अपने साथ मेरा सफ़र - 10 Prabodh Kumar Govil द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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अपने साथ मेरा सफ़र - 10

दस
2014 में पहले वर्ष हमने और कुछ भी विशेष न करके केवल कुछ ऐसे सशक्त रचनाकारों की सूची सोशल मीडिया पर डाली जो तन्मय होकर गंभीर लेखन कर रहे थे और उनमें अधिकांश काफ़ी उम्र दराज भी थे। ये पहली सूची हमने ब्लॉग्स पर और फेसबुक पर जारी की ओर इसे बाद में देश के कुछ विश्वविद्यालयों में भी भिजवा दिया गया।
इस सूची को देश की साहित्य अकादमियों व हिंदी प्रचार प्रसार के अन्य प्रमुख संस्थानों से अलग ही रखा गया।
इसे कहां भेजा गया और कहां इरादतन नहीं भेजा गया, और क्यों, मुझे लगता है कि इस बात पर हमें थोड़ा प्रकाश डालना चाहिए।
इस सूची को पहली बार जारी करते समय हम पर्याप्त संकोची से थे क्योंकि हम एक ऐसा काम करने जा रहे थे जिसे पहले कभी नहीं किया गया। किंतु हम आपको यह भी बता दें कि हम ऐसा नहीं मानते कि हम ये काम पहली ही बार कर रहे थे।
देश भर में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में आज "रैंकिंग" का पर्याप्त प्रचलन है। ये लगभग हर क्षेत्र में है, हर स्तर पर है। इसके बिना आसानी से कोई बात तय हो ही नहीं सकती है। फ़िल्मों में, खेलों में, व्यापार में, शिक्षा में, तकनीकी में, यहां तक कि रेल,बस, जहाज के सफ़र तक में तो ये सब डंके की चोट पर है और इस पर खुले मन से सोच कर खूब काम किया ही जाता है।
कुछ लोगों का मानना था कि साहित्य में ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं हो सकता, ऐसा नहीं होना चाहिए और ऐसा होना अटपटा है।
मुझे लगता है कि हमें सबसे पहले इसी स्टेटमेंट, उक्ति, सोच, मंतव्य या जड़ता पर ही बात कर लेनी चाहिए।
हम ऐसा मंतव्य प्रकट करने वाले लोगों की अनदेखी कर सकते थे और अपने काम में लगे रह सकते थे। लेकिन ऐसा नकारात्मक मंतव्य प्रकट करने वाले लोगों में कुछ वरिष्ठ, सम्माननीय तथा गंभीर रचनाधर्मी भी थे इसलिए हमने आगे बढ़ने से पहले उनके मस्तिष्क प्रक्षालन का प्रयास करने में कोई कोताही नहीं की। हम उनसे चर्चा करने से बचे नहीं। हमने मन में यही ध्येय रखा कि या तो हम अपनी बात उन्हें समझाने में कामयाब हो सकें या फ़िर उनकी बात समझने के लिए खुद अपने आप को तैयार कर सकें। हमने अपनी योजना, प्रयोजन और प्रक्रिया पर कुछ आलेख तैयार किए और उन्हें सोशल मीडिया के साथ साथ कुछ पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाने का प्रयास भी किया। यहां हमें मिली जुली प्रतिक्रिया मिली। विरोध करने वालों का स्वर थोड़ा प्रखर मुखर था जबकि इसके पक्षधर दबे स्वर में हमें अपना अनुमोदन दे रहे थे।
मुझे समय- समय पर अपने पढ़े हुए ऐसे मंतव्य याद आए कि ऊंचे तीखे सुर में कही गई बात का वजन हल्का होता है। बुनियाद पर खड़ी बात तेज़ आवाज़ की मोहताज नहीं होती।
ऐसा करना चाहिए या नहीं, इस बहस में पड़ने से पहले हमने अपने सहयोगियों मित्रों और जिज्ञासुओं की नब्ज़ टटोलने के लिए कुछ बैठकें की। इन अनौपचारिक चर्चा बैठकों से हमें कुछ ऐसे तर्क हासिल हुए जो हमारी मदद करने का आश्वासन देते हुए दिखते थे बशर्ते हम लोग अपने इरादों में अडिग रहें।
इस बात में कोई दम नहीं था कि ऐसा तो कभी होता नहीं है इसलिए ये भी न हो।
ऐसा हो रहा था, होता रहा है और इस विचार को दिनों दिन लोकप्रियता मिल रही थी।
अब "साहित्य" में ऐसा नहीं हो सकता पर आएं। क्यों? क्यों नहीं हो सकता?
क्या साहित्य के किसी भी छोटे से लेकर बड़े पुरस्कार विजेता या सम्मान के लिए पात्रों का चयन करते समय भी यही विचार रहता है कि लेखन तो लेखन है, लिखने वाले तो सब बराबर हैं तो पुरस्कार किसी को भी दे दिया जाए? सबको दे दिया जाए? बारी- बारी से दे दिया जाए? सबको समान मान कर दे दिया जाए?
नहीं, ये विचार ही हास्यास्पद है।