मंजिले - भाग 39 Neeraj Sharma द्वारा जीवनी में हिंदी पीडीएफ

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मंजिले - भाग 39

मंज़िले कहानी सगरहे मे ----एक खमोशी ---- नाम की कहानी जो सत्य पर आधारित है। वो लिखने को आज  मन किया।

                              समय 81 का था। सत्य घटना पर आधारित एक खमोशी एक सदमा, एक बेचैनी इसके जयादा कुछ नहीं था।

मिलिटेंट का साम्राज्य था उस वक़्त पंजाब मे, पंजाब एक गूंगी जंग मे अंधा वलीन था। कौन आपना कौन पराया था। उस घर की कहानी जो खेतो मे था। बापू का नाम साधु सिंह था। माँ थी, और भी भाई थे। वो पक्के सरदार थे। दाढ़ी जिनकी खुली रखते थे... घातरे वाले जाथेदार थे। उनका बाबा धर्मिक पुरष था।

हाँ एक बात थी। मिलिटेंट उनके घर मे अक्सर बसेरा करते थे। जिनके हाथों मे पिस्टल स्टेरगज, बारूद होता था। वही वो लोग थे जो पता नहीं कितनो को मार कर रात इस खेतो वाले साधु सिंह के घर मे रुक जाते थे। यहाँ से वो प्रशादे शकते थे खूब दहशत थी उनकी उस गांव मे, पंजाब का मालवा ही कह लो, पढ़नेवालो।

ये सच्ची कहानी थी। जो एक बड़ा दर्द दें गयी। किसी का भी नाम यहाँ गुप्त रखा जायेगा।

                                        कया हक़ था किसी के घर रात को प्रशादे खाने, आपने कपड़े तन के  धोने। ये कौन सा दहशत का दौर था। लहू की होली खेलने वालो से ये उम्मीद रखी जाए, कया वो जहर नहीं उगले गे। नाग डंक नहीं मारता, उसका जीवन ही ऐसा है।

                                               सुबह वो अभी निकले ही थे। तो CRP पुलिस से मुठबेड हो गयी। वो जो तीन थे वो वही ढेर हो गए। कभी न कभी तो कच्ची दीवार गिरती ही है, चाहे तूफान हो चाहे हल्की हवा चलती हो।

                                              कहर तब हुआ। ये कैसे हुआ। तो गांव के लोगों ने उनके कच्चे कान भर दिए। वो 100 किले वाले सरदार साधु सिंह से लोग शरीक लगते थे। तभी आग लगी। सब इन्होने ही करा दिया है। या झूठी अफंवाह बन चुकी थी।

                                         फिर अगली रात पहले से ही उन्होंने रोटी पक्का रखी थी साधु सिंह के परिवार ने, पर उन्हों को कया पता था कि दरवाजे पीछे उनकी मौत है।

उन्होने दरवाजा खोला।

वो अन्दर आये।

चार या पांच होंगे।

" ये खबर किस ने पुलिस को दी। "

साधु सिंह कुछ जानता होता तो बताता... तभी गोलिया चली।

ताबड़तोड़।

एक कसक छोड़ गयी।

बिलकुल छोटा और एक लड़की चरपाई के नीचे छुप गए। तो बच गए। मातम था, उल्टा नाग जैसे काटता है, कमबख्त काट गए। घर मे सनाटा था।

वो खून की होली खेल के जा चुके थे। कितना दर्द छोड़ गए थे।

उड़ती खबरों से हवाबाज़ी के सिवा कुछ नहीं मिलता।

नानको ने कुलजीत को पाला था। उसकी बहन को भी।

आज वो कुलजीत दफ्तर मे सरकारी आदमी है लेकिन बिलकुल शून्य है। चूप ही रहता है बस।कितना पास कोई गया उसके, फिर भी बहुत मुश्किल से बोला" वो " पहले तो खूब रोया था। हलक सुख गया था उसका। शायद कोई था उसका भी, इस दुनिया मे, जिसको वो दर्द सुना सका। 

ये जो जमीन थी उस पर शरीको की निगहा अब उनके हाथ मे थी। कैसी ये गैरता थी। गिर गया वो हमेशा के लिए, कुलजीत उठेगा हाँ एक दिन जरूर।

ये सत्य कहानी है, अगर किसी पर ये लगती हो तो मै जिम्मेदारी नहीं लेता। कहानी सत्य है।

(चलदा )-------------   नीरज शर्मा