तेरी कुर्बत में - (भाग-9) ARUANDHATEE GARG मीठी द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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तेरी कुर्बत में - (भाग-9)

अगली सुबह सब कुछ बदला - बदला सा लग रहा था । ऋषि रात भर सोया नही था , और हैरानी ये थी कि अब भी उसकी आखों में नींद नही थी । संचिता अब कल से ठीक थी । जी भरकर सोने से उसे बहुत राहत मिली थी ।
स्कूल पहुंचने पर , उसने पहले तो एग्जाम के फॉर्म संबिट किए और फिर अपनी क्लास चली गई । ऋषि ने भी अपने एग्जाम फार्म संबिट कर दिए थे । आज पूरे दिन संचिता और ऋषि की मुलाकात नहीं हुई । दोनों अपने - अपने कामों में इतने ज्यादा व्यस्त थे , कि एक दूसरे से मिल ही नहीं पाए । स्कूल से लौटते ही ऋषि ने उस फॉर्म को ऑनलाइन कैफे में संबिट किया , जिसका सपना वह सालों से देख रहा था ।

उस दिन के बाद से सब कुछ सही चल रहा था । या ये कहिए , शांति छाई हुई थी । बस अगर कुछ अजीब हो रहा था , तो ये....., कि संचिता और ऋषि के बीच बात बंद थी । उस दिन के बाद से एक भी बार न ही दोनों एक दूसरे के सामने आए थे और न ही उनकी कोई बात हुई थी । सेमेस्टर एग्जाम स्टार्ट हो चुके थे , जो कि लास्ट नवंबर में थे । सारे पेपर दोनों के बहुत अच्छे जा रहे थे । लास्ट पेपर के दिन संचिता ने अपना पेपर कंप्लीट किया और क्लास से बाहर निकली ही थी , कि बगल की क्लास से बाहर आता ऋषि उससे टकरा गया । लेकिन दोनों ने खुद को संभाल लिया । पर अनायास ही दोनों की नजरें आपस में मिल गई । संचिता को देख ऋषि के दिल में एक टीस सी उठी । उसका चेहरा पिछली मुलाकात की अपेक्षा काफी मुरझाया हुआ था । पिछले दो महीनों में ऋषि ने उसे देखा तक नहीं था और न ही संचिता ने उसे । आंखों के नीचे काले गड्ढे थे और दिखने में वह काफी दुबली दिख रही थी । ये सब देख ऋषि ने नजरें फेर लीं , उसे लगा उस दिन के बाद से संचिता कभी संभल ही नहीं पाई, उसका मुरझाया चेहरा देख ऋषि को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था । जबकि संचिता के साथ उल्टा था , उसे ऋषि को देख कर एक अजीब सा सुकून मिला , जैसे तपती रेत पर बारिश की फुहार बरस गई हो । उसे ऋषि हमेशा के तरह टिप टॉप और अट्रेक्टिव लग रहा था और ऐसा था भी । अब उसे समझ नही आ रहा था , कि ऋषि उससे उस दिन के बाद से कभी मिला क्यों नहीं और अभी ऐसे चुप चाप क्यों खड़ा है..?? ऋषि ने अब चुप चाप अपने कदम आगे की तरफ बढ़ाए , उसने संचिता को देखकर भी पूरी तरह इग्नोर कर दिया । संचिता को ये बड़ा अजीब लगा । वह उसके पीछे - पीछे आई और उसे आवाज़ दी ।

संचिता - ऋषि...., रुको ।

संचिता की आवाज़ सुनकर ऋषि न चाहते हुए भी रुक गया । संचिता भागती हुई उसके पास आई और आते ही कहा ।

संचिता - क्या हुआ..??? एक तो इतने दिनों बाद हम मिले और तुमने बात तक नहीं की मुझसे , इन्फेक्ट मुझे इग्नोर कर दिया ।

संचिता की बात सुनकर ऋषि का दिल धक से रह गया । आखिर यही तो नहीं चाहता था वो , कि संचिता उससे कोई सवाल करे । बिना पलटे वह अपने आप से मन ही मन बोला।

ऋषि - कैसे बात करूं तुमसे मैं संचिता..??? उस दिन मैंने तुम्हारे दर्द को कुरेदा था । मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था । मैंने उस दिन बहुत बड़ी गलती कर दी थी और उस गलती का गिल्ट मुझे चैन से जीने नही दे रहा । कितना कुछ बुरा हुआ तुम्हारे लाइफ में और मैंने कैसे तुम्हें उस दर्द को फिर से याद करने पर मजबूर कर दिया । क्यों मैंने खुद को नही रोका , तुमसे तुम्हारे बारे में जानने से । बहुत गलत किया मैंने , मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था । अब मैं तुमसे नजरें कैसे मिलाऊं , और आज तुम्हारी हालत देख शायद अब मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा । भगवान कभी किसी को अपने परिवार से अलग न करें , कभी किसी भी इंसान को अनाथ न करे । मैं तो बिना अपने पैरेंट्स के, खुद की जिंदगी जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता और , तुम संचिता ..., तुम तो जी रही हो , वो भी बचपन से । मैं उस दिन अपनी सबकुछ जानने की जिद में , तुम्हारा गुनहगार बन गया संचिता , बहुत बड़ा गुनहगार हो गया हूं मैं तुम्हारा ।

ऋषि को चुप चाप खड़ा देख , संचिता उसके सामने आकर खड़ी हो गई , तो ऋषि ने अपनी गर्दन झुका ली । उसे ऐसे देख संचिता को बड़ा अचंभा हुआ । उसने ऋषि से कहा ।

संचिता - हे.... ऋषि !!! तुमने मुझे देख अपनी गर्दन क्यों झुकाई ??? और मैं कब से तुमसे सवाल कर रही हूं , बात कर रही हूं, तुम जवाब क्यों नही दे रहे..??? मुझसे कोई गलती हुई है क्या..???

ऋषि ( तुरंत बोला ) - नहीं...। तुमसे कोई गलती नही हुई संचिता ।

संचिता को ऋषि की आवाज़ हमेशा के मुकाबले कुछ अजीब सी लगी । उसने उसे टोका ।

संचिता - तुम इतना अजीब साउंड क्यों कर रहे हो , जैसे अभी रो दोगे ।

ऋषि ने उसकी बात सुनते ही एक बार फिर अपनी गर्दन घुमा ली । संचिता ने फिर सवाल किया ।

संचिता - हुआ क्या है ऋषि , कुछ तो बोलो ।

ऋषि - हम कहीं और चलकर बात करें ।

संचिता - ठीक है , कहां चलना है । ( सीढ़ियों की तरफ इशारा कर ) वहां बैठे ...???

ऋषि - क्या हम गार्डन चल सकते हैं , जहां हमने पिछली बार लंच किया था ।

संचिता ( थोड़ी हैरानगी और असहजता से बोली ) - वहां..!!?? पर वहां इस वक्त कोई नहीं होगा !!!!

ऋषि - टेंशन मत लो , मैं उस तरह का लड़का नहीं हूं , मैं तुम्हें हर तरह से सेफ रखूंगा और न ही.....।

संचिता - ओके ...., ओके ....। रहने दो, आगे मत बोलो, मैं समझ चुकी हूं । मैं बस यूं ही ये सवाल ....। अच्छा ठीक है , चलो ।

दोनों गार्डन में उसी पुरानी जगह पर आ गए । जहां पिछली बार दोनों बैठे थे ।

क्रमशः