तेरी कुर्बत में - (भाग-5) ARUANDHATEE GARG मीठी द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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तेरी कुर्बत में - (भाग-5)

अगले दिन स्कूल में लंच के टाइम संचिता अपनी नोटबुक लिए नोट्स बना रही थी । आज उसे उठने में देरी हो गई थी , इस लिए वह टिफिन तैयार नहीं कर पाई , जिसकी वजह से उसे घर पहुंचते ही मौसी से डांट पड़ेगी , ये बात वह जानती थी । बाकी की दोनों बहने अपने कामों में बिजी थी , इस लिए वे नही बना पाईं , इस लिए संचिता की तरह ही बाकी दोनों भी आज बिना टिफिन के ही स्कूल आ गईं थी । संचिता को कई बार उसकी फ्रेंड्स उनके साथ लंच करने के लिए कह चुकी थीं , लेकिन मन नही है कहकर संचिता ने मना कर दिया था । वह अपने नोट्स तैयार करने में शिद्दत से जुटी हुई थी । कुछ पल बाद ऋषि उसकी क्लास के सामने से गुजारा , लेकिन वह संचिता की क्लास के सामने ही ठहर गया । जाने क्यों, ये वो नही जनता था। संचिता फर्स्ट बेंच पर ही बैठी थी , जो ऋषि को दिख गई । अनायास ही वह उस क्लास की तरफ बढ़ गया । उसे क्लास में देख , सारे स्टूडेंट्स अपना लंच छोड़ उसे देखने लगे , क्योंकि ये पहली बार था , जो ऋषि किसी की क्लास में गया था , वरना उसे अपनी पढ़ाई , अपनी क्लास से फुर्सत ही नहीं थी । संचिता अभी तक इन सबसे अनजान थी । ऋषि सीधे उसके पास आकर रुका और उससे कहा ।

ऋषि - हे..., स...,संचिता..., यही नाम है न तुम्हारा???

उसे किसी का नाम भी याद नहीं था , संचिता का नाम भी वह लगभग भूलता ही , अगर हर महीने टॉप फाइव अनाउंसमेंट में उसका नाम शामिल न होता तो । इसके उलट संचिता अपने नोट्स में इतनी उलझी थी , कि उसे ऋषि की आवाज़ सुनाई ही नहीं दी । ऋषि ने फिर कहा , लेकिन थोड़ा तेज आवाज में ।

ऋषि - मिस संचिता...., ( संचिता हड़बड़ा गई और अपने बगल में देखा ) मैं तुम्हें आवाज दे रहा हूं और तुम सुन तक नही रही , इतना ईगो ठीक नही ।

संचिता तो हैरान थी , उसे वहां देखकर , बेचारी के मुंह से शब्द नही फुट रहे थे , क्योंकि उसे ये एक सपना सा लग रहा था । जबकि ऋषि को उसका व्यवहार अपने सेल्फ रिस्पेक्ट को आहत करने वाला था । संचिता के वैसे ही बुत बने बैठकर उसे देखते रहने से ऋषि थोड़ा सा चिढ़ गया और उसने उसके सामने अपने हाथ हिलाते हुए कहा ।

ऋषि - संचिता , क्या तुम मुझे सुन पा रही हो..???

उसके ऐसा करते ही पूरी क्लास हंसने लगी, संचिता की बेवकूफी भरी हरकतों पर । जबकि हंसी की आवाज सुनकर संचिता अपने होशो हवास में आ चुकी थी और अब उसे ये अपने लिए एंबेरेसमेंट से कम नही लग रहा था । वह हड़बड़ा कर खड़ी हो गई और तुरंत कहा ।

संचिता - तुम ..., तुम यहां ..., यहां कैसे???

ऋषि ( अपने हाथ बांधकर ) - तुम पहले बताओ...., तुम इस टाइम ये क्या कर रही हो???

संचिता ( नासमझ सी उसे देखने लगी और पूछा ) - तुम इस लिए यहां आए थे?

ऋषि - लंच टाइमके वक्त तुम्हें स्टडीज में उलझे देखा , तो आया मैं यहां ।

ऋषि ने संचिता की शंका स्पष्ट कर दी थी । लेकिन उसके इस बात के कहने से , संचिता का दिल जाने क्यों जोर - जोर से धड़कने लगा । ऋषि की बात में उसे अपने लिए फिक्र दिखी । वह हल्की सी मुस्कुराई , फिर मुस्कुराना बंद कर दिया , जब उसे आभास हुआ कि उसके सामने कौन है ।

ऋषि - अब तो बताओ..., तुम इस वक्त लंच करने की जगह , स्टडीज में क्यों उलझी हुई हो ?

संचिता की एक फ्रेंड, नीलम उनके पास आई और कहा ।

नीलम - हम सब भी कब से इसे कह रहे हैं , चल लंच कर ले हमारे साथ , लेकिन ये लड़की मान ही नहीं रही है ।

ऋषि ( संचिता से ) - क्यों..?? क्यों नही गई तुम इनके साथ?

नीलम - क्योंकि आज ये लंच नहीं लाई है , लेकिन हमारे साथ शेयर कर खाने में इसे जाने क्या प्रॉब्लम है??

नीलम ऋषि के आगे अपने नंबर बढ़वा रही थी , क्योंकि ये पहली बार था , जब ऋषि किसी लड़की से बात कर रहा था , दिखने में तो था ही हैंडसम , इस लिए जाने कितनी लड़कियां उससे बतियाने को मरती रहती थीं , लेकिन ऋषि किसी पर ध्यान नहीं देता था । नीलम इसी बहाने उससे बात कर लेगी , सोचकर इतना कुछ बोल रही थी ।

ऋषि - क्या प्रॉब्लम है संचिता , जाओ...., लंच कर लो उनके साथ ।

नीलम - वही तो हम कब से समझा रहे हैं इसे , लेकिन ये मैडम हमारे साथ लंच कर लेंगी, तो इनकी सेल्फ रिस्पेक्ट आहत हो जायेगी ।

ऋषि ( नीलम से ) - तुम्हारा नाम संचिता है क्या मिस..???

नीलम उसकी बात से अचकचा गई । उसने एक नज़र उन दोनों को देखा और फिर बिना कुछ कहे वहां से चली गई । जिस सेल्फ रिस्पेक्ट की बात अभी वो कर रही थी , अब उसकी खुद की सेल्फ रिस्पेक्ट ही आहत हो गई थी । उसके जाते ही ऋषि ने संचिता से कहा।

ऋषि - चलो...., आज मेरे साथ लंच करो...।

संचिता ( थोड़ी संकुचाते हुए बोली ) - लेकिन मैं कैसे...???

ऋषि - जैसे किया जाता है सबके साथ लंच , वैसे ।

संचिता ( को उसका जवाब जचा नहीं , लेकिन संकोच वश फिर भी वह बोली ) - मैं तुम्हारे साथ कैसे लंच कर लूं ? तुम अपने लिए लाए हो , और मैं...।

ऋषि ( उसे टोक कर ) - इतनी फॉर्मेलिटी क्यों निभा रही हो ??? मुझे पसंद नहीं । तुमने मेरी हेल्प की थी , मैं तुम्हें थैंक्यू तक नहीं बोल पाया था । इस लिए तुम्हें लंच के लिए इन्वाइट कर रहा हूं । इसे मेरी तरफ से थैंक्स कहने का एक अंदाज़ समझ लो , बस ।

संचिता खुश हो गई । कि कम से कम उसे याद तो है और उसे थैंक्स कहना भी आता है , भले ही दूसरे तरीके से ही सही । संचिता राज़ी हो गई । उसने अपनी बुक्स और नोटबुक अपने बैग में रखी और फिर खाली हाथ ऋषि के साथ चली गई । जबकि बाकी के स्टूडेंट्स बस उन्हें देखते रह गए । कुछ लड़कियां संचिता से जल भुन गई और कुछ लड़के ऋषि से । कुछ आपस में कयास लगाने लगे और कुछ फुसफुसाने लगे , इन दोनों को देखकर । जबकि दोनों इन सबसे अनजान ऋषि की क्लास में पहुंचे । अब ऋषि के क्लास के स्टूडेंट्स ठीक वैसे ही अचंभे से दोनों को देख रहे थे , जैसे संचिता की क्लास वाले देख रहे थे ऋषि को । ऋषि ने तो किसी की भी तरफ देखा तक नहीं। अपना लंच उठाया और संचिता को लेकर गार्डन में चला गया । उसे हरी भरी घांस बहुत पसंद थी , साथ ही वह प्रकृति प्रेमी भी था , क्योंकि यहां उसे मन की शांति का एहसास होता था । संचिता को भी अच्छा लगा यहां आना , एक तरह से कहा जाए , तो वह तो जहां - जहां ऋषि उसे ले जा रहा था , बिना कुछ बोले उसके साथ उसे निहारते हुए चली जा रही थी । ऋषि का उसका हाथ पकड़ना और उसे यहां लाना , संचिता के दिल में घर कर रहा था , उसे अजीब सा अटैचमेंट हो रहा था ऋषि से , जिससे वह बहुत खुश थी , उसे लग रहा था , ये पल यहीं थम जाए , कहीं जाए ही न और वह ऐसे ही ऋषि के साथ रहे । उसकी उड़नखटोले जैसी ख्वाबों वाली भावनाओं के पंखों पर ब्रेक लगाया ऋषि की आवाज़ ने ।

ऋषि ( बरगद के पेड़ के नीचे बिछी घांस पर बैठकर बोला ) - आओ...., बैठो । ( संचिता अपने खयालों से बाहर आ, उसके सामने बैठ गई ) ये जगह कितनी अच्छी लग रही है न ? मुझे तो ये हरी भरी घांस , ये पेड़ की छांव के नीचे बैठना बहुत पसंद है , तुम्हें पसंद आया..???

संचिता ( मुस्कुराकर बोली ) - हां .., बहुत ज्यादा ।

पर असल में वह ऋषि को देख कर बोली थी , ये तारीफ वहां के माहौल के लिए न होकर , ऋषि के लिए ही थी , जिसे ऋषि नही समझा था । वह मुस्कुरा रहा था , और संचिता उसे ऐसे पहली बार मुस्कुराते हुए देख रही थी । उसकी भूरी आखें , जिनमे यहां आकर असीम खुशी झलक रही थी , उसमें संचिता खोती चली जा रही थी , उसे काफी खुशी हो रही थी ऋषि को मुस्कुराते देखकर । ऋषि हमेशा शांत और चुप ही रहता था , ये शायद पहली बार था , जब वह स्कूल के किसी स्टूडेंट के सामने मुस्कुराया था । संचिता जाने क्यों उसमें इतनी रमी जा रही थी , नहीं जानती थी वह । जबकि उसकी इन सब भावनाओं और उसकी नजरों से अनजान , ऋषि ने अपना टिफिन खोल लिया था , जिसमें आज आलू के पराठे , अचार , दही , साथ में कुछ स्नैक्स थे । काफी सारा खाना था , जो शायद सिर्फ उसके लिए ही आता था । ऋषि ने संचिता को खाने के लिए कहा , तो संचिता की तंद्रा टूटी और उसने जब अपने सामने इतना सारा खाना देखा , तो हैरान होकर ऋषि से बोली ।

संचिता - इतना सारा खाना...., और वो भी...!!!

ऋषि ( बीच में ही ) - तुम मुझे गलत समझो , उससे पहले मैं तुम्हें बता दूं , मेरे घर से इतना सारा खाना रोज आता है । मैं न लाऊं , तो भी मां भिजवा देती हैं, मजबूरन मुझे पूरा खाना झेलना पड़ता है , क्योंकि खाना फेंकना मुझे पसंद नहीं और यही हाल हमारे घर के सारे बच्चों के साथ होता है। मैने पहले से नहीं सोचकर रखा था , कि आज तुम्हें भी लंच मेरे साथ करने को कहूंगा। इस लिए प्लीज इसे प्लानिंग या कुछ गलत इंटेंशन से मैं ऐसा कर रहा हूं , ये सब मत समझना ।

संचिता उसकी बात पर मुस्कुराई , उसे अच्छा लगा ऋषि का उसकी शंका जाहिर करने से पहले ही उसे दूर करना । उसने मुस्कुराकर ही कहा ।

संचिता - नहीं ऋषि ..., मैं ऐसा कुछ नही समझ रही । बल्कि मैं ही नहीं , पूरा स्कूल तुम्हारे व्यवहार से वाकिफ है , जिसमें कुछ गलत इंटेंशन वाली बात तो हमारे जहन में कभी आ ही नहीं सकती ।

ऋषि - थैंक गॉड....। अच्छा , तो चलो...., फिर खाकर बताओ , कैसा है ....??? भई मुझे तो आलू के पराठे बहुत पसंद हैं ।

संचिता ( एक कौर अपने मुंह में डालते हुए बोली ) - वाउ...., इट्स सो मच डिलीशियस । बहुत ही ज्यादा टेस्टी है ये तो । और ये मेरी भी फेवरेट डिशेस की लिस्ट में शामिल है ।

ऋषि - मां ने बनाया है , घर में वही हम सबके लिए इंडियन फूड बनाती हैं ।

संचिता - वे तुमसे बहुत प्यार करती हैं , लगता है ।

ऋषि - हां...., सबकी माएं अपने बच्चों से बहुत प्यार करती हैं ।

संचिता बस मुस्कुरा दी । आखें भर आई थी उसकी ....।

क्रमशः