डेविल्स क्वीन - भाग 10 Poonam Sharma द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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डेविल्स क्वीन - भाग 10

इससे पहले जब अनाहिता ग्रेजुएशन पार्टी से आई थी तब उसने बहुत ही शॉर्ट ड्रेस पहनी हुई थी जो की घुटनों से थोड़ी ऊपर थी जिसमे उस के काफी पैर दिख रहे थे। और एक पतली सी स्टेप से उसके कंधे पर टिकी उसकी ड्रेस काफी स्टाइलिश थी।

उसकी ड्रेस इतनी टाइट थी की उसके शरीर की बनावट उभर कर नज़र आ रही थी।

असल में तो अनाहिता को इस तरह के कपड़े पहना पसंद ही नही था पर ना जाने क्यूं उसके पिता ने ही उसे यह ड्रेस ला कर दी थी और पार्टी में पहनने को कहा था। पहले तो अनाहिता ने मना किया था पर उसकी आज़ादी का हवाला दे कर उन्होंने उसे मना ही लिया था।

अनाहिता का दूध सा गोरा रंग निखर कर बाहर आ रहा था। उसके लंबे खुले काले बाल काफी आकर्षक लग रहे थे। वोह इतनी खूबसूरत लग रही थी की चाँद भी उसके सामने फीका पड़ जाए।

अभिमन्यु तो उसे देखता ही रह गया था। जब उसने उसे इससे पहले देखा था तो वो बिल्कुल बच्ची थी। उससे छोटी तो अभी भी थी पर पहले से मैच्योर नज़र आ रही थी। उम्र तो उसकी खुद की भी बढ़ी थी। वोह खुद भी पहले से काफी मैच्योर हो गया था।

इस वक्त अनाहिता के चेहरे पर कोई मेकअप नही था पर बिना मेकअप में उसका बेदाग चेहरा और भी ज्यादा खिल रहा था और आकर्षक लग रहा था। भले ही वोह इस वक्त उदास थी पर फिर भी उसके चेहरे का नूर ही अलग था।

पहले की तरह आज भी उसने सच्चे मोती के टॉप्स पहने हुए थे। जब वोह चार साल पहले उससे उसके पिता के ही ऑफिस के कमरे में मिला था तब भी उसने वोही सच्चे मोती के टॉप्स पहने हुए थे, जब आज वोह पार्टी से वापिस आई तब भी उसने वोही टॉप्स पहने हुए थे और अब जब वोह कपड़े बदल कर आ चुकी थी तब भी उसने वोही टॉप्स पहने हुए थे।

शायद इन टॉप्स से उसका कोई गहरा रिश्ता जुड़ा था। जो वोह उसे कभी नही उतारती थी।

“चलें,” अभिमन्यु ने हाथों के इशारे से उसे दरवाज़े की तरफ बढ़ने के लिए कहा।

अनाहिता की भूरी आँखें हैरानी से बड़ी हो गई। क्या वोह अब भी सोच रही थी की यह सब कोई मज़ाक है? क्या कोई खेल है?

अनाहिता ने एक नज़र अपने पिता के ऑफिस के कमरे की ओर देखा। उसके पिता अभी भी अंदर थे। उस से मिलने बाहर भी नही आए। एक गहरी उदासी छा गई अनाहिता के मन में। पर उसने अपने भावों को तुरंत छुपा लिया और वोह बाहर जाने के लिए आगे बढ़ गई।

वोह एक दृण निश्चय से आगे बढ़ रही थी जो उसके लिए इस वक्त बहुत जरूरी था।

_ओह स्वीट हार्ट, वेलकम टू माय वर्ल्ड।_
टेढ़ा मुस्कुराते हुए अभिमन्यु भी उसके साथ आगे बढ़ने लगा।

बाहर खड़ी अभिमन्यु की चमचमाती हुई महंगी और शानदार एसयूवी खड़ी थी। अभिमन्यु का एक आदमी उसका पिछला दरवाज़ा खोले खड़ा था। गाड़ी अंदर से भी उतनी ही लग्ज़री लग रही थी जितनी की बाहर से। पीछे की तरफ़ आमने सामने दो सीट थी जो ड्राइवर की सीट से एकदम अलग थी। ना ही ड्राइवर देख सकता था की पीछे क्या हो रहा है और ना ही अंदर बैठा आदमी ड्राइवर को देख सकता था। बस बीच में थी एक छोटी सी खिड़की जिसपर काले रंग का शीशा चढ़ा हुआ था और उसके ऊपर पर्दा भी चढ़ा हुआ था। अगर खिड़की का स्लाइडर शीशा बंद रहे, जिसे सिर्फ अंदर बैठा शख्स ही खोल सकता था ना की ड्राइवर, तो आवाज़ आर पार नही जा सकती थी।

एक जेंटल मैन की तरह अभिमन्यु ने अनाहिता को पहले अंदर बैठने का इशारा किया। अनाहिता बिना हिचकिचाए अंदर बैठ गई। वोह जानती थी की उस के पास और कोई ऑप्शन नहीं है। वोह अंदर जा कर सबसे आगे की ओर पहली सीट पर ही बैठ गई।

अभिमन्यु ने देखा की अनाहिता आगे नहीं खिसक रही है ताकि वोह भी उसके साथ ना बैठ सके। तो उसने अपनी नज़र अनाहिता पर टिका दी।

अनाहिता चाहती थी की अभिमन्यु उसके सामने बैठ जाए पर उसके साथ एक ही सीट पर नही।

अगले ही पल अभिमन्यु ने गाड़ी में कदम रखा और अनाहिता के ही साथ उसकी सीट पर आगे बैठ गया।

अनाहिता उसे घूरने लगी। वोह तो सोच रही थी की अभिमन्यु को अपनी इंसल्ट फील होगी और वोह सामने बैठ जाएगा। _पर इसमें तो सेल्फ रिस्पेक्ट थी ही नहीं।_

गाड़ी स्टार्ट हो चुकी थी। बाकी गाड़ियों में अभिमन्यु ओबरॉय के बाकी के आदमी उसके आगे और पीछे उसकी सुरक्षा के लिए साथ बने हुए थे।

अनाहिता नही जानती थी की वोह कहाँ जा रही है। उसने नासिक शहर से बाहर कभी कदम रखा ही नही था।

“सफ़र लंबा है। पाँच छः घंटे लगेंगे। अगर तुम चाहो तो थोड़ी देर आराम कर सकती हो।” फिर कुछ पल रुक कर अभिमन्यु ने आगे कहा, ”हम रास्ते में एक जगह पर रुकेंगे अगर तुम्हे भूख लग रही हो तो वहाँ कुछ खा लेना।”

“मुझे भूख नही है,” अनाहिता ने नफ़रत भरे लहज़े में कहा।

“देखतें हैं,” अभिमन्यु ने बिना किसी भाव के जवाब दिया।

गाड़ी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी। अनाहिता खिड़की से बाहर का नज़ारा देखने में लगी थी। यह पहली बार था जब वो घर से बाहर इतनी दूर निकली थी।

अभिमन्यु अपने फोन में मेल्स चैक कर रहा था। उसकी बिज़नेस की भागदौड़ उसके कंधों पर थी। ओबरॉयस का होटल्स का बिज़नेस था जो की मिस्टर आनंद ओबरॉय ने अपनी मेहनत से खड़ा किया था। उनके बेटे अभिमन्यु ने बीस साल की उम्र से ही उनका बिज़नेस में हाथ बटाना शुरू कर दिया था और आज नौ साल की उसकी मेहनत के बाद अभिमन्यु ने अपने पिता का बिज़नेस एक नई ऊंचाइयों पर ला कर खड़ा कर दिया था। पूरे देश में उनके होटल्स की चेन्स थी।

मिस्टर आनंद ओबरॉय के छोटे बेटे अवनीश ओबरॉय को उनके बिज़नेस में कोई रुचि नहीं थी। उसने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपना ही नया बिज़नेस खोला। उसे पार्टीज करना बेहद पसंद था इसलिए उसने पुराने रेस्टोरेंट और जमीनें सस्ते दामों पर खरीद कर उन्हे क्लब में बदलने का काम शुरू कर दिया था। अपने पाँच साल के करियर में उसने छह टूटी फूटी जगह को शानदार क्लब में बदल कर खूब पैसा कमाया था।














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कहानी अगले भाग में जारी रहेगी....
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©पूनम शर्मा