ताश का आशियाना - भाग 9 Rajshree द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

ताश का आशियाना - भाग 9

उसे दिल आज भी नही भुला पाया।
चित्रा के जाते ही, सात दिन के अंदर मैंने बनारस छोड़ दिया।
अगर नहीं छोड़ता तो या फिर पागल हो जाता नहीं तो, आवारा आशिक।
मैं दोनों ही बनने की फिराक में नहीं था।
मैंने अपनी कंपनी में रेजिक्नेशन लेटर देकर अपने फंड में जो कुछ भी पैसे थे। उसे लेकर निकल गया, एक सफर पर।
"पता नहीं था कहां जाऊंगा?
पता नहीं था रास्ते कितने छोड़ आया हूं,
मंजिल तो काफी दूर थी,
हवा भी गुस्ताखी से भरी
हर निशान मिटाये जा रही थी,
वापस लौट जाने के।"
आखिरकार कहीं जगह हाथ में आया वह काम किए।
उसी जगह "शंकर त्रिपाठी" जो केरला में मेरे साथ सफर कर रहे थे, उन्होंने मेरी कला शैली को देख अपनी कंपनी बालाजी ट्रैवल्स में टूर गाइड का काम दे दिया।
वहीं से मेरा सफर शुरू हुआ।
मैं लोगों को उन जगहों की इतिहास नहीं बल्कि, उनके जीवन में उस जगह का क्या महत्व है यह भी बताता। जरूर कुछ लोगों को मै टूरगाइड कम और फिलोसोफर ज्यादा लगता मेरा काम मुझे पसंद था।
उसे पूरा ना होने की बैचनी नहीं बल्कि हर पल में जी रहा हूं, इस बात की खुशी थी, जो शायद इंजीनियरिंग लेकर या फिर कल जाकर मुझे प्रमोशन भी मिलता तब भी नहीं होती।
इसी बीच घूमने वाले एक फॉरेनर वयस्कर व्यक्ति ने जिनका नाम "फ्रेन्ज़ मार्विक" था। उन्होंने मुझे ट्रैवल ब्लॉग लिखने की सलाह दी।
मेरे लिए ब्लॉग शब्द मानो, अभी-अभी दिमाग में घुसा कीड़ा था।
उस व्यक्ति ने ब्लॉक के बारे में, मुझे जो कुछ भी जानकारी दी। उसके बावजूद में कुछ और जानने के लिए उत्सुक था। थोड़ी बहुत जानकारी निकालने पर मैंने ब्लॉक लिखना शुरु कर दिया।
बालाजी ट्रेवल्स में, में बहुत ही अच्छा खासा कमा लेता था
16 से 17000 मेरे जैसे अकेले इंसान के लिए काफी थे।
मैं उनकी कंपनी का चहेता टूरगाइड बन गया था।
इसलिए कभी-कबार मेरा मन ना होने पर ज्यादा पैसे या वहां की जगह पर रहने के लिए आरामदायक सुविधा इसकी लालच देकर मना लिया जाता था।
उसी बीच एक बिटा रीडर ने मुझे यह सुजाव दिया,
"अगर आप ब्लॉग में पिक्चर की जगह, वीडियो अपलोड करेंगे तो और भी ज्यादा देखने में मजा आएगा।"
अपनी सारी जमा पूंजी जमा कर मैंने तब एक कैमरा लिया।
काम मुश्किल था, पर नामुमकिन नहीं। धीरे-धीरे वीडियोस भी मेरे ब्लॉग में शामिल होने लगे।
उसी बीच में वीडियो को यूट्यूब में डालने की एडवाइस मुझे भी मिलने लगी।
मैं आज जो कुछ भी हूं, मैंने अपने बारे में कभी सोचा नही था।
बस मुझे काम करने में मजा आ रहा था, मेरा ट्रैवलिंग पैशन नहीं था, बस घूमना मेरी जरूरत बन गई थी।
मैं उस वक्त भी चित्रा को भूल नहीं पाया था क्योंकि उसकी कसक किसी ने अब तक भरी नहीं थी।
"जब तक उस व्यक्ति की जगह कोई दूसरा नहीं ले लेता, तब तक वह जगह उस व्यक्ति की ही बनकर रह जाती है।"
हमारे पड़ोसी शर्मा जब तक 15 साल वहा गुजारने के बाद एक दिन वहां से दिल्ली शिफ्ट हो गए, तब भी वह खाली घर शर्मा परिवार का ही था।
और आज जब कि उसमें एक फैमिली रहने आई है। तब भी वह घर शर्मोका ही है।
आज उसने "आई लव यू" कहा।
पर क्या शायद तब वो यह कहती तो तस्वीर कुछ उल्टी होती? क्या होता अगर?
आधे समय तो इंसान इसी सोच में गुजार देता है क्या होता अगर?
आज चित्रा के लिए मेरे मन में कोई गुस्सा नहीं है, पर पता नहीं एक कसक अभी भी है।
अगर एक बार फिर चित्रा सामने आयी तो मुझे संभालना मुश्किल हो जाएगा।
इसीलिए कभी-कभी खुद पर गुस्सा बढ़ता जाता है।
चित्रा खुश रहे, चित्रा की आंखों में कभी आंसू ना आए, यही मांगता रहता हूं भगवान से।
लेकिन कभी-कभी लगता है, उसके दुख का कारण मैं ही हूं।
काश.... काश अगर....
इंजीनियरिंग की जगह कभी बीटीटीएम ले लेता तो? आज मेरे पास यह काश नहीं होता?
जब मैं 18 साल का था, तब मैंने सोचा था,
"अगर मैं इंजीनियरिंग लेकर इंजीनियरिंग बनूंगा, तो मुझे मेरे जिंदगी में कभी रिग्रेशन का सामना नहीं करना पड़ेगा।"
लेकिन आज लगता है, अगर मैं तभी बीटीटीएम ले लेता, तो मेरे लिए यह काम एक पैसा कमाने का जरिया होता, ना की खुशी पाने की आजादी।

पहला प्यार इंसान कभी नहीं भुला पाता।
क्यों? क्यों किसी की याद से दिल को अजीब सुकून मिलता है? क्योकि वो हमसे दूर है, इसी चीज से दिल और छटपटाता है कि एक बार उसकी झलक दिख जाए, उससे बात हो पाए।
मैच्योरिटी लेवल पर पहला प्यार इमैच्योरिटी है, पर मरते दम तक उस इनमेच्योरिटी को रिग्रेशन बन कर पालने में एक अजीब सुकून मिलता है।
चाय की सुड़किया लगाते हुए अपनी साधु बनकर, फिलोसॉफी झाडते हुए यह कहना की- "पहला प्यार कभी पूरा होने के लिए नहीं होता। बस हो जाता है।"
"शायद पहला प्यार सिर्फ हो जाता है।" सिद्धार्थ बुदबुदाया।
"ठीक कहा, तुमने पहला प्यार हो जाता है।"
सिद्धार्थ अपने ख्यालों की नदियां पार कर एक पतली सी आवाज के साथ बाहर निकला।
लंबी कद काठी, आंखों पर कैट फ्रेम, सावला रंग,
ऊपर सफेद रंग की कुर्ती जिस पर सुंदर नक्षी काम और लाल कलर की चूड़ीदार सलवार पहने एक सुंदर युवती गंगा के आगे और सिद्धार्थ के ठीक पीछे खड़ी थी।
"क्या मैं यहां बैठ सकती हूं?" सिद्धार्थ ने कुछ जवाब नहीं दिया। लड़की तभीभी सिद्धार्थ के बाजू में बैठ गई।

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चाहे रास्ते कितने ही लंबे हो,
मंजिलो को छूना मतलब दूसरा जीवन।
कोशिशें तमाम पर ना मिले तो जिंदगी बोजर।
पर समय तो हर एक चाल भांप लेता है,
हर एक कहानी का दूसरा पहलू होता है।

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Rajshree

Rajshree मातृभारती सत्यापित 8 महीना पहले

S Nagpal

S Nagpal 11 महीना पहले

Ooo Jangra

Ooo Jangra 11 महीना पहले

Nice