कैसा ये इश्क़ है.... - (भाग 20) Apoorva Singh द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

कैसा ये इश्क़ है.... - (भाग 20)

राधिका अर्पिता की आवाज सुन लेती है और मुड़ कर पीछे देखती है तो प्रशांत जी को पाती है जिसे देख वो अर्पिता से मुस्कुराते हुए कहती है जी वो यहाँ मीटिंग के लिये आये है।अब इनकी मीटींग इन्ही की तरह निराली ही होती है।

राधिका की बात सुन कर अर्पिता मुस्कुरा भर देती है।राधिका का फोन रिंग होता है तो वो अभी आने का कह वहाँ से उठ कर चली जाती है।राधिका के जाने के बाद श्रुति अर्पिता से कहती है ये हमेशा ऐसे ही व्यस्त रहती हैं हर पांच सात मिनट मे इनका फोन बजता ही रहता है।कभी प्रेम भाई का होता है तो कभी घर से होता है। और जिस दिन छुट्टी पर हो तो ऑफिस से आता ही रहता है।बैंक मे मैंनेजर के पद पर नियुक्त है मेरी सबसे प्यारी भाभी।

ये तो बहुत अच्छी बात है।और तुम्हारे प्रेम भाई क्या करते हैं? अर्पिता ने पूछा।

प्रेम भाई अब एक कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर है।कुछ ही महीनो पहले ही तो उनकी जॉब लगी है।श्रुति ने मुस्कुराते हुए कहा।

जिसे देख अर्पिता कहती है लगता है तुम्हारे घर में सब की अलग अलग चॉइस है।

हाँ ये बात तो सौ टका सही कही तुमने। परम भाई जिनसे तुम्हारी कजिन के विवाह की बातचीत चल रही है वो मोबाइल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में विशेषज्ञ है।यानि एक अच्छी पोस्ट पर है। श्रुति की बात सुन कर अर्पिता चौंक जाती है और एकदम हड़बड़ा कर कहती है क्या कहा अभी तुमने श्रुति.. जरा दोबारा से कहना।

श्रुती – अप्पू मैने कहा कि परम भाई जिन की शादी तुम्हारी कजिन से होने वाली है वो एक मोबाइल सॉफ्टवेयर के ज्ञाता है। श्रुति कि बात सुन अर्पिता हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहती है। तुम सच कह रही हो न हमारी किरण की शादी तुम्हारे परम भाई के साथ फिक्स होने वाली है।बोलो श्रुति..।

अर्पिता एक ही बार में श्रुति से कह जाती है।उसकी आंखो में बैचेनी देख श्रुति उससे कहती है क्या बात है अप्पू पूछ तो ऐसे रही हो जैसे अंजान थी तुम इस बात से।अरे मै भला काहे झूठ बोलने लगी।अरे ये शॉपिंग तो एक बहाना है इन दोनो को मिलाने के लिये।कल परम भाई काम की वजह से तुम्हारे घर पहुंच नही पाये तो सबको लेकर प्रशांत भाई को आना पड़ा।अब सारी बातचीत फाइनल हो गयी है तो मिलने मिलाने में क्या हर्ज है।खैर मै भी कहाँ बाते लेकर बैठ गयी तुम्हे तो सब पता ही होगा न्।

ओह गॉड मतलब हमे प्रशांत जी और किरण के रिश्ते को लेकर गलत फहमी थी।मतलब किरण और प्रशांत जी की शादी नही हो रही है।थैंक गॉड अर्पिता मन ही मन खुश होते हुए कहती है।उसके मन मे तो इस समय लड्डू फूट रहे है।और ये खबर उसके लिये किसी सरप्राइज से कम नही होती है।वो अपनी ही खुशी मे सरोबार होती है सो श्रुति की आगे की बात पर ध्यान ही नही देती है।

उधर किरण और परम दोनो ही टेबल पर बैठे होते हैं इस इंतजार में कि वो शुरूआत करे तब कुछ बात हो।इसी में दोनो खामोश हो जाते हैं।जब कुछ समय तक कोई कुछ नही बोलता है तो किरण अपनी नजरे उपर कर कुछ कहने को होती है लेकिन सामने परम को देख सिटपिटा कर चुप हो जाती है।और खुद से कहती है क्या सच में ये वही है...? या मुझे ही कोई वहम हो रहा है।इन्हे तो मैंने मॉल में देखा भी था वहाँ प्रशांत भी थे लेकिन वो पहले ही चले गये थे और इन्ही को लेकर मैंने कहा था कि काश मै उस समय इनकी बान्हो में गिरी होती... तो क्या ये वो ही है...। हाँ वही तो है अब जब हमें यहाँ लाकर मिलने के लिये बैठा दिया गया है तो निश्चित रूप से वही होगे। अब ये तो कुछ कहने से रहे उस दिन भी तो ऐसे ही चले गये अब मै ही शुरू करती हूँ

अब अपनी किरण ठहरी स्ट्रेट फोर्वर्ड सीधी सादी बात कहती है सो वो परम से कहती है, “क्या यहाँ कोई साइलेंट कम्पटीशन रहा है जो कोई कुछ कह ही नही रहा है”।अरे हम यहाँ मुलाकातके लिये आये हैं थोड़ी बातचीत हो जाये इसी उम्मीद से यहाँ बैठे है लेकिन लगता है कि किसी को अपने मोबाइल से ही फुरसत नही है।

अब पहली मुलाकात में इतनी साफगोई से भला कौन हैरान नही होगा सो हमारे परम के हाथ से मोबाइल गिरते गिरते बचता है। और वो किरण से कहता है क्या बात है मुझे लगा आप को चुप रहना पसंद है।इसीलिये मै भी चुप रहा।

अच्छा और आपको ऐसा लगा काहे जरा हमें भी तो कारण पता चले।किरण अपने दोनो पैर कुर्सी पर समेटते हुए कहती है।साथ ही साथ अपने दोनो हाथो को भी फोल्ड कर टेबल पर रख लेती है।

उसे ऐसे देख परम मन ही मन कहता है इनके हाव भाव से तो कहीं से भी नही लग रहा है कि ये चुप रहने वालो में से है।बेटा परम तेरी तो सॉलिड वाली लगने वाली है।

परम को खोया हुआ देख किरण कहती है अरे अब आप ही चुप हो गये मैंने ऐसा क्या पूछ लिया कि आपकी बोलती ही बंद हो गयी।

वो मैंने सुना है कि लड़किया बहुत बोलती है इतना बोलती है कि एक बार को टेप रिकॉर्डर की रिकॉर्डिंग पूरी बज कर खत्म हो सकती है लेकिन उनकी जबान नही थकती।परम ने भी किरण के अंदाज मे कहा। अब हमारे परम भी तो कम नही है न सो उन्होने भी स्पष्ट कह दिया।

अच्छा फिर तो बड़ी गलतफहमी में है आप।वो क्या है न हम लड़कियो से ज्यादा तो आप लड़के बातूनी होते हैं। वो क्या कहते हैं शेर पर सवा शेर टाइप्।किरण ने कहा।जिसे सुन कर परम जोश मे आ जाते हैं और कहता है अछा तो क्या चाहती है आप कि लड़के चुप रहे जिससे कि तुम लड़किया अपनी बक बक से उन्हे टॉर्चर करती रहे।हाँ ये बात तो सही है और मै आपकी इस बात से सहमत हूँ कि हम लड‌के तुम लड़कियो से शेर पर सवा शेर के जैसे हैं। परम ने मुस्कुराते हुए कहा और चुप हो गया।किरण अपनी ही कही हुई बात मे उलझ कर चुप हो गयी।फिर कहती है अरे अब क्या बातो मे उल्झा कर ही सारी एनर्जी खत्म करा दोगे किरण ने कहा तो परम उसकी बात समझ कहता है सॉरी मै अभी कॉफी मंगवाता हूँ।अगैन सॉरी आप क्या लेंगी वो बता दीजिये मै अभी ऑर्डर कर देता हूँ।

किरण ‌- जो आप का मन हो वो मंगा लीजिये।

परम – ओके फिर मै दो कैपेचीनो मंगवाता हूँ।कह परम दो कैपेचीनो का ओर्डर कर देता है।

तब तक राधिका वापस आ जाती है और वो श्रुति और अर्पिता से कहती है, “ओह हो हम भी न बातो में भूल ही गये कि हम लोग यहाँ आये किस काम से है”।चलो हम लोग चलकर शॉपिंग कर लेते है।तुम लोग चलो आगे हम किरण को लेकर आते है।

ओके भाभी श्रुति कहती है।राधिका वहाँ से उठकर चली जाती है और किरण के पास जाकर कहती है किरण अब हम लोग शॉपिंग के लिये निकलते हैं।काफी समय हो गया है हम ज्यादा देर नही रुक सकते हैं।

किरण हाँ में गरद्न हिलाकर वहाँ से उठ जाती है।और राधिका के साथ चल देती है।

उसे ऐसे इस तरह चुपचाप जाता हुआ देख परम सोचता है ये अब तो ऐसे चुप हो गयी जैसे इनसे कम कोई बोलता ही नही हो।जो भी हो लेकिन ठीक ठाक है इनके साथ लाइफ इतनी बोरिंग नही लगेगी।

राधू और किरण दोनो ही वहाँ से अर्पिता तथा श्रुति के पास पहुंचती है और उनसे कहती है सॉरी वो क्या है हमें किरण के साथ बाहरजाकर शॉपिंग करनी है आप लोग मॉल में से कुछ लेनाचाहे तो देख लीजिये जब हमारी शॉपिंग हो जायेगी तब हम कॉल कर आपको बुला लेंगे।

तब आप हमें नीचे मॉल के दरवाजे के पास ही मिलना।

ओके भाभी श्रुति ने राधिका से कहा।

किरण चले आपको कोई परेशानी तो नही।राधिका ने पूछा।तो किरण ने “ना” कह राधिका की बात का जवाब दिया।

राधिका किरण वहाँ से ज्वैलर्स के पास निकल जाती है और श्रुति अर्पिता का हाथ पकड़ वापस से कैंटीन के अंदर ले जाती है।एवम एक टेबल पर बैठ्कर कहती है थैंक यू राधू भाभी मेरा शॉपिंग से पहले पिज्जा खाने का मन था और हर बार की तरह आपने मुझे जान बूझ कर स्पेस दिया।लव यू।कह श्रुति एक चीज पिज्जा का ऑर्डर देती है।

अर्पिता श्रुति को देख मुस्कुराती है और चारो ओर अपनी नजरे दौड़ा देती है।दौड़ा क्या चोरी चोरी प्रशांत जी को ढूंढ रही है वो बैठे कहाँ है।तभी उसकी नजर एक तरफ बैठे हुए प्रशांत जी पर पड़ जाती है जिन्हे देख उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती है।

वहीं प्रशांत जी की मीटिंग खत्म हो जाती है सो वो वहाँ से उस व्यक्ति के साथ बाहर निकल जाते हैं।ये देख अर्पिता कहती है लो ये भी गये।चल अर्पिता अब तुम न अपना ध्यान एकत्रित कर लो।काहे कि वो यहाँ से जा चुके हैं।लेकिन उसकी बात खत्म होने से पहले ही प्रशांत जी उसके सामने बैठे होते हैं जिन्हे देख वो बुदबुदाती है लो हो गया हमारा सत्यानाश अब तो हमें हर जगह वही दिखने लगे हैं अभी तो वो बाहर गये थे और अब यहाँ हमारे सामने बैठे हैं।हमें खुद की भावनाओ पर नियंत्रण रखना होगा।न जाने क्या समझे हमारे बारे में।

हे प्रशांत भाई आप यहाँ।आपकी मीटिंग़ खत्म हो गयी। श्रुति ने मुस्कुराते हुए पूछा।

हाँ जी॥खत्म ओ गयी कह प्रशांत ने अपना हाथ टेबल पर रखा।उसके हाथ में अभी तक रुमाल बंधा हुआ था।ये देख अर्पिता ने पूछा, आपने अभी तक कोई मेडिसिन नही लगाई।

वैसे ही बांधे हुए हो। ... न न अब ठीक है कल तक ठीक हो जायेगा इंजेक्शन ले लिया है मैंने।प्रशांत ने कहा और फिर से खामोश हो गये।तब तक श्रुति का ऑर्डर आ जाता है।

वहीं प्रशांत जी मेनू कार्ड देख एक अदरक वाली चाय और एक कैपोचिनो का ऑर्डर करते हैं।

जिसे देख अर्पिता मन ही मन सोचती है तो ये चाय के तलब गार मालूम पड़ते हैं।इन तीनो में बस श्रुति ही इन दोनो के बीच की खामोशी को तोड़ती है।बस बीच बीच में अर्पिता और प्रशांत जी एक दुसरे की ओर देखते है नजर मिलने पर नजर चुरा कर इधर उधर ताकने लगते हैं।बड़ा ही अनोखा रिश्ता होता है दो दिलो का।जो शुरू आंखो से होता है और खत्म आंखो के जरिये दिल में उतरने से होता है।वही हमारे अर्पिता और प्रशांत जी के साथ हो रहा है।दोनो के बीच शब्दो से ज्यादा खामोशिया उनका साथ दे रही है।बहुत कम रिश्तो में ऐसा होता है जहाँ खामोशी एक दूसरे की जुबान बन जाती है जिससे रिश्ते में कोई कोम्प्लिकेशन नही बल्कि मजबूती आती है।

कुछ ही देर में चाय और कैपिचीनो दोनो आ जाते है तो प्रशांतजी कॉफी का मग अर्पिता की ओर बढा देते हैं।और अपने लिये मंगवाई गयी चाय की चुस्की लेने लगते हैं।प्रशांत जी की इस बात पर अर्पिता हैरान हो जाती है और मन ही मन सोचती है हमें एक स्ट्रॉन्ग झाग वाली कॉफी पसंद है ये इन्हे कैसे पता जबकि हमारी तो अभी तक हाय हेल्लो भी ढंग से नही हुई।उसे सोच में डूबा देख प्रशांत जी उससे धीरे से कहते हैं ये जरूरी तो नही किसी के मन की बात तभी जानो जब वो आपको बताये कभी कभी खामोशिया भी सब कुछ बता देती हैं।और इसी ने तुम्हारे घर पर मुझे चुपके से बताया...।

प्रशांत जी की बात सुन अर्पिता बस हल्का सा मुस्कुरा देती है।और कॉफी मग उठा कर कॉफी पीने लगती है।और प्रशांत जी अपनी चाय्।

श्रुति ‌- अप्पू! मुझे शॉपिंग करनी है तो तुम मेरे साथ चलना। बड़े दिनो बाद मौका लगा है भाइ की जेब ढीली कराने का।श्रुति ने प्रशांत जी की ओर देखते हुए कहा।

श्रुति काहे नाहक अपने भाई को दोष दे रही हो जहाँ तक हमें लगता है इन्होने कभी तुमसे किसी बात के लिये न नही कहा होगा।अर्पिता ने कहा जिसे सुन श्रुति अपनी आंखे बड़ी कर उसे देखने लगती है।और प्रशांत जी चाय पीते हुए उसकी इस बात पर हौले से मुस्कुरा देते हैं।

लगता है कुछ ज्यादा ही समझदार हो यार तुम।बात तो सही कही तुमने मेरे लिये कभी न नही कहते भाई।श्रुति कहती है और खड़ी हो जाती है।

ठीक है श्रुति तुम लोग चलो मै परम के साथ के आता हूँ।प्रशांत जी ने कहा और एक बार अर्पिता की ओर देखा।अर्पिता भी उठ्कर खड़ी हो जाती है श्रुति के साथ चली जाती है।लेकिन जाते हुए चोरी चोरी मुड़ कर देखती है...और वहाँ से चली जाती है।

‘लवो से वो जो कह न सकी उसकी खामोशी वो सब कह गयी’। प्रशांत जी ने मुस्कुराते हुए कहा और वो उठकर परम के पास चला जाता है।

क्रमश.....


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