फ़िल्म 'दुकान'की प्रेरणा - आनंद की डॉ. नयना पटेल Neelam Kulshreshtha द्वारा जीवनी में हिंदी पीडीएफ

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फ़िल्म 'दुकान'की प्रेरणा - आनंद की डॉ. नयना पटेल

[ नीलम कुलश्रेष्ठ ]

उनकी आँखों से झर झर आंसू झर रहे हैं, गालों पर बह रहें हैं -नहीं नहीं ये उनके दिल में बिंधी तीखे दंशों की डोरियाँ हैं जो गालों से आगे तक बहकर लगातार आँचल में गिर रहीं हैं. 

उनका नाम कुछ भी हो सकता है -कोकिला बेन, जया बेन, सुगुना बेन या कुछ भी लेकिन वे रोते हुए भाव विह्वल हो हाथ में लिए नवजात शिशु को बार बार चूमतीं हैं. उस बच्चे का चेहरा आंसुओं से भीग जाता है. वे कहतीं हैं, "सब कहतें हैं सबसे कष्टदायक होती है प्रसव पीड़ा लेकिन एक बाँझ औरत से पूछकर देखो. प्रसव पीड़ा से भी कहीं बड़ी होती है बाँझ होने की पीड़ा. प्रसव पीड़ा के बाद स्त्री मुक्त हो जाती है. लेकिन समाज, रिश्तेदार यहाँ तक कि मित्र तक बाँझ स्त्री को चोट पहुंचाते रहते हैं. "

ये द्रश्य है आनंद के केवल अस्पताल के आकांक्षा इनफ़र्टिलिटी एंड आई. वी. ऍफ़. क्लिनिक का. जिन स्त्रियों को बच्चा पैदा नहीं होता वे अक्सर यहाँ इलाज के लिए मातृत्व ग्रहण करने आतीं हैं. उनका रोम रोम शुक्रगुज़ार होता है डॉ. नयना पटेल का. अक्सर इलाज से उन्हें अपना टेस्ट ट्यूब बेबी प्राप्त हो जाता है लेकिन कभी कभी उन्हें सरोगेट मदर का सहारा लेना पड़ता है यानि वे दूसरी औरत की कोख किराये पर लेतीं हैं. 

दूसरा द्रश्य है इसके सरोगेट मदर हॉस्टल का. यहाँ ये सिलाई, कढाई व् कंप्यूटर पर काम करना सिखातीं दिखाई देतीं हैं. ज़रूरी नहीं है हर ऐसी स्त्री हॉस्टल में ही रहे. ये उसकी अपनी मर्ज़ी है. शाम व रात को वो अपने पेट के हलके उभार के साथ टहलतीं दिखायीं दे जाएँगी. यही है विश्वविख्यात डॉ. नयना पटेल का बनवाया हॉस्टल यही है आकांक्षा क्लिनिक जो स्त्री के माँ बनाने की आकांक्षा को पूरा करता है. अनेक स्त्रियों को प्रेरित करता है कि वे सरोगेट मदर बनकर अपनी आय बढाएं व एक ऐसी स्त्री को मातृत्व का सुख दें जिसे प्रकृति देना भूल गयी है. 

सन 2004 में अचानक ये क्लीनिक विश्व प्रसिद्ध हो गया था क्योंकि एशिया में प्रथम बार एक स्त्री की कोख से उसकी बेटी के बच्चे ने जन्म लिया था. ये विश्व का पांचवा केस था. डॉ. नयना पटेल से लन्दन में रहने वाले एक भारतीय दम्पति ने पत्र द्वारा संपर्क किया था कि उनकी बेटी नि;संतान है सरोगेसी से अपना बच्चा चाहती है लन्दन में इलाज मंहगा है आप भारत में सरोगेट मदर ढूढ़कर उसका इलाज करें. उनके लिए ये प्रस्ताव नया था लेकिन हमने सरोगेट मदर ढूढ़ना शुरू किया. कोई स्त्री इस काम के लिए नहीं मिली तो हमने सुझाव दिया उस स्त्री की माँ या सास ये काम कर सकती है. सास तो पचास वर्ष की थी. चवालीस वर्ष की आयु वाली माँ ही इसके लिए उपयुक्त थी. "

"क्या वह माँ सरोगेसी के लिए तैयार हो गयी थी ?" "वह शर्म के कारण तैयार नहीं हो रहीं थीं लेकिन हमारे समझाने के बाद वह बेटी के लिए तैयार हो गईं थीं. गर्भ धारण के ढ़ बाद जब उनका पेट बढ़ने लगा तो उन्होंने मकान बदल लिया व ओर्थोराइटिस का बहाना लेकर घर से कम निकलतीं थीं. "

"बच्चे के पैदा होने के बाद उनकी शर्म कम हुयी ?"

"हाँ, बाद में तो वे गर्व से प्रेस से भी मिलीं, फोटो खिंचवायीं. "

आनंद में सरोगेसी के लोकप्रिय होने का एक बड़ा कारण है कि नयना जी व उनके सहयोगी बहुत मेहनत से दोनों स्त्रियों को मानसिक रूप से तैयार करना पड़ता है जिसे बच्चा चाहिए वह जल्दी तैयार हो जाती है. सरोगेट मदर बनने के लिए कोई स्त्री एक दो महीने में ही तैयार हो पाती है. ये काम मेडिकली, भावनात्मक रूप से या मनोवैज्ञानिक रूप से इतना आसान नहीं है. 

"दोनों स्त्रियों के परीक्षण भी होते होंगे ?"

"हाँ, परीक्षण से देखा जाता है की उन्हें कोई गंभीर बीमारी तो नहीं है. वे कहीं एच.. आई. वी. पोजिटिव तो नहीं हैं. सरोगेट मदर बनने वाली स्त्री का यूट्रस तो ख़राब नहीं है. "

इस काम के लिए अविवाहित स्त्री तो चुनी नहीं जाती कि कहीं उसके लिए सामाजिक समस्याएं न पैदा हो जाएँ. विवाहित स्त्रियाँ ही चुनी जातीं हैं जो कि जानतीं हैं कि गर्भ धारण के बाद क्या परेशानियाँ, प्रसव पीड़ा क्या होती है, बच्चे की देख रेख कैसे कर सकतें हैं. इंडियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल साइंस के नियमों के अंतर्गत दोनों दम्पत्तियों से अनुबंध पत्र भरवाया जाता है. नि;संतान व्यक्ति को घोषित करना पड़ता है यदि बच्चा विकलांग होगा या कोई भी कमी उसमें होगी, वह उसे लेना ही होगा. यदि दोनों कि म्रत्यु हो जाती है तो उन्हें रिश्तेदारों के नाम पहले से ही देने होतें हैं जिससे वह बच्चे को ले ले. 

"सरोगेट मदर व उसके पति के लिए क्या नियम हैं ?"

"प्रथम शर्त तो यही है कि उन्हें हर हाल में बच्चा नि;संतान दंपत्ति को देना पड़ेगा. दूसरी कड़ी शर्त ये है कि उन्हें नौ महीने तक शारीरिक संबंधों का त्याग करना पड़ेगा. "

" क्यों?"

"क्योंकि सरोगेसी से उत्पन्न बच्चे के डी. एन. ए. का टेस्ट जब होता है जब उसे विदेशी माँ बाप विदेश ले जा रहे हों. यदि वह विदेशी पिता से मैच करता है तभी उसे विदेश ले जाने दिया जाता है. "

सरोगेट मदर के गर्भ धारण करते ही डॉ. नयना व उनकी टीम के लिए तपस्या के दिन शुरू हो जातें हैं. हर चैक अप के समय उसे ये समझाया जाता है कि कोख में पल रहा बच्चा उसका नहीं है. यदि वे चाहे तो गर्भपात करवा सकती है लेकिन अब तक हुआ खर्च उसे देना होगा

यदि चिकित्सक किसी गंभीर कारण से गर्भ गिराने की अनुमति दे तो उसे रूपये लौटने की आवशयकता नहीं है. सरोगेसी करवाने वाले दम्पत्ति अलग अलग सोच के होते हैं. कुछ तो बच्चा पैदा होते ही तुरंत उसे ले लेतें हैं. कुछ कुछ दिनों तक बच्चे को उनसे मिलने देतें हैं या बार बार फ़ोन पर हाल चाल पूछने देतें हैं. 

सरोगेट मदर को एक से दो लाख तक रुपया मिल जाता है ये पैसा किश्तों में भी दिया जाता है, बकाया राशि बच्चा लेने के बाद ही दी जाती है. मेरा प्रश्न है. "अक्सर फ़िल्मों में दिखाया जाता है कि सरोगेट मदर इतनी भावुक हो जाती है कि बच्चे को देना नहीं चाहती. "

"हम लोग ऐसी स्थिति आने नहीं देते क्योंकि हम लोग उसे समझाने में बहुत मेहनत करतें हैं कि उसकी कोख में पलने वाला बच्चा उसका नहीं है. अब तक हमरे क्लीनिक में ऐसा नहीं हुआ है कि किसी सरोगेट मदर ने बच्चा देने से इंकार किया हो. कुछ नि;संतान दंपत्ति अपनी पहचान सरोगेट मदर से छिपाना भी चाहतें हैं तो हम भी उनकी गोपनीयता रखते हैं. "

"आपके अस्पताल का खर्च तो सरोगेट मदर को देना ही होता होगा. "

"मै उनसे अस्पताल में रहने तक की कोई फ़ीस नहीं लेती. ये खर्च मैं ही वहन करतीं हूँ. "

" क्यों?"

गौरवर्ण सुन्दर डॉक्टर सुन्दर सा ही उत्तर देतीं हैं, "दो परिवारों को ख़ुशी देने से बढकर ख़ुशी और क्या होगी ?एक परिवार को ख़ुशी मिलती है, एक गरीब परिवार को पैसा मिलता है. "

मैं इनसे पूछतीं हूँ, "सरोगेसी से बच्चा माँ की बुरी 'जींस ' के कारण बुरा भी निकल सकता है ?"

" इसकी संभावना तो होती ही है कि माँ का असर उस में आये इसलिए हम लोग सरोगेट मदर बनने वाली स्त्री के व्यक्तित्व की जानकारी लेने के बाद ही उसे ये काम सौपतें हैं. "

सरोगेसी में एक मज़े की बात ये है की निषेचित एग से 30 प्रतिशत जुड़वां बच्चों के पैदा होने की संभावना होती है. इसी कारण नयना जी अब तक 240 सरोगेट मदर से 1736 बच्चे पैदा कर चुकीं हैं. जब मैंने ये इंटर्व्यू लिया था तब उनके यहाँ 67 सरोगेट मदर्स. अब तक वे 30,000 से अधिक ऐसे दम्पत्तियों की सहायता कर चुकीं हैं जिनके बच्चा पैदा नहीं हो रहा था। जिनका इलाज सम्भव नहीं है उन्हें ही सरोगेसी की सलाह दी जाती है।

कुछ बातें तो दिल को छू जाने वालीं हैं जैसे कि आनंद के कस्बे तारानगर की 45 वर्ष की नीलम बेन की कहानी। उसके गर्भाशय में टीबी थी। वह परिचितों के टोंट सुनकर तंग आ चुकी थी, "तेरा जन्म तो माँ बनने के लिए नहीं हुआ है। "

उसने ठान ली थी कि वह माँ बनकर दिखाएगी। डॉ. नैना जी ने पहले उसकी टीबी का इलाज किया। उसका धीरज देखिये वह दस बार आई वी एफ़ की प्रक्रिया से गुज़री। नौवीं बार जुड़वा बच्चे गर्भ में आये लेकिन गर्भपात हो गया। दसवीं बार डॉ. की कोशिश व उसके धीरज को सफ़लता मिली और उसके बेटा हुआ।

आमजन तो उस तकलीफ़ की कल्पना नहीं कर सकते कि आई वी एफ़ के लिए इंजेक्शन लगाए जाते हैं तो कितनी कमज़ोरी, कितनी जलन, कितने दिन तक शरीर में होती है। धन्य है ऐसी माँ जिसने धीरज से तकलीफ़ झेलते हुये 17 वर्ष की कोशिश के बाद बेटा पैदा कर ही दिया। हालाँकि बार बार इंजेक्शन लेने से उसकी दांये हाथ में अब भी दर्द रहता है।

ऐसी डॉक्टर की सदाशयता है, वे कहतीं हैं, "भगवान के आशीर्वाद से, टीम वर्क से, सभी साथियों के सहयोग से, शुभचिंतकों की शुभकामनाओं से नि :संतान दंपत्ति आकांक्षा हॉस्पिटल व रिसर्च इंस्टीट्यूट पर विश्वास कर आते हैं। हम ईश्वरकी कृपा से उनका विश्वास पूरा कर पाते हैं। "

ये विशिष्ट कार्य करके वाकई उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि एम बी बी एस में उन्हें पांच गोल्ड मैडल्स ऐसे ही नहीं मिल गए थे।उनके सीधे सरल, ख़ूबसूरत व्यक्तित्व से मिलना मेरी उपलब्धि रही थी उनके ऑफ़िस में जहां मेज़ पर उनके गुरु की तस्वीर रक्खी हुई थी। हम लोग बाद में वॉट्स एप से जुड़े रहे थे।

एक वाकया बहुत दिलचस्प है।तब मेरा लियाइनका इंटर्व्यू 'गृहशोभा 'में प्रकाशित हुआ था। अगले महीने मैं वड़ोदरा के घर में सुबह नौ बजे चाय पीकर बैठी ही थी कि कॉल बैल बजी, दरवाज़ा खोलकर देखा दो स्मार्ट लेडीज़ बाहर खड़ीं थीं, "आप ही नीलम कुलश्रेष्ठ हैं ?"

"जी। "

"हम लोग गृहशोभा ' में आपका डॉ नयना पटेल जी इंटर्व्यू पढ़कर दिल्ली से आ रहे हैं। "

"जी ?"

"ये मैगज़ीन वाले लेखकों का मैगज़ीन ' में पता नहीं देते। कितनी मुश्किल से देल्ही प्रेस के ऑफ़िस में जाकर आपका पता निकलवाया है। "

उन्होंने अंदर आने से इंकार कर दिया था। उनमें से एक ने कहा था, "मेरी इस फ़्रेंड के बच्चा नहीं है। हम लोग सर्किट हाऊस में ठहरे हैं व आनंद जा रहे हैं डॉ नयना पटेल से मिलने। पहले सोचा कि आपसे मिल लें, कहीं आपने कुछ ग़लत तो नहीं कर लिख दिया? "

"कैसी बातें कर रहीं हैं ?आई एम रिपॉन्सिबल जर्नलिस्ट। "

"दैन थेंक्स टु यू। " बिना चाय, पानी पीये वे टैक्सी में बैठ ये जा, वो जा। अब मैं सोचतीं हूँ देल्ही प्रेस की पत्रिकाएं सारे विश्व में पढ़ी जातीं हैं। कितने लोगों को मेरे इस इंटर्व्यू से सहायता मिली होगी।

सन 2017 में हम लोगों को बेटे अभिनव की नौकरी के कारण मुंबई जाना पड़ा। उन्हें जब मैंने ये खबर दी तो उनकी सदाशयता है कि मुझे दुखी इमोजी के साथ ये मेसेज मिला -'गुजरात विल मिस यू।'

मैंने सन 2017 में उनके लिए साक्षात्कार व अस्पताल के अनुभवों से एक सरोगेसी पर एक कहानी लिखी थी 'रस---प्रवाह ' जिसमें एक ब्रिटिश महिला बच्चे के लिए यहाँ आती है [जो मातृभारती में प्रकाशित है ]जिसे 'हंस 'में प्रकाशित करते हुए साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लेखक तत्कालीन सम्पादक संजीव जी ने कहा था, "हमें लन्दन से भी सरोगेसी पर कहानी मिली थी लेकिन जब हमें भारत से सरोगेसी पर और भी प्रमाणिक कहानी मिल रही है तो हम क्यों न इसे ही प्रकाशित करें ?"

मेरा धन्यवाद नयना जी को क्योंकि ये सम्मान उनकी प्रतिभा के कारण मुझे मिला। कुछ वर्षों बाद के वर्षों में भारत सरकार ने विदेशियों के भारतीय स्त्री से सरोगेसी से बच्चा करने पर प्रतिबंध लगा दिया था।सरकार को अपने ख़ुफ़िया सूत्रों से पता लगने लगा था कि कुछ विदेशी बच्चों को पोर्नोग्राफ़ी में धकेलने के लिये, चाईल्ड लेबर के लिए या ट्रेफ़िकिंग के लिए सरोगेसी से बच्चे भारत में पैदा करके ले जाते हैं। केवल एन आर आई अपना पासपोर्ट दिखाकर भारत में सरोगेसी से बच्चा पैदा कर सकते थे।

उन्होंने एक किताब भी लिखी थी "लास्ट रे ऑफ़ होप ". जिसके आधार पर मुंबई में एक नाटक भी प्रस्तुत किया गया था. अब फ़िल्म 'दुकान 'अपने अनूठे विषय के कारण धूम मचा रही है जिसकी प्रेरणा डॉ. नयना पटेल हैं।

ऐसी प्रेरणादायक व्यक्तित्व वाली डॉ. नयना जी पर सच ही उनके सत्कार्यों के लिए ऊपरवाला मेहरबान है क्योंकि उनका बेटा डॉ. निकेत पटेल व बहू डॉ. मोलीना पटेल जो उनके क्लीनिक में 8 वर्ष से आई वी एफ़ सरोगेसी लेप्रोस्कोपी गायनी व ऑब्स्ट्रेटिक्स को सम्भाल रहे हैं।

बहुत से लोग नयना जी पर आरोप लगाते रहे कि उन्होंने बच्चे पैदा करने की दुकान खोल ली है या ये उनका बिज़नेस है। वे ये नहीं समझ पाये कि उन्होंने कितने निःसंतान दम्पत्तियों को सुख दिया है। दूसरी तरफ तरफ़ किसी गरीब सरोगेट परिवार का आर्थिक स्तर सुधारा है। इसी बात का उत्तर देने के लिए सिद्धार्थ सिंह व गरिमा वहल ने ' दुकान ' फ़िल्म बनाई है जिसकी शूटिंग की है आनंद के वसु गाँव में। नयना जी के अनुसार, "गरिमा और सिद्धार्थ दोनों मुझसे सन 2015 से सपर्क में हैं। वे इस कार्य से जुड़े तथ्यों, आँकड़ों व इसके भावनात्मक पहलु पर काम करते रहे हैं। इतने वर्ष शोध के बाद उन्होंने ये फिल्म बनाई है। "

"इससे वे क्या सन्देश देना चाहतें हैं ?"

"वे इस सत्य को सामने लाना चाहते हैं कि ये चाहतों, सपनों और भावनाओं व जीवन की सबसे बड़ी अपेक्षा का बिज़नेस है या दुकान है, न कि धन का लेन देन । "

सिद्धार्थ और गरिमा भी मानते हैं, "हम लोगों ने ये फ़िल्म नयना जी की सहायता व पथ प्रदर्शन से बनाई है जिससे हम सरोगेसी के विषय में गलत अवधारणा रखने वालों की ऑंखें खोल सकें। "

अनेक पुरुस्कारों से सम्मानित आनंद की नौ दस वर्ष पूर्व डॉक्टर नयना पटेल की ओप्रा विन्फ्रे के दूरदर्शन शो में आने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति और भी बढ़ गयी थी. 

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श्रीमती नीलम कुलश्रेष्ठ

e-mail—kneeli@rediffmail. com