Title: दुश्मनी के दरमियान इश्क
Part 15: खामोशियों के बीच साजिश
कबीर और Myra के बीच की दूरी…
अब सिर्फ कुछ कदमों की नहीं रही थी।
वो एक ऐसी खाई बन चुकी थी…
जिसे पार करना आसान नहीं था।
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उधर…
Myra अपने कमरे में अकेली बैठी थी।
कमरा खामोश था…
मगर उसके अंदर एक तूफान चल रहा था।
उसकी नजर सामने रखी उस खाली जगह पर थी…
जहाँ कभी कबीर खड़ा हुआ करता था।
उसकी उंगलियाँ हल्की कांप रही थीं।
“क्या मैंने सही किया…”
उसने खुद से पूछा।
जवाब…
खामोशी में गुम हो गया।
उसने आँखें बंद कीं।
मगर कबीर का चेहरा उसके सामने आ गया।
उसकी मुस्कान…
उसकी आँखें…
उसका साथ…
और फिर…
वो आखिरी नजर…
उसका दिल और भारी हो गया।
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कबीर…
एक सुनसान सड़क पर अकेला चल रहा था।
बारिश नहीं थी…
मगर मौसम उदास था।
उसके चेहरे पर थकान साफ दिख रही थी।
वो Myra से दूर था…
मगर दिल अभी भी वहीं अटका था।
“तुमने सही किया…”
उसने खुद से कहा।
“कम से कम… तुम सुरक्षित हो।”
मगर ये शब्द…
उसके दिल को नहीं समझा पा रहे थे।
उसके फोन में Myra का नंबर था।
उसने उसे देखा…
और फिर…
फोन बंद कर दिया।
“अगर ये दूरी… तुम्हें बचा सकती है…”
उसने धीरे से कहा,
“तो मैं इसे सह लूंगा।”
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दूसरी तरफ…
विक्रम वर्मा अपने ऑफिस में बैठे थे।
उनके सामने कुछ फाइलें रखी थीं।
उनके आदमी अंदर आए।
“सर… वो दोनों अलग हो गए हैं,”
एक ने कहा।
विक्रम के चेहरे पर एक संतोष की मुस्कान आई।
“अच्छा…”
उन्होंने कहा।
“तो अब हमारा काम आसान हो गया।”
उन्होंने कुर्सी से उठकर खिड़की की तरफ देखा।
“प्यार को तोड़ने के लिए…
हमेशा लड़ने की जरूरत नहीं होती…”
वो मुड़े और बोले—
“कभी-कभी… बस हालात काफी होते हैं।”
उनकी आँखों में एक ठंडा इरादा था।
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रात…
Myra अपने बिस्तर पर लेटी थी।
नींद उससे दूर थी।
उसका फोन अचानक वाइब्रेट हुआ।
उसने तुरंत उठाया।
कबीर का नाम…
उसके दिल की धड़कन तेज हो गई।
उसने कॉल उठाई।
“हैलो…”
उसकी आवाज़ धीमी थी।
दूसरी तरफ… कुछ सेकंड तक खामोशी रही।
फिर…
कबीर की आवाज़ आई—
“Myra…”
उस नाम को सुनते ही…
Myra की आँखें भर आईं।
“कबीर…”
उसने कहा।
दोनों चुप हो गए।
जैसे शब्द कम पड़ गए हों…
या दर्द ज्यादा हो गया हो।
“तुम ठीक हो?”
कबीर ने आखिर पूछा।
Myra ने जवाब दिया—
“हाँ… तुम?”
कबीर हल्का सा मुस्कुराया।
“जी रहा हूँ…”
ये शब्द…
दोनों के बीच चुभ गए।
“तुम…”
Myra ने हिचकिचाते हुए कहा,
“क्यों कॉल किया?”
कबीर कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने कहा—
“सुनने के लिए…”
“क्या?”
Myra ने पूछा।
“तुम्हारी आवाज़…”
Myra की आँखों से आँसू गिर गए।
“हमने दूरी इसलिए बनाई थी…”
उसने कहा,
“ताकि हम मजबूत बनें…”
कबीर ने धीरे से कहा—
“या फिर… टूटने के लिए…”
ये शब्द सुनते ही…
दोनों के दिल चुप हो गए।
कॉल के दूसरी तरफ सन्नाटा था।
और उसी सन्नाटे में…
एक अनकहा प्यार…
धीरे-धीरे दम तोड़ रहा था।
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कहीं दूर…
विक्रम वर्मा मुस्कुरा रहे थे।
“अब बस थोड़ा और…”
उन्होंने कहा।
“और ये रिश्ता खुद खत्म हो जाएगा।”
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कबीर और Myra…
दोनों एक ही रात में थे…
मगर एक-दूसरे से हजारों कदम दूर।
और उस दूरी में…
एक नई साजिश जन्म ले रही थी…
जो उनके इश्क को हमेशा के लिए बदल सकती थी।
रात गहरी थी…
और शहर एक अजीब खामोशी में डूबा हुआ था।
मगर उस खामोशी के पीछे…
कुछ ऐसा चल रहा था जो सब कुछ बदल सकता था।
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कबीर…
फोन रखने के बाद देर तक वहीं खड़ा रहा।
Myra की आवाज़ उसके कानों में गूंज रही थी।
“हम मजबूत बनें…”
उसने हल्की सी सांस ली।
“या फिर… टूटने के लिए…”
ये वाक्य उसके दिल में चुभ रहा था।
उसने आसमान की तरफ देखा।
“मैं टूटने नहीं दूंगा…”
उसने खुद से कहा।
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उधर…
Myra अपने कमरे में बैठी थी।
फोन हाथ में था…
और स्क्रीन पर कबीर का नाम अभी भी चमक रहा था।
उसने धीरे से फोन को सीने से लगा लिया।
“क्यों इतना मुश्किल है…”
उसने फुसफुसाया।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
वो जानती थी…
ये दूरी उसे बचाने के लिए थी…
मगर उसका दिल…
हर पल उसे खो रहा था।
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अगली सुबह…
कबीर अपने दोस्त अर्जुन से मिलने गया।
अर्जुन उसे ध्यान से देख रहा था।
“तू ठीक नहीं लग रहा,”
उसने सीधे कहा।
कबीर ने हल्का सा मुस्कुराने की कोशिश की।
“मैं ठीक हूँ।”
अर्जुन ने भौंहें चढ़ाईं।
“झूठ बोलना तेरी आदत नहीं है।”
कबीर चुप रहा।
कुछ सेकंड बाद उसने कहा—
“Myra और मैं… अलग हो गए हैं।”
अर्जुन चौंक गया।
“क्या? क्यों?”
कबीर ने गहरी सांस ली।
“क्योंकि हमें दूरी चाहिए थी…
ताकि सब ठीक हो सके।”
अर्जुन ने उसे देखा।
“और हो रहा है ठीक?”
उसने सवाल किया।
कबीर चुप रहा।
उसके पास कोई जवाब नहीं था।
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उसी समय…
विक्रम वर्मा अपने ऑफिस में किसी से बात कर रहे थे।
“अब वक्त आ गया है…”
उन्होंने कहा।
“उन्हें और दूर करना होगा।”
उनके आदमी ने पूछा—
“कैसे?”
विक्रम के चेहरे पर एक ठंडी मुस्कान आई।
“उनके विश्वास को तोड़कर…”
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शाम…
Myra कॉलेज से लौट रही थी।
जैसे ही वो गेट के पास पहुँची…
कुछ अजनबी लड़के उसकी तरफ बढ़े।
“आप Myra वर्मा हैं?”
एक ने पूछा।
Myra थोड़ी सतर्क हो गई।
“हाँ… क्यों?”
लड़के ने एक लिफाफा आगे बढ़ाया।
“ये आपके लिए है।”
Myra ने धीरे से लिफाफा लिया।
“किसने दिया?”
उसने पूछा।
लड़का बिना जवाब दिए चला गया।
Myra ने लिफाफा खोला।
अंदर एक फोटो थी।
वो फोटो देखकर…
उसका दिल जोर से धड़क गया।
फोटो में…
कबीर किसी और लड़की के साथ खड़ा था।
दोनों एक-दूसरे के करीब थे।
Myra की आँखें फटी रह गईं।
“ये…”
उसने फुसफुसाया।
उसके हाथ कांपने लगे।
“ये झूठ है…”
उसने खुद से कहा।
मगर फोटो…
उसके दिमाग में सवाल छोड़ गई थी।
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उधर…
कबीर अपने घर में था।
उसे एक अज्ञात नंबर से मैसेज आया।
“अगर सच जानना है… तो अकेले आना।”
नीचे एक पता लिखा था।
कबीर ने फोन को ध्यान से देखा।
उसकी आँखों में संदेह था।
“ये कौन है…”
उसने सोचा।
कुछ पल सोचने के बाद…
उसने फैसला लिया।
“मैं जाऊंगा।”
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रात…
एक सुनसान जगह।
कबीर वहां पहुँचा।
चारों तरफ अंधेरा था।
“कौन है?”
उसने आवाज़ दी।
अचानक…
पीछे से एक आवाज़ आई—
“तुम देर से आए…”
कबीर ने मुड़कर देखा।
एक शख्स अंधेरे में खड़ा था।
“तुमने Myra को दिखाने के लिए झूठी तस्वीर भेजी?”
कबीर ने सीधा सवाल किया।
वो शख्स हल्का सा मुस्कुराया।
“झूठी?”
उसने कहा,
“तुम्हें यकीन है?”
कबीर का चेहरा सख्त हो गया।
“साफ बोलो… तुम कौन हो?”
शख्स ने एक कदम आगे बढ़ाया।
“मैं…”
उसने कहा,
“वो हूँ… जो तुम्हारी कहानी खत्म करने आया है।”
कबीर की आँखों में गुस्सा भर गया।
“और ये कहानी… इतनी आसानी से खत्म नहीं होगी,”
उसने जवाब दिया।
दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे…
जैसे अगला पल…
सब कुछ बदलने वाला हो।
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उधर…
Myra…
अपने कमरे में बैठी…
उसी फोटो को बार-बार देख रही थी।
उसकी आँखों में आँसू थे…
और दिल में सिर्फ एक सवाल—
“क्या कबीर… सच में ऐसा कर सकता है?”
और इसी सवाल के साथ…
एक नया तूफान शुरू हो चुका था…
जिसने उनके इश्क को और गहराई में धकेल दिया था।