल से बाहर निकल गए।

पीछे छूट गया—

शोर…
रिश्ते…
और एक टूटता हुआ परिवार।
---
बाहर…

रात शांत थी।

मगर उनके अंदर एक नई शुरुआत थी।

“Myra…”
कबीर ने धीरे से कहा,
“क्या तुम यकीन से मेरे साथ हो?”

Myra ने उसकी आँखों में देखा।

“अब कोई शक नहीं है,”
उसने कहा।

“ना तुम पर…
ना हमारे प्यार पर।”

कबीर ने हल्की मुस्कान दी।
---
मगर कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी…

दूर खड़े विक्रम वर्मा
उन्हें जाते हुए देख रहे थे।

उनकी आँखों में अब गुस्सा नहीं…

बल्कि एक खतरनाक फैसला था।

“अब…”
उन्होंने धीरे से कहा,
“ये लड़ाई सच में शुरू होगी।”
---
और इसी के साथ…

इश्क ने अपनी सबसे बड़ी जीत हासिल की—

मगर असली जंग अभी बाकी थी।

रात की हवा ठंडी थी…
मगर हालात अब भी गर्म थे।

कबीर और Myra सड़क पर खड़े थे।
पीछे छूट चुका था—
एक घर… एक रिश्ता… और एक नाम।

“Myra…”
कबीर ने धीरे से कहा,
“तुम ठीक हो?”

Myra ने गहरी सांस ली।

“शायद पहली बार…”
उसने कहा,
“मैं सच में जिंदा महसूस कर रही हूँ।”

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में डर अब भी था…
मगर उसके ऊपर एक नई हिम्मत भी।
---
“अब आगे क्या?”
Myra ने पूछा।

सवाल सीधा था…
मगर जवाब आसान नहीं।

कबीर कुछ पल चुप रहा।

फिर उसने कहा—

“अब हम भागेंगे नहीं…”

Myra ने उसकी तरफ देखा।

“तो?”
उसने पूछा।

कबीर की आँखों में एक फैसला था—

“अब हम लड़ेंगे।”
---
उधर…

विक्रम वर्मा अपने घर के बाहर खड़े थे।

उनकी नजरें उस सड़क पर थीं…
जहाँ से कबीर और Myra जा चुके थे।

“गाड़ी निकालो,”
उन्होंने अपने आदमी से कहा।

उनकी आवाज़ में ठंडापन था…
जो आने वाले तूफान का इशारा था।
---
कबीर और Myra अब एक सुनसान जगह पर पहुँच चुके थे।

एक पुराना गोदाम…
जहाँ फिलहाल उन्हें कोई ढूंढ नहीं सकता था।

“Myra…”
कबीर ने कहा,
“हमें कुछ समय यहाँ रुकना होगा।”

Myra ने सिर हिलाया।

“जब तक हम प्लान नहीं बना लेते…”

वो अंदर गए।

चारों तरफ धूल…
पुरानी चीज़ें…
और एक अजीब सी खामोशी।

मगर इस बार…

ये खामोशी डरावनी नहीं थी।

क्योंकि वो अकेले नहीं थे।
---
“तुम्हें डर लग रहा है?”
कबीर ने पूछा।

Myra ने कुछ पल सोचा।

फिर मुस्कुराई—

“हाँ…
मगर तुम साथ हो…
तो थोड़ा कम।”

कबीर ने भी हल्की मुस्कान दी।
---
“हमें सच जानना होगा,”
कबीर ने कहा।

“वो आदमी कौन था…
जिसने हमें अलग करने की कोशिश की…”

Myra ने तुरंत कहा—

“और पापा भी इसमें शामिल थे…”

कबीर ने सिर हिलाया।

“हाँ…
मगर ये सब किसी बड़े प्लान का हिस्सा है।”
---
तभी…

कबीर का फोन वाइब्रेट हुआ।

अज्ञात नंबर।

उसने कॉल उठाया।

“हैलो?”

दूसरी तरफ वही आवाज़…

“तो आखिर तुम दोनों एक हो ही गए…”

कबीर की आँखों में गुस्सा भर गया।

“तुम कौन हो?”
उसने सख्ती से पूछा।

आवाज़ हंसी।

“मैं… वो हूँ
जिसने तुम्हारी कहानी को मोड़ दिया है।”

Myra ने कबीर की तरफ देखा।

“स्पीकर पर डालो,”
उसने कहा।

कबीर ने कॉल स्पीकर पर कर दिया।

“अब सुनो…”
वो आवाज़ बोली,
“जो खेल शुरू हुआ है…
वो अब खत्म नहीं होगा।”

“Myra…”
उसने उसका नाम लिया।

Myra की सांसें तेज़ हो गईं।

“तुम्हारे पिता…”
आवाज़ ने कहा,
“सिर्फ शुरुआत हैं।”

दोनों चौंक गए।

“मतलब?”
कबीर ने पूछा।

आवाज़ कुछ सेकंड चुप रही।

फिर बोली—

“तुम्हारे दोनों खानदानों की दुश्मनी…
सिर्फ एक कहानी नहीं है…”

“ये एक राज है…”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

“Myra…”
आवाज़ ने फिर कहा,
“तुम्हें सच जानना है?”

Myra ने हिम्मत जुटाकर कहा—

“हाँ…”

आवाज़ धीरे से हंसी—

“तो फिर…
अतीत में जाना होगा।”

कॉल कट गया।
---
कमरे में खामोशी फैल गई।

“Myra…”
कबीर ने धीरे से कहा,
“ये मामला… जितना हमने सोचा था… उससे कहीं बड़ा है।”

Myra ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में अब डर नहीं…

बल्कि जिज्ञासा थी।

“तो फिर…”
उसने कहा,
“हम अतीत जानेंगे।”

कबीर ने सिर हिलाया।

“साथ में।”
---
बाहर…

विक्रम वर्मा की गाड़ी उस गोदाम के पास आकर रुकी।

उनकी नजरें सख्त थीं।

“यहीं हैं वो…”
उन्होंने धीरे से कहा।

उनके आदमी आगे बढ़े।
---
अंदर…

कबीर और Myra एक-दूसरे के सामने खड़े थे।

“अब ये सिर्फ हमारा प्यार नहीं…”
कबीर ने कहा,
“ये एक जंग है।”

Myra ने उसका हाथ पकड़ा।

“और हम…
भागते नहीं…”

“लड़ते हैं।”
---
दरवाज़े के बाहर कदमों की आवाज़ गूंजी।

कहानी अब अपने अगले बड़े मोड़ पर थी…

जहाँ अतीत…
वर्तमान से टकराने वाला था।