ताश का आशियाना - भाग 1 Rajshree द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

ताश का आशियाना - भाग 1

सिद्धार्थ शुक्ला 26 साल का नौजवान सरल भाषा में बताया जाए तो बेकार नौजवान।
इंजीनियरिंग के बाद एमबीए करके बिजनेस खोलना चाहते हैं जनाब!
बिजनेस के तो इतने आइडिया इनके पास है जितने की पिताश्री के सिर पर बाल नहीं है। थक चुके है बेचारे अभी तक, कब तक बेटे का बोझ उठायेंगे?
सिद्धार्थ को अपने नये आईडिया लोगों के सामने रखने का एक शौक और ताश का आशियाना बनाने का दुसरा,पिछले 12 साल से बना रहे हैं।
अपनी छोटी सी रूम में जगह ना होने के कारण उस आशियाने को जगह भी मिली तो खिड़की के पास पूरा कमरा अंधकार में कहीं गुम हो गया है। अभी अंधकार बढ़ गया है जुनून कम नहीं हुआ जिसमें एक पत्ता धीरे से बैठ जाता है बिना एक पत्ते को हिलाऐ।
"देखना यह तुम्हारी जिंदगी का सबसे बड़ा तोहफा होगा जो शायद ही किसने किसको दिया हो।"
सिद्धार्थ अपनी सोच पर गर्व करके हंस रहा था। चित्रा का 12 वे जन्मदिन पे सिद्धार्थ उसके लिए टेडी बेयर लेकर गया। टेडीबियर देखकर चित्रा ने नाक सिकुड़ा- "तुम भी टेडी बेयर लेकर आए!? I am not kid Sidharth".
"तो तुम्हें क्या गिफ्ट चाहिए मेरी गुड़िया?"- चित्रा के पिता सिद्धार्थ और चित्रा के बीच चल रहे बातचीत में मध्यस्थ होते हुए बोले। "मुझे.. मुझे.. अपने पिता के हाथों में ताश के पत्ते देख मुझे ताश का आशियाना चाहिए। मेरे 24 वें जन्मदिन पर वो भी हर एक दिन का उसमें हिसाब हो,एक पत्ता एक दिन।"
शिवनारायण जी खुद के ही बेटी के मासूमियत पर ठहाका मारकर हंस दिए, बाकी मेहमानों ने भी कुछ ऐसा ही किया। चित्रा का मुँह गुस्से से लाल-पीला हो गया।
वही आशियाना वो पिछले 12 साल से सिद्धार्थ बना रहा है। रोज एक पत्ता!
धड़धड़ आवाज से ख्यालो का आशियाना टूट गया। आवाज दरवाजे के बाहर से आ रही थी।
"रूम को झाड़ू लगाना है, दरवाजा खोल।"
"में कितनी बार आप को कह चुका हूं, मैं खुद झाड़ू लगा लूंगा।"
माँ एक लंबी सांस लेते हुए-" ऐसे अंधेरे में रहेगा तो, तबीयत बिगड़ जाएंगी। एक दिन फिर रोता हुए मेरे पास ही आएगा, तब देख लेना बिल्कुल गले नहीं लगाऊंगी तुम्हें।"
"मत लगाना, मैं कभी नहीं आऊंगा तुम्हारे पास।"
एक शब्द से चुभन तो महसूस हुई गंगादेवी को। पर बेटे के जुनून और उम्मीद में अपने आप हंसी खिल गई चेहरे पर।
"ठीक है बाद में लगा लेना।"
दिन ढल गया सुबह हो गयी।
आज भी अस्सी घाट गंगा मैया को नमन करने के बाद गंगा मैया कहीं दूर छोड़ गई उसे, पीछे सिर्फ अपनी छाप छोड़के जाती थी रोज।
आज भी सूरज उगते हुए सब बनारस को अपने गोदी में समा लिया था।
कुल्लड़ में चाय की सुडकिया लगाई जा रही थी, तो कहीं आत्मा-शांति के लिए दक्षिणा देकर पूजा करवाई जा रही थी। गंगा मैया की आरती भी तो रोज का ही रूटीन था।

अलग था तो बस सिद्धार्थ के जीवन में।
"हम हर समय हर मिनट एक नई जिंदगी जीते हैं बस हमारी नजर चूक जाती है। इसलिए कुछ ही दिन हमारे लिए यादगार हो पाते हैं।"
आज का दिन सिद्धार्थ के लिए खास था, चित्रा का 24 वां जन्मदिन था।
बस ताश के आशियाने में आज एक ही पत्त्ते के साथ चित्रा का सपना पूरा होने वाला था। आज वह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता था। सुबह जल्दी उठा, नहा धोकर सुबह गंगा मैया के दर्शन करने अस्सी घाट पर गया।
आरती थोड़ी देर पहले ही खत्म हुई थी।
सिद्धार्थ को भोलेनाथ से लेकर बनारस के सारे देवी-देवता एक ही दिन याद आते थे उसे, चित्रा के जन्मदिन पर।
गंगा में दो बार डुबकी लगाएं, भोलेनाथ से लेकर पंडितों के तक के दर्शन किए, अबीर का टीका लगाए घर लौटा।
हर साल चित्रा की खुशहाली की और समृद्धि की दुआ मांगता।
घर के आंगन में सिद्धार्थ की माँ कपड़े सुखा रही थी सिद्धार्थ को देखते ही- "बेटा घर पर चित्रा आयी है।"
दिल की धड़कन रूक जाना, फिर अचानक जोर जोर से धड़कना, मोमेंट फ्रिज होना यह सब हो सकता है? हो सकता है जब हम प्यार में हो।
सिद्धार्थ सीधे आते ही घर में तेजी से घुस गया।
चित्रा कुर्सी पर बैठकर चाय पी रही थी।
चित्रों को देखकर सिद्धार्थ का हाल- ए- बयां नहीं किया जा सकता था।
सिद्धार्थ ने सफेद धोती और ऊपर शरीर ढकने मात्र के लिए खादी का दुपट्टा लपेटा था।
इतने सालों में बिल्कुल नहीं बदली थी 12वीं के बाद प्रिपरेशन के लिए दिल्ली चली गई।
बीच में कभी कबार वो बनारस आती रहती पर आज उसे इतने सालों बाद अपने घर पर देख कर सिद्धार्थ को खुद की आंखों पर विश्वास होना कठिन था।
चित्र कभी सिद्धार्थ के घर नहीं आयी जब भी कभी वो मिले तो चित्रा के घर पर, गार्डन में, अस्सी घाट पर, आरती के समय या फिर कैफ़े में।
चित्रा इतने सालों में बिल्कुल नहीं बदली थी, बदल गए थे उसके रंग हैं बस कमर तक जाते बाल शॉर्ट हेयर में तब्दील हो गए थे, और दिल्ली के करिश्मे से घर से दूर रहकर ज्यादा गोरी और mature दिख रही थी चित्रा।
चित्रा एकटक सिद्धार्थ को देखे जा रही थी एक मुस्कान उसके चेहरे पर भी खिल गयी थी,डिंपल उसका प्रतीक था। सिद्धार्थ बिना वक्त गवाए अपने कमरे में घुसा चित्रा को अचरज में छोड़।
बाहर लौटा तो पीले कलर का कुर्ता और सफेद कलर का पायजामा पहना था। हाथ में रेशम का फीता था।
सिद्धार्थ चित्रा के करीब गया।इतना करीब जाने के बावजूद भी चित्रा बिल्कुल भी नही घबराई।
सिद्धार्थ ने उसे गले लगा लिया। मन एक दूसरे से मिल चुकी थे, मन की गंदगी एक आलिगंन के साथ ही धुल गई थी।इस पल का सिद्धार्थ को कब से इंतजार था। चित्रा ने भी बिना हिचकिचाते हुए सिद्धार्थ को गले लगा लिया।




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Ecosafe

Ecosafe 1 साल पहले