आस्था का ताप और अपने समय से संवाद कृष्ण विहारी लाल पांडेय द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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आस्था का ताप और अपने समय से संवाद

आस्था का ताप और अपने समय से संवाद

ब्लैक आउट-वल्लभ सिद्धार्थ की कहानियाँ

‘‘महापुरूषों की वापसी’’, ’’नित्य प्रलय’’ ‘‘व्यवस्था’’ ’’ब्लैक आउट’’ जैसी चर्चित कहानियाँ और ‘कठघरे’ जैसे संश्लिष्ट संवेदना के उपन्यास के रचनाकार के रूप में वल्लभ सिद्धार्थ का नाम प्रमुख और वीर वरिश्ठ कथाकारों में आता है, हालांकि उनके साहित्य का उतना और वैसा विमर्श कुछ और कारणों से नहीं हो सका, जैसा हिन्दी कथा साहित्य के लिये आवश्यक था। वल्लभ, लेखन में भी आस्था को उतना ही जरूरी मानते हैं जितना जीवन के लिये। लेखनेतर गतिविधियों में बेहद संकोची और निरूद्योगी वल्लभ रचना में लेखक का इतना गहरा निवेश या निक्षेप मानते हैं कि वह उस प्रक्रिया में स्वयं को मिटा देता है।

वल्लभ सिद्धार्थ ने अपने मित्र कथाकार गोविन्द मिश्र को एक पत्र में लिखा है ’’मुझे लगता है, लिखने के लिये जरूरी होता है कि संसार, मनुष्य और पूरी गहराई के साथ और इन तमाम एब्सर्ड सी दिखने वाली स्थितियों के बीच अपने होने के अर्थ को समझा जाये। डोंट शन सफरिंग.... इस बात से आश्वस्त हो चुका हूं कि रचना की शक्ति मेरी समझ में यही होती है कि वह तुम्हें कितना सस्टेनेंस देती है, कितना मुक्त करती है और कितना तुम्हें तुम्हारे अर्थ की तलाश में और बढ़ाती है।’’

दार्शनिक से लगने वाले इस कथन में वल्लभ सिद्धार्थ के रचनात्मक सरोकारों और उनकी वैचारिक निष्पत्तियों को समझने के कई सूत्र हैं। उनके और गोविन्द मिश्र के बीच हुए पत्र संवाद (संवाद अनायास) में आत्मीयता के साथ ही साहित्य और वैचारिकता के अनेक मुद्दों पर विमर्श हुआ है। वल्लभ उन कुछ लेखकों में से है जिन्होंने विदेशी साहित्य की महत्त्वपूर्ण कृतियों का विपुलता में ही नहीं गहराई में अध्ययन किया है। इसके द्वारा उन्होंने अपनी आग्रहशीलता तथा पूरी प्रतीति के साथ अपना एक ’’थॉट सिस्टम’’ बनाया है। सिस्टम ही नहीं बल्कि विचार का एक पूरा पाठ्यक्रम जो उनके रचनात्मक और कथेतर गद्य में डग-डग पर देखा जा सकता है। विषय के रूप में दर्शनशास्त्र से लगाव ने तो उन्हें अन्तरावलोकन और सोचने की प्रवृत्ति दी ही है।

इस विशद अध्ययन और पूरी संपृक्ति के साथ उस पर चिन्तन से वल्लभ के पास विचार सम्पदा तो बढ़ी है, उससे उन्हें पूर्णता की कामना करती रचनात्मक चाह और जीवन दृष्टि भी मिली है पर इससे उनका परिमाण प्रभावित हुआ है, और उनकी तरह के बेहद तराशे गये लेखन से पाठक वंचित हुए हैं। लगभग 100 कहानियां, मुश्किल से एक हाथ की उॅगलियों के बराबर कहानी संग्रह और एक उपन्यास ’’कठघरे’’ रचनात्मक लेखन के नाम पर चार दशकों से अधिक के समय में इतना ही। वल्लभ रचनाशीलता के आकार और आयतन में विपुल नहीं हैं पर आयतन के लेखक वह हैं भी नहीं। वह घनत्व और संश्लिष्टता के कथाकार है। सत्त्व की तलाश में वह लम्बी यात्रा के अनुभवों से गुजरते तो हैं पर योग का रूपक लेकर कहें तो वह आरम्भिक स्थितियों में नहीं रमते। वह घटनाओं से अधिक उनके ‘‘फॉल आउट’’ के लेखक हैं। उनकी अनुभूतियों का संधनन पाठक के आस्वाद की प्रक्रिया में इतना फैलता जाता है कि लगता है कि हम एक कहानीं नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि अपने समय का काफी बड़ा दस्तावेज हमारे हाथ लग गया। महसूस करने पर हमें लगता है कि हम दिक् और काल के बहुत बड़े आयामों के साथ है, सिर्फ उतने ही नहीं जितने हम हैं।

लेखन के प्रति इतनी गहरी संपृक्ति के कारण भी और शायद पूर्णता की चाह के कारण भी वल्लभ सिद्धार्थ अपने लिखे को बार-बार जाँचते रहते हैं, उसके कई प्रारूप बनाते हैं। तब कहीं उसे वह सामने लाते हैं। गोविन्द मिश्र ने ’’संवाद अनायास’’ में वल्लभ की रचना प्रक्रिया पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि वल्लभ की रचना-प्रक्रिया थोड़ी विचित्र लगती है, वे कहते हैं कि इस कहानी (ब्लैक आउट) को लिखने से पहले तेरह चौदह प्रश्न बनाये थे जिनके समाधान तलाशे थे इस कहानी में। ’’कठघरे’’ उपन्यास पर उन्होंने दस वर्ष से अधिक तक काम किया है। वह मिश्र जी से अपना विचार बांटते हैं कि ‘‘जब तक तुम्हें न लगे कि अपने को ठीक से व्यक्त कर पाये हो इस पर परिश्रम करते रहना चाहिये।’’ ’’कठघरे’’ उपन्यास आकार में भले ही बड़ा न हो लेकिन प्रकार में वह ऐसा है कि उसकी संवेदना अन्तरिक्ष की तरह व्यापक है।

कला और जीवन को एक दूसरे का पूरक मानते हुए वल्लभ जिस गंभीरता के साथ अपने होने का अर्थ खोजते हैं, उसी तरह वह रचना की सार्थकता में भी लगते हैं। रचना और जिन्दगी दोनों ही मुझे नाखूनों के सहारे एक चिकनी काली चट्टान पर चढ़ने जैसा लगता है। लिखना वल्लभ के लिये मुक्ति की तलाश में एक टॉरचर का वरण है, अपने को समझने, विश्लेषित करने और रिकंस्ट्रक्ट करने का (रिसरैक्शन) वह दारूण यंत्रणा के क्षणों में आदमी को सस्टेन करना, हताश न होने देना, दुःख के सकारात्मक आयाम का दर्शन करने की क्षमता देना ही कला का सबसे बड़ा धर्म मानते हैं।

यह वल्लभ का किसी अवसर पर दिया गया चलताऊ वक्तव्य होता तो उसकी अर्थवत्ता या उसमें लेखक की आस्था संदिग्ध हो सकती थी पर लेखन की पूरी जिम्मेवारी लेते हुए वह उसे अधिक से अधिक सार्थक बनाने की कोशिश करते हैं।

वल्लभ सिद्धार्थ के पत्र भी सिर्फ व्यक्तिगत राजी खुशी या पास-पड़ौस की जानकारियों के तथ्य नहीं हैं, बल्कि वे अपने मित्रों और लेखकों से आत्मीयता के आलोक में साहित्य और जीवन के कई संदर्भांे पर गंभीर संवाद हैं। ‘‘संवाद अनायास’’ में गोविन्द मिश्र के साथ हुआ पत्राचार तो इसका उदाहरण है ही, बृजेश कृष्ण को लिखे या कुछ और लोगों को लिखे व्यक्तिगत रागात्मकता के पत्रों में भी विविध और बड़े संदर्भ मिलते हैं।

अनुवाद कार्य वल्लभ के लेखन का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है। वह विदेशी लेखकों की कुछ महत्त्वपूर्ण कृतियों से इतने अभिभूत हैं कि उनकी चिरन्तनता के सामने वह अपने लेखन को स्थगित कर देते हैं और एस्कीलस, सोफोक्लीज, यूरीपाइडस, सार्त्र, गोगोल, काफ्का, पुश्किन, सोल्जेनित्सिन, दांॅस्तोस्की, इब्सन आदि की श्रेष्ठ कृतियों का अनुवाद करने में लगे रहते हैं। वह अनुवाद में भी मौलिक लेखन की आसक्ति के साथ जुड़ते हैं। इसलिये उनके अनुवाद विदेशी भाषा और अनुभूति की अजनबीयत तोड़कर कृति को देशज बनाने की पुनर्रचना करते हैं।

वल्लभ सिद्धार्थ के कथा साहित्य की संवेदना जिन कुछ प्रभावों अथवा तत्त्वों से रची बनी है, उनमें उनकी बौद्धिकता है, उनका समय और उसके दबाव, तनाव भी हैं और उनकी अपनी व्यक्तिगत स्थितियाँ भी हैं। उनके लेखन में व्यक्त आत्मा, ईश्वर, आस्था, पवित्रता जैसी धारणाओं के कारण पाठक प्रायः इस पूर्वाग्रह में पड़ जाता है कि वल्लभ उस आत्मवादी सोच से प्रतिश्रुत हैं जिसमें बाहर की दुनिया और समकालीनता की प्रत्यक्षता नहीं है। दरअसल सच यह नहीं है।

गोविन्द मिश्र ने लिखा है कि मूल्य नैतिकता आत्मिकता ईश्वर... की बातें वल्लभ के यहाँ बार-बार आती हैं। यह भी है कि इनके आसपास घूमने वाला वल्लभ का सच सोल्जेेनित्सिन के जीवन, लेखन और विचार से बहुत प्रभावित हुआ है। वल्लभ स्वयं स्वीकार करते हैं कि उनकी कहानियों में ’’फेथ’’ और ‘‘ईश्वर’’ बार-बार आते हैं। ’’ब्लैक आउट’’ कहानी में जीनियस’’ में खाकी कद्दावर का प्रतिकार करने का जो बल आ जाता है उसे लेखक ने ईश्वर के ’’फेथ’’ से उत्पन्न माना है। जीनियस महसूस करता है कि हमें एक ईश्वर की जरूरत है। एक ईश्वर विहीन संसार भयावह लगता है। दुःख वल्लभ के लिये दुनिया में एकमात्र अन्तिम चीज है। ‘‘दुःख सबको माँजता है’’ की तरह वह भी मानते हैं कि यंत्रणा को बिना ’’रेजिस्ट’’ किये आस्था और दृढ़ता से सहन करना चाहिए। वह व्यक्ति को शोेधती है और परिष्कृत करती है। सोल्जेनित्सिन को आत्मसात करते हुए वह उसकी इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि व्यक्ति को विपदाएँ और तकलीफें चाहिए। वे अन्तर्जीवन को गहरा करती हैं और आत्मिक उत्थान का कारण बनती हैं। दुःख सहते हुए आस्था बनाये रखना बड़ी चीज है।

जिस आस्था या आत्मिकता की बात वल्लभ के लेखन में आती है, उसे वह स्वयं तर्कातीत मानते हैं परन्तु वह आस्था एक परम्परा पूजक सामान्य व्यक्ति को अनायास मिले संस्कार की तरह न होकर उनके द्वारा अर्जित की हुई वस्तु अधिक है। इसलिये आस्था एक विचार, प्रत्यय अथवा प्रतीति के रूप में तो उनके चिन्तन को निर्देशित करती है लेकिन वह अपने चारों ओर अध्यात्म का पूरा संस्थान या संसार नहीं बनाती। वल्लभ की कहानियों के कई पात्रों को आस्था से इस दुनिया की भयानकता या असह्यता का सामना करने की शक्ति मिलती है। ‘ब्लैक आउट’ कहानी के अलावा ’नित्य प्रलय’’ में भी ईश्वर का होना इस दुनिया के लिये जरूरी माना गया है। वरूण नामक पात्र आस्था और ईश्वर के बारे में स्वाभाविक तर्क देता है कि ‘‘यदि ईश्वर है तोे संसार में इतनी बुराई क्यों है, इतनी सफरिंग....इतना अन्याय क्यों है ? ’’यह तर्क भले ही हो पर उत्तरापेक्षी प्रश्न के रूप में उसकी अपनी जगह है, कहानी के पात्र ‘‘मैं’’का उत्तर है ‘‘....और तुम्हारी साइंस के आइंस्टीन क्या कहते हैं....मेरी फिजिक्स का उद्देश्य ईश्वर द्वारा रचे गये ब्रह्माण्ड के नियमों की खोज करना है। थोड़ी देर के लिये मान लिया कि संसार में बुराई है, अन्याय है, दुःख है तो इससे ईश्वर का निषेध कहाँ होता है। ....ईश्वर समझने की नहीं महसूस करने की चीज है, इसके लिये तर्क की नहीं, आस्था की जरूरत होती है।’’

एक सामान्य जिज्ञासा हो सकती है कि आस्था और तर्क में यह कबीलाई बैर क्यों है? तर्क तो चलते चलते आस्था (यदि उचित लगे तो) तक पहुंच भी सकता है पर आस्था तर्क को पूरी तरह क्यों नकार देती है ? ‘‘संवाद अनयास’’ में मिश्र जी का ऐसा ही स्वाभाविक प्रश्न है, कि ‘‘जब एक साहित्यकार होकर मैं अपनी कृति में न्याय अच्छाई का पक्षधर होता हूँ तो ईश्वर की सृष्टि में वह क्यों गायब है। यहाँ न्याय क्यों नहीं है, क्यों अच्छाई दुःख उठाने को अभिशप्त है, क्यों दुष्ट मजा मारते है ? न्याय एकदम गायब नहीं तो धूमिल ही क्यों है ?’’ क्या इसे तर्क की स्थूलता या अमूर्त को मापने के लिये भौतिक माप कहकर मुक्त हुआ जा सकता है ? दरअसल देखा तो यह जाता है कि विभिन्न दर्शन या मत आस्था को तर्क द्वारा ही प्रमाणित करने का प्रयत्न करते हैं।

वल्लभ सिद्धार्थ के कथा साहित्य को, उसमें व्यक्त उनकी धारणाओं को समझने में काफी विवेक और सतर्कता की जरूरत है अन्यथा कई गलत सरलीकरण हो जाने का खतरा है। उनकी आस्था आत्मिकता या अंतर्यात्रा को इस तरह भी समझा जा सकता है कि इतनी मारक और त्रासद स्थितियों में दुःख और यंत्रणा भी इस अन्तहीन व्यवस्था (?) में स्वयं को बचाये और बनाये रखने के लिये हमें आन्तरिक विश्वास की जरूरत होती है। यातना सहन करने की क्षमता से ही हम करूणा के द्वारा दूसरों से जुड़ते हैं।

वल्लभ की वैचारिकता में दुःख और यंत्रणा के प्रति जो सत्कार भाव है वह न तो आत्मदया है न दुःख का रोमानी उत्सवीकरण। अधिक स्पष्ट शब्दों में कहा जाये तो वह दुःख के प्रति शहादत के नकारात्मक सुख की ग्रंथि नहीं है। वह निश्चेष्टता और निष्क्रियता में आत्मक्षरण की भावुक गलद्श्रुता न होकर शोधन का सकारात्मक प्रयास है। वह बाहरी संसार या सामाजिकता का निषेध नहीं है। जितने बैचेन सरोकारों और जितनी गहरी संपृक्ति के साथ वल्लभ ने अपने समय की विसंगतियों और हिंसक व्यवस्था की समीक्षा की है, उससे उनका यह कथन प्रमाणित होता है कि ‘‘पता नहीं कैसे धीरे-धीरे यह विश्वास दृढ़ होता जा रहा है कि जीवन से कट कर कहानी या साहित्य नहीं हो सकता। कहानी वास्तव में घटती घटनाओं का ‘इन्टरप्रिटेशन’ भर हो सकती है। काल, स्थान और कुछ चिरन्तन सिद्धान्तों के परिपेक्ष्य में।’’

घटना अपने आप में कहानी या साहित्य नहीं है। उसके होने के सारे आसंगों और उसके प्रभावों की व्याख्या ही उसे रचना में रूपान्तरित करती है। जीवन हम किस रूप में देख रहे हैं और उसका वास्तविक स्वरूप क्या होना चाहिए यही व्याख्या घटना को कहानी बनाती है। समय अपनी घटनात्मकता में चाहे जितना विविध और विशद हो हम उसे उसकी प्रमुख संवेदना में ही पहचानते हैं। जो समय वल्लभ सिद्धार्थ के लेखन की संवेदना रच रहा था। उसमें आजादी के कुछ ही समय बाद आया मोहभंग था। लोकतंत्र की चेतना अपनी पूरी सार्थकता में उभरते उभरते बहुत थोड़े से मामलों में सीमित रह गयी। व्यवस्था क्रूर हिंसक और स्वच्छन्द होने लगी। हर आदर्श होने लगे। सात्विक कथन उद्धरण चिन्हांे के भीतर युद्धबन्दियों की तरह ठूंस दिये गये। भय, असुरक्षा, न्याय का उपहास, आतंक, संशय इस समय की चारित्रिक विशेषताएँ बन गयी।

वल्लभ की कहानियों में सामान्य व्यक्ति के ऐसे ही संत्रास दुःख और आशंकित बने रहने की स्थितियाँ हैं जो व्यवस्था की स्वच्छन्द मनमानी से पैदा हुई हैं। ‘‘महापुरूषों की वापसी’’ ‘‘डरा हुआ’’ ... ‘‘दुरभिसंधि’’.. ‘‘जुलूस’’, ‘‘कनखजूरा’’, ‘‘ब्लैक आउट’’ जैसी कहानियों में ऐसा ही यथार्थ है। ‘‘महापुरूषों की वापिसी ’’ के जित्ते को विश्वास है कि नौकरी से उसकी छँटनी के विरूद्ध अपनी कोशिश में उसे अवश्य न्याय मिलेगा लेकिन उसके पिता का अनुभव जानता है कि मिल चुका इंसाफ। वही कानून बनाने वाले वहीं तोड़ने वाले। जित्ते की डायरी में मार्क्स, लेनिन, नीत्शे, गांधी, सार्त्र, पास्तरनाक, सुकरात, कैनेडी, लोहिया के नाम और उन महापुरूषों के कथन लिखे रहते हैं। आज के तंत्र के सामने इन महापुरूषों के सारे आदर्श प्रभावहीन हो रहे हैं। ‘‘डरा हुआ’’ कहानी का पात्र ‘दोस्त’ भी ऐसे ही व्यवस्था के सामने विवश और डरा सहमा है। ‘‘व्यवस्था’’ कहानी व्यवस्था हीनता का क्रूर चेहरा दिखाती है। ‘‘दुरभि संधि’ और ‘‘कनखजूरा’’ के पात्र विक्षिप्ति की सीमा तक त्रस्त हैं।

कहीं-कहीं ‘जीनियस’ (ब्लैक आउट) जैसा अप्रतिहृत प्रतिरोध है जिससे लगता है कि दुनिया से अच्छाई पूरी तरह तिरोहित नहीं होती। इसके बाद भी ’’डरा हुआ’’ कहानी के पात्र का यह अनुभव ही आज का यथार्थ है कि ‘लोगों, परम्पराओं और मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ हर वक्त खौलता रहता हूँ कि इस जड़ता को टूटना चाहिए। तमाम गलत सलत चीजों में बदलाव आना चाहिए। लेकिन कर कुछ नहीं पाता। हर वक्त मेरी अपनी सुरक्षा का सवाल सामने खड़ा होता है। .....और मुझे अपना आक्रोश नकली और नपुंसक लगने लगता है।’’ ऐसे समय में अधिकतर लोग ’’महापुरूषों की वापिसी’’ और ‘‘दुरभि संधि’’ जैसी कहानियों के पात्रों की तरह विक्षिप्त मनोदशा में बड़े लोगों के कथन बड़बड़ाते रहते हैं और दुःस्वप्नों में जीते हैं। ऐसी हताशा, असुरक्षा और आशंका जैसी जीवन विरोधी स्थितियों में जीते हुए ये लोग सामूहिक आत्महत्याएँ नहीं करते तो इसलिये कि ’’असल में हमारे देश के धर्म और राजनीति में हर तबके के हर आदमी के लिये जस्टीफिकेशन मौजूद है और मौलिक अधिकारों के अंतर्गत उन्हें वरण की स्वतंत्रता दे दी गयी है।’’ यह वरण की स्वतंत्रता वैसी ही अप्राप्य स्थिति है जैसे अस्तित्ववादी विचार में मनुष्य अपनी इच्छानुसार कुछ भी होने के लिए स्वतंत्र है लेकिन विडम्बना यह है कि दुनिया की बाहरी परिस्थितियाँ उसे वैसा बनने नहीं देती।

वल्लभ सिद्धार्थ जब अपने समय का तापमान पढ़ते है और उसके कारणों की खोज करते हैं तो एक क्लासिक लेखक की तरह उनके सरोकार बहुत स्पष्ट हो जाते हैं। ‘‘मैंे उस व्यवस्था को बर्दाश्त नहीं कर सकता जिसमें कुछ लोग कदम कदम पर मक्कारों की दया के मोहताज हों। मैं मानवतावादी व्यवस्था चाहता हूँ।’’ ‘‘मुझे विश्वास नहीं कि इस देश में क्रान्ति हो सकती है। यहाँ आदमी भूखों मर जाने में भी आदर्श देखता है। हमें संस्कृति और क्रान्ति में से किसी एक को चुनना पड़ेगा। इतने साल की आजाद हवा में हम सिर्फ अविश्वासी बने हैं या अंधविश्वासी।’’

वल्लभ सिद्धार्थ की प्रमुख कहानियों में से ’’ब्लैक आउट’’ कहानी सभी तरह से पूर्ण कहानी है। आपातकाल के खौफ और आतंक भरे समय की निरंकुशता की यह कहानी सिर्फ एक घटना नहीं है बल्कि तात्कालिकता से आगे जाकर वह किसी भी समय की बर्बरता और उसकी प्रतिक्रि़या से उत्पन्न नैमेसिस की कहानी है। यह बहुत ही उचित है कि प्रतिकार एक बुद्धिजीवी जीनियस की तरफ से आता है। जिस पर वैचारिकता के कारण दूसरों से अधिक जिम्मेदारी है। जीनियस नाम का यह पात्र उन बुद्धिजीवियों पर व्यंग्य भी माना जा सकता है जो ऐसी स्थितियों में विरोध के साथ किसी तरह का खतरा नहीं उठाना चाहते। वे बनाये जाते इतिहास की तरफ होते हैं जैसा वल्लभ इस कहानी के बारे में स्वयं कहते हैं कि उन्होंने यह कहानी सार्त्र की उस स्थापना को गलत सिद्ध करने के लिये लिखी है जिसके अनुसार इतिहास के नाम पर किसी भी अत्याचार को न्यायोचित ठहराया जा सकता है। जीनियस का यह फेथ, ट्रांस, विकल्पमुक्त साहस अथवा ईश्वर का अनुभव मनुष्य के भीतर से जनमती आत्मचेतना है। यह आक्रोश सिर्फ कहानी गढ़ने के लिये अचानक घटित चमत्कार या प्रायोजित उत्तेजना नहीं है बल्कि अत्याचार के रूबरू दृढ़ होती प्रतिरोध की शक्ति है, हालांकि कहानी के अंत पर यह प्रश्न हो सकता है कि क्या अत्याचार के प्रतिकार के लिये मनुष्य को ईश्वर ही तलाशना पड़ेगा।

‘‘जुलूस’’ कहानी में भी जीनियस नाम का पात्र है, उसकी आँखों में भी वी.आई.पी. की दमनकारी शक्ति के प्रतिकार में ऐसी ही लपट कौंधती है। इसके भीतर भी एक आत्मा है। यह कहानी हमारे लोकतंत्र का एक और चेहरा खोलती है। जहां जीवन की जरूरी मांगों को राजनीतिक मुद्दों में दबा दिया जाता है। भूख के पक्ष में अभियान चला रहे जीनियस को प्रान्त निर्माण की माँग के राजनीतिक जूलूस में शामिल मान लिया जाता है। प्रतीकात्मक रूप में यह जीवन का निषेध है और सत्ता की दमनकारी विजय है।

वल्लभ की इस तरह की कहानियों में जहाँ वह अपने समय के यथार्थ से जूझ रहे हैं वहाँ भी वह घटनात्मक या कोरे तथ्यात्मक नहीं होते। शिल्प की सघनता में भी उनके आशय दूर तक जाते हैं। विदेशी साहित्यकारों और विचारकों के कथन इन आशयों को कभी समानता के द्वारा और कभी व्यंग्य (आयरनी) के द्वारा अधिक अर्थवान् बनाते हैं। ‘‘महापुरूषों की वापिसी’’ ‘‘ब्लैक आउट’’’, ‘‘जुलूस’’ और ‘‘दुरभिसंधि’’ में आये उद्धरण इसके उदाहरण है। इन उद्धरणों की बौद्धिकता के कारण यह खतरा हो सकता था कि वल्लभ की कहानियाँ अकादमिक या बोझिल लगने लगें लेकिन वल्लभ का डूब कर लिखने का कौशल यही है कि वे जीवन की अनुभूतियों की अभिव्यक्तियों की तरह कहानी में घुल मिल जाते हैं।

चीख अपनी पूरी मर्मान्तकता में वल्लभ की कहानियों में कई बार सुनायी देती है। ‘‘बीच का दरवाजा’’ में वह मास्टर की पत्नी की चीख है, ‘‘षड़यंत्र’’ में वह साईंदास की लड़की की चीख है और ‘‘ब्लैक आउट’’ में वह शिवदयाल की पत्नी की चीख है। ‘‘ब्लैक आउट’’ कहानी है ही चीख की। यह चीख कहानी का एक उपशीर्षक भी बनाती है और ‘‘नेमेसिस’’ तक भी पहुँचती है। खाकी कद्दावर द्वारा चम्पा के बलात्कार से निकली चीख वल्लभ तक सिर्फ आवाज के रूप में नहीं पहुँचती बल्कि वह एक घुटी हुई मगर तेज धारदार और चमचमाती हुई आवाज थी। अपनी सम्पूर्ण दहशत और नफरत और प्रतिकार के साथ अपनी असहायता में खिंची हुई जैसी कि किसी बर्बर आततायी द्वारा अपने प्रतिरोध को पूरी हिंसा से कुचल देने से निकल सकती है। खौफ, हिकारत, शर्म और ठंडी बारूद की तरह रोम-रोम से जिस्म के अन्दर धँसती, थरथराती हुई एक लम्बी चीत्कार। लोकतंत्र समाजवाद और ऐसी ही गर्वोन्नत घोषणाओं के शोर में इन चीखों का चीत्कार डूबा रहता है। मास्टर, साईंदास और शिवदयाल इन चीखों को सुनने और प्रतिरोधहीन विवशता में घुटते रहने को अभिशप्त है।

वल्लभ सिद्धार्थ की कहानियों की चर्चा में उनकी कुछ भावपूर्ण कहानियों का जिक्र रह जाता रहा है। वल्लभ की ‘रेन्ज’ काफी बड़ी है। बदले हुए समय में पारिवारिक रिश्ते भी अप्रभावित नहीं रहे। एक ओर उनका अनिवार्य रूप से बदलता स्वरूप, दूसरी तरफ उनकी चली आती ऊष्मा को बनाये रखने का द्वन्द्व। ’’शेष प्रसंग’’, ‘‘जड़ंे’’, ‘‘तनहाई’’, ‘‘अनाहूत’’ और ‘‘लड़कियाँ’’ जैसी कहानियां अपने करूण वातावरण में जीवन की बड़ी सच्चाईयों को बिना किसी अतिरिक्त उत्तेजना के कह देती हैं। ‘‘क्षेपक’’ कहानी में तो कोई ऊँची आवाज में बोलता भी नहीं है। बहुत कम संवादों की यह कहानी ठिठके सहमें सम्बन्धों की ही कहानी नहीं है बल्कि उसमें गैर जरूरी होने की हद तक पहुँची पारस्परिक अनुभूतियाँ भी हैं। आत्मकथा जैसी प्रामाणिकता की प्रतीति देती यह कहानी असहजता की बेहद सहज कहानी है।

प्रेम के सम्बन्ध में वल्लभ ने एक दार्शनिक सा प्रश्न उठाया है, कि क्या प्रेम में सफलता या असफलता जैसी कोई चीज होती है। जिसे सामान्यतः असफल या निराश प्रेम कहा जाता है उस तरह की स्थिति या उसके विपरीत सफल प्रेम की स्थिति से अलग उन्होंने प्रेम को सकारात्मक भाव माना है। वह मानते है कि ‘‘प्रेम मेरे लिये आस्था का ही एक रूप है। मैं प्रेम से मुक्ति नहीं चाहता, इस पर निर्भरता भी नहीं चाहता, इसके द्वारा अपना परिष्करण चाहता हूँ।’’

‘‘प्यार एक अन्तर्तम की सबसे गहरी गुहा में पलने वाली ज्योति...... जहां से शक्ति प्रकाश और जीवन का अर्थ आता है।’’

वल्लभ ने कुछ बहुत अच्छी प्रेम कथाएँ लिखी हैं। ’’उपेक्षित’’ ‘‘छिंगुरी कौ रस’’, ‘‘उसी जगह’’, ‘‘छुट्टियाँ’’ ‘‘दूसरे किनारे पर’’ और ‘‘अजनबी आकाश’’ जैसी इन प्रेमकथाओं में न तो प्रेम की अतिरंजित या अभिजात स्थितियाँ हैं, न नाटकीय घटनाएँ और न रोमानी भावुकता। किसी धूम धड़ाके के बिना गांव कस्बे के किशोरों की तरह वह मधुर अपनत्व शुरू हो जाता है, अपने परिवेशीय जीवन की अपेक्षाओं के अनुसार वह प्राण रस देता रहता है और किसी बहुत ही स्वाभाविक कारण से वह टूटने की स्थिति तक पहुँच जाता है जिसमें कांसे के बर्तन के जोर से गिरने जैसी तेज आवाज नहीं आती। बस एक रोती बिसूरती, खन्न देर तक सांस की तरह चलती रहती है। ‘‘छिंगुरी कौ रस’’ ऐसी ही कहानी है। ‘‘उपेक्षिता’’ तो उससे भी आगे की कहानी है। कालिन्दी जिज्जी के प्रेम पत्र भाई साहब तक चुपचाप पहुंचाने का काम करती खोखी खुद भाई साहब को प्यार करने लगती है। उसका प्रेम एकांकी और अव्यक्त है, प्रकट होता है तो तब जब ठोड़ी पर बना हुआ काजल का तिल उसके आंसुओं में बहने लगता है।

इन कहानियों की संवेदना को वल्लभ बहुत कोमलता से छूते है, उँगुलियों के पोरों से त्वचा को नहीं बल्कि सिर्फ रोमों का स्पर्श करते हुए उसके पास निःशब्द पदचाप से चलते हुए कि अभी सोयी प्यार की पवित्रता कहीं आहट से भी न जाग जाये।

वैसे भी वल्लभ व्यर्थ ही कभी ’’लाउड’’ नहीं होते, वहां भी नहीं जहाँ उनके पात्र वेदना और व्यंग्य की अभिव्यक्ति में उद्धरण पर उद्धरण बोलते रहते हैं। सोच विचार और विमर्श में लगे ये पात्र सार रूप में मुखर होना जानते हैं। भीतर से निकली यह मुखरता अर्थ की ताकत लेकर आती है। इसलिये उसे गर्जन तक नहीं जाना पड़ता क्योंकि गर्जन आतंक भले ही हो, आश्वस्ति नहीं हो सकता और दुनिया को स्वस्ति और आश्वस्ति की बहुत जरूरत है। एक ईमानदार लेखक की तरह अपने लिखे को वल्लभ तभी सार्थक मानते हैं जब उसमें यातना में भी ईश्वर में, जीवन में, मूल्यों में और मनुष्य में आस्था बनाये रखने की क्षमता हो। दोस्तोव्यस्की ने ऐसे ही किसी उदात्त अर्थ में कहा होगा कि सुन्दरता संसार को बचायेगी। वल्लभ सिद्धार्थ का लेखन इस सुन्दरता की प्रार्थना है।

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