मैत्रेयी पुष्पा का ‘‘चाक’’ उपन्यास कृष्ण विहारी लाल पांडेय द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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मैत्रेयी पुष्पा का ‘‘चाक’’ उपन्यास

मूल्यांकनµ

कृष्ण बिहारी पाण्डेय

अधुनातन साहित्य के सूक्ष्मदर्शी आलोचक द्वारा मैत्रेयी पुष्पा के

बहुचर्चित उपन्याय ‘‘चाक’’ का आकलन

चाकः प्रजापतित्व का अभिनव पाठ

यह रचनात्मकता की नियति है या लेखक की सीमा कि किसी लेखक की विभिन्न कृतियां प्रायः विकास का उत्तरोत्तर ग्राफ नहीं बनाये रख पातीं अथवा समान रूप से महत्वपूर्ण नहीं हो पातीं। यदि लेखन परिमाण में विपुल हो’ तब तो यह आशंका और भी अधिक हो जाती है। इसेस रचनाकार की विफलता मानना संभवतः न्यायसंगत नहीं हो क्योंकि सृजन कर्म स्वयं में ही महत्वपूर्ण होता है तो वह अपनी अलग पहचान बना लेता है। इस संदर्भ में मैत्रेयी पुष्पा का कथा साहित्य आज व्यापक रूप से चर्चित और प्रशंसित है। लगभग एक दशक के लेखन-काल में ही ‘सेंध’, ‘फैसल’, ‘गोमा हंसती है’, ‘रास’ और ‘‘ललमनियां’ जैसी सशक्त कहानियों के तीन कथा-संग्रह तथा ‘बेतवा बहती रही, ‘‘इदन्नमम’, ‘‘चाक’’ झूला नट, अल्मा कबूतरी, विजन और अगन पाखी, जैसे अभिभूत कर देने वाले उपन्यासों का सृजन करके मैत्रीयी पुष्पा ने अपनी अद्भुत रचनाशीलता का परिचय दिया है। ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ ने तो आत्मकथा साहित्य को कई दृष्टियों से सम्पन्न किया ही है। उल्लेखनीय यह है कि कम समय में इतना लिखने के बाद भी उनकी प्रत्येक कृति ने पाठकों को आश्वस्त किया है। ‘बेतवा बहती रही’ के बाद आये ‘इदन्नमम’ उपन्यास ने ‘लगभग क्लासिक जैसा उपन्यास’ जैसी समीक्षा-टिप्पणियां अर्जित कीं।

‘इदन्नमम’ के इतने चर्चित होने के बाद मैत्रेयी के अगले उपन्यास के आगमन की सूचना से पाठकों की यह उत्सुकता स्वाभाविक थी कि क्या वह ‘इदन्नमम’ से आगे की रचना-यात्रा में उतनी ही सफल हो पायेंगी। तब ‘चाक’ उपन्यास ने अपने समय और समाज के घटित यथार्थ के बीच स्त्री-विमर्श का एक और विश्वसनीय पक्ष रख। ‘चाक’ को समीक्षकों ने ‘लगभग रेणु की याद दिलाता हुआ’ या ‘रेणु से आगे जाता’ उपन्यास माना। पहली रेखा को छोटी करने के बजाय मैत्रेयी पुष्पा उससे बड़ी रेखा खींचने का हर बार जो रचना संकल्प करती है, उसमें उनकी रचनात्मक निष्ठा अभिनव से अभिनवतर प्रस्तुत करती है। ‘अल्मा कबूतरी’ और बाद के उपन्यास अपने कथ्यों में उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

अपेक्षाकृत कम समय में इतने अधिक लेखन के पीछे इस तथ्य को आसानी से समझा जा सकता है कि मैत्रेयी पुष्पा के पास अनुभवों का व्यापक संसार है। उनकी आत्मकथा ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ से बात प्रमाणित होती है कि उन्हें समाज को और अपने परिवेश को उसके विभिन्न रूपों में देखने का अवसर मिला है और वह भी किसी सप्रतिक्रियाविहीन दर्शक की तरह नहीं बभ्ल्कि उसमें शामिल उसके अच्छे-बुंरे से प्रभावित होते, उसमें जूझते और अस्तित्व की तलाश करते हुए व्यक्ति की तरह उन्होंने उससे अपनी संवेदना संचित की है। इस अनुभव-संसार में वह खुद भी है और उनके आपसपास की पूरी दुनिया भी। संवेदना के रूप में संचित यह विपुल भंडार एक के बाद दूसरी कथाकृति का कथानक बनता गया। कोई लेखक जब अपनी सही रचना-दृष्टि विकसित कर लेता है और अभिव्यक्ति का अपना सहज शिल्प सि( कर लेता है तब ऐसी ही निष्पत्तियाँ होती हैं। संप्रेषण के लिए आकुल अनुभव अजस्त्र बन जाते हैं।

‘विजन’ उपन्यास को छोड़कर मैत्रेयी पुष्पा की प्रायः पूरी कथाभूमि ग्रामीण है। यह भूमि उनकी जानी-पहचानी ही नहीं बल्कि उनके संवेदनों में रची-बसी है। इसीलिए वह पूरी निजता;इसे कुछ लोगों ने नॉस्टेल्जिया भी कहा हैद्ध और प्रामाणिकता के साथ इस समाज को अंतरंगता और संपूर्ण परिपार्श्विकता में देखने में समर्थ हैं। मैत्रेयी के यहां गांव न तो ‘अहा’ का मिथ धारण किये हैं, न वे किसी फिल्मी दृश्य की तरह कुछ ग्रामीण चीजों के संकलन और सरलीकरण हैं। मैत्रेयी पुष्पा ने यहां स्पंदित जीवन को पूरी जटिलताओं और विविधताओं में यथार्थ दृष्टि से देखा है। परम्परा और परिवर्तन के टकरावों को उनकी सूक्ष्म नज़र विशदता के साथ देखती है। इस क्षेत्र में वह समकालीन महिला कथाकारों से भिनन हैं। जहां अधिकतर लेखिकाओं के कथा साहित्य में नगरीय मध्यवर्ग के जीवन का यथार्थ चित्रिह है, क्योंकि उनके अनुभवों की संपृक्ति उसी समाज से है, वहीं मैत्रेयी पुष्पा ने व्यापक ग्रामीण समाज के भीतर के जीवन को इस तरह आविष्कृत कियाक है, ‘जिसमें पूरा समाजशास्त्र निहित है।’

आज हमारी समकालीनता का परिदृश्य तेजी से बदलते जीवन के सरोकारों तथा परिवर्तित और विनिष्ट होते मूल्यों का साक्षी है। एक ओर जीवन-शैली को बदलता और हर चीज का विक्रय मूल्य निर्धारित करता बाजार और उसका उपभोगवाद है तो दूसरी ओर जाति और वर्ण के आधार पर चलता सामंतवाद। एक ओर गलत तरीकों से संरिक्षत दौलत है तो दूसरी ओर अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी से त्रस्त असहाय विशाल जनसंख्या है। आदर्श अपने घरों की खपरैल भी नहीं बदलवा पाये और भ्रष्टाचार की अट्टालिकाओं पर ‘पेंट हाउस’ बने हुए हैं। जाति और संप्रदाय अपनी विभाजकता तथा आक्रामकता में आतंकवादी हो गये हैं। राजनीति मतें सत्ताकामिता ने सारे अमानवीय साधनों को अपना लिया है। आजादी की सारी आशाएं जल्दी ही मोहभंग में बदल गयीं। स्त्री आज भी पुरूष के सामंतवाद की क्रूरता से आहत् है, मुक्त होना तो बहुत दूर की बात है। विकास की योजनाएं कुछ खास लोगों के दरवाजों पर रूकी हुई हैं।

मैत्रेयी पुष्पा इस पूरे परिदृश्य में घटित जीवन की विसंगतियों को सवाल की तरह उठाती हैं और नये सृजन का आह्वान करती है। ‘‘चाक’’ उपन्यास इसका बहुत उपयुक्त उदाहरण है। यह उपन्यास अपने वर्ण्य विषय में ‘इदन्नमम’ से आगे का विस्तार भी है और लेखिका की रचना-कला का शीर्ष तक पहुँचता विकास भी है।

बृहत्तर ब्रज के गांव अतरपुर की कथाभूमि पर आधारित इस विशद उपन्यास का कथानक इतना संश्लिष्ट है कि वह एक ओर जाट समाज का सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक अभिलेख बन गया है तो दूसरी ओर उसमें आजादी के बाद के अच्छे-बुरे बदलावों का लेखा-जोखा भी है। उपन्यास के मूल में पुरूष प्रधान मूल्यों वाले पारंपरिक समाज में व्यक्तित्व तो दूर अस्तित्व से भी वंचित स्त्री की करूण स्थिति है और इसी के बीच से उभरती एक स्त्री के संकल्पों की दृढ़ता भी है। इस कथानक में विशेष भौगोलिक क्षेत्र तो अपनी सभी विशेषताओं के साथ चित्रित है ही, उसमें मानवीय अनुभवों का इतना व्यापक स्वरूप है कि वह किसी एक क्षेत्र या गांव का ही कथानक नहीं रह जाता। यह गांव ळभारत का कोई भी गांव हो सकता है, जहां रूढ़िव( संस्कार हैं, जातियों का ऊंच-नीच है, सामंती मूल्य है, जड़ता है, अशिक्षा और गरीबी है, समाज में नयी व्यवस्थाओं का धीमा प्रवेश है और जीवन के विविध अभावों में भी उल्लास के अवसरों का विधान करती हुई जिजीविषाा है।

उपन्यास की नायिका सारंग नैनी अपनी फुफेरी बहन रेशम को उसी के ससुराल वालों द्वारा मार दिये जाने पर विचलित और आक्रोशपूर्ण है। वह चाहती है कि अपराधियों को दंड मिले और उसका पति रंजीत न्याय के लिए सक्रिय हो। इस गांव में रेशम इस तरह मरने वाली अकेली औरत नहीं है बल्कि रस्सी के फंदे से झूलती रूकमणी, कुएं में कूदने वाली रामदेई, करबन नदी में समाधिस्थ नारायणी.....ये बेबस औरतें सीता मइया की तरह ‘भूमि प्रवेश ’ कर अपने शील-सतीत्व की खातिर कुरबान हो गई। ये ही नहीं, और न जाने कितनी...न्याय इतना सही और सुलभ होता तो अन्याय होती ही नहीं। सारंग अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करती हुई अपनी तरह से प्रतिशोध का उपाय कर लेती है।

गुरुकुल में शिक्षित सारंग को गांव में आये नये मास्टर श्रीधर प्रजापति में अपरा प्रेरक और पूरक मिलता है। वह शिक्षक के रूप में गांव के विकास में अपनी भूमिका निभाता है। सारंग का पति रंजीत कृषि में स्नातकोत्तर उपाधि के बाद किसानी करने में अपमान नहीं मानता। सारंग और श्रीधर के बीच परस्पर आदर, विश्वास और प्रेम विवाहेत्तर संबंधों की सीमा तक पहुंच जाता है। सारंग अपने दाम्पत्य के प्रति ईमानदार होते हुए भी रचनात्मकता के प्रति आकष्रित मन से विवश है।

पंचायती चुनाव के जोड़-तोड़, षड़यंत्र और हिंसा तथा जाति के आधार पर श्रीधर का अपमान, गुलकंदी की हत्या, रंजीत के स्वप्नों का बार-बार बिखरना, सारंग का अपने ही पति के विरूद्ध प्रत्याशी होना-इन सब संघर्षो और टकरावों के बीच उपन्यास समाजशास्त्र तथा मानव मन के विमर्श और मानवीयता की आकांक्षा में ही नहीं बल्कि लगभग उसकी आश्वस्ति में समाप्त होता है।

विवाहेत्तर संबंधों तथा यौन-प्रसंगों के कारण इस उपन्यास की समीक्षाओं में नैतिकता के प्रश्न पर भी चर्चा हुई है। नैतिकता के निर्धारण में संबंधित समाज के जीवन स्थितियों तथा सामािजक निषेधों को अस्वीकार करते और स्वतंत्रता चाहते मानव-मन का भी महत्व है। मैत्रेयी पुष्पा ने नैतिकता का किताबी स्वरूप प्रस्तुत न करके ग्रामीण समाज में उसकी स्थिति का प्रामाणिक और यथार्थ रूप दिखाया है। यह न कहीं ‘लस्ट’ है, न पश्चिमी स्त्री मुक्ति का भौंडापन। इसे अधिक से अधिक स्त्री के व्यक्तित्व की चाह का एक संकेत कहा जा सकता है। जहां तक सारंग और श्रीधर के देह-संबंधों का प्रश्न है तो सारंग खुद कहती है, यह व्यभिचार नहीं, आज़ादी है। आजादी भी उच्छृंखल नहीं बल्कि सृजन की अभ्यर्थना में पुलकित मन का दान है।

मैत्रेयी पुष्पा के प्रमुख स्त्री पात्र प्रतिकूलताओं में से अपना रास्ता बनाते हैं और अस्तित्व के साथ ही व्यक्तित्व की प्राप्ति के लिए संघर्ष करते हैं पर यह संघर्ष खुद के लिए ही नहीं होता बल्कि अपनी पूरी प्रजाति के प्रति करूणा से प्रेरित होता है।

शिल्प के स्तर पर -‘चाक’ औपन्यासिक उपलब्धि है। इतना विविध घटनात्मक कथानक और कहीं भी बिखराव नहीं। लोकगीताकें और आंचलिकता के स्पर्शो वाली भाषा प्रसंगानुसार रचनात्मकता का परिनिष्ठित स्वरूप भी ग्रहण करती है, धरती रक्तरंजित हो चली.........धरती की बेटियां लौह जंजीरों को काटने निकली हैं....ये ग्राम बालाएं प्रेम के सिवा किसी शब्द का अर्थ समझती नहीं....धरती से लेकर आसमान तक नारंगी आभा में लिपटा चैतन्य’-संसार।’

‘‘चाक’’ उपन्यास में अन्य उपन्यासों की तरह हो, बल्कि कुछ अधिक हीं, चरित्रों की सृष्टि विविध और बहुल है। मैत्रेयी का कौशल यह है कि इतने अधिक पात्रों को भी उन्होंने व्यक्तित्व दिये हैं। कलावती, लौंगसिरी, गुलकंदी और सारंग जीवंत सृष्टियां हैं। बच्चे तक समूह नहीं है।

अनस्तित्व से अस्तित्व ओर व्यक्तित्व तक का सारंग का यह संघर्ष अपनी संश्लिष्टता में पूरे समाज और समय का मार्मिक आख्यान है।

जीवन की सरस स्तुतियों और सृजन की मंगल’-कामनाओं से रचा गया यह उपन्यास प्रजापतित्व वका अभिनव पाठ है।

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