डेविल्स क्वीन - भाग 2 Poonam Sharma द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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डेविल्स क्वीन - भाग 2

अनाहिता जब अपनी बहन को अपने कमरे में छुपा कर जब अपनी माँ के साथ नीचे हॉल में आई तो वहां कोई नहीं था। बाईं ओर बने एक बंद दरवाज़े पर दोनो की नज़रे टिक गई। उस बंद दरवाज़े के बाहर दो बॉडी गार्ड्स खड़े थे। अनाहिता ने उनकी ओर देखा।

"माँ यह जाने पहचाने नही लग रहें हैं?" अनाहिता को कुछ अजीब लगा।

"हाँ, मुझे लगता है की..." राधिका जी के कुछ कहने से पहले ही उन दोनो बॉडीगार्ड ने उन्हें देख लिया।

उनमें से एक ने कहा, "आपको आते ही अंदर जाने को कहा है।"

दोनो ने पहले एक दूसरे को देखा फिर आगे बढ़ने लगीं पर बॉडीगार्ड्स ने उन्हें रोक दिया।

"सिर्फ अक्षरा मैडम को ही अंदर आने को कहा है।"

अनाहिता थोड़ा घबराने लगी। उसे अपने ऊपर भरोसा तो था पर वोह अक्षरा बन कर आई थी तो उसे उसी की तरह बरताव भी करना था। उसकी माँ ने प्यार से उसके सिर के ऊपर हाथ फेरा और पलके झपका दी।

उस बंद दरवाज़े के पीछे उसके पिता विजयराज शेट्टी का ऑफिस था। अनाहिता डरते हुए भारी कदमों से बढ़ने लगी। किसी अनचाहे डर से उसकी आँखें झिलमिलाने लगी।

बॉडीगार्ड ने दरवाज़ा हल्का सा खोला और अपना सिर्फ सिर अंदर करते हुए कुछ इशारा किया। उसके बाद उसने पूरा दरवाज़ा खोल दिया।

अनाहिता ने जैसे ही अपने पापा के ऑफिस में कदम रखा उसे हमेशा की तरह कुछ अजीब सा लगा। उसे कभी भी उनके ऑफिस में आने की इजाज़त नही होती थी। अक्सर उसे दरवाज़े पर खड़े रह कर ही बात करनी होती थी। मुझे उनका ऑफिस बिलकुल भी पसंद नही था। यहाँ से उसकी एक भी अच्छी याद नही जुड़ी थी।

"यह ज़रूर अक्षरा है।" एक अधेड़ उम्र के आदमी ने अनाहिता की तरफ मुस्कुराते हुए कहा।

सबकी नज़रे उस ओर हो गईं। अनाहिता को वहां चार चेहरे नज़र आए। जिसमे से दो को वोह जानती थी और दो को वोह पहली बार मिल रही थी। एक उसके पिता थे, और एक उसके पिता के वकील, 'मिस्टर मनोज देसाई'। बाकी के दो नए चेहरे थे। जिसमे से एक जिन्होंने अभी उसे अक्षरा समझा था वोह अधेड़ उम्र के आदमी लग रहे थे जिन्होंने एक बहुत महंगा और स्टाइलिश बिजनेस सूट पहना हुआ था। उनको देख कर लग रहा था की काफी अमीर होंगे वोह।

उनके साथ एक और शख्स बैठा था जो अपने पैर पर पैर चढ़ाए बैठा था। उसने भी काफी महंगा हीना ग्रीन कलर का बिजनेस सूट पहना हुआ था। उसकी उम्र लगभग बीस से बाइस के बीच कुछ लग रही थी। चेहरा लंबा और चेहरे पर तेज़ साफ झलक रहा था। बहुत ही हल्की सी दाढ़ी थी और आँखें बड़ी बड़ी की जैसे अभी आँखों से ही निगल लेगा। वोह काफी हैंडसम था और भले ही वोह बैठा हुआ था पर कोई भी देख कर साफ कह सकता था की ऊंचा कद तो जरूर होगा। कोई भी दोनो को देख कर कह सकता था की यह जरूर बाप बेटे की जोड़ी है।

उस लड़के की नज़रे सीधे अनाहिता पर ही टिकी हुई थी। जब उसने अनाहिता को वहां कदम रखते हुए देखा था तो उसके होश ही उड़ गए थे। उसने उसे पहले भी एक बार देखा था पर आज सामने से देख कर उसकी पलकें झपकना ही भूल गई थी। दूध सी सफेद और उस पर हरे रंग के अनारकली सूट में वोह बेहद खूबसूरत लग रही थी। चेहरे पर कोई मेकअप नही, उसे जरूरत ही नही थी। नैनों में काजल और माथे पर एक छोटी सी चमकती बिंदिया कहर ढा रही थी। कानों में उसने सच्चे मोटी के बूंदे पहनी हुई थी। बालों की गुथ करके पीछे ही छोड़ रखा था और हया की ओढ़नी ओढ़े हुई थी। उसका रंग रूप, उसका स्वरूप इतना मनोहर था की जो एक बार देख ले बस देखता ही रह जाए। नभ में पाताल में उसके जैसी खुबसूरती कहीं नहीं थी। क्योंकि अक्षरा और अनाहिता जुड़वा थी तो उनकी खूबसूरती एक समान थी। और उन्हे यह खूबसूरती अपनी माँ से विरासत में मिली थी।

"अक्षरा।" विजयराज शेट्टी ने अपनी बेटी का नाम घृणा से पुकारा।

अनाहिता ने हैरानी से नज़रे उठा कर उन्हे देखा। वोह समझ गई थी की उसके पिता को पता चला गया है की वोह अक्षरा नही है और अनाहिता है। क्योंकि उसके पिता सिर्फ उसे ही घृणा भरी नजरों से देखते थे और बात करते थे। जबकि अक्षरा को तोह वोह बहुत प्यार करते थे। वोह समझ चुकी थी की यहां सबके सामने वोह कोई तमाशा नही खड़ा करना चाहते थे इसलिए वोह चुप हैं और बाद में ही उसकी खबर लेंगे। उसे सज़ा देकर। जो उसका नसीब बन चुका था। जिसकी उसे आदत थी।

"अक्षरा, यह हैं मिस्टर आनंद ओबरॉय।" विजयराज जी ने उन अधेड़ उम्र के आदमी की ओर इशारा करते हुए कहा। "और यह हैं मिस्टर अभिमन्यु ओबरॉय, उनके बेटे, और तुम्हारे होने वाले पति।" उन्होंने अब दूसरी ओर इशारा करते हुए कहा।

होने वाले पति। कभी कभी तो अक्षरा को लगता था की वोह मॉडर्न दुनिया में रह ही नहीं रही है और उसके पिता कभी यह मॉडर्न दुनिया समझेंगे की नही। वोह पुराने रीती रिवाजों और नियमों में ही जीते रहेंगे। उनके विचार भी उनके ऑफिस में रखे पुराने और बेकार फुर्नीचरों जैसे पुराने हैं।

"नमस्ते अंकल।" अनाहिता ने मिस्टर आनंद ओबरॉय की और हाथ जोड़ कर कहा। अक्षरा अनाहिता से ज्यादा सभ्य और शांत स्वभाव की थी। अनाहिता यहां बैठे सभी लोगों को पता नही लगने देना चाहती थी की उनके सामने खड़ी लड़की तो वो है ही नही जो वोह समझ रहें हैं। जबकि वोह जानती थी की उसके पिता उन दोनो की यह अदला बदली जान गए हैं। पर फिर भी वोह किसी के सामने पहला इंप्रेशन खराब नही करना चाहती थी।

जैसे ही अनाहिता ने अपनी नज़रे अभिमन्यु ओबरॉय को ओर की उसकी पीठ पर एक सिरहन सी दौड़ गई। वोह उसकी उम्र का तो बिलकुल नही था। वोह ऐसा लग रहा था मानो कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ली हो। उसके बाल एक दम परफेक्टली कॉम्ब थे और दाढ़ी अच्छे से ट्रिम थी। अनाहिता की नज़रे उसकी आँखों पर जा रुकी। नीली आँखें।

"अभिमन्यु," अनाहिता ने धीरे से कहा और नज़रे झुका ली। इन पलों में एक बार फिर उसने उसे देख लिया था। उसने मेंहदी रंग का बिजनेस सूट पहना हुआ था जिस के साथ कोई टाई नही पहनी थी। उसके अंदर उसने शाही सफेद रंग की शर्ट पहनी हुई थी। उसके कपड़ो में भी उसकी टाइट मसल्स और फिटनेस साफ पता चल रही थी। उसके हाथ उसके सीने पर बंधे हुए थे।

"अक्षरा," अभिमन्यु ने अपना सिर हल्का सा झुकाया। "तुमसे मिलकर अच्छा लगा।"

"कॉन्ट्रैक्ट तैयार हो चुका है। हमे बस तुम्हारे सिग्नेचर चाहिए। उसके बाद तुम ऊपर अपने कमरे में जा सकती हो। मुझे पता है तुम्हे बहुत सारा होमवर्क भी करना है।" विजयराज जी ने अपनी बेटी अनाहिता से कहा जो की अक्षरा बन कर उनके सामने खड़ी थी।












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कहानी अगले भाग में जारी रहेगी...
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©पूनम शर्मा