दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-12) Shivraj Bhokare द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-12)

Part 12: टूटते रिश्तों की गूंज

सुबह का हल्का उजाला शहर पर फैल रहा था…
मगर उस उजाले में सुकून नहीं, तनाव था।

कबीर और Myra एक छोटे से सुरक्षित स्थान पर रुके हुए थे।
रात की भागदौड़ के बाद दोनों थक चुके थे।

मगर असली थकान…
शरीर से ज्यादा दिल में थी।

Myra खिड़की के पास बैठी थी।
उसकी नजर बाहर थी… मगर मन कहीं और।

कबीर उसे देख रहा था।

वो समझ सकता था—
उसके अंदर चल रही लड़ाई को।

“तुम कुछ बोल नहीं रही हो,”
कबीर ने धीरे से कहा।

Myra ने हल्का सा सिर घुमाया।

“क्या बोलूं?”
उसने पूछा।

उसकी आवाज़ में एक अजीब सा दर्द था।

“हर बार जब हम साथ होते हैं…
कुछ न कुछ गलत हो जाता है।”

कबीर चुप रहा।

वो इस बात से इनकार नहीं कर सकता था।

“क्या तुम थक गई हो?”
उसने सीधा सवाल किया।

Myra ने उसकी आँखों में देखा।

एक लंबा सन्नाटा रहा।

फिर उसने कहा—

“मैं थकी नहीं हूँ…
मैं डर गई हूँ।”

कबीर के चेहरे पर चिंता आ गई।

“डर किस बात का?”
उसने पूछा।

Myra ने गहरी सांस ली।

“इस बात का…”
उसने कहा,
“कि कहीं एक दिन… हम एक-दूसरे को खो न दें।”

ये शब्द…
कबीर के दिल में गहरे उतर गए।

वो कुछ पल चुप रहा।

फिर उसने धीरे से कहा—

“अगर हम कोशिश करना छोड़ देंगे…
तो सच में खो देंगे।”

Myra ने उसकी तरफ देखा।

“और अगर कोशिश करते-करते हम टूट गए तो?”
उसने पूछा।

कबीर ने हल्की मुस्कान दी।

“तो भी… हम एक साथ टूटेंगे,”
उसने कहा।

Myra की आँखों में आँसू आ गए।

वो उठी और खिड़की से दूर चली गई।

“तुम समझ नहीं रहे हो…”
उसने कहा,
“ये सिर्फ हमारी लड़ाई नहीं है…”

कबीर ने आगे बढ़कर कहा—

“तो क्या हम हार मान लें?”

Myra ने तुरंत जवाब दिया—

“नहीं…”

उसकी आवाज़ टूट रही थी।

“मगर हमें सोच समझकर चलना होगा…”

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

“तुम क्या चाहती हो?”
उसने पूछा।

Myra कुछ पल चुप रही।

फिर धीरे से बोली—

“मुझे… थोड़ी दूरी चाहिए।”

कबीर का दिल जैसे थम गया।

“दूरी?”
उसने दोहराया।

Myra ने उसकी आँखों में देखा।

“हाँ… ताकि हम सोच सकें,”
उसने कहा,
“कि हमें आगे क्या करना है।”

कबीर के चेहरे पर दर्द साफ था।

“अगर दूरी बढ़ गई…”
उसने कहा,
“तो हम फिर कभी साथ नहीं रह पाएंगे।”

Myra चुप रही।

ये बात… वो भी जानती थी।

मगर उसके पास और कोई रास्ता नहीं था।

“शायद…”
उसने धीमे से कहा,
“यही सही रास्ता है।”

कबीर ने गहरी सांस ली।

उसने एक कदम पीछे लिया।

“ठीक है…”
उसने कहा।

उसकी आवाज़ में हार थी…
मगर साथ में मजबूती भी।

“अगर यही तुम चाहती हो…”

Myra ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में दर्द था…
मगर फैसला भी।

कबीर ने आगे कहा—

“तो मैं तुम्हारी इच्छा का सम्मान करूंगा।”

Myra की आँखों से एक आँसू गिर गया।

वो कुछ नहीं बोली।

कबीर दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

उसका हर कदम…
जैसे उसके दिल से एक हिस्सा निकाल रहा था।

दरवाज़े तक पहुँचकर…

उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा।

Myra वहीं खड़ी थी…

अकेली।

उनकी नजरें मिलीं।

मगर इस बार…
उनमें वो पहले वाली गर्माहट नहीं थी।

कबीर ने हल्की सी सांस ली।

और फिर—

दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गया।

दरवाज़ा बंद होते ही…

Myra अकेली रह गई।

उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

“ये मैंने सही किया…”
उसने खुद से कहा।

मगर उसके दिल ने जवाब दिया—

“शायद नहीं…”


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उधर…

कबीर बाहर खड़ा था।

उसकी मुट्ठियाँ भींची हुई थीं।

उसने आसमान की तरफ देखा।

“ये क्या हो रहा है…”
उसने खुद से कहा।

उसके दिल में एक ही सवाल था—

“क्या प्यार… वाकई इतना मुश्किल होना चाहिए?”

और उसी पल…

दूर कहीं…

विक्रम वर्मा अपनी गाड़ी में बैठे थे।

उनकी नजरें अब भी कबीर और Myra पर थीं।

“अब…”
उन्होंने कहा,
“वो खुद ही टूटेंगे।”

और उनके चेहरे पर एक खतरनाक मुस्कान थी।


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कहानी अब एक नए मोड़ पर थी…

जहाँ दुश्मन इंतज़ार कर रहे थे…

और प्यार…
दूरी के बीच दम तोड़ने की कगार पर था।