ताश का आशियाना - भाग 7 Rajshree द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

ताश का आशियाना - भाग 7

मुझे तब लगा वो अचानक से कन्फेशन से घबराई होंगी। जैसे 2 साल पहले मेरा हाल था उसी प्रकार उसका भी वही हाल था, पर जब वह 12वीं के बाद बिना बताए दिल्ली चली गए तब मुझे खटका। प्रकाश ने कहा वह तुझ से लव नहीं करती है। पर मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ। शायद वो भी जिम्दारिया, दोस्ती, सपने इनमें दब चुकी थी।
पापा ने 12वीं में 80% मिलते ही कुछ ना सोचते हुए, "तुम्हें इंजीनियरिंग करना होगा।" क्योंकि उनके ऑफिस में एक क्लर्क का बेटा इंजीनियरिंग कर आर्किटेक्ट बन चुका था। मेरी एक भी नहीं चलने दी मैं ट्रैवलिंग में कुछ करना चाहता था, बी.टी.टी.एम करना चाहता था।
बाकी मैंने भी ज्यादा बहस नहीं की क्योंकि वो मैं कर भी नहीं पाता था, और चित्रा के नजरों में खासकर उसके पिता के नजर में, मैं एक बड़ा आदमी बनने के लिए तब मुझे B.E ये एक ही रास्ता नजर आया।
वैसे भी ट्रैवलिंग करके करेगा क्या? खुद के परिवार को छोड़ खुद का पेट तक नहीं भर पाएगा। यह पापा के कहे गए शब्द दिमाग में घर कर बैठ गए थे, कि मैंने प्रकाश की बातों को तक नजरअंदाज कर दिया। "मैकेनिकल इंजीनियर सेकंड ईयर" चित्रा वापस आई तब वह एम.बी.बी.एस की डिग्री ले रही थी।
चित्रा मुझे तभी यही अस्सी घाट वाले कैफ़े पर मिली थी।
चित्रा का जब फ़ोन आया तो मेरे मन ने क्या क्या बातो का परचम चढ़ना शुरू कर दिया था।
"मै तुमसे इसलिए मिलने आए हु की में ये तुम्हे बता सकू that i love you."
याफिर "तुम कैसे हो मुझे तुम्हारी बहोत याद आ रही थी।"
"उसदिन मैने इसलिए कुछ नही बोला क्युकी मेरे लिए यह बात इतनी जल्दी तुम बोल दोगे पता नही था।"
या फिर
"हम अभी दोस्त बनकर नही रह सकते।"
"मुझे लगा तुम अलग हो, पर तुम भी बाकी लड़को कि तरह मौका फर्स्ट निकले।"
मेरा दिमाग आशा-निराशा के भवर में गोते खा रहा था।
लेकिन जैसे तैसे वो इतने सालों बाद चित्रा को मिलने से मान ही गया।
जब मै वहां पहुचा तब तक चित्रा ने कॉफी और सैंडविच का आर्डर दे दिया था।
मुझे उससे कितनी बाते शेयर करनी थी, कितनी बाते पूछनी थी।
आखिरकर शुरुवात उसने ही की।
"कैसे हो?"
"ठीक हु।" मैंने हिचकिचाते हुए जवाब पेश किया
"और तुम कैसी हो?"
"मै ठीक हु।"
अच्छा है हम दोनों एक ही चोटी पर खड़े है।
"आजकल क्या कर रहे हो?"
"मैकेनिकल इंजीनियरिंग." यह बात सुनते ही उसका चेहरा एकाएक उखड़ गया। मै पूछना चाहता क्यो पर क्या पता मेरा ही वहम हो वैसे भी तब मेरा मन पढ़ाई से ज्यादा बाहर भटकाना चालू हो गया था।
"तुम बताओ आजकल तुम क्या कर रही हो?"
"यहां बनारस में कोई स्कोप नही है। इसीलिए पापा के कहने पर मासी के घर दिल्ली शिफ्ट हो गई।"
"बिना बताए दिल्ली क्यों चली गयी?"
"हा..." एक मिनिट के लिए शांति फैल गयी।
"मैडम आपका ऑर्डर" वेटर ने कॉफ़ी और सैंडविच टेबल पर रख दिए मेरे लिए हमेशा की तरह चाय।
"लो सिद्धार्थ, बाते तो बाद में भी होती रहेगी।"
कम दूध, कम शक्कर।
चित्रा को अभीभी मेरी पसंद के बारे में पता है यह जानकर जाने अनजाने दिल को बहुत सुकून मिला था।
"तुमने जवाब नही दिया तुम...."
"बताया ना बनारस में स्कोप नही है।"
तब मैंने पहली बार हम दोनों के रिश्ते में एक हिचकिचाहट महसूस की,एक झुठ।
जैसे एक अनजान व्यक्ति से उसके घर का पता पूछ लिया हो।
उस वक्त लगा जैसे मशीन में रह रह के मेरा मन जिंदगी के हर एक बात की गहराई खोज रहा है। मुझे ब्रेक ले लेना चाहिए।
"सॉरी"
चित्रा ने एक लंबी सांस ली और सवाल दागा तुमने "मैकेनिकल इंजीनियरिंग क्यो लिया?"
"हा..." तब मेरी बोलती बंद हो गयी। तब चित्रा को वेटर ने बचाया पर मुझे बचाने वाला कोई न था।
पापा ने कहा था। इंजीनियरिंग में स्कोप है, मै आगे जाकर पैसे कमा सकता हु। औऱ तुम डॉक्टर औऱ मै एंजिनियर परफेक्ट कपल। यह बोलना चाहता था पर बोल नही पाया।
"पापा ने कहा था कि...."
में वाक्य पूरा होने ही वाला था कि चित्रा का फोन बजा
"हा पापा कैफ़े में हु एक दोस्त के साथ।"
"हा पापा जल्दी घर पहोचती हु।"
"सिद्धार्थ में चलती हु पापा ने घर जल्दी बुलाया है।"
"बट हम अभी अभी तो मिले है।"
"आय क्नोव सिद्धार्थ, पर तुम पापा को तो जानते हो ना।"
अपना बैग उठाते हुए
"डोंट वरी खाने का बिल भर दिया जस्ट एन्जॉय ओके."
इतना बोलके वो वहा से चली गयी।
उस दिन बाद शायद ही कभी फुरसत से मिले होंगे हम दोनों।
चित्रा की छुट्टियां खत्म होने के एक दिन पहले गंगा आरती के लिए मिले थे तब हम दोने ने मिलकर गंगा में दिया छोड़ अपनी अपनी मन्नते मांगी थी।

"मेरे लिए, चित्रा हमेशा खुश रहे यही काफी था।"
चित्रा सुबह की ट्रेन से एक बार फिर दिल्ली चली गयी पीछे
एक सवाल छोड़ "मेरे आय लव यू का जवाब?"
बचकाना लगता है। पर तब उसका जवाब मिलना मेरे लिए मानो हिमालय की चोटी पर ध्वज फहराने जैसा था।
पर शायद वो मुझे कभी दोस्त से आगे बनाना ही नही चाहती थी पर मुझे उससे कोई ऐतराज नही था। फिर भी आज भी दिल चित्रा से ऊपर उठ ही नही पाया बस कभी-कभी यादों से ऊब जाता है।
कैसे तैसे कर इंजीनियरिंग पूरा हुआ।
चित्रा भी एक साल बाद वापस आ गयी।
कॉलेज में जॉब प्लेसमेंट के लिए कंपनीज आयी पर मेरे मार्क्स काफी नही थे औऱ इंटरव्यू में भी सपनो में सोचे गए पैकेजेस भी नही थे बस एक जॉब थी जो में छोड़ना नही चाहता था।
तब थ्री इडियट्स नही आई थी ना और आती भी तो नाही मै राजू था नाही मेरा बाप फरान का अब्बा था।
कभी-कभी फिल्मो में वो हम दुनिया जी सकते है जो हम कभी जीना चाहते है। जिसकी अस्सल जिंदगी में सिर्फ परिकल्पना ही की जा सकती है।
क्योकि लेखक भी समाज का वो हिस्सा होता है जो देखता तो आंखों से है, लिखता कलम से है। बस असलियत में थोड़ी कल्पना का घोल मिलाके कहानी पेश कर देता है।
सिर्फ खुदका बोझ "लिखी गयी कहानी से किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नही है यह दो तीन लाइन लिख हल्का कर देता है।"
मैने बहोत कुछ सोचा आगे क्या करु मेरी उसी युवावर्ग का हिस्सा बन चुका था जिसके पास औकात के ज्यादा का खर्च कर, दिन रात असाइनमेंट कर सिर्फ दस रुपए के कागज पर पास की डिग्री छपी थी।
क्या बोलने वाला था में चित्रा को? मेरे माता- पापा ने मुझसे बात करना कुछ वक्त के लिए बंद कर दिया क्युकी फर्स्ट एटेम्पट में मुझे जॉब नही मिल पाई पर जब फिर से एकबार इंटरव्यू हुए तो मुझे आखिरकार जॉब मिल ही गई।

जब मैने जॉब मिल गयी है और महीने का सिर्फ 8,000 मिलेगा यह सुनते ही वो खुशी से झुम उठे। पर तभी भी मेरे मन मे यही सवाल था क्या सिर्फ इतनी मेहनत और मेरी जिंदगी की कीमत सिर्फ 8,000 है?
तू आगे कमा लेगा तू होशियार है देखना एक दिन तू बहोत बड़ा आदमी बनेगा।
होशियार! तब मुझे इस बात पर हँसी आ रही थी। शायद स्कूल एजुकेशन सच मे ही आसान होता होगा या फिर तब
किताबी पढ़ना भी हमे पैसा दिला सकता है ऐसी झुठी आशा शायद कही जन्मी नही होती होगी।
मैने जॉब करना चालू कर दिया तब लगा मै भी बिज़नेसमैन बन सकता हु।
अपने एक दोस्त की मदत से एम.बी.ए. में एडमिशन ले ली जॉब तब भी चालू थी।
लगा सब सेट है कभी- कभी कुछ गलत है लगता था। प्रकाश भी मुझे कही बार थोड़ा ज्यादा ही परेशान कर देता था इसलिए मैने ड्रिंक करना चालू कर दिया था।
जो आदत आज तक नही छुटी। आदते कभी नही छूटती बस आदतों की आदत लग जाती है।
चित्रा की भी आदत लग गयी थी शायद प्यार के रिश्ते पहले ही कही धुंधले हो गए थे।
फिर भी चित्रा किसी और के जिंदगी का हिस्सा है ये गम अभी भी सताता है क्यो?पता नही
कभी कभी लगता है खाली वक्त में फल्शबैक दिखा-दिखाके परेशान करना मेरे दिमाग का पसंदीदा काम बन जाता है, इसीलिए तो बंजारों की तरह घूमता रहता हूं।
मेरे एम.बी.ए. करने की बात चित्रा को खासा पसंद नही आयी।
"पहले इंजीनियरिंग अभी एम.बी.ए.आर यु गॉन क्रेजी सिद्धार्थ."
चित्रा को मुझसे मिलने की खुशी नही बल्कि मेरा जीवन मे लिया गया फैसला गलत लग रहा था।
कही खटास सी फैल गयी थी रिश्तों में।
मैंने पहली बार चित्रा को घर भी बुलाया मम्मी पापा से मिलने पर "तुम एम.बी.ए करके कुछ ढंग का करलो तभी में आऊँगी।" उस दिन उसने बातो-बातो में मजाक में कह दिया पर मेरा दिल पहले ही संवेदनशील हो चुका था।
एम.बी.बी.एस के बाद वो डि.जी.ओ. की डिगरी ले रही थी। एम.बी.बी.एस में भी वो फर्स्ट क्लास आयी थी। और मै, मै तो उस श्रेणी मे खड़ा भी नही हो पाया था।
चित्रा के जिंदगी में उसका जीवनसाथी बन कंधे से कंधा मिलाकर चलने की मेरी नींव ही कही गलत हो गई थी।
मेरे दिमाग ने ये पहले ही पूर्वानुमान (इंट्यूशन) लगा लिया था, मेरा और चित्रा का एकसाथ कोई भविष्य नही है।
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क्या सिद्धार्थ का जीवन एम.बी.ए. के बाद बदल जायेगा?
क्या सिद्धार्थ के लिए चित्रा एक परफेक्ट मैच थी?

सिद्धार्थ की बीमारी के बाद भी क्या वो एक खुशहाल जिंदगी जी पायेगा?
क्या भोलेनाथ ने सिद्धार्थ के लिए कुछ औऱ सोचकर रखा है?




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