ताश का आशियाना - भाग 8 Rajshree द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

ताश का आशियाना - भाग 8

चित्रा और शायद मेरी शायद कम ही बातें हुई।
उसी बीच में अपने ऑफिस कलीग्स के साथ में मसूरी घूमने गया।
ट्रेन से जब नीचे उतरे तब मुझे लगा जैसे मैं एक अलग जगह हूं, सारे विचार कहीं खो से गए थे।
पहाड़ों को हरियाली ने ऐसे गोद में लिया था मानो मां अपने बच्चे को हवा, पानी से बचाकर सुरक्षित रख रही हो।
वह भी अपनी मां से उतना ही लिपटा हुआ था मानो दोनों अगर बिछड़ गए तो शायद उनका अस्तित्व कहीं खो जाएगा।
"केंमटी फॉल" जब हम पहुंचे पहाड़ों की गोद से झरना बह रहा था। और नीचे लोग अपने परिवार के साथ उस का आनंद ले रहे थे।
तब लगा शायद कहीं उस भीड़ भाड़ शानो-शौकत की दुनिया में ऐसी एक चीज है जो हमें शायद बांधे रखती है, सुकून पहुंचाती है वह है भावनाएं।
भावनाओं से लड़कर और भूख से बचकर एक इंसान का जिंदा रहना मुश्किल है।
मैं मसूरी आकर ज्यादा ही फिलोसॉफिकल हो गया था।
उस दिन पहली बार नौकरी में मिलने वाले 8000 का मैंने अपने जीवन से मोल नहीं किया।
उस दिन पहली बार मुझे बिना थके भी नींद आ गई।
जबकि रोज मेरा सोने से काफी पहले वर्कआउट करता हूं, खाना खाता हूं और नहाने के बाद सो जाता हूं।
उस दिन शायद में पहली बार बिना नहाए सोया था क्योंकि वाटरफॉल में मेरे तन को मेरे मन को पहले ही भिगो दिया था।
पूरे 4 दिन मसूरी में रहे वहां के लोगों से भी मिले फोटो खिंचवाई
क्लाउड एंड में तो मैं कहीं ऐसे खो गया मानो मेरे विचार एक बादल बनकर मेरे सामने तैयार रहे हो और मैं उसे कहीं खोता जा रहा हूं।
उस दिन मानो मैं जिंदगी के मायने कितने गलत लिए बैठा था। कहीं जाना है, कहीं पहुंचना है पर वहां जाने पर क्या? क्या मैं खुश रह पाऊंगा?
जिस बादलों में यहां पहाड़ ढका है क्या यह बादल एक- एक कर हट जाने पर उन पहाड़ों का कोई अस्तित्व नहीं रहेगा।
क्या पता अगर पहाड़ वहा ना होते तो बादल भी वहा जमा नही हो पाते।
"इंसान की जरूरते होती है,जरूरतों के लिए इंसान नहीं।
कितने कम या ज्यादा होनी चाहिए यह इंसान खुद सोच सकता है, जरूरत है उस पर भारी क्यों हो भला?"

मेरी जिंदगी कहानियों में दिखाई गए किरदारों की तरह बदली ना हो, पर नजरिया जरूर बदल गया था।
8000 मेरे लिए काफी थे, हर एक पल में खुश रहना मेरे लिए काफी था।
मै खुश था, पापा खुश थे, माँ खुश थी, प्रकाश? प्रकाश भी खुश था।
मेरे ड्रिंक करने की आदत छूटी ना हो, पर पापा से झूठ बोलकर पीने की आदत छूट गई थी क्योंकि पापा भी मेरे साथ पीने लगे थे।
खडूस सुपरवाइजर तक लंच टाइम में कभी कबार मुझसे पूछ लिया करता था।
कहानी लगती है ना पर हर एक पल को, बड़ी बारीकी से जी रहा था पर सुबह उठकर क्या करता हु या रात सोने से पहले किसीके सपने देखता हूं यह बताकर पकाने का पाप नही करना चाहता।
कभी कभी दिमाग पहले ही सवालो के जवाब दे देता है, ज्यादा दिक्कत नही उठानी पड़ती। मेरे दिमाग ने भी
सवालों को एक श्रेणी में लाकर उसके जवाब दे दिए थे।
क्या चित्रा मेरे साथ खुश रह सकती है?
:- नहीं उसकी जिंदगी के मायने और तुम्हारे जिंदगी के मायने अलग है।
क्या चित्रा कभी मेरी दोस्त नहीं थी? दोस्त, दोस्ती थी पर दोस्ती में कुछ आगे ही बढ़ गए।
:- एक दोस्ती जैसे रिश्ते से तुम जिंदगी भर का साथ चाहते हो।
मैं उससे प्यार करूंगा तो भी ,दोस्ती हमारी प्यार की नींव है, यह कैसे भूल सकते हो?
:- प्यार एक लगाव से भी ज्यादा एक जिम्मेदारी होती है। तुम अपने दोस्तों को दूसरे दोस्तों के साथ शेयर करके खुश हो सकते हो और अगर वही दोस्त प्यार बन जाए तो?
साथ चलने की अपेक्षाएं, प्यार के बदले बहुत कम होती है दोस्ती से। इसलिए दोस्ती बिना किसी बंधन हमारे साथ चल देती है यही एक कारण है कि दोस्त हमारी वह बातें भी जानता है जो हमारा प्यार भी कभी जानता नहीं पाता।
यह सब बातें जानते हुए भी चल- विचल करता रहा मेरा मन।
"क्या पता अगर वो मुझसे अभीभी प्यार करती हो?"
"क्या पता आज के बाद सब बदल जाए?"
"क्या पता के माता-पिता उसपर दबाव डाल रहे हो कि वह मुझसे ज्यादा दोस्ती ना बढ़ाएं?"
क्या पता.... क्या पता.... बहुत सारे क्या पता थे मेरे पास पर जवाब नही,
क्योंकि अगर जवाब मिलते तो शायद मेरी 12 साल की उम्मीद मुझे मारने के लिए काफी थी।
कमरा अंधियारी में कहीं खो गया था। मां मुझे हमेशा डांटती ,बीमार पड़ जाएगा, अंधेरे में रहना सेहत के लिए ठीक नहीं है, क्या बच्चों जैसे चौक पाल रखे हैं।
पर हमेशा में उन्हें कुछ ना कुछ सुना देता और वो चुप हो जाती।
"जब रोते हुए एक दिन मेरे पास आएगा तो गले नहीं लगाऊंगी तुम्हें।"
"मैं आपके पास रोते हुए कभी नहीं आऊंगा।"
उनके गर्व को चकनाचूर कर दिया था मैने।
पर जब आयी तब लगा गर्व नहीं है उन्हें ,पर विश्वास था।
जो विश्वास शायद मुझे भी अपने प्यार पर नहीं था। चुकी चित्रा को 24 वे जन्मदिन को ताश का आशियाना देना है।
इस बात से ज्यादा मुझे वह ताश का आशियाना ना कहीं टूट ना जाए ,उसे कोई देख लेगा तो उसको नजर ना लग जाए, किसी कारण वश गिर ना जाये इस बात से दिल घबराता था।
इन 12 सालों में लग रहा था मानो चित्रा से ज्यादा, चित्रा से दूर जाने के डर से ज्यादा ताश का अचानक ही बिखर ना जाए इस बात का था।
इसमें जब चित्रा ने शायद अपने दिल की बात सामने रखी तो पता नहीं क्यों पर एक अजीब सी चुभन महसूस हुई दिल में कि ऐसा कैसे बिखर सकता है 2 साल जिस को हाथ भी नहीं लगाने दिया एक आवाज से ही बिगड़ गया।
आक्रोश,दर्द, घृणा फूट - फूट कर बाहर निकलना चाहते थे। पर जबान पर मानो दांत जड़ गए हो। कुछ भी नहीं फूटा उस वक्त बस बाहर से आती हुई धूप को देख रहा था।
कितनी मुक्त थी वो ऐसे कैसे एक अंधेरे कमरे में बिना इजाजत मांगे घुस गई थी।
काश हमारा मन भी किसी और के मन में बिना इजाजत मांगे झांक सकता,और शायद ऐसा कर पाता तो शायद चित्रा के मन में झांक कर जान लेता आखिर उस वक्त वह क्या महसूस कर रही होगी।
लेकिन अंत में मेरा दिमाग ही जीत गया चित्रा को मेरी जरूरत नहीं है।
"उस दिन सिर्फ खुश रहो।" इतना ही बोल पाया।
जो चित्रा मेरे कुछ बोलने का, उसे डांटने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी, उसे सिर्फ में एक शब्द दे पाया था।
वो भी शायद बहुत कुछ बताना चाहती थी, पर उसकी आंखों में देख कर यह पता लगा सकूं इसके लिए मेरे नमक के पानी से भरी आंखें और उसे खुल कर पूछ सकूं इसके लिए मेरा मुंह पहले ही भावनाओं से बंद हो चुके थे।
"दोस्ती के आशियाने को पिरोते- पिरोते प्यार के लालसा में बिखेर कर रख दिया था आशियाने को।
तब शायद लगा, प्यार ने दस्तक दी ना होती खिड़की पर और दोस्ती गले लगाता ही नहीं प्यार को।"
उस दिन में शांत बैठा रहा चित्रा के जाने के बाद माँ आयी।
उन्होंने बिना कुछ कहे सिर्फ हाथ रख दिया।"सब कुछ ठीक हो जाएगा।"
उन्होंने कहते ही शायद सब आंसुओं में कहीं बह गया, मानो अगर वह थोड़ी देर पहले चित्रा के सामने पिघल जाते तो चित्रा शायद रुक जाती।
शायद रुकती मगर मैं उसे कभी बोल ही नहीं पाया "सब कुछ ठीक हो जाएगा।" तब जाकर एहसास हुआ- चित्रा कभी बिस्तर नहीं अपना दिल बांटना चाहती थी।
प्यार के अलग मायनो से मैंने ही दुनिया सजा के रखी थी। वो तो हमेशा अपने पॉइंट ऑफ यू से क्लियर थी।


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