ताश का आशियाना - भाग 5 Rajshree द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

ताश का आशियाना - भाग 5

आज चित्रा ने सब खाली कर दिया जो भी गुबार था वो फट गया। उसका भी मन अब रेत की तरह हल्का होकर उडने लगा। “इसलिए तो उस दिन रोका नहीं तुम्हे?” एक निर्मोही पर दिल में काटे चुभोने वाली हँसी के साथ बोला।
उसदिन चित्रा की सच्चाई बताने पर बस सिद्धार्थ शांत एक पुतला बनकर बिना हिले डुले बैठा रहा।
उसने चित्रा को कुछ नहीं बोला, नाहीं चिल्लाया नाहीं उससे फालतू सवाल जवाब किए क्योंकि कमेंटमेंट उनके रिश्ते को लागू ही नहीं थे।
सिद्धार्थ ने आई लव यू बोल के और चित्रा ने चुप रह के पहले ही उस प्यार को एकतरफा कर दिया था।
पर सिद्धार्थ तो एक फालतू से शब्द ‘उम्मीद’ पर जी रहा था।
एकतरफा प्यार की यही तो खासियत होती है, जो करता है उसी का हक होता है उस पर उसके ही दिल की धड़कनें तेज होती है उसका ही दिल टूटता है।
सिध्दार्थ उस दिन “खुश रहो” बस इतना ही कह पाया। दरवाजा खुलते ही चित्रा माँ से आंखें नहीं मिला और बिना कुछ बोले एक कसक के साथ वहाँ से चली गयी।

"एक दिन रोते हुए मेरे पास ही आएगा तब मैं गले नहीं लगाऊंगी?" मत लगाना मैं नहीं आऊंगा तुम्हारे पास और माँ आई। चित्रा के जाते ही वो बिना कुछ बोले चुपचाप बस अपने बेटे के पास बैठी रही जैसे वो ताश के बिखरे हुए पत्तों से अपने बेटे का हाल बटोरने की कोशीश कर रही थी। कुछ नहीं बोला उन्होंने? बस अपने बेटे के हाथों पर हाथ रख उसे कस के पकड़ "तुम अकेले नहीं हो?” शायद इसी भावना को सेंस ऑफ सेक्युरिटी कहते होंगे।
सिद्धार्थ अपनी माँ के गले लग उस दिन फुट फुट के रोया।
दो घंटों में 12 साल का ख्वाब धूल गया। गला बैठ गया दो दिन में सिद्धार्थ ने निवाला तक मुँह में नही डाला।
सात दिन बाद वो बनारस छोड़कर चला गया। उस दिन उसने चित्रा को रोका नहीं, जो खुद को ही नहीं संभाल सकता वो चित्रा को कैसे संभाल पाता? इसी एक नासूर के साथ वो कही चला गया।
सिद्धार्थ चित्रा के शादी पर भी नही गया। जाता भी कैसे बनारस पहले ही छोड़ दिया था। सिद्धार्थ फिलहाल अस्सी घाट पर बैठा है।
अगर सिद्धार्थ कभी चित्रा की कही गई बचकानी ख्वाहिश पूरा ही नहीं करता तो? सिद्धार्थ को मौका न देकर चित्रा ने गलत किया था? सिद्धार्थ प्यार में इतना पागल था की जो उसे अपनी जिम्मेदारी कोई पहचान नहीं थी? चित्रा का शेखर से शादी करने का फैसला सही था? सिद्धार्थ ने आई लव यू में कुछ ना सुनने के बावजूद भी यह सब क्यों करता रहा? इसका जवाब तो सिर्फ सिद्धार्थ दे सकता है। अगर यह सवाल सिद्धार्थ से पूछे जाये तो?
इसका जवाब मेरे जैसे एक थर्ड पार्टी के लिए थोड़ा मुश्किल दिखाई देता है।

इसका जवाब तो सिद्धार्थ की जुबानी ही मिल पायेगा।
पाँच साल बीत गए, चित्रा की यादों में। जब ग्यारह साल का था, तब चित्रा को पहली बार देखा था।
उसके पिता बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी मैं इंग्लिश प्रोफेसर थे। उनका मुंबई से बनारस तबादला हुआ था। पहली बार प्यार, धड़कन यह शब्द मायने नहीं रखते थे मेरे लिए। मैं एक बैकबेंचर, पढ़ाकू लड़का था। मेरे पिता एक कंपनी में शॉर्टहैंड एंड टाइपिंग का काम करते थे मेरे दादाजी टाइफाइड के चलते बहुत पहले ही चल बसे थे इस कारण मेरे पिता को कभी अच्छी शिक्षा लेने का मौका ही नहीं मिला।
कुछ काम मिल सके इसलिए उन्होंने टाइपिंग और शॉर्टहैंड सिख लिया।
वो हमेशा से चाहते थे कि मैं अच्छा पढ़ लिखकर उनका नाम रोशन करूँ।
मेरी माँ भी बालवाड़ी में छोटे बच्चो को पढ़ाती थी पर तभी भी बाकी बच्चों के चलते मैं खासा कूल और स्मार्ट नहीं दिख पाता था। मुझे हर साल स्कूल की तरफ से स्कॉलरशिप और यूनिफॉर्म मिलता। खासा सामने किसी से बात नहीं करता या किसी से बात नहीं करूँगा यह सोच लेकर लोग यहाँ जीते थे।
लेकिन कभी-कभी लगता उन्हे मुझसे बात करने में हिचकिचाहट महसूस होती थी। बहुत बार कोशीश की मैंने उनकी पास जाकर बात करूँ दोस्त बनाऊ कुछ नहीं हुआ उल्टा सिर्फ मेरी ईमानदारी का फायदा उठाया गया। एक बार जब पकड़ा गया तो होश आया कि मैं कितना गलत कर रहा था, मैंने दोस्त बनाना फिर छोड़ दिया।
चित्रा स्कूल में दाखिल होने के बाद मुझे खासा फर्क नहीं पड़ा, पढ़ता भी क्यों? लड़की जो थी।
लेकिन जब एक दिन उसने नोट्स के लिए मदद मांगी तब लगा सिर्फ मदद के लिए मेरे पास टीचर ने उसे भेजा होगा लेकिन नोट्स मिलने के बाद भी वह मुझसे बात करती रही। कभी यह नहीं लगा हम दोनों अलग है उसमें कोई छलावा नहीं दिखाई दिया। मुझे लगा जैसे उसके आचार-विचार मुझसे काफी मिलते-जुलते हो।
चित्रा मुझसे रोज बिना थके बातें करती थी। इतनी बाते वो लाती कहा से थी!?
मैं बस सुनता और जवाब में कुछ बोल देता। चित्रा का सहवास मुझे कभी नहीं खटका क्योंकि तब सिर्फ यह पता था “दोस्त,दोस्त हैं।“
“लड़का लड़की कभी एक दोस्त नहीं बन सकते।" यह विचारधारा शायद मेरे लिए तब कोई मायने नहीं रखती थी।
और ऐसा भी नही था कि चित्रा के कोई दोस्त नही थे।

सिद्धार्थ की कहानी आगे जारी है...
और मेरा भी तो परिचय बाकी है, थोड़ा धीरज रखिये कहानी में। कहानी भले ही छोटी हो पर अंत तक सारे जवाब मिल जायेंगे।
"क्योकि कभी- कभी सवालो में ही जवाब छुपे होते है।"



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S Nagpal

S Nagpal 11 महीना पहले