नरोत्तमदास पाण्डेय ’’मधु’’ बीसवीं शताब्दी के बुन्देलखण्ड के कवि कृष्ण विहारी लाल पांडेय द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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नरोत्तमदास पाण्डेय ’’मधु’’ बीसवीं शताब्दी के बुन्देलखण्ड के कवि

नरोत्तमदास पाण्डेय ’’मधु’’ बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में बुन्देलखण्ड के ऐसे कृती कवि हुए हैं जिन्होंने प्रभूत परिमाण में उत्कृष्ट काव्य-रचना की है किन्तु उनकी ओर हिन्दी जगत का अधिक ध्यान आकृष्ट नहीं हुआ। हिन्दी साहित्य के इतिहासों में काल और प्रवृत्ति के आधार पर कविता का जो अध्ययन किया गया उसमें प्रतिनिधित्व के रूप में कुछ ही कवियों का नामोल्लेख होता रहा है। देश के विभिन्न अंचलों के अनेक प्रतिभा सम्पन्न कवियों का समावेश उसमें नहीं हो पाया। एक तो प्रकाशन के अभाव में उनका काव्य उपेक्षित रह गया। दूसरे, साहित्य के इतिहास में काल विशेष की प्रतिनिधि प्रवृत्तियों का ही अध्ययन विस्तार से किया गया तथा उसमें पूर्व युग की संक्रमित प्रवृत्त्यिों का अध्ययन केवल सन्दर्भ के रूप में कर दिया गया ऐसी स्थिति में ’’मधु’’ जैसी असाधारण प्रतिभा के कवियों का काव्य स्थानीय चर्चाओं तथा गोष्ठियों तक ही सीमित रह गया। उनके काव्य के मूल्यांकन के अभाव में हिन्दी जगत महत्त्वपूर्ण काव्य प्रदेय से वंचित रह गया।
’’मधु’’ ने वर्तमान शताब्दी के तीसरे और चौथे दशकों में काव्य रचना करते हुए एक ओर पुनर्जागरण के नवीन बोध को वाणी दी है, दूसरी ओर उनमें अपने समय की काव्य प्रवृत्तियों के साथ संपृक्ति भी है। वे एक ओर शंकर और सनेही जी की काव्य चेतना से जुड़े हैं। दूसरी ओर पंतजी, बच्चनजी और सुमन के भाव बोध से संयुक्त हैं। सर्जना के इतने विविध और विपुल रूप की सम्पदा के धनी ’’मधु’’ का काव्य उन्हें निश्चय ही अन्यतम सिद्ध करता है।
आठवाँ अध्याय
कलागत सौन्दर्य के अन्य उपकरण

ऽ अलंकार विधान
अलंकार काव्य के शोभातिशायी धर्म हैं। भावाक्षिप्ति की अवस्था में साधारण वक्ता की वाणी में भी विदग्धता आ जाती है। वह अपनी बात को काव्य शास्त्र से अपरिचित होते हुए भी सादृश्य, विरोध, अतिशय आदि की सहायता से ऐसे शाब्दिक प्रयोगों द्वारा व्यक्त करने की चेष्टा करता है जिनसे उसकी अभिव्यक्ति में प्रखरता और सौन्दर्य का सन्निवेश हो जाता है। काव्य में शब्दार्थगत चमत्कार अथवा वैशिष्ट्य के द्वारा भाव के चारूत्व का उत्कर्ष करने वाले उपादान अलंकार हैं।
संस्कृत काव्य-शास्त्र में काव्य में अलंकारों के औचित्य पर पर्याप्त विमर्श हुआ है। मामह, दण्डी, वामन आदि आचार्यांे ने अलंकारों के प्रति आत्यंतिक मोह के कारण उन्हें काव्य के नित्य धर्म के रूप में स्वीकार किया। ध्वनिवादी आचार्य आनन्दवर्द्धन तथा समन्वयवादी आचार्य मम्मट ने यह प्रतिष्ठापना की कि अलंकार काव्य के सौन्दर्याधायक उपकरण न होकर अलंकार के उपस्कारक तत्त्व हैं। मम्मट ने ’’अनलंकृती पुनः क्वापि’’ कहकर अलंकार की स्फुट रूप से सत्ता न होने पर भी काव्य की हानि नहीं मानी है।1 साहित्य दर्पणकार ने भी अलंकारों की काव्य के अस्थिर धर्म कहा है।
भाव-विरहित शब्दार्थ की क्रीडा कौतुक तो उत्पन्न कर सकती है पर रसानुभूति में सशक्त नहीं हो सकती है। इसीलिये अलंकार की सार्थकता के लिये आनन्दवर्द्धन ने रसाक्षिप्ति तथा अपृथग्यत्नत्व को आवश्यक माना है।2 इस दृष्टि से अलंकार रस की अभिव्यक्ति में बहिरंग तत्त्व नहीं है। शुक्ल जी ने अलंकारों के औचित्य की परीक्षा के लिये भावोत्कर्ष को ही निकष माना है। उनके शब्दों में ’’भावों का उत्कर्ष दिखाने और वस्तुओं के रूपगुण और क्रिया का अधिक तीव्र अनुभव कराने में कभी कभी सहायक होने वाली युक्ति ही अलंकार है।3
काव्य-सौन्दर्य में साधक होने के लिये अलंकारों का उचित और अयत्नज प्रयोग अपेक्षित अलंकारों को भाव और अभिव्यक्ति का भूषण मानते हुए पं0 रामदहिन मिश्र लिखते हैं कि ’’यदि ये घुल-मिल कर भाषा को मधुर और झंकृत न बना सकें तथा यदि भावों में सजीवता और प्रभविष्णुता न ला सकें तो ऐसे अलंकार प्रयत्नसाध्य ही समझे जा सकते हैं, उनसे रचना को कोई लाभ नहीं हो सकता।4
सौन्दर्य के सशक्त उपकारक होने के कारण ही काव्य में अलंकारों का प्रयोग सदैव होता रहा है, यद्यपि विभिन्न युगों की कविता के स्वरूप और उसकी संवेदना के अनुसार अलंकारों के प्रयोग में अन्तर परिलक्षित होता रहा है। रीतियुग में वस्तु और भाव में वैविध्य का अधिक अवसर न होने के कारण कवियों की प्रतिभा कलात्मकता को समर्पित हो गयी। कला सचेष्टता के कारण रीतियुग में अलंकारों का अतिशय प्रयोग हुआ है। छायावाद की अन्तःस्फूर्त स्वानुभूतिपरक कविता में अलंकारों का सचेष्ट अनुधावन नहीं है, परन्तु भाव रमणीयता तथा अभिव्यक्ति की प्रांजलता के लिये अलंकारों का पर्याप्त प्रयोग हुआ है। कलात्मकता अपने आप में घृण्य वस्तु नही है। उसका अपना प्रभाव और आकर्षण होता है, किन्तु उसकी अतिशयता, तदैवता तथा भावविवर्जितता उसमें एतादृशत्व का अनाकर्षण उत्पन्न कर देती है। रीतियुगीन शब्द चमत्कार प्रधान आलंकारिकता का उपहास करते हुए पंत जी ने अलंकृत भाषा में लिखा है-’’घन की घहर, भेमकी की भहर, झिल्ली की झहर, बिजली की लहर, मोर की कहर, समस्त संगीत तुक की एक ही नहर में बहा दिया। और बेचारे औपकायन की बेटी उपमा को तो बाँध ही दिया। आँख की उपमा, खंजन, मृग, कंज, मीन इत्यादि होठों की ? किसलय, प्रवाल, लाल, लाख इत्यादि।5
छायावाद युग में अलंकार केवल वाणी की सजावट के लिये नहीं, वे भाव की अभिव्यक्ति के विशेष द्वार माने गये। वे वाणी के आचार, व्यवहार, रीति, नीति माने गये।6
रीति परम्परा में अलंकारों प्रयोग की सौन्दर्य विहीन अतिशयता का उपहास स्वयं ठाकुर कवि ने किया था ’’सीख लीनो मीन मृग खंजन कमल नैन और लोगन कवित्त की बौ खेल करि जानो है।’ अथवा माँस की गरेथी कुच कंचन कलश कहे चाम के अधर ताहि कहें विम्बाफर है। ऐसी झूठी जुगती बनावें और कहावे कवि ताहू पै कहें कै हमें सारदा कौ वर है।’ अज्ञेय रूढ उपमानों को लेके कह रहे थे जैसे अधिक बासन घिसने से मुलम्या छूट जाता है पंत जी कह रहे थे तुम वहन कर सको जन मन में मेरे विचार-वाणी मेरी चाहिये तुम्हें क्या अलंकार।
’’मधु’’ के काव्य संस्कार विविध काव्य प्रवृत्तियों से प्रेरित और प्रभावित थे। उनके काव्य में भाव गौरव और कल्पना की सृजनशीलता के साथ कलात्मकता की प्रवृत्ति भी परिलक्षित होती है। सुन्दर भाव को कलात्मक रूप से व्यक्त करना उनका काव्यादर्श था। परन्तु ’’मधु’’ के काव्य में अलंकारों का मोहाविष्ट और अनावश्यक प्रक्षेप नहीं है। कवि ने प्रमुख सत्ता तो भाव सौन्दर्य की ही मानी है। इसलिये ’’चन्द्रचकोर’’ पतंग और दीपक’’ तथा ’’हाला’’ आदि रचनाओं में अलंकारों का विशेष आग्रह नहीं दिखायी देता है-
लो कौ हिला कहता ही रहा
यहाँ आग से खेलने को मत आना।
तद्यपि अंग से जा लिपटा वह
अंधा पतिंगा न माना न माना।।
दुर्दशा देख पतंग की दीपक
जागा निशा भर आशा समाना।।
प्रात की प्राणद वायु से शायद
जी उठे मेरा मरा परवाना।।
कवि को शब्दालंकारों में अनुप्रास और यमक तथा अर्थालंकारेां में औपम्यमूलक अलंकार अधिक प्रिय है।
ऽ शब्दालंकार
शब्दाश्रित सौष्ठव के हेतु शब्दालंकार होते हैं। शब्द का तात्पर्य यहाँ मात्र शब्द नही है, बल्कि शब्द की ध्वनि अथवा नाद है। ’’शब्दालंकार की सृष्टि वस्तुतः शब्द के आधार पर नही बल्कि शब्द की ध्वनि के आधार पर होती है।7 ध्वनि अथवा नाद से कविता में संगीत धर्म की सृष्टि होती है।
अनुप्रास में एक वर्ण अथवा अनेक वर्णांे की आवृत्ति से नाद-सौन्दर्य की सर्वाधिक सम्भावना रहती है। ’’मधु’’ ने अनुप्रास का प्रचुर प्रयोग किया है। अनुप्रास की अनुगूंँज उनकी रचनाओं में सर्वत्र व्याप्त है। उनके अनुप्रासों में एक वर्ण की आवृत्ति से अधिक चरण के बीच-बीच में वर्ण समूहों की आवृत्ति की प्रवृत्ति अधिक मिलती है। अनुप्रास के अधिक प्रयोग का यह कारण भी है कि वर्णित वृत्त होने से कवित्त, सवैया में नाद तत्त्व अधिक रह सकता है। विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के शब्दों में ’’वर्णवृत्तों में नियत आरोह अवरोह के कारण प्रत्येक चरण के मध्य में नाद की अभिवृद्धि के अवसर मिल जाते हैं।8 ’’मधु’’ के काव्य में अन्तरनुप्रास वैसे तो सभी चरणों में मिलता है, पर उसकी योजना कवित्त सवैया के अन्तिम चरण में अधिक हुई है। कवि का अनुप्रास मोह कवित्त सवैया छन्दों तक ही सीमित नहीं है। गीतों में भी अनुप्रास का स्थान-स्थान पर प्रयोग हुआ है। कवित्त सवैया के अन्तिम चरण में अन्तरनुप्रास के विशेष प्रयोग का कारण यह है कि इन छन्दों में भाव तीन चरणों में विशद होता हुआ चौथे चरण में चरम सीमा पर पहुँचता है। चौथा चरण भाव और कला की दृष्टि से सशक्तम होता है। इस प्रकार के कुछ उदाहरण प्रसंगोचित होंगे-
चारू चन्द्र आनन की चाँदनी समान छवि
छुटक रही है चारू चोप चित्त चीनो है।
बेंदी भव्यभाल उरथल पर मुक्तमाल
राजत मराल हीय नव नेह भीनो है।।
’’मधु’’ कच पास छूटे राहु सम पेख तहीं
माँग लाल लाल भाव भायौ यों नवीनो है।।
विशद विशाल मनौ टीकौ मुदमाल आज
टीकौ लाल लाल राहुचन्द भाल दीनो है।।
रावन मती चली विजय महती चली
कै कौसलपती ढिंग सुलोचना सती चली।।
छहर छटा ही तज शम्भु की जटारी लयें
किरन कटारी आयौ राथा की अटारी पै।।
सूनर गेह में दूनर देह कै
चूनर चारू निचोरन लागी।।
’’मधु’’ के काव्य में प्रयुक्त अलंकारों के कतिपय उदाहरण इस प्रकार है-

अनुप्रास:
छेकानुप्रास
भूषित भूषन साज सजाय कैं
दूखन दूर भजावत है तू।
वाद विषाद निवाज कें ओज
प्रसाद के साज सजावत है तू।।
महिप मयूर पखियान के सुठाम आज
मुकुट मनीन की लहर लहरी रहीं।
आधे कंठ जहाँ घुँघचून माल राजतती
जटित जवाहर की छवि छहरी रही।।

वृत्यनुप्रास

कलित कमोदन के झौंरन पै भौंरन की
भीर भर भौंर झुक झोंकन झला लगीं।
सुकृत समूह सचै अमृत अथोर अचै
आनंद अकौरतीं चकोर मचला लगीं।।
छाती छीलवें को छलिवें कौं छला छापदार
अबला अबल बनें विकट बला लगीं।
तरन तला के पूत पुलिन पला पै कला
कोटन कलाधर की करन कला लगीं।।

लहरत आवै लोल लहर पियूष की सी
पावन प्रकाश पट पहरत आवै है।
फहरत आवै दुग्ध फैन फैल फैल छटा
छिति पै छपाकर की छहरत आवै है।।

यमक
ए री वनवारी तौ पै वारी वनवारी तू तो
सब सुरवारी तो पै सब सुर वारी जात।
जीवन पंथ के तौ ऐ सु राही
सुराही भरी रख संग सुराही।।

श्लेष
होत बड़ी गुनवारी तबै
जब काहू गुनी गुन सों गस जावै।
त्यौं ’’मधु’’ जू रस में रस कें
झट जाय कें जीवन में धुस जावै।।
दूर हो चाहै जिती सफरी
बच पावै न तानन में फस जावै।।
धीवर के कर में पर कैं
यह बंसिका मानस में धस जावै।।
दोष न देखते यों तुममें ’’मधु’’
प्रेमी जु दोषा प्रिया के न होते।।
छीन छिनेक मेें होते नहीं तुम
हे शशि जो द्वितिया के न होते।।


अर्थालंकारः
अप्रस्तुतविधान
अर्थालंकारेां में सादृृश्यगर्भ अलंकारों का क्षेत्र बहुत व्यापक है। अभिव्यक्ति की प्रभविष्णुता और प्रांजलता के लिये सादृश्य की स्थापना स्वाभाविक और सशक्त प्रणाली है। किसी वस्तु के रूप, गुण अथवा क्रिया का सम्प्रेषण उसके वर्णन से उतना सहज संवेघ नहीं हो पाता है। जितना उसके साथ किसी प्रतिरूप का उल्लेख कर देने से होता है। सादृश्य निरूपण में प्रस्तुत के लिये किसी समान बिम्ब की योजना की जाती है। यह समानान्तर अप्रस्तुत प्रस्तुत के स्वरूप अथवा गुण-धर्म को साम्य के द्वारा प्रस्फुटित कर देता है। शुक्ल जी ने स्वरूप बोध और भाव तीव्रता को सादृश्य योजना के हेतु माना है। उनका मत है कि सदृश वस्तुओं के द्वारा वर्ण्य भाव तो तीव्र होता ही है अगोचर तथ्यों का स्वरूप बौध भी होता है।9
सादृश्य-योजना में प्रस्तुत के लिये ऐसे अप्रस्तुत व्यवह्त होते हैं जो प्रत्यक्ष ज्ञान, अनुमान अथवा संभावना के द्वारा हमारे बोध में प्रतिष्ठित रहते हैं। उनके स्वरूप की कल्पना से वर्ण्य वस्तु की धारणा अभिव्यक्ति की मितव्ययिता के साथ अधिक प्रस्फुट रूप से मनोगत हो जाती है। उनसे अभिव्यक्ति में व्यंजकता और प्रोज्ज्वलता तो आती ही है, काव्यार्थ में भी सौन्दर्य का समावेश हो जाता है। डॉ0 कृष्णचन्द्र वर्मा के शब्दों में उपमान योजना वस्तुबोध तो कराती ही है, वह सौन्दर्यबोध भी कराती है। वह काव्य में सरसता और चमत्कार की भी सृष्टि करती है।10 प्रस्तुत और अप्रस्तुत मे साम्य का विधान रूप धर्म और प्रभाव के आधार पर किया जाता है।
प्रस्तुत और अप्रस्तुतों के प्रयोग से वस्तु के स्वरूप चित्रण में अधिक स्पष्टता और चारूता आ जाती है। सादृश्य-विधान में ऐसे अप्रस्तुतों की योजना की जाती है जिनका प्रस्तुत से रूप साम्य हो, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि सादृश्य में रूप का स्थूल आकारगत सादृश्य ही रहता है। रूप-साम्य में भी गुण साम्य की कुछ न कुछ व्यंजना होती है। तभी रूप साम्य सौन्दर्य का हेतु बन पाता है। चन्द्रमा को नवनीत की ढेंढी कहने से केवल आकारगत साम्य का ही बोध नहीं होता है बल्कि उसकी शुभ्रता और मसृणता का भी आभास मिलता है। परन्तु सादृश्य में गुण अथवा धर्म का बोध प्रधान न होकर स्वरूप-बोध ही प्रमुख होता है।
सुन्दरी शरद बनी मंजु मधुबाला कांत
कौमुदी का हाला से प्रपूर्ण चन्द्र प्याला है।।
शरद पूर्णिमा का चन्द्रमा अपनी पूर्णता में ऐसे प्याले के समान प्रतीत होता है जिसमें चाँदनी की सुरा भरी है। सुरा से भरे हुए चषक के सादृश्य से प्रस्तुत का भाव रमणीयता के साथ व्यक्त हुआ है।
चन्दन कौ विन्दु ’’मधु’’ सौहे शीश किधौं
दीपैे राधा मुख नील पट विसतीरा है।
कमल उदार नभ सागर मझार किधौं।
नीलम के थार में उदीयमान हीरा है।।
कवि ने यहाँ सन्देह अलंकार के माध्यम से चन्द्रमा के सादृश्य के लिये अनेक कल्पनाएँ की हैं। नीले आकाश में शरद का चन्द्रमा कृष्ण के माथे पर चन्दन का बिन्दु है अथवा नीले वस्त्र में जगमगाता हुआ राधा का मुख है। वह सागर में खिला हुआ कमल है अथवा नीलम की थाली में जड़ा हुआ हीरा है। इस सफल सादृश्य योजना में वर्ण और आकार दोनों के साम्य का ध्यान रखा गया है। आकाश की विशालता की तुलना में चन्द्रमा की लघुता के ही सादृश्य में माथे पर चन्दन के बिन्दु, सागर में कमल और नीलम की थाली में हीरे के आकार का अनुपात दिखाया गया है। अप्रस्तुतों के वर्ण सादृश्य से प्रस्तुत का स्वरूप विभासित हो गया है।
साधर्म्य
सादृश्य में स्वरूपगत साम्य का बोध कराया जाता है और साधर्म्य में उपमान के गुण अथवा धर्मसाम्य से प्रस्तुत के धर्म की अनुभूति की तीव्रता प्रदान की जाती है। स्वरूप साम्य की अपेक्षा धर्मसाम्य में प्रस्तुत के सौन्दर्य की संवेदना अधिक प्रखर होती है। सादृश्य में बहिरंग की समानता का भाव प्रस्फुटित होता है, जबकि साधर्म्य में आंतरिक सदृशयता के कारण अनुभूति अधिक सूक्ष्म और रमणीय प्रतीत होने लगती है-
केहरी निनाद से सभीत हरिनी सी उस
कण्व कन्यका का चित्र कौन लिख पायगा।।
यहाँ शकुन्तला और हरिणी में स्वरूप साम्य नहीं है, बल्कि दुर्वासा के शाप से स्तंभित शकुन्तला और सिंह के गर्जन से भयभीत हरिणी में भय से संकुचित हो जाने के धर्म का साम्य है। दुर्वासा ने शकुन्तला को प्रिय की विस्मृति का शाप दिया था। जीवन की सर्वाधिक प्रिय अभीप्सा के शापग्रस्त होने से शकुन्तला की कातर दशा की अभिव्यक्ति में केहरी निनाद से सभीत हरिनी के अप्रस्तुत से मार्मिकता आ गई है।
यह घात की बातें न ऊघौ करौ
हम श्याम के नाम की चातकी है।
प्रस्तुत उदाहरण में गोपियों और चातकी में रूप-साम्य नहीं है। गोपियों और चातकी में तृषा और आलम्बन की अनन्यता के धर्म का साम्य स्थापित किया गया है। जैसे चातकी तृषाकुलता में प्रिय को पुकारती रहती है उसी प्रकार गोपियाँ भी कृष्ण का नाम रटती रहती हैं।
प्रभाव साम्य
अप्रस्तुत योजना मंे रूप और गुण के साम्य से भी अधिक सौन्दर्य की अनुभूति प्रभावसाम्य के द्वारा होती है। सादृश्य से अधिक आन्तरिकता साधर्म्य के बोध में है और साधर्म्य की सूक्ष्मता प्रभाव निदर्शन के द्वारा पूर्ण रूप से विवृत होती है। वैसे तो साधर्म्य में भी प्रभाव साम्य की कुछ झलक मिल जाती है। परन्तु उसमें प्रमुखता गुणसाम्य की होने के कारण प्रभाव निष्पन्नता लक्ष्य नहीं बन पाती। प्रभावसाम्य में व्यापकता रहती है। डॉ0 कृष्ण चंद्र वर्मा के शब्दों में प्रभावसाम्य भी तो रूप, गुण, क्रिया आदि के साम्य को ही आधार बनाकर चलता है।11
तिमिर मतंग खोजने के लिये घूमता सा
झूमता सा निकला मयंक मृगराज है।
यहाँ चन्द्रमा और सिंह में न तो रूप की समानता है और न साधर्म्य ही है। भाव की व्यंजकता प्रभावसाम्य में है। जिस प्रकार शिकार के लिये सिंह हाथी की खोज में घूमता हुआ निकलता है और उसके भय के कारण हाथी छिप जाते हैं उसी प्रकार चन्द्रमा के निकलने से अंधकार भी विलुप्त होा गया है। प्रभाव साम्य के साथ हाथी और अन्धकार के वर्णसादृश्य तथा विशालता के साम्य से प्रस्तुत का सौन्दर्य अधिक संवेदनीय हो गया है।
’’मधु’’ ने अप्रस्तुत योजना में प्रायः रूप गुण अथवा क्रिया का खण्ड साम्य न दिखाकर समस्त व्यापार या प्रसंग का साम्य दिखाया है। इससे भाव में समग्रता का प्रभाव उत्पन्न हुआ है। इसके लिये कवि ने रूपक, अपनुह्मुति तथा अन्योक्ति अलंकारों का प्रयोग किया है। अप्रस्तुतों का सौन्दर्य कवि की कल्पना शक्ति पर निर्भर रहता है। शुक्ल जी ने इस सम्बन्ध में कल्पना की पूर्णता प्रसंग या व्यापार के साम्य में मानी है।12 ’’मधु’’ के काव्य में व्यापार समष्टि के साम्य के अनेक उदाहरण मिलते हैं।
जितना इठला रहे आज तुम्हें
इसका मिलेगा कल ही फल सारा।
विधि का है विधान किसी का कभी
रहता सदा ही नहीं ऊंँचा सितारा।।
इतराओ नहीं ’’मधु’’ दो दिन के
लिये है कहना इतना ही हमारा।
तन धूल का धूल में है मिलना
फिर फूलना फूल फिजूल तुम्हारा।।
प्रस्तुत उदाहरण में अन्योक्ति के द्वारा क्षणिकता, मनुष्य के मिथ्या गर्व और रंग-रूप के प्रति आसक्ति की व्यर्थता का निदर्शन फूल के माध्यम से किया गया है।

मूर्त और अमूर्त अप्रस्तुत

वर्ण्य विषय की मूर्तता और अमूर्तता की ही तरह काव्य में अप्रस्तुत भी मूर्त और अर्मूत दोनों प्रकार के प्रयुक्त हुए हैं। सामान्य रूप से मूर्त के लिये मूर्त अथवा अमूर्त भाव को स्पष्ट करने के लिये मूर्त अप्रस्तुतों का प्रयोग किया जाता है। परन्तु मूर्त के लिये अमूर्त अथवा अमूर्त के लिये अमूर्त के विधान से काव्य में व्यंजकता का अधिक प्रभाव आ जाता है। ’’मधु’’ के काव्य में मूर्त और अर्मूत दोनों प्रकार के अप्रस्तुतों का प्रयोग मिलता है।

मूर्त के लिये मूर्त
त्योहूं अनजाने में कहूंँ ते इन्दु आनन पै
आय पर्यो रोरी विन्दु रंग झकझोरी में।

मंगल उदौ को बन्यौ वारिज में बानिक के
मानिक जड्यौ है कल कंचन कटोरी में।।
होली खेलते समय राधा के पीताभ मुख पर रोरी के बिन्दु के लिये कमल में मंगल का उदय अथवा सोने की कटोरी में माणिक्य का जटित होना कहा गया है।

मूर्त के लिये अमूर्त

रावण मती चली विजय महती चली कै
कौशलपती ढिंग सुलोचना सती चली।
सुलोचना के लिये रावण की मति और महती विजय के अमूर्त अप्रस्तुतों का प्रयोग किया गया है।

अमूर्त के लिये मूर्त
ऊधव ज्ञान की होलिका में
तुम प्रेम प्रह्लाद कों जारनि चाहत।।
’’मधु’’ के काव्य में रूढ़ उपमान भी मिलते हैं और नवीन अप्रस्तुतों की योजना भी है। उनके अनेक उपमान तत्युगीन चेतना से संबंधित है। कवि ने चन्द्रमा के अनेक क्रमागत उपमानों के साथ ही ’’बरतानिया का बानिया’’ कहा है।
जो भी सिर धारता है नंगा कर देता उसे
बहिरंग स्वेत अंतरंग सकलंक है।
पग वारूणी की ओर बढ़के बढ़ाता सदा
रखता न एक रूप सीधा कभी बंक है।

जानता जगत अनाचार की कहानियांँ हैै
मानौ बरतानिया का बानिया मयंक है।।
व्यापारी अंग्रेज को बनिया कहकर कवि ने वणिक वृत्ति, अंग्रेजों के व्यवहार और चन्द्रमा की विशेषताओं में अनूठे साम्य का निर्वाह किया है।
इसी प्रकार कोहरे को शीतरूपी अंग्रेजी कुशासन की मृत्यु के समय की आहें कहा गया है। अंग्रेजी शासन भारत में अपना अन्त निकट देखकर आहें भर रहा है और आँंसू बहा रहा है-
शीत के कुशासन से कहता सताया ’’मधु’’
कोहरा नहीं है नया रूपक दिखाता है।
अवधि अशेष है हमारी हुई जानकर
आह भरता है अश्रुधार बरसाता है।।
कवि की सादृश्य योजना में पौराणिक सन्दर्भ भी हैं। पौराणिक अप्रस्तुत प्रायः परतंत्र भारत की तत्कालीन करूण दशा के चित्रण में प्रयुक्त हुए हैं।
करत कुराज नक्रराज है अकाज आज
सुधि ब्रजराज लेहु हिन्दगजराज की।
दीसै महायुद्ध जन्य घोर अग्निदाह सो तौ
होलिका पिसाची के कुमंत्रन कौ साज है।
अबल अनाथन के नाथ देहु हाथ दीन
भारत प्रहलाद की तिहारे हाथ लाज है।।
उपमग
जाँंचो आपु आँचु लगे होरी की सु वाकौ हियौ
काँचे काँच ही सौ कहूँ करकि न जावै जू।।

अनन्वय
भास होता आपसे ही आपके प्रताप का।

रूपक

लतिका दलन के डुलावतीं व्यजन श्वास
पवन पवन रही वासित बनाय कैं।
तट के तरून तरें अचल चकोरनी जे
बैठीं परिचारिका ह्वै पहरौ लगाय कैं।।

सन्देह
नील नभ आँगन में शरद सुधांशु किधौं
गात पै गुविन्द जू के जुटित अबीरा है।
तैरें नभ सिंधु माँह लुन्द नवनीत कौ कै
बुदबुद बुन्द उठ्यौ अधिक अधीरा है।।
चन्दन कौ बिन्दु ’’मधु’’ सो है स्याम शीस कियौं
दीपै राधा मुख नील पट विसतीरा है।।
कमल उदार नभ सागर मझार किधौं
नीलम के थार में उदीयमान हीरा है।।

मंगल उदै कौ बन्यौ वारिज में बानिक कै
मानिक जड्यौ है कल कंचन कटोरी में।

भ्रान्ति
कर में निशंक दरपन ले मयंकमुखी
पौढ़ी परयंक निज मुख निहरत है।
ता में बेर बेर ’’मधु’’ शशि सी निरख आभा
सखि सों कहत मन खीज में मरत है।।
ओरी याहि तोरि चकचोरि कर मोरि फेंक
मेरौ कहौ जौ न नेक कानन धरत है।
मौ मुख छिपावत दिखावत है चंद मेरे
संग छरछन्द मंद मुकुर करत है।।

अपन्ह्नुति

कोहिरा नहींहै साफ साफ कहता है ’’मधु’’
शीत की यवनिका का पतन ये होता है।।

मन्दाकिनी धार नित्य बहती पवित्र जहाँ
जो कि पातकों के पुंज करती है खण्ड खण्ड।
चारों ओर छाई कीर्ति महिमा महेन्द्र की है
हरदेव आत्म वलिदानी जहाँ समुद्दण्ड।।
दीखते जहाँ पै वन नंदन अनेक चारू
केशव श्री तुलसी का जिनको घना घमण्ड।
मित्र भला आपने बखाना यह स्वर्ग लोक
नहीं नहीं मैंने तो बखाना है बुन्देलखण्ड।।

उत्प्रेक्षा
औचक अबीर ’’मधु’’ छूट स्याम मूठी में ते
शशिवदनी के आन आनन छहरिगो।
मानो घनवृन्द के सु फन्द बन्द काटि चन्द
चूर चूर होय मुखचन्द पै बगरिगो।।

राधिके रावरे आनन मंजु यौं
लोचन लोल विलोल हैं छाजेे।
पूर्ण मयंक के अंक में मानो
चकोर के छौना निशंक विराजे।।

व्यतिरेक
वाके कर पंचशर ही है ’’मधु’’ याके कर
कोटि कर की अनंत शर राशि है वरी।
वह है अगात ये सगात कौन भांत करै
दीन रतिपति रातपति की बराबरी।।

विभावना

अधर तुम्हारे बिन बोलें ही बतायें देत
फगुवा में रतन अमोल हर लाई हौ।

असंगति
गात पै गुपाल जू के पानी की फुहार परै
कंपत तिहारौ अंग सीत सिहरान में।
धूरि ब्रजचन्द मुख मेली जात मलिनाई
आवत तिहारे मुखचन्द अमलान में।।

नैन बलवीर के तौ परत अबीर वीर
नीर झरझरत तिहारी अँखियन में।।

यथासंख्य

ऊँचौ उठ्यौ पहुँच्यौ धनु ऊपर
शारदा कौं मन ही मन जोहा।
धन्य ध्वनी भई छूट चल्यौ ’’मधु’’
कांत कवित्व रहयौ संग सोहा।।
संग ही संग उठान्यौं उड़ान्यौ
सुनान्यौ तहाँ सिगरी सभा कोहा।
मस्तक गोरी मुहम्मद कौ
पृथ्वीराज कौ बान औ चन्द कौ दोहा।।

तद्गुण
ऐसी का टिढ़ई तो में तू ही बाँसुरी री बता
जाते धारे ही तें तोय अधर अगारे के।
सुछवि उतंग ’’मधु’’ सूधे सूधे अंग टेढ़े
टेढ़े होत प्यारे स्यामसुन्दर हमारे के।।

पाश्चात्य अलंकार
मानवीकरण
नभ में यह सावन फागुन सा
रच ढंग रहा लखिये लखिये।
छिपता छिपता निकला वह भानु
स्वरश्मियों की पिचकारी लिये।।

रंँग से सरा वोर उदीची हुई
वनखण्ड कपाट प्रतीची दिये।
’’मधु’’ देखिये धा ेरही प्राची प्रिया
निज गाल गुलाल से लाल किये।।
विशेषण विपर्यय
कवितान की गानन तानन में
वर वीन कौ वंद्य वसैरौ रहै।
ध्वन्यर्थ व्यंजना:-
अति भीषण तोपें गड़ गड़ कर
गमक गराजें देती हैं।

आवाजें रायफलोें में से
तड़ तड़ तड़ तड़ की आती है।
गोलियां सर्र सन सन करती
कानों को छू कढ़ जाती है।।
निष्कर्ष
कवि ने अलंकारों का प्रयोग भाव सौन्दर्य को कलात्मक परिधान से प्रसाधित करने में किया है। उसके काव्य में केवल चमत्कारोत्पादन के लिये अलंकारों का प्रयोग नहीं हुआ है। इसीलिये शब्दालंकारों में अनुप्रास का प्रयोग अधिक है। जिससे नाद सौन्दर्य का विधान हुआ है और अर्थालंकारों में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा और अपन्हुति का अधिक प्रयोग है क्योंकि इनमें कवि को अपनी कल्पना शक्ति के उपयोग का अवसर मिल सका है। कवि ने अलंकारों के बिना भी भावपूर्ण काव्य की रचना की है।

बिम्ब विधान
गत कुछ दशकों से काव्य के एक सशक्त उपकरण के रूप में बिम्ब की चर्चा विशेष रूप से होने लगी है। यों तो पहले भी विम्ब के प्रति सचेतन दृष्टि या प्रयत्न न होते हुए भी काव्य में उनका प्रयोग होता रहा है। इसी आधार पर जायसी और तुलसी के काव्य में बिम्ब-विधान का अनुशीलन हुआ है। परन्तु विगत वर्षांे में सिद्धान्त और व्यवहार दोनों दृष्टियों से बिम्ब का महत्त्व परिलक्षित हुआ है। वर्तमान शताब्दी के प्रथम दशक में यूरोप में बिम्बवाद के नाम से जो कला आन्दोलन चला उसमें तो बिम्ब को काव्य का अनिवार्य उपकरण मानते हुए उसे काव्य मूल्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया।
शुक्ल जी का यह कथन कि ’’काव्य का काम है कल्पना में बिम्ब अथवा मूर्त भावना उपस्थित करना, बुद्धि के सामने कोई विचार लाना नहीं’’ काव्य बिम्व के स्वरूप और महत्व पर प्रकाश डालता है। भाव की प्रेषणीयता उसके संपृर्तन पर निर्भर है। इसी सन्दर्भ में पन्तजी ने चित्रभाषा की महत्ता निरूपित की है। उनके अनुसार उसके, शब्द सस्वर होने चाहिए, जो बोलते हों, सेव की तरह जिनके रस की मधुर लालिमा भीतर न समा सकने के कारण बाहर झलक पड़े, जो अपने भाव को अपनी ही ध्वनि में आँखों के सामने चित्रित कर सकें, जो झंकार में चित्र, चित्र में झंकार हों जिनका भाव संगीत विद्युदधारा की तरह रोम रोम में प्रवाहित हो सके।13
कवि सृजनात्मक कल्पना के द्वारा भाव को इस प्रकार व्यक्त करता है कि उसमें चित्र की गोचरता की प्रतीति होने लगती है। सामान्य अर्थ में शब्द चित्र को बिम्ब कहा जा सकता है। काव्य में चित्रात्मकता को लक्ष्य करके ही कहा गया है कि प्रत्येक कविता एक चित्र है और प्रत्येक चित्र एक कविता।
बिम्ब के सम्बन्ध में गहन चिन्तन करते हुए पश्चिमी आलोचकों ने उसकी अनेक परिभाषाएँ दी हैं। कुछ परिभाषाओं में तो बिम्ब माहात्म्य के प्रति अत्यधिक आग्रह के कारण दर्शन तत्त्व प्रधान हो गया है। बिम्ब की प्रमुख विशेषाताओं को ध्यान में रखकर पारिभाषिक रूप में यह कहा जा सकता है कि बिम्ब वह शब्दचित्र है जिसका निर्माण ऐन्द्रिय आधार पर कल्पना के संयोग से होताहै। भाव उसका मूल प्रेरक होता है।
काव्यमें बिम्ब अथवा चित्र विधान का माध्यम शब्द है। प्रत्येक शब्द में मूल रूप से किसी अर्थ का बिम्ब निहित रहता है। भाषा के सामान्य प्रयोग में शब्द केवल सूचनात्मक चिह्न या नाम मात्र होते हैं, परन्तु काव्य में वे अन्तर्निहित मूर्त अर्थ के द्वारा तथा लक्षणा और व्यंजना की सहायता से संवेदना को जाग्रत करते हैं। प्रयोगाधिक्य से शब्दार्थ की यह मौलिक ऐन्द्रियता घिसने लगती है और शब्द केवल रूढ़ अमूर्त अर्थ का ध्वनन करने लगते हैं तब उनसे किसी रूपक का मानसिक बोध नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में कवि भाषा को उन आदिम ध्वनियों की ओर ले जाने का प्रयास करता है। जब वस्तु और उसके नाम में न्यूनतम अन्तर था।14
ऐन्द्रियता बिम्ब का प्रमुख आधार है। विभिन्न इन्द्रियों के सन्निकर्ष से हमारी चेतना में पदार्थों के अनुभव बिम्ब रूप में गृहीत होते हैं। बिम्ब शब्द के मूलार्थ में दृश्यता की ध्वनि है, परन्तु इन्द्रियानुभव दृष्टि के अतिरिक्त श्रवण, आस्वाद, स्पर्श आदि से भी संबंधित होते हैं। बिम्ब की मूर्तता का अर्थ चाक्षुष गोचरता ही नहीं है। अन्य ऐन्द्रिय संवेदन भी ऐसी मानस छवियों का निर्माण करते हैं जो चाक्षुष न होकर भी गोचर होती हैं।15 चाक्षुष प्रत्यक्षीकरण में मूर्तता अधिक होती है। इसलिये उसमें बोध का आधार अधिक पुष्ट होता है किन्तु अन्य संवेदना भी कवि की चित्र विधायिनी शक्ति के द्वारा मूर्त प्रतीत होने लगते हैं। अतः किसी भी इन्द्रिय के द्वारा प्रत्यक्षीकृत अनुभव के शब्द चित्र को बिम्ब कहा जा सकता है।
बिम्ब निर्माण की प्रक्रिया में कल्पना का महत्त्वपूर्ण योगदान है। किसी विषय के साथ इन्द्रियों के सन्निकर्ष से जो संवेदन उत्पन्न होते हैं वे अन्तश्चेतना में पहुँचकर अनुभव बन जाते हैं। पुनर्सर्जन के लिये इन अनुभवों का विशेष से सामान्य में परिवर्तित हो जाना आवश्यक है। निर्वैयक्तीकरण की यह प्रक्रिया कल्पना के द्वारा सम्पन्न होती है। कल्पना मानव मस्तिष्क की एक विशिष्टि प्रक्रिया है जो अपने सचेष्ट क्षणों में उन नूतन और अनेक रूप छाया छवियों का बिम्ब ग्रहण किया करती है जो कभी दृष्टिपथ या अनुभूति की परिधि में आ जाने के कारण अन्तःपटल पर सुप्त अथवा जागृत संस्कारों के रूप में पड़ी रहती है।16
बिम्ब विधान में स्मृति भी सहायक होती है परन्तु स्मृति के द्वारा विषय को नवता प्राप्त नहीं होती है। कल्पना ही प्रस्तुत को रमणीयता और अभिव्यंजना को तीव्रता प्रदान करती है। किसी कवि का बिम्ब विधान उतना ही सजीव और सुन्दर होगा जितनी नवोन्मेेषशालिनी और रूपविधायनी उसकी कल्पना होगी। रूढ़ प्रयुक्यिों में कल्पना का संस्पर्श नहीं होता है, इसलिये उनमें अन्वेषण का आह्लाद नहीं रह जाता है।
अभिव्यंजना के कुछ उपकरणों में बिम्ब का साम्याभास होता है, परन्तु वे अभिन्न नहीं हैं। बिम्ब और प्रतीक में यह समानता है कि प्रत्येक प्रतीक अपने मूल में बिम्ब होता है। इसी प्रकार प्रत्येक बिम्ब की अन्तिम परिणति प्रतीकात्मकता में होती है। इस साम्य को छोड़कर दोनों में मौलिक भेद हैं। प्रतीक किसी भाव या विचार का संकेत करता है। उसके द्वारा संकेतित अर्थ परम्परा के द्वारा रूढ़ हो जाता है इसके विपरीत बिम्ब में परम्परभुक्ति नहीं होती है। वह आकस्मिक और व्यक्तिगत होता है।17 उसके संश्लिष्ट स्वरूप में प्रतीकार्थ की संकुचितता नहीं होती है। प्रतीक अमूर्त भी हो सकता है परन्तु बिम्ब किसी न किसी ऐन्द्रिय स्तर पर मूर्त ही होता है।
विभिन्न आधारों पर बिम्ब के अनेक प्रकार निर्धारित किये गये हैं। ऐन्द्रिय आधार पर बिम्बों के प्रकार दृश्य, श्रव्य, स्पृश्य, घ्रातव्य और आस्वाद्य है। प्रस्तुत के आधार पर अंकित चित्र लक्षित बिम्ब कहलाता है और अप्रस्तुत की सरलता और सहायता से निर्मित चित्र उपलक्षित बिम्ब कहा जाता है। अनुभूति की सरलता और संश्लेष के आधार पर बिम्बांे को सरल और संश्लिष्ट माना जा सकता है। काव्य दृष्टि के आधार पर बिम्ब यथार्थ और स्वच्छन्द हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त वर्ण्य विषय के रूप में परम्परा और समसामयिक का भी बिम्बों पर प्रभाव पड़ता है। परम्परित बिम्बों में पौराणिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्रकृतिपरक चित्र माने जाते हैं और सामयिक रूपायन युगीन राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक भावों के आधार पर होता है।
भावों का मूर्तीकरण ’मधु’’ की कला की प्रमुख विशेषता है। उन्होंने भाषा की चित्रात्मकता का प्रयोग करके कल्पनाशीलता के द्वारा अनुभूतियों के रम्य बिम्ब अंििकत किये हैं। उनके उपलक्षित बिम्बों में अप्रस्तुत विधान लक्षित के साथ इस प्रकार संश्लिष्ट हैं कि यह प्रस्तुत से अलग या समानान्तर नहीं प्रतीत होता है। उनके सादृश्य मूलक अलंकारों में खण्डसाम्य न होकर प्रायः आन्तरिक और बाल एकता का पूरा अनुषंग है। इसलिये उनकी उपमाओं, उत्प्रेक्षाओं और रूपक योजनाओं में बिम्बाधायिनी विशेषता प्रमुख रूप से लक्षित होती है। उनके काव्यय में उपरिवर्णित प्रायः सभी कोटियों के बिम्ब मिलते हैं।
ऐन्द्रिय बिम्ब
चाक्षुष
चाक्षुष अनुभब सबसे अधिक मूर्त ऐन्द्रियानुभव होता है। इसलिये चाक्षुष बिम्बों में रूपात्मकता अधिक स्पष्ट होती है-
लतिका दलन के डुलावती व्यजन, श्वास
पवन, पवन रही वासित बनाय कें।
तट के तरून तरें अबल चकेरनी के
बैठी परिचारिका ह्वै पहरौ लगाय कें।।
भर भर भौर भौंरे भौर जिन गूँजे कान
भनक परैगी तो उठेगी अकुलाय कें।।
यामिनीश जू की कल किरन कुमारी इतै
सोवत गदूल के गलीचन बिछाय कें।।
गदूल के पुष्प दलों पर पड़ती हुई चन्द्र किरण के इस बिम्ब में राज वैभव का दृश्य मूर्त है। यामिनीश की राजकुमारी किरण गदूल के मुलायम गलीचों पर सो रही है। लताएँ उसे अपने पत्तों से धीरे धीरे हवा कर रही हैं। चकोरियाँ परिचारिकाओं की तरह पहरा दे रही हैं। गूँजते हुए भौंरों को वर्जित किया जा रहा है ताकि किरण कुमारी उनकी भनक से जाग न उठे। इस चाक्षुष बिम्ब में ध्वनि, गंध और स्पर्श के बिम्ब भी संश्लिष्ट हैं।
झूमते चकोर मदमस्त मधुपाई, खुली
प्रकृति प्रशस्त की प्रकाम मधुशाला है।
छोड़े बड़े तारकों की प्यालियाँ धरी हैं, भरा
जिनमंे प्रमोदकारी मादक मसाला है।।
छाक छक किरन कुमारिकाएंँ नाच रहीं
चारों ओर दीख रहा नूतन उजाला है।
सुन्दरी शरद बनी मंजु मधुबाला, कांत
कौमुदी का हाला से प्रपूर्ण चन्द्र प्याला है।।
-
शरद पूर्णिमा के इस बिम्ब में मधुशाला के दृश्य का रूपायन हुआ है। मधुपायी चकोर, तारों की शीशियाँ, मदमस्त नाचती किरण कुमारियाँ, मधुबाला शरद सुन्दरी और हाला से प्रपूर्ण शरदपूर्णिमा का चन्द्रमा इन सभी उपकरणों से मधुशाला का सजीव और सचेष्ट बिम्ब अंकित किया गया है।

वर्ण बिम्ब
चाक्षुष बिम्बों की रचना में स्वरूपगत रेखाओं के अतिरिक्त रंग-योजना का भी महत्त्व है।
औचक अबीर ’’मधु’’ छूट स्याम मूठी में से
शशि बदनी के आन आनन छहरिगो।
मानो घन वृन्द के सुफन्द वन्द काटि चन्द
चूर चूर होय मुख चन्द पै बगरिगौ।।
-
राधा के गोरे मुख पर अभ्रक के चमकते हुए कणों के वर्ण-सादृश्य के लिये चन्द्रमा के छोटे छोटे टुकड़ों की योजना बहुत उपयुक्त है। कृष्ण की मुट्ठी के श्याम वर्ण का बादलों के रंग से साम्य श्वेत और श्याम की विरोधी वर्ण-योजना प्रस्तुत करता है। श्वेत आभा का एक और बिम्ब भी इसी प्रकार भास्वर है-
दमक-दमक चकाचौंध सी दृगन देत
चमकत चौप भरी चंचला की सानी की
रावरी कुटी में यह द्वैज चन्द्रहास किधौं
चन्द्रहास चोखी यह चण्डिका भवानी की।।
-
’’मधु’’ के कुछ वर्ण- बिम्ब तो बहुत ही भावपूर्ण और कलात्मक हैं।
अलंकार पान जौ करयौ है मनमोद मान
ताही की खचान जा दिखात चंद उर में।।
चन्द्रमा के भीतर कालिमा के बिम्ब का चित्रण करते हुुए कवि ने कल्पना की है कि चन्द्रमा ने अंधकार पी लिया है। अन्धकार के गाढ़े काले रंग ने उसके दृश्य पर काली रेखा अंकित कर दी है। शंकर भी तो विषपान के कारण नीलकण्ठ कहलाये। ’खचान’ शब्द ने बिम्ब को भावपूर्णता प्रदान की है। कथा साहित्य में प्रायः इस प्रकार का प्रयोग मिलता है कि प्रथम बार सुरा पान करने पर सुरापायी को गले में एक लकीर खिंचने का अनुभव हुआ।

ध्वनि
श्रौत बिम्बों में अनुरणनात्मक ध्वनियों का ऐसा प्रयोग किया जाता है जिससे श्रवण का ऐन्द्रिय संवेदन मूर्त प्रतीत होने लगता है-
काव्य नवीन नवीन की बीन
कबीन के कंठ बजावत है तू।
’’न’’ वर्ण की आवृत्ति से वीणा के निनाद का चित्र अंकित किया गया है। ’’मधु’’ ने ध्वनि-बिम्बों में अनुरणनात्मक शब्दों का केवल ध्वनिवाचक प्रयोग ही नहीं किया है, बल्कि ऐसे शब्दों का सार्थक व्यवहार करके उन्होंने बिम्ब को और अधिक सजीवता और भाव को समृद्धि प्रदान की है-
नाहक शोर में भी हक् ही हक्
कण्ठ से शब्द कढ़ा करते हैं।
साकिया तेरी सुराहियों से हम
मस्त ये पाठ पढ़ा करते हैं।।
सुराही से निकलते हुए पानी से हक हक की ध्वनि होती है। हक, हक अनुरणनात्मक शब्द तो है ही उनका अर्थ खुदा भी है। जब मुख से निकलने वाणी हर ध्वनि में ईश्वर का नाम ही निकले तो साधना की परमावस्था और साधक की तल्लीनता की स्थिति आ जाती है।

गन्ध
ध्वनि की तरह गन्ध के बिम्ब भी सूक्ष्म ऐन्द्रिय संवेदनों पर आधारित होते हैं।
अंग की गन्धि झकोरन तें
चहँुं ओर की पौन झकोरन लागी।
- - - -
लतिका दलन के डुलावतीं व्यजन, श्वास
पवन, पवन रही वासित बनाय के।

आस्वाद
आस्वाद ऐन्द्रिय बोध का अपेक्षाकृत स्थूल स्तर है।
मनमोहन की मुख माधुरी में
यह बाँसुरी बाँस की फाँस भई।

कृष्ण की मुख माधुरी के आस्वादन के बीच यह बाँसुरी उसी प्रकार बाधक है जैसे गुड़ में ईख का छिलका निकल आये और वह गुड़ के मधुर स्वाद को बिगाड़ दे।
पी पी मकरन्द ’’मधु’’ मंजुल मलिन्द वृन्द
गुंजित करेंगे मंजु राग गुणगान का।
यहाँ आस्वाद के साथ भौरों के गुंजन में ध्वनि-बिम्ब भी संश्लिष्ट है।
जिस भ्रमरावलि को भर भर देेते थे प्याली पर प्याली।
वे भी चकित रहेंगी लखकर धिक् धिक् दैव अनय चाली।।
प्याली पर प्याली शब्दों के आस्वाद बिम्ब तो अंकित हुआ ही है प्याली और फूलों के आकार साम्य का भी संकेत है।

गत्यात्मक बिम्ब
’’मधु’’ के ऐन्द्रिय बिम्ब केवल स्वरूपपगत रंग और रेखाओं से ही निर्मित नहीं है। उनमें क्रियाओं और चेष्टाओं का भी मूर्तीकरण हुआ है। वैसे तो ये बिम्ब भी चाक्षुष अनुभवों के चित्र ही माने जा सकते हैं, परन्तु संकेन्द्रण उनकी गतिशीलता पर होने से उन्हें गत्वर बिम्ब भी कहा जा सकता है।
लहरत आवै लोल लहर पियूष की सी
पावन प्रकाश पट पहरत आवै है।
थहरत आवै कल कुुमुद थली में ठीक
ठिठकत ठाम ठाम ठहरत आवै है।।
वहरत आवै वन बागन तड़ागन में
गमक गुराई गर्व गहरत आवै है।
फहरत आवै दुग्ध फैन फैल फैल छटा
छिति पै छपाकर की छहरत आवै है।।
चन्द्रोदय के समय पृथ्वी पर चाँदनी के फैलने की गति का चित्र अंकित किया गया है। इस बिम्ब में चाँदनी की दुग्ध धवल आभा का रंग तो मूर्त है ही, उसकी गतिशीलता और उसका क्रमशः प्रसार भी रूपायित हुआ है। इसके चित्रण के लिये बिम्बात्मक क्रिया शब्दों का प्रयोग किया गया है। ’’लहरत आवै’’ में किसी तरह के वक्र और वर्तुल आकार में उमड़कर बहने का बिम्ब है, थहरत आवैे में काँपते हुए चलने का भाव है, ’ठिठकत ठाम ठाम ठहरत आवे है’’ में ठिठक कर जगह जगह ठहरते हुए चलने का आशय है, बहरत आवैं में उद्यानों में और सरोवरों के किनारे विहार करते हुए आने का भाव है, गहरत आवै में चाँदनी के श्वेत रंग के गाढ़े होने का बिम्ब है ’’फहरत आवै’’ में दूध के फेन के तरह ऊपर उठने की क्रिया मूर्त है और ’छहरत आवै’’ में चांदनी के सर्वत्र बिखरते जाने का बिम्ब है।
एक अन्य गत्वर बिम्ब में भी इसी प्रकार क्रियाशीलता का चित्रण किया गया है-
तिमिर मतंग खोजने के लिये घूमता सा
झूमता सा निकला मयंक मृगराज है।
इस रूपकाश्रित चित्र में मृगया के लिये निकले हुए सिंह के घूमने और झूमने का आरोप चन्द्रमा पर किया गया है। ’’मधु’’ के बिम्बों में शब्दों की बिम्बात्मकता का पूरा उपयोग हुआ है-
’ंइंदीबर नैनी लंक लचक लछारी लै’ में मुष्टि मध्यमा तन्वंगी नायिका की कटि के लचकने और उसके बल खाकर चलने की क्रिया का प्रत्यक्षीकरण है।

भाव बिम्ब
गत्यात्मक अथवा ़िक्रयात्मक बिम्बों के अतिरिक्त कवि ने भावों और अनुभावों के भी आकर्षक बिम्ब अंकित किये हैं। इन बिम्बों में ऐन्द्रिय संवेदन की अपेक्षा मानसिक अनुभवों की प्रधानता है।

मुग्धता
मार के मंत्र पढ़ी सी गुलाल
गुपाल ने कीनी दसा यों हमारी।
हारी हजार चलाय अली
न चली न चली सो भरी पिचकारी।।

कोई गोपी होली के अवसर पर पिचकारी भरकर इस निश्चय के साथ निकली है कि आज वह कृष्ण को अच्छी तरह रंग स्नात करके उनकी सारी चालाकी निकाल देगी परन्तु जब वह कृष्ण को देखती है और वह उस पर गुलाल फेंकते हैं तो प्रेमानुभूति में वह मुग्ध होकर रह जाती है। पिचकारी चलाने की उसकी सचेतना तिरोहित हो जाती है। सौन्दर्य के आकर्षण और प्रेमानुभव जन्य मुग्धता का यह बहुत ही मुखर बिम्ब है।
यह तो नायिका की दशा है। उभयपक्षीय मुग्धता का यह बिम्ब भी उतना ही सजीव है-
दीठ सौं दीठ जो जूटी भई ’’मधु’’
दोउन की दसा ऐसी अनूठी
भूली उन्हें पिचकारी भरी
इन्हें भूल गई त्यों गुलाल की मूठी।।

अलसंता और मादकता
पाँखन पै दीसती सहेलीं झपकी सी आँख
पंकज पुहुप अधपाँखु सी जनावै है।
अंगन में यामिनी झकोरे लेत हौंसन तें
धोसन तें नीर धार निचुरत आवै है।।
-
अर्द्धमुकुलित कमल पुष्प के समान ’’झपकी सी आँख’’ में आलस्य का और ’’अंगन में यामिनी झकोरें लेत हौंसन तें’’ में मादकता का बिम्ब है।

यौन बिम्ब
’’मधु’’ के काव्य में प्रेम का चित्रण मानसिक धरातल पर हुआ है। उसमें मांसलता तथा भौतिकता नहीं है। परन्तु उनके अभिजात काव्य में श्रृंगार के कुछ परम्परित चित्र हैं। इनका चित्रण अवसर तथा प्रसंगविशेष के अनुसार कवि कर्म की पूर्ति के लिये हुआ है। ये यौन बिम्ब अत्यन्त स्थूल और मांसल है। स्वतंत्र रूप से अंकित यौन बिम्बों का आलेखन संयमित है। कवि की प्रमुख चेतना आदर्शवादी, नैतिक और राष्ट्रीय है। इसलिये उसके काव्य में यौन बिम्ब अत्यन्त विरल है।
निशा सुन्दरी के तन से लिपटी
मुकता जटी साटिका खोलते आये।

रति की व्यापार पूर्णता के विचार से एक अन्य बिम्ब दृष्टव्य है-
प्रणयी नलिनी नलिनीश ने रात्रि में
प्रेम का मूल्य परस्पर आँका।
जग का क्रम भूले प्रभात हुआ
दिननाथ ने पूरब से कुछ झांका।।
लगा लाज लगाम में टाँका वहाँ
उड़ा रंग सुधांशु की श्री सुरवया का।
नलिनी ने यहाँ झट आहट से
नव पल्लवों के पट से मुख ढाँका।।
कुमुदिनी और चन्द्रमा के प्राकृतिक व्यापार पर आरोपित इस रति-बिम्ब की रेखाएँ संयमित होते हुए भी स्पष्ट हैं। युगनद्ध कुमुदिनी और चन्द्रमा के द्वारा काल-विस्मृति, प्रातःकाल होेते ही सूर्य का उनको छिपकर देख लेना, लज्जा के कारण चन्द्रमा के मुँह का रंग उड़ जाना और कुमुदनी का मुँह छिपा लेना इस लक्षित बिम्ब का भावपूर्ण प्रत्यंकन है।

निष्कर्ष
बिम्बों की सफलता उनकी मूर्तिमत्ता से ही आँकी जाती है। बिम्ब की रंग-रेखाएँ जितनी स्पष्ट और स्वाभाविक होंगी, बिम्ब की ऐन्द्रियता उतनी ही सहनग्राह्य और प्रभावशाली होगी। ’’मधु’’ के बिम्ब सरल, पुष्ट और सहज संवैद्य है। कवि ने उपलक्षित बिम्ब योजना में अलंकारों का प्रयोग इस प्रकार किया है कि न तो वे बिम्ब के स्वरूप को आच्छादित करते हैं और न उनका समानान्तर आभास होता है। वे अपने चमत्कार और चारूत्व से बिम्ब को मूर्तिमान करने में पूरी तरह सहायक हुए हैं।
-0-
ऽ प्रतीक विधान
अनुभूति जब भाषा के प्रचलित प्रयोगों द्वारा सम्प्रेषित नहीं हो पाती तब अभिव्यक्ति प्रतीकाश्रित हो जाती है। शब्दों के वाच्यार्थ हमारे साधारण विचारों और भावों का वहन तो कर लेते हैं किन्तु सूक्ष्म और गहन अनुभतियों की विशद व्यंजना में वे असमर्थ हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में प्रायः दृश्य जगत के उपादानों का प्रतीक के रूप में व्यवहार किया जाता है। डॉ0 कृष्णचन्द्र वर्मा ने प्रतीकों की आवश्यकता के विषय में लिखा है-’’सहृदय संवेदनशील और कल्पना कलित कवि-चित्त की कितनी भी अनुभूतियाँं ऐसी होती है जिन्हें सामान्यतः प्रयुक्त भाषा मंे संवेदित नहीं किया जा सकता, ऐसी ही कवि अनुभूतियों अथवा काव्यानुभूतियों के लिये कवि को प्रतीकों का आश्रय ग्रहण करना पड़ता है।18
प्रतीक का शाब्दिक अर्थ प्रतिकृति या चिन्ह है। गणित में भी कुछ प्रतीक गृहीत किये जाते हैं परन्तु काव्य प्रतीक उनसे भिन्न हैं। गणित में प्रयुक्त होने वाले प्रतीकों में कोई भावना या अनुभूति निहित नहीं होती है। काव्यगत प्रतीक किसी मनोदशा अथवा अन्तर्दृष्टि की प्रतिकृति होते हैं।19 काव्यगत प्रतीक और हृदयगत भाव के बीच मंें तर्क्य सम्बन्ध होता है। प्रतीक सदैव किसी न किसी मध्यस्थ प्रकार के व्यापार का प्रतिनिधि होता है।20 इसीलिये काव्यगत प्रतीक प्रायः दृश्य जगत से लिये जाते हैं दृश्य जगत के पदार्थो के रूप गुण के प्रति हमारा निश्चित बोध बन जाता है। ये पदार्थ अपने रूप गुण के साहचर्य से अनुभूति को विशद रूप से व्यंजित कर देते हैं। डॉ0 प्रेमनारायण शुक्ल के अनुसार ’जब तक प्रतीकों के साथ हमारा इन्द्रिय प्रत्यक्ष नहीं होगा तब तक वे भाव अथवा विचार की न तो सृष्टि ही कर सकंेगे और न उन्हें बल ही प्रदान कर सकेंगे।21
प्रतीक योजना में किसी अगोचर या अप्रस्तुत विषय का प्रतिविधान किसी गोचर वस्तु के द्वारा किया जाता है, जैसे किसी देवता का प्रतिनिधित्व उसकी प्रतिमा या अन्य कोई वस्तु कर सकती है।22
कवि की लालसा थोड़े से शब्दों में अधिक से अधिक कह देने की होती है वह अभिव्यक्ति के घिसे पिटे रूप को छोडकर नव्यता का संधान भी करना चाहता है। इसी के साथ वह अपनी बात को प्रत्यक्ष रूप से न कहकर ऐसे उपकरणों का प्रयोग करता है जिनसे प्रस्तुत की उद्भावना अधिक प्रखर और आल्हादक हो जाती है। प्रतीक कवि के इन्हीं मनोरथों की पूर्ति करते हैं। यहाँ तक तो वे कवि के सहायक और भावों के उपकारी बनकर आते हैं। परन्तु कभी कभी अत्यंत वैयक्तिकता के कारण गहन रहस्यानुभूतियों को प्रकट करने के कारण अथवा अत्यधिक प्रयोगातुरता के कारण वे या तो जटिल और क्लिष्ट हो जाते हैं या साध्य बनकर भाव के अपकारी हो जाते हैं। प्रतीक जब आन्तरिक अनिवार्यता और सहजता से उद्भुत होते हैं तभी उनकी सार्थकता है। ’’कोरे बौद्धिक श्रम से आगत प्रतीकों में वह सौन्दर्य और व्यंजना मुश्किल है जो अनायास और भावावेश निर्गत प्रतीकों में हुआ करती है।23
प्रतीक और सादृश्य मूलक अलंकारों की प्रकृति में साम्याभास के कारण प्रायः उनमें अभेद मान लिया जाता है। प्रतीक और अलंकार में स्वरूप और प्रयोजन दोनों दृष्टियों से अन्तर है। उपमा और उत्प्रेक्षा में तो प्रस्तुत और अप्रस्तुत का सभेद कथन होने के कारण साम्य अलग दिखायी देता ही है, रूपक में भी, जिसमें प्रस्तुत और अप्रस्तुत में, अभेद स्थापन होता है, साम्य ही बढ़कर एकरूपताा धारण कर लेता है। परन्तु प्रतीक में प्रस्तुत और अप्रस्तुत का अलग-अलग बोध न होकर एकरूपता की चरम परिणति होती है। प्रतीक में प्रस्तुत में ही अप्रस्तुत का अध्यवसान रहता है।24 शुक्लजी ने प्रतीक और अलंकार के अन्तर को स्पष्ट करते हुए लिखा है-’’प्रतीक का आधार सादृश्य या साधर्म्य नहीं, बल्कि भावना जाग्रत करने की निहित शक्ति है। पर अलंकार में उपमान का आधार सादृश्य या साधर्म्य ही माना जाता है। अतः सब उपमान प्रतीक नहीं होते पर जो प्रतीक भी होते हैं वे काव्य की बहुत अच्छी सिद्धि करते हैं।25
प्रतीकों की निर्मित पर देश और काल का प्रभाव पड़ता है। अज्ञान के लिये अन्धकार ज्ञान के लिये प्रकाश, वीरता के लिये सिंह और कायरता के लिये श्रृगाल जैसे सार्वभौम प्रतीक बहुत कम होते हैं। अधिकतर प्रतीक भौगोलिक स्थिति, संस्कृति तथा ऐतिहासिक घटनाओं से प्रभावित होते हैं। भारत मंें ग्रीष्म ऋतु कष्ट का प्रतीक है लेकिन शीत प्रधान देशों में वह सुखद है। गंगा, मानसरोवर, कल्पवृक्ष और स्वस्तिक भारतीय संस्कृति के पावन प्रतीक हैं। छुहारा मुसलमानों का पवित्र फल है। पुराण और इतिहास भी प्रतीक निर्धारण करते हैं। हिरण्यकशिपु, रावण और कंस अत्याचार और आसुरी वृत्ति के प्रतीक हैं। राणा प्रताप, शिवाजी और झांँसी की रानी स्वातंत्र्य चेतना और वीरता के प्रतीक हैं। जयचन्द, मीरजाफर और दूलह देशद्रोह के प्रतीक हैं। प्रकृति से भी अनेक प्रतीक गृहीत किये जाते हैं। मधुमास उल्लास का तथा चकोर और चातक अनन्य प्रेम निष्ठा के प्रतीक हैं।
कुछ प्रतीक ऐसे होते हैं जो एक से अधिक भावों या विचारों का प्रति विधान करते हैं। वटवृक्ष सघन छाया के कारण संरक्षण भावना का भी प्रतीक है और अपनी छाया में किसी अन्य पौधे को न पनपने देने के कारण हेय अर्थ की भी व्यंजना करता है।
युग विशेष के कावय की संवेदना के आधार पर भी प्रतीकों में अन्तर हो जाता है। छायावादी प्रतीक कोमल और मधुर हैं। प्रगतिवादी कविता के प्रतीक प्रखर और आग्नेय हैं। प्रयोगवादी काव्य के प्रतीक अन्तश्चेतना और मनोविश्लेषण से संयुक्त हैं।
प्रतीकों का क्षेत्र इतना विस्तृत और विविधि आयामी है कि उन्हें किसी संक्षिप्त वर्गीकरण में नहीं रखा जा सकता है। शुक्ल जी ने दो प्रकार के प्रतीक माने हैं। एक तो वे जो मनोविकारों या भावों को जगाते हैं। दूसरे वे जो भावनाओं या विचारों को जगाते हैं।26 डॉ0 प्रेमनारायण शुक्ल ने प्रतीक के चार प्रकारों का उल्लेखकिया है- परम्परागत, देशगत, व्यक्तिगत और युगगत।27 यह वर्गीकरण देश और काल को दृष्टि में रखकर किया गया है। विषय के आधार पर आध्यात्मिक, श्रंृगारिक राष्ट्रीय भावनापरक जैसे अनेक वर्ग हो सकते हैं। व्यंजनात्मकता की दृष्टि से प्रतीक रूपकात्मक, अन्योक्तिपरक और लक्षणामूलक हो सकते हैं।28
’’मधु’’ ने अपने काव्य में विभिन्न प्रकार के प्रतीकों का व्यवहार किया है। उनके अधिकांश प्रतीक परम्परागत हैं। पौराणिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रीय चेतना से सम्पन्न विषयों में ऐसे ही प्रतीक आ सकते हैं। प्रेम और अन्य कोमल भावों की अभिव्यक्ति के लिये भी प्रायः स्वीकृत प्रतीकों का ही प्रयोग हुआ है।

पौराणिक और ऐतिहासिक प्रतीक
हिरण्य कशिपु- अत्याचार
समुझि न आवै कौन भांति को गनावै ऐसी
अगनित बाढ़ी हिरनाकुस समाज है।
विभीषण- द्रोह
झांसी के एक विभीषण की यह कलुष कलंक कहानी हैं।
राघोबा, मीरजाफर- द्रोह
कोई राघोबा खोजूंँगा या कोई जाफर खोजूंँगा।
लाल झण्डा- क्रान्ति
वो पूरब में सूरज का ढेरा उठा।
लिये लाल झण्डा सबेरा उठा।।

सांस्कृतिक प्रतीक
होली खेलना- उल्लास, आनन्द
बोरी रंगराग में गई है अरी ओरी कितै
होरी के बिना ही कैसी होरी खेलि आई है।
होली जलना- दहन-वेदना
दिल में जब होली जलती है मैं दीप जलाऊँ फिर कैसे
ईद- हर्ष
मातम करने को मन कहता में ईद मनाऊँ फिर कैसे
कर चुरीं-(हाथ की चूड़ियाँ)- स्त्री का सौभाग्य
वरत विवस ह्वै वृद्ध कौं बाला करत विचार
देखें कै दिन कर चुरीं कर राखत करतार।

प्रकृति परक प्रतीक-
उषा- उदयकाल, शैशव
संध्या- अवसान, मृत्यु
उनके जीवन में ऊषा के पहले संध्या मुस्कानी।
निशा- दुःख, अचेतावस्था
प्रभात- हर्ष, चेतनावस्था
इसी भांँति व्यथा में सिरानी निशा
था प्रभात किसी विधि होने चला।
भ्रमर- रसलोमी
अरे भौंर तू भूला हुआ निज को
फिरता उस ही पै दिवाना हुुआ।
भावात्मक प्रतीकः-
पत्थर- कठोरता
हृदय हो कोमल कमल सा कहाता रहा
देवि, वह पत्थर हुआ है कहाँ कब से।
कागजी फूल- निस्सार आड़म्बर
अरे भौंर तुझे क्या प्रमाद हुआ
इस कागजी फूल में फूल रहा है।
नभ-कुसुम- अलभ्य आकर्षण
मृगजल- मिथ्या प्रतीति
नभ कुसुमों का उरहार मिला
मृगजल अभिषेक साज पाया।।

ऽ छन्द विधान
छन्द और कविता का घनिष्ठ सम्बन्ध है। काव्य शास्त्रियोें ने इनमें अविनाभाव सम्बन्ध माना है। मानव-शरीर के रूपक से कहा जाये तो यदि रस काव्य की आत्मा है, तो छन्द उसका मोहक, मधुर, मांसल और सुवर्ण शरीर है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व व्यवहार जगत् में संभव नहीं है।29
छन्द ध्वनियों का व्यस्थित और क्रमबद्ध संगुफन है। व्यवस्थित क्रम से उत्पन्न विशिष्ट लय से वाणी मंे संगीत का प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। लय ही छन्द का तत्त्व है। मानव प्रवृत्ति तो लयानुरागी है ही, प्रकृति में भी लय व्याप्त है। लय का सम्बन्ध भावनाओं की तीव्रता से दिखाते हुए डॉ0 नगेन्द्र ने लिखा है कि शरीर के भीतर रक्त प्रवाह की समगति लयपूर्ण है। भावोच्छ्वास के कारण रक्त की गति तीव्र हो जाती है और उसकी लय सम न रहकर अस्थिर और तीव्र हो जाती है। इसी आन्तरिक लय का भाषा पर आरोप करके मनुष्य ने छन्द का आविष्कार कर लिया।30 इसी आधार पर छन्दों की रसानुकूलता का निर्धारण किया गया है।
आज की कविता का छन्द-तिरस्कार काव्य में छन्द की महत्ता और अर्थवत्ता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाता। विश्व की सभी भाषाओं की कविता में छन्द की आवश्यकता का अनुभव किया गया है और उसकी लम्बी परम्परा रही है। आज की हिन्दी कविता में भी छन्द किसी न किसी रूप में जीवित है। कविता और छन्द के सम्बन्ध के विषय में पंत जी के शब्द विचारणीय हैं-’’कविता हमारे प्राणों का संगीत है, छन्द हृत्कम्पन, कविता का स्वभाव ही छन्द में लयमान होना है। जिस प्रकार नदी के तट अपने बन्धन से धारा की गति को सुरक्षित रखते-जिसके बिना वह अपनी ही बंधनहीनता में अपना प्रवाह खो बैठती है, उसी प्रकार छन्द भी अपने नियंत्रण से राग को स्पन्दन, कम्पन तथा वेग प्रदान कर, निर्जीव शब्दों के रोड़ों में एक कोमल, सजल, कलरव भर, उन्हें सजीव बना देते हैं। वाणी की अनियमित साँसंे नियंत्रित हो जातीं, तालयुक्त हो जातीं, उसके स्वर में प्राणायाम, रोगों में स्फूर्ति आ जाती, राग की सम्बद्ध झंकारें एक वृत्त में बँध जातीं, उनमें परिपूर्णिता आ जाती है।31 आज की छन्दहीन कविता यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिये स्वयं को आवश्यक मानती है। निराला ने भी छन्दमुक्त कविता का सत्कार किया। परन्तु ’’मधु’’ का सम्पूर्ण काव्य छन्दबद्ध है। इसलिए उनकी कविता में प्रयुक्त छन्दों का विवेचन आवश्यक है।
आधुनिक काव्य में पुरानी लयों के आधार पर नवीन छन्दों के प्रयोग भी हुए हैं और पुराने छन्दों को भी स्वीकृति मिली हैं। ’’मधु’’ ने प्रमुख रूप से कवित्त और सवैया छन्दों को अपनाया है। इन छन्दों में इन्होंने प्रबंध और मुक्तक दोनों प्रकार की काव्य रचना की है। उनके प्रबन्ध काव्यों का छन्द विशेष रूप से धनाक्षरी है। केवल कहीं कहीं दो एक सवैये आये हैं। वृ़त्त वर्णन और प्रबन्ध निर्वाह के लिये सवैया की अपेक्षा घनाक्षरी छन्द अधिक सहायक हैं। मुक्तक काव्य में घनाक्षरी और सवैया दोनों का प्रयोग हुआ है, परन्तु सवैया छन्द की प्रमुखता है। ’’चकोर और चन्द्र’’ पंतग और दीपक, पपीहा तथा हाला आदि रचनाओं में कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम सवैया छन्द है। ’’बुन्देलखण्ड दर्शन, में कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति और बेतवा वावनी में भी कुछ कवित्तों को छोड़कर सवैया छन्द का प्रयोग हुआ है। ’’मुरलीमाधुरी’’ और ’’होलीमाला’’ में कवित्त और सवैया दोनों हैं।
’’मधु’’ को ये छन्द अपने परिवेश से प्राप्त हुए थे। उनकी मूल प्रेरणा छायावादी शिल्प के गीतों में प्रस्फुटित हुई थी। परन्तु कवित्त और सवैया में भी उनकी छन्द सिद्धि का परिचय मिलता है। कवित्त के भेदों में मनहरण और सवैया के भेदों में दुर्मिल, सुन्दरी, मतगयन्द और किरीट उनके प्रिय छन्द है। कहीं कहीं उन्होंने रूपघनाक्षरी, जलहरण, डमरू, मुक्तहरा, वाम और सुख छन्दों का भी प्रयोग किया है, परन्तु ऐसे छन्द संख्या में बहुत अधिक नहीं है।
कवित्त के अतिशास्त्रीय नियमों का गतानुगतिक निर्वाह न करते हुए उन्होंने यति, लघु-गुरू उच्चारण और चरणान्त में गण व्यवस्था में आर्षवाक्य को सदैव न मानकर छन्द को अर्थयति, पाठयति के आधार पर ही डाला है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके कवित्तों में कहीं भी शिथिलता या सौष्ठवहीनता आयी हैं।
मात्रिक छन्दों में कवि ने प्रमुख रूप से पादाकुलक, मनोरमा, सार, राधिका, ताटंक, मत्तसवैया और बिहारी को अपनाया है। अन्य प्रयुक्त छन्द दोहा, रोला, छप्पय, श्रृंगार और शक्ति हैं। दोहा, रोला, छप्पय और बिहारी के अतिरिक्त सभी मात्रिक छन्दों का प्रयोग गीतों में या गीतात्मक प्रदीर्घ कविताओं में हुआ है। अधिकांश गीत पद्धति की लय पर आधारित हैं। उसी लय पर दो चरणों के योग से निर्मित 32 मात्राओं का मत्तसवैया भी अनेक गीतों का छन्द है। ’’सैनिक या प्रियतमा को पत्र’’ पत्रगीत भी इसी छन्द में है। मनोरमा छन्द की लय गीतों के बहुत उपयुक्त है। ’’मधु’’ ने इस छन्द में भी अनेक गीत लिखे हैं।
गीतों में कवि ने पुरानी मात्रिक लयों का ही आधार ग्रहण किया है। उनमें न तो भिन्न छन्दों से बने मित्र छन्द हैं न किसी लय को छोटा बड़ा किया गया है। कवि ने निश्चित लय के आधार पर गीतों की इकाई का अन्त्यानुक्रम निश्चित कर लिया है। गीतों की संरचना में प्रायः एक ही पद्धति अपनायी गयी है। गीत के छन्दक में प्रायः दो चरण अथवा चार चरण और सम्पद में चार चरण अथवा आठ चरण रखे गये हैं। बिहारी छन्द में कवि का विपुल सैर काव्य है।

घनाक्षरी
घनाक्षरी छन्द का प्रयोग सर्वप्रथम भक्तिकालीन काव्य में मिलता है। उत्पत्ति की दृष्टि से कुछ लोगों ने इसका पूर्व रूप वैदिक छन्दों में माना है। डॉ0 पुत्तूलाल शुक्ल की यह मान्यता है कि वर्णिक छन्द हिन्दी में अचानक किसी कवि ने आविष्कृत नहीं कर दिये। वह लिखते हैं कि घनाक्षरी का संबंध सूत्र वैदिक अनुष्टुप् से है, जो लय की विभिन्न अवस्थाओं में विकसित होकर भी अपनी अक्षर संख्या को अक्षुण्ण रख सका। उसका अन्तिम सप्तक उष्णिक् ( 7 अक्षर ) का ही रूप है।32
आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र घनाक्षरी को हिन्दी का अपना छन्द मानते हैं। वह किसी प्राचीन भाषा-संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश से नहीं लिया गया है।33 परन्तु सुमित्रानन्दन पंत को यह छन्द हिन्दी का नहीं प्रतीत होता है- ’कवित्त छन्द, मुझे ऐसा जान पड़ता है, हिन्दी का औरसजात नहीं, पोष्य पुत्र है, न जाने, यह हिन्दी में कैसे और कहाँ से आ गया, अक्षरमात्रिक छन्द बंगला में मिलते हैं, हिन्दी के उच्चारण संगीत की ये रक्षा नहीं कर सकते। कवित्त को हम संलापोचित (कलोकियल) छन्द कह सकते हैं, सम्भव है, पुराने समय में भाट लोग इस छन्द में राजा महाराजाओं की प्रशंसा करते हों और इसमें रचना सौकर्य पाकर तत्कालीन कवियों ने धीरे-धीरे इसे साहित्यिक बना दिया हो।34
शुक्ल जी ने वीरगाथाकाल में प्रयुक्त छन्दों में दूहा, तोमर, त्रोटक, गाहा और आर्या के साथ कवित्त का भी उल्लेख किया है, किन्तु कवित्त शब्द जैसा उन्होंने स्वयं लिखा है, छप्पय के लिये प्रयुक्त हुआ है।35 वह घनाक्षरी छन्द नहीं है।
संगीत की दृष्टि से ध्रुपद राग में गाये जाने वाले पद घनाक्षरी से पूरी तरह मिलते हैं। ’’सूरसागर’ में ऐसे अनेक पद हैं जिनके स्वरूप में घनाक्षरी छन्द से अदभुत साम्य है-
सुनि री सयानी तिय रूसिबे को नेम लियौ,
पावस दिननि कौऊ ऐसौ है करत री।
दिसि दिसि घटा उठी मिलि री पिया सौं रूठी
निडर हियो है तेरौ नेंकु न डरत री।।
चलिए री मेरी प्यारी, मौकों मान देन हारी,
प्रान हूँ तें प्यारे पति धीर न धरत री
सूरदास प्रभू तौहिं दियो चाहे हित-बित
हँसि क्यों न मिलै तेरौ नेम है टरत री।।36
- - - - -
हा हा रे हठीले हरि जननी को कह्यौ करि
इंद्र गोर वरषि गरि अब गिरिवर धरि।
सात धौंस कीन्हीं छाँह नैंकु न पिरानी बांह
अति ही कठिन कूट राख्यौ रे छतनि करि।।
सुनि के जसोदा वाइ निकट गोपाल आइ
करौ रे सबै सहाइ कहै नैन जल भरि।
- - - - - -
सूरदास प्रभु गिरिधर कौ कौतुक देखि
कामधेनु धरयौ लिये इंद्र अपडर डरि।।37

उद्धृत पदों में से पहला धनाक्षरी (31 वर्ण) का उदाहरण है और दूसरा रूप घनाक्षरी (32 वर्ण, अंतिम लघु) का। दूसरे पद में रूप घनाक्षरी से केवल यहीं अंतर है कि रूप घनाक्षरी में चार चरण होते हैं और सूर के पद में छै चरण हैं। उनके इस तरह के कुछ अन्य पदों में चार ही चरण हैं।
घनाक्षरी के आदि óेत चाहे अनुष्टुप और उष्णक् हों अथवा उसका निर्माण राग विशेष के आधार पर किया गया हो परन्तु इतना निश्चित है कि भक्तिकालीन काव्य में उसका स्वरूप स्थिर हो गया था। गंग कवित्तों के लिये प्रसिद्ध हैं। नरोत्तमदास और तुलसीदास ने घनाक्षरी का साफ सुथरा प्रयोग किया है।
घनाक्षरी छन्द को पूर्ण उत्कर्ष रीतियुग में प्राप्त हुआ। इसकी अनगढ़ता तो भक्तिकाल में ही समाप्त हो गयी थी, रीतियुग में वर्ण मैत्री, शब्दमैत्री, लय, रसानुकूल वर्णयोजना आदि के द्वारा उसमें ऐसी तराश और नक्काशी की गयी कि यह छन्द पूरी आभा से दीप्त हो उठा। पद्माकर ने कवित्त-रचना में अन्यतम सिद्धि प्राप्त की। द्विवेदीयुग और छायावाद युग में भी कवित्त का अनेक कवियों द्वारा प्रयोग होता रहा है। वर्तमान युग में जगन्नाथदास रत्नाकर, सत्यनारायण, कविरत्न, हरदयालसिंह नाथूराम शंकर शर्मा, शंकर, सनेही हितैषी, गोपालशरण सिंह, अनूप शर्मा, मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर और शिशुपालसिंह शिशु आदि कवि खड़ी बोली में घनाक्षरी छन्द के सफल प्रयोक्ता हुए हैं। बुन्देलखण्ड के झाँसी जनपद में घनश्यामदास पाण्डेय नाथूराम माहौर, घासीराम व्यास, सेवकेन्द्र और नरोत्तमदास पाण्डेय ’’मधु’’ तथा टीकमगढ़ राज्य से सम्बन्धित कवियों में रामाधीन खरे, अम्बिकेश, ब्रजेश और बिहारी इस छन्द का कुशल प्रयोग करते रहे हैं।
कवित्त अनियत वर्णिक छन्द है। 26 से अधिक वर्णों के छन्दों को सामान्य रूप से दण्डक कहा जाता है। देव ने 30 से 33 वर्णो तक चार प्रकार के अनियत दण्डक माने हैं, परन्तु सामान्यतः इसके दो भेद स्वीकृत हैं। 31 वर्णांे के छन्द को कवित्त अथवा मनहरण कहा जाता है और 32 वर्णो की रूपघनाक्षरी होती है।
घनाक्षरी में सवैया की तरह गणों का बन्धन नहीं होता। उसमें केवल प्रत्येक चरण में 16 और 15 की यति से 31 वर्णोंे का नियम है। अन्त में गुरू वर्ण होना चाहिये। रूपघनाक्षरी मंे चरणान्त में लघु का नियम माना गया है, परन्तु रत्नाकर जी ने अन्त्य गुरू वाली श्रुतिसुखद रूपघनाक्षरी का उदाहरण देते हुुए उसमें अन्त्य लघु के नियम को अनिवार्य नहीं माना है।38
कवित्त में साधारणतया 16 और 15 पर यति का विधान है परन्तु लोक कवियों ने 16 वर्णों पर यति की योजना न करके एक या दो क्रम वर्णो पर भी की है। इसी प्रकार चरण की रचना में 8, 8, 8, 7 वर्णसमूहों पर विशेष यति के नियम का भी कवियों ने निरपवाद पालन नहीं किया है। वैसे लय की दृष्टि से पाठ करने पर कवित्त में 8, 8, 8, 7 पर स्वाभाविक विराम आ जाता है और उसमें छन्द में नाद-माधुर्य उत्पन्न होता है। कवित्त में लय का ही महत्त्व है। इसी की सुरक्षा के लिये यति और अन्तर्यति का विधान है, परन्तु यति से भी अधिक लय का सौन्दय सम और विषम शब्द मैत्री पर आश्रित है।
’’मधु’’ ने अष्टक यति के नियम का निरपवाद पालन तो नहीं किया है, लेकिन उनके अधिकतर कवित्तों में चार यतियाँ है-
लहरत आवै लोल । लहर पियूष की सी।
पावन प्रकाश पट । पहिरत आवै है।
उपर्युक्त कवित्त में 16 और 15 की यति के साथ ही 8, 8, 8, 7 की अन्तर्यतियाँ भी हैं, परन्तु कहीं कहीं अन्तर्यति शब्द के बीच में भी आ गयी हैं-
काली काली घूम धँुंध । राली अलकावलि पै
पंक्ति भ्रमरों की घटा मेघों की विसार दूँ।
आनन अमन्द की नि। हार ’मधु’ मंजु द्युति।
पंकज प्रसून पूर्ण चन्द्रमा को हार दूँ।।
भाव व्यंजना में सहायक मानकर कहीं कहीं कवि ने 16 वर्णांे पर यति न रखकर एक या दो वर्ण कम पर कर दी है-
(अ) हरि हरि करते उठा लिया करों से।
करूणातुर हो आतुर हो उर से लगा लिया।
(ब) रति मान मोचनी रूदन रस रोचनी ।
महिम मृगलोचनी सुलोचना सुलोचनी।।
उपर्युक्त उदाहरणों में पहले में यति 14 वर्णांे पर है और दूसरे में 15 पर है।
देव के सन्दर्भ में डॉ0 नगेन्द्र ने लिखा है कि चार यतियों के नियम पालन से कवित्त के ’मुक्तत्व’’ में बाधा पड़ती है।39 यति का प्रयोजन लय में सहायक होना है। चरण के मध्य की यति को लय यति कहा भी जाता है।40 परन्तु लय यति के साथ अर्थ यति का भी महत्व है।41 भावानुकूल पाठ यति अष्टक यति से अलग होते हुए भी भाव की व्यंजना में अधिक सहायक होती है। अर्थ की दृष्टि से चरण के शब्द समूहों का पृथक्करण तथा यति विधान अर्थ को अधिक विवृत करता है-
रति मान मोचनी रूदन रस रोचनी
महिम मृगलोचनी सुलोचना सुलोचनी
उपर्युक्त चरण में अर्न्ययति के नियम से यति इस प्रकार होगी-
रति मान मोचनी रू । दन रस रोचनी म।
हिम मृग लोेचनी सु। लोचना सुलोचनी
लेकिन नाद-साम्य के अनुसार तथा भाव-व्यंजना की स्पष्टता के लिये इसका पाठ रतिमान मोचनी। रूदन रस रोचनी। महिम मृग लोचनी। सुलोचना सुलोचनी होगा।
कवित्त में प्रमुखता लय की है और लय-विधान सम विषम शब्दों के निश्चित क्रमानुसार प्रयोग पर निर्भर है। सम विषम प्रयोगों की व्यवस्था में उलटफेर से कवित्त की लय पर आघात होता है। जगन्नाथ प्रसाद ’’भानु’’ ने सम विषय शब्दों के प्रयोग सम्बन्धी नियमों पर विस्तार से विचार किया है।42 ’’मधु’’ ने सम-विषम शब्दों की व्यवस्था पर पूरा ध्यान दिया है। इसलिये उनके कवित्तों में लय तत्त्व सुरक्षित है। सम और विषम शब्दों का अर्थ दो और तीन वर्ण वाले शब्द ही नहीं है। इस दृष्टि से तो कवित्त के स्थूल रूप की साधना होने के कारण भाव अत्यंत संकुचित हो जायेगा। ’’मधु’’ ने चार और पाँच वर्णों के शब्दों का भी प्रयोग किया है। इसलिये यदि अष्टक की दृष्टि से देखा जाये तो यति शब्द के बीच में पड़ती है, परन्तु इस तरह लय पर कोई आघात नही होता है। उनके कवित्त पाठ की शैली में यति 16 और 15 पर आती थी अथवा अर्थ के अनुसार शब्द समूहों पर विराम देकर वह कविता-पाठ किया करते थे।
कवित्त के चरणान्त में यगण (ऽऽऽ) का प्रयोग पूरे शब्द में नही होना चाहिए। यदि मनण आये तो अन्तिम गुरू पहले के दोनों गुरूओं से अलग होना चाहिए।42
वीर ब्रज में तो वर जोरी हौन लागी चल
रहैं तौन खौरी जाँ न होरी होत होवै री।।
कवित्त के अन्य भेदों में कवि ने रूप घनाक्षरी जलहरण और डमरू शब्दों का प्रयोग किया है।

रूप धनाक्षरी
32 वर्ण, चरणान्त में गुरू, लघु। अंतिम लघु के पहले तीन गुरू सुमधुर होते हैं।

अमल अपारन तें हेम हीर हारन तें
तारन कतारन तें आरती उतारी जात।
पूर मुकतान भरि भूरि भूरि भायन तें
सुन्दर सिंदूरमयी माँग है सम्हारी जात।।
वृृन्द वृन्द देव यदुनन्दन समेत ’’मधु’’
नन्दन सौं वन्द बेरि बेरि वलिहारी जात।
राधिके तिहारौ मुखचन्द धन्य जापै ब्रज
चन्द नभचन्द कोटि कोटि चन्द वारी जात।।

जलहरण
32 वर्ण चरणान्त में दो लघु
हम तुम एक हो चुके हैं दो करेगा कौन
मेरे नाथ आओ मुझ में ही समा जाओ तुम।
निकट रहो या रहो दूर जहाँ कही रहो
कामना है केवल यही कि सुख पाओ तुम।।
वचन हमारा मान निज नयनों से ’’मधु’’
मुक्त आँसुओं की मत मेघ झर लाओ तुम
हँस के सदा ही रहे मुझको हँसाते आज
रोकर यों आप ही न मुझको रूलाओ तुम।।

डमरू
32 वर्ण कवि-प्रथा के अनुसार सभी लघु वर्ण।
ऐसे छन्द प्रयत्नसाध्य और वैचित्र्य के उदाहरण होते हैं। ’’मधु’’ ने एक डमरू छन्द लिखा है। इसमें सभी वर्ण लघु ही नहीं मात्राहीन भी हैं-
तज छल कपट करत अघमय तन
तरत न कत भव खल तप कर कर।
नरक धरक न धरत उर प्रतपल
अनरथ सरत मदन मद भर भर।।
तब अघ मग गह मदन दहन पग
असरन सरन सतत उर धर धर।
तप तप तय कर शठ भव भय हर
हर हर जप नर नर जप हर हर ।।

सवैया
सवैया घनाक्षरी की अपेक्षा अधिक पुराना छन्द है। सवैया की उत्पत्ति पर विचार करते हुए डॉ0 नगेन्द्र ने उसे प्राकृत का छन्द माना है। वह लिखते हैं-’’हमारी धारणा है कि यह सपादिका का ही अपभ्रंश रूप है। पहले भाट लोग सवैया की अन्तिम पंक्ति को दो बार सबसे पूर्व और चौथे चरण के बाद-पढ़ते थे। इस प्रकार इसमें चार के स्थान पर पाँंच पंक्त्यिाँ नियमपूर्वक पढ़ी जाती थीं। सवाये (सपाद) रूप मेें पढ़े जाने के कारण ही इसका नाम सवैया (सपादिक) पड़ गया। सवैया संस्कृत का छन्द नहीं है।45 डॉ0 मनोहरलाल गौड़ ने इसका मूल संस्कृत को ही माना है। उनका अनुमान है कि सवैया के तेईस वर्णों वाले छन्द उपजाति के चौदह भेदों में से किसी एक का विकृत रूप है।
संस्कृत और प्राकृत के छन्दशास्त्र में सवैया शब्द का उल्लेख तो नहीं मिलता है परन्तु प्राकृत के पिंगल ग्रंथ प्राकृत पैंगलम् में 8 भगण वाले किरीट और 8 सगण वाले दुर्मिल छन्द दिये गयेहैं। इन छन्दों के स्वरूप पर भले ही संस्कृत के वर्णिक छन्द का प्रभाव पड़ा हो परन्तु दुर्मिल और किरीट नाम से सवैया का रूप-निर्धारण सर्वप्रथम प्राकृत में ही हुआ है। प्राकृत पैंगलम् के रचना काल के अनुसार सवैया का प्रयोग संवत 1243ई. के लगभग होने लगा था।
हिन्दी में सवैया को भक्तिकालीन काव्य में प्रचलन का सम्मान मिला। नरोत्तमदास अकबर, गंग और तुलसीदास ने इसका परिमार्जित प्रयोग किया है। सुदामाचरित में सवैया का निखरा हुआ यह रूप यह प्रमाणित करता है कि इसकी परम्परा किसी न किसी रूप में पहले से विद्यमान थी। घनाक्षरी की तरह सवैया भी रीतियुग का प्रमुख छन्द रहा है।
सवैया 22 से 26 अक्षरों तक का ऐसा वर्णिक छन्द है जिसमें गणों के नियम की व्यवस्था है। इसके एक प्रकार में एक ही गण की सात या आठ बार आवृत्ति होती है। गणों वर्णसंख्या और चरणान्त में लघु गुरू के अन्तर से सवैया के अनेक भेद स्वीकृत हैं। जगन्नाथ प्रसाद ’’भानु’’ ने छन्दः प्रभाकर में सवैया के 10 भेदों का उल्लेख किया है। लक्षण आचार्यो ने लगभग 48 प्रकार के सवैये माने हैं।46
एक ही गण की अनेक बार आवृत्ति होने से सवैया का स्वर विधान निश्चित क्रम में होता है। डॉ0 नगेन्द्र ने सवैया के राग तत्त्व पर विचार करते हुए लिखा है-नियमित रूप में राग का यह स्वरपात सवैया में एक अनूठा संगीत पैदा कर देता है, उसके राग का प्रवाह धीरे-धीरे बल खाता हुआ एक निश्चित सीमा तक बढ़ता है फिर वहाँ एक झकोर लेकर फिर उसी क्रम से आगे ब़ढ़ता है।47यह राग तत्त्व यदि सवैया को आकर्षण प्रदान करता है तो एक से स्वर विधान की अनेक आवृत्त्यिों से उसमें एकरसता और जड़ता भी आ सकती है। पंत जी ने इसी दृष्टि से सवैया की आलोचना की है। उनके शब्दों में इसी दृष्टि से सवैया में एक ही सगण की आठ बार पुनरावृत्ति होने से उसमें एक प्रकार की जड़ता एकस्वरता (मौनोटनी) आ जाती है। उसके राग का स्वरपात बार बार दो लघु अक्षरों के बाद आने वाले गुरू अक्षर पर पड़ने से सारा छन्द एक तरह की कृत्रिमता तथा राग की पुनरूक्ति से जकड़ जाता है।48
वर्णिक छन्द होने के कारण सवैया में गणों की गणना में कहीं कहीं गुरू को लघु ध्वनि की तरह पढ़ने की स्वतंत्रता है। जगन्नाथ प्रसाद ’’भानु’’ ने इस सम्बन्ध मंे लिखा है-...वर्णों का गुरूत्व और लघुत्व केवल उच्चारण पर निर्भर है न कि लिखावट पर। यदि लिखावट पलटें तो शब्द ही अशुद्ध और निरर्थक हो जायँ। अतएव शब्दों को प्रायः जैसे के तैसे ही रहने देते हैं और प्रसंगानुसार गुरू का उच्चार लघु और लघु का उच्चार गुरू करके इष्टगण मान लेते हैं।49
’’मधु’’ ने वैसे तो सात प्रकार के सवैयों का प्रयोग किया है, किन्तु उनके काव्य में दुर्मिल, किरीट और मत्तगयंद की बहुलता है। लघु गुरू के उच्चारण स्वातंत्र्य का उन्होंने निःसंकोच लाभ लिया है।
मत्त्गयंद:- सात भगण और दो गुरू

धारत हैं अधरान पै तो कहँ श्री हरि गायवे कौ ’’मधु’’ रागै।
तू मुख पै चढ़ि ह््वै तिरछी लगि óोनन धन्य गनै निज भागे।।
- - - -
रावरी रीति निहार औ बाँसुरी कौ न महा अचरज्ज में पागै।
कानन लागि लगैं मुख सों सब तू मुख लागि कें कानन लागै।।
इस छन्द के रेखांकित वर्ण उच्चारण के अनुसार लघु हैं, यद्यपि लिखित रूप में उनका रूप गुरू है।

दुर्मिल- आठ सगण
अधरातन हू लगि लागी रहै ब्रजचंद जू के अधरातन सौं।
मनमोहन की मनमोहनी है मधु जान परी इन बातन सौं।।
इक हाथ गही तिया के वशीभूत रहें नर रीत सनातन सों।
इह के वश में हरि क्यों न रहें वे गहे इह कौं दुहू हातन सौं।।
किरीट- आठ भगण

मानस मोहि मृगान समान सबै सुधि कौं विसरावन लागति।
शब्द सुधा दश हू दिशि में सरसावन लागत सावन लागति।।
पाहन से हियरे हू पसीज कें पानिप ह्वै छवि छावन लागति।
मां वर वानी की वीन नवीन जबै विधि वानी बजावन लागति।।

सुन्दरी- आठ सगण और एक गुरू

उड़ता उस और कभी वह तो उड़के इस ओर चला करता है।
अपने वश लौ पर ये न कभी अपना थल त्याग टला करता है।
जग वावले रंचक सोच तो तू कहाँ पूरण प्रेम पला करता है
क्षण ही के लिये जलता है पतंग दिया सब रात जला करता है।।

वाम- सात जगण और एक यगण

विजै कर लंक गढ़ै दल राघव कौ पल ही यह औध में आग्यौ।
सियापति पांयन पै ’’मधु’’ कैकयीजात गिर्यौ अति प्रीति में पाग्यौ।।
बिलोक यों बन्धुन बन्धुन में नव नेह सनेह अछेह उमाग्यौ।
विभीषण कौं सुगरीव सुग्रीव कौं मन्द विभीषण देखन लाग्यौ।।

मुक्तहरा- आठ जगण

सदा हम दौउन कौ चलै चक्र रचे रचनान अनेक प्रकार।
सकें रच वे नहीं नेम विरूद्ध रचें हम तौ रूचि के अनुसार।।
विचार में हीन विचारन में,’’मधु’’ जू यौं उचार असार विचार।
चहै विधि की समता करवौ अभिमानी अरे शठ कूर कुम्हार।।
सुख- आठ सगण और दो लघु

तम की मस टार बहा अरि ओर चहै मन वाह सुधा सुख सूरत।
तर की वसधा सब हीर लफै मन जात ललात हसौ धर मूरत।।
तत संगत में मन मोद सुधा सुख है बनता न बनी हम धूरत।
तप ताप भला रवि आकर चाहत सौ तस ना निकरौ तम चूरत।।

गीति शिल्प-
मधु’’ के अधिकांश गीत 16 मात्राओं वाले संस्कारी वर्ग के पादाकुलक समूह के छन्दों पर आधारित हैं। पादाकुलक वर्ग के सभी छन्दों में मात्राओं की संख्या समान होते हुए भी गण-योजना और गुरू-लघु-विधान की विविधता से उनकी लयों में अंतर हो जाता है। कहीं कहीं तो लय का अन्तर अत्यंत सूक्ष्म होता है। इन छन्दों में चार चतुष्कलों का नियम है परन्तु सभी में भेद निरूपण सर्वथा स्पष्ट न होने के कारण एक छन्द के लक्षण का आरोप दूसरे में भी हो जाता है। सिंह छन्द के प्रत्येक चरण के आदि में दो लघु और अन्त में सगण का नियम है परन्तु चरण के प्रारंभ में दो लघुओं के लक्षण का निषेध अन्य किसी छन्द में भी नहीं है। इसी प्रकार सगणान्त का लक्षण पादाकुलक, प´यटिका और मत्तसमक में भी हो सकता है। मत्तसमक में दूसरा अष्टक लघु से प्रारंभ होता है, परन्तु डिल्ला में भी भगणान्त के साथ दूसरा अष्टक लघु से प्रारम्भ हो सकता है। इसी प्रकार सिंह में भी आदि के दो लघु और सगणान्त के लक्षण के साथ नौवी ंमात्रा के लघु हाने का निषेध नहीं है।
इस प्रकार 16 मात्रिक संस्कारी वर्ग के विभिन्न छन्दों में मात्रा क्रम में भेद से लय की सूक्ष्म विविधताएँ परिलक्षित होती हैं तथा कभी कभी एक ही छन्द में विभिन्न लयें अन्तर्मूत हो जाती हैं। पादाकुलक के विभिन्न भेदों से एक ही छन्द में विभिन्न तरंगों और ध्वनियों को उत्पन्न करके प्रतिचरण में नवीनता की सम्भावना का पता चलता है।50
पुराने शब्दों से नवीन क्रमायोजन के आधार पर मात्रिक छन्दों को नव विकर्षाधार वर्ग में रखते हुए डा0 पुत्तूलाल शुक्ल ने लिखा है-इस वर्ग की समस्त लयें पुरानी ही हैं, पर उनका अन्त्यक्रम, परिसंस्थान (मात्रा-संख्या या वजन) और मात्रा क्रम नवीन होता है, जिसमें कवि को पूर्ण स्वतंत्रता रहती है, पर एक बार छन्द का स्वरूप निश्चित हो जाने पर कवि को छन्द की आवृत्ति में आत्मानुशासन मानना पड़ता है।51 यह छन्द योजना मित्र छन्दों से अलग है। आधुनिक कवियों ने अपने गीतों में दो छन्दों से बने मित्र छन्दों का प्रयोग किया है। गुप्त जी के साकेत और यशोधरा में ऐसे अनेक उदाहरण हैं। इनमें दो छन्दों का योग ही प्रधान है। नवीन क्रमायोजन वर्ग के छन्दों में एक ही छन्द के चरणों की योजना निश्चित कर ली जाती है और इस प्रकार निर्मिैत इकाई की आवृत्ति होती रहती है। ’’मधु’’ ने अपने गीतों में मित्र छन्दों का प्रयोग न करके अमित्र छन्दों का नवीन क्रमायोजन अपनाया है।
’’मधु’’ के गीतों के छन्दक (टेक) और सम्पद (अन्तरा) के चरणों की योजना में वैविध्य है। उनके अधिकांश गीत पादाकुलक वर्ग के पद्धरि छन्द पर आधारित हैं। इनमें कहीं कहीं सोलह मात्राओं के दो चरणों को मिलाकर एक चरण बना लिया गया है और ऐसे दो चरणों को छन्दक का रूप दिया गया है। यह रूप मत्त सवैया छन्द का है। कवि ने मत्त सवैया की वह लय अपनायी है जो पद्धरि छन्द पर आधारित है।
भारत अखण्डता के हित ओ लाखों की बलि देने वाली। क
तू अमर हुई तू अजर हुई चिरकाल तलक नोआखाली।। क
अकबर ने और हुमायू ने हमको मद पिला सुलाया था। ख
औरंगजेब के जुल्मों ने तब हमको तनिक जगाया था। ख
उस रंच जागरण में भी हमने वह कमाल दिखलाया था। ख
मुगलों को दल कर दिल्ली पर केसरिया पट फहराया था। ख
लेकिन तूने तो आज यहाँं काया ही सकल पलट डाली।। क
यह गीत की एक इकाई है और पूरे गीत में यही अन्त्यक्रम चलता है। सम्पद के चारों चरण सम तुकान्त है। पाँचवीं चरण छन्दानुबंधक है जिसकी तुक छन्दक से मिलती है।
कहीं 32 मात्राओं के एक चरण को ही छन्दक के रूप में रखा गया है-
ओ कवि तुलसी फिर एक बार राघव का दो सन्देश हमें।
कुछ गीतों कें छन्दक में सोलह मात्राओं के दो चरण हैं। इनमें से वे चरण तो निश्चित रूप से स्वतंत्र चरण हैं जो सान्त्यानुप्रास है, परन्तु अन्त्यानुप्रास रहित दो चरणों को 32 मात्राओं के एक चरण का लिखने के आधार पर द्विभाजन माना जा सकता है-
सान्त्यानुप्रसास छन्दक
बुन्देल धरा तुझको प्रणाम
क्या तेरे आगे स्वर्ग धाम।।
अतुकानत छन्दक
सुन ले भोले परदेसी उस
बुन्देलखण्डके वासी हम।
कुछ गीतों के छन्दक मंे सोलह मात्राओं के चार विषम तुकान्त चरण हैं-
पन्द्रह अगस्त सेंतालिस पर क
क्या लिखूँ समस्या बड़ी गहन। ख
जग जन कहते आनन्द मना। ग
मन मन कहता विद्रोही जन।। ख
सम्पदों में कहीं सोलह मात्राओं के चार चरण आये हैं और कहीं आठ चरण हैं-
क्या एक और दो चार करूँ ख
तुझ पर सौ स्वर्ग निसार करूँ ख
अभिलाषा तेरी गोदी में ग
सौ बार जिऊँ सौ बार मरूँ। ख
तेरे चरणों में जी जी कर घ
मर मर कर पाऊँ अमर नाम।। क
- - -
दिल में जब होली जलती है घ
मैं दीप जलाऊँ फिर कैसे ड
भीतर हो गर्द गुबार रंग च
रोली बरसाऊँ फिर कैसे ड
रो रो उठता है कंठ तुम्हीं छ
कह दो मैं गाऊँ फिर कैसे ड
मातम करने को मन कहता ज
मैं ईद मनाऊँ फिर कैसे छ

दिल मेरा पत्थर नहीं जिसे झ
व्यापे न दुखित जन का क्रन्दन। ख
’गरीब की दुनिया’ गीति का शिल्प बिल्कुल भिन्न है। इसके प्रारम्भ में छन्दक नहीं है। पहले सम्पद के चार चरण हैं। पाँचवाँ चरण अन्त्यानुप्रास रहित है। उसके बाद के चार चरण छन्दक बनाते हैं, किन्तु प्रत्येक इकाई के छन्दक का काफिया अलग अलग है। गरीबों की दुनिया रदीफ़ पूरे गीत में आया है-
ओ उच्च भवन वालो बोलो क
औ अतुलित धन वालो बोलोवालौ बौलौ क
कांतित कंचन वालो बोलो क
जगमग जीवन वालो बोलो क
क्या कभी निहारी है तुमने ख
अनजान गरीबों की दुनिया ग
बेजान गरीबों की दुनिया ग
वीरान गरीबों की दुनिया ग
शमशान गरीबों की दुनिया ग

’’मधु’’ के कुछ गीतों में मनोरमा छन्द का प्रयोग हुआ है। यह गीतों के लिये बहुत उपयुक्त छन्द है। ’बच्चन’ जी का प्रसिद्ध गीत ’’कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा’’ इसी छन्द में है। मनोरमा 14 मात्राओं का छन्द है। इसकी तीसरी और दसवीं मात्रा लघु होती है। ’’मधु’’ ने दो चरणों को मिलाकर 28 मात्राओं का छन्दक बनाया है। सम्पद में 14 मात्राओं के दस चरण हैं। बारहवाँ चरण छन्दानुबन्धक है। यह योजना गीत के लिखे जाने के आधार पर मानी गयी है। यदि दो चरणों को मिलाकर एक चरण माना जाये तो सम्पद में पाँच चरण होंगे-
कौन शुभ सन्देश लाये अय विजय त्यौहार मेरे क
फूलकर प्रति फूल में भी ख
जो नहीं फूले समाते ग
खगों के कल कण्ठ से यह घ
कौन अस्फुट राग गाते ग
नील नभ की पट्टिका पर ड
लिख रहे क्या मौन भाषा च
गोप्य कौन रहस्य ऐसा छ
आज जो हमसे छिपाते ग
पट पहिन रवि रश्मियों का ज
मुस्कराते मन सुमन में झ
पर न कुछ भी बोलते है ´
पुण्य मेरे प्यार मेरे। क
दो चरणों का एक चरण मान लेने से इसका अन्त्यक्रमायोजन क ख ख ग ख घ क के अनुसार होगा।
सार छन्द का भी प्रयोग कुछ गीतों में हुआ है। सार छन्द में 28 मात्राएँ होती हैं। इसके अन्त में दो गुरू होेते हैं। पद्धरि और मत्तसवाई के बाद सार छन्द कवि को अधिक प्रिय है। इस छन्द में कवि ने गीतों के अतिरिक्त लम्बी कविताएँ भी लिखी हैं। गीतों के छन्दक और सम्पद में 28 मात्राओं के चरण हैं। ’’देहाती दुनिया’’ गीत में एक चरण को दो चरणों के रूप में लिखा गया है, परन्तु वे स्वतंत्र चरण नहीं है। सार छन्द पर आधारित गीत की एक इकाई इस प्रकार है-
गौर अंग प्रभ्ुाओं के पूजन को चंदा चंदन लो क
आओ आयबहादुर आओ रायबहादुर बन लो क
इसकी नहंीं जरूरत इनको नित्य प्रति बहलाओ ख
डाली फसली पर प्रसाद की जगह अवश्य चढ़ाओ ख
उच्च यूनियन जैक करो ध्वज पीली लाल भुलाओ ख
जी हांँ सम्पुट सहित खुशामद मंजु मंत्र दुहराओ ख

रोज रोज जो नहीं बनै तो मासिक ही दर्शन लो। क

ताटंक छन्द भी मधु के कुछ गीतों का आधार है। 30 मात्राओं के इस छन्द में 16 और 14 मात्राओं पर यति होती है। अन्त में तीन गुरू होने चाहिए।
दूध भरा जीवन तज जिसने पिया मृत्यु विष का पानी क
अजर अमर वह वीर बोस की बालक सेना बलिदानी क
जिन होठों से तुतले तुतले वचन न अब तक छूटे थे ख
कच्चे दाँंत दूध वाले भी जिनके कभी न टूटे थे ख
कल तक जो कि चूसते पलने में निज पाँव अँगूठे थे ख
आजादी के हेतु आज वे रण रचने को रूठे थे। ख
जिनकी कुरबानी से बढ़कर नहीं दूसरी कुरबानी। क

राधिका छन्द में कवि ने बुन्देली में एक गीत लिखा है। इस छन्द में 13 और 9 की यति से 22 मात्राएँ होती हैं-
पैयाँ परि परि कें लैंव बलैयाँ तोरी क
दिखराव दया अब जाव मायकें गौरी क
मुख भोरौ भेरौ दूध सरिस तन गौरो ख
दिखराय हाय तें हर लीनौं मन मोरौ ख
तिहि पै डार्यौ झूठे सनेह कौ डोरौ ख
सपने हू में नहिं समझ सक्यो छल तौरौ ख

अब सोचि सोचि कें जरत हिये में होरी क

शक्ति छन्द का प्रयोग भी कवि ने गीतों में किया है। अठारह मात्राओं के इस छनद की लय उर्दू बहर फऊलन फऊलन फअल से मिलती है।
उमीदे वतन के फिसानो उठो क
उठो हिन्द के नौजवानों उठो क
फलक पै से तारों का डेरा उठा ख
लो दुनियाँ से बिल्कुल अँधेरा उठा ख
वो पूरव में सूरज का ढेरा उठा ख
लिये लाल झण्डा सवेरा उठा ख
ओ तुम मुल्क के निगह बानो उठो क

कवि के आरम्भकाल के गीतों में श्रृंगार छन्द का प्रयोग है। यह छायावाद युग का बहुप्रचलित छन्दहै। पन्तजी की ’’पल्लव’’ ’’उच्छ्वास,’’ ’’आँस’ू ’’ ’’मौन निमंत्रण’’ आदि कविताएँ इसी छन्द में है। 16 मात्राओं के इस छन्द के आदि में त्रिकल मध्य में समप्रवाह और अन्त में प्रल निपात या गलात्मक त्रिकल (ऽ।) होता है।52
अरी मेरी सुस्मृति झंकार क
कसकती है क्येां बारम्बार क
नाचती आती है तू कौन ख
साथ में लिये व्यथाएँ मौन ख
कहाँ जाती इस अंचल मध्य ग
छिपाकर मेरा सुख संसार।। क

अन्य छन्द
गीतों में प्रयुक्त मात्रिक छन्दों के अतिरिक्त ’’मधु’ ने बिहारी, दोहा, रोला और छप्पय में भी काव्य रचना की है। बिहारी छन्द में रचित काव्य प्रभूत परिमाण में है। ’’मधु सूक्ति-संग्रह’’ में 70 दोहे हैं। इसके अतिरिक्त कवि ने प्रबन्ध तथा मुक्तक काव्य में कहीं कहंीं कवित्तों के पहले दोहे लिखे हैं जिनमें कवित्तों में वर्णित भाव का परिचय दिया गया है। रोला और छप्पय में ’’मधु’’ ने अधिक काव्य रचना नहीं की है।

बिहारी
इस छन्द में 8, 6, 8 के विराम से 22 मात्राएँ होती हैं। इसकी लय उर्दू बहर मफऊल मफाईल मफाईल मफाईल से मिलती हैं। सैरों का यही छन्द है। मधु ने सैकड़ों सैंरे लिखी हैं। सामान्यतया एक सैर में 16 चरण होते हैं उसका चौथा आठवाँ बारहवाँ और सोलहवाँ चरण वही रहता है। सैर के सभी चरण समतुकान्त होते हैं-
मुग्धा समान वान म्यान की सुरंग में
मध्या सी कढ़ै बाहर कछु लाज अंग में
प्रौढ़ा सी गति दिखावैे मैदान जंग में
असि छत्रसाल खेलत नित नये ढंग में।

दोहा- 13 और 11 की यति से 24 मात्राएँ

ऐसीं कांच चुरी हमें, पहिरा औ मनिहार
जिन्हें उतारें चित्ता मेें, आंच देत भरतार।।

रोला- 11 और 13 की यति से 24 मात्राएँ
महाराज मधुकर महीप के तिलक धनुष सम
लिये रहें निज वान वानजुत वान अरिन्दम।।
रानी कुंवर गणेश भक्ति कौस्तुभ सम ताकी।
क्रीडा कन्दुक भई बाल अवधेश लला की।।
छप्पय-
रोला के चार चरण और उल्लाला के दो चरण। उल्लाला के चरणों में 26 मात्राएँ होती हैं 28 भी। सममात्रिक उल्लाला में प्रत्येक चरण में 13 मात्राएँ होती है और अर्द्धसम उल्लाला के विषम चरणों को मिलाकर एक चरण माना जाता है। इस तरह उसमें 26 मात्राओं का भी विधान है और 28 मात्राओं का भी।
जय जय सुषमा सदन नँंदन कवि वदन विहारिनि।
चतुरानन मन हरन जयति वीना कर धारिनि।।
जय छिन्दनि घन विघन जयति जन मन आनन्दनि
जय जय मंदनि मोह कोह छल छोह निकंदनि।।
अपने ही जन जान जिय मम तन तंत्री तार दे
’’मधु’’ मन मानस में सदा विहरहु वर दे सारदे।।
’’मधु’’ के छन्द प्रयोग में भावानुकूलता है। कोमल भावव्यंजना के लिये सवैया छन्द अपनाया गया है और वृ़त्त वर्णन में प्रायः कवित्त छन्द प्रयुक्त हुआ है। ’’यशोदा का स्वप्न’’ कविता में कृष्ण के मथुरा चले जाने पर फाग के अवसर पर यशोदा के हृदय की करूण व्यथा सार छन्द में व्यक्त हुई है। पत्रगीति में 32 मात्रिक मत्त सवैया छन्द प्रकथन शैली के बहुत उपयुक्त है। कवि ने छन्द सिद्धि का परिचय लय-विधान और विषयानुकूलता दोनों ही रूपों में दिया है।

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सन्दर्भ
1- काव्य प्रकाश- मम्मट, का. 4 सू.1
2- ध्वन्यालो-आनन्द वर्द्धन, 2/16
3- रसमीमांसा-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ 292
4- काव्य दर्पण- पं. राम रहिन मिश्र, पृ.345
5- पल्लव-सुमित्रानंदन पंत पृ.22
6- .....वही.... पृ. 32
7- प्रलंकार विमर्श-कृष्णनारायण प्रकाद मागध, पृ. 12
8- जगदविनोद-सं.विश्वनाथ प्रसाद मिश्र प्रस्तावना पृ.24
9- रसमीमांसा-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ 280
10- छायावादी काव्य-डॉ0 कृष्णचंद वर्मा, पृ.289
11- ....वही....पृ. 303
12- रसमीमांसा-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ 286
13- पल्लव-सुमित्रानंदन पंत, भूमिका, पृ. 30
14- आधुनिक हिन्दी कविता में बिम्ब विधान का विकास-डॉ.केदारनाथ सिंह,पृ.4
15- काव्य बिम्ब-डॉ. नगेन्द्र पृ.17
16- आधुनिक हिन्दी कविता में ििचत्र विधान डॉ रामयतनसिंह भ्रमर पृत्र4
17- आधुनिक हिन्दी कविता में बिम्ब विधान का विकास, डॉ.केदारनाथसिंह पृ.29 18- छायावाद-डॉ. कृष्णचंद्र वर्मा, पृ. 331
19- आधुनिक हिन्दी कविता में बिम्ब विधान का विकास, डॉ.केदारनाथसिंह पृ.28
20- हिन्दी साहित्य कोश(भाग-1)सं.धीरेन्द्र वर्मा, पृ. 515
21- हिन्दी साहित्य में विधिवाद-डॉ. प्रेमनारायण शुक्ल, पृ. 478
22- हिन्दी साहित्य कोश(भाग-1)सं.धीरेन्द्र वर्मा, पृ. 549
23- छायावाद-डॉ.कृष्णचंद्र वर्मा पृ. 324
24- आधुनिक हिन्दी काव्य में प्रतीक विधान-डा.नित्यानंद शर्मा पृ.25
25- चिन्तामणि (भाग-2)आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पृ. 110
26- .....वही.........पृ. 109
27- हिन्दी साहित्य में विधिवाद-डॉ.प्रेमनारायण शुक्ल पृ. 472
28- आधुनिक हिन्दी काव्य में प्रतीक विधान-डॉ. नित्यानंद शर्मा पृ. 141
29- आधुनिक हिन्दी काव्य में छन्द योजना-डॉ.पुत्तूलाल शुक्ल,पृ. 55
30- देव और उनकी कविता-डॉ. नगेन्द्र पृ. 243
31- पल्लव-सुमित्रानन्दन पंत, प्रवेश पृ. 33
32- आधुनिक हिन्दी काव्य में छन्द योजना-डॉ. पुत्तूलाल शुक्ल, पृ. 160
33- शर्वाण-अनूप शर्मा, भूमिका-आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र सुकवि विनोद
दिसम्बर 1974 पृ.3
34- पल्लव-सुमित्रानंदन पंत, भूमिका पृ. 38
35- हिन्दी साहित्य का इतिहास-रामचन्द्र शुक्ल पृ. 42
36- सूरसागर (दूसरा खण्ड) सं. नन्द दुलारे वाजपेयी, दशम स्कंध पृ.27,86
37- सूरसागर (पला खण्ड) सं. नन्द दुलारे वाजपेयी, दशम स्कंध पृ.952
38- धनाक्षरी नियम रत्नाकर-जगन्नाथ दास रत्नाकर पृ. 7
39- देव और उनकी कविता-डॉ. नगेन्द्र पृ. 255
40- आधुनिक हिन्दी काव्य में छन्द योजना-डॉ. पुत्तूलाल शुक्ल पृ. 204
41- ....वही....पृष्ठ 213
42- छन्द प्रभाकर-जगन्नाथ प्रसाद भानु पृष्ठ 189, 190
43- आधुनिक हिन्दी काव्य में छन्द योजना-डॉ. पुत्तूलाल शुक्ला पृ. 163
44- देव और उनकी कविता-डॉ. नगेन्द्र पृ. 245
45- घनानंद और स्वच्छंद काव्य धारा-डॉ. मनोहर लाल गौड पृ. 180
46- हिन्दी छन्द प्रकाश-रघुनन्दन शास्त्री पृष्ठ 108
47- देव और उनकी कविता-डॉ. नगेन्द्र पृ. 248
48- पल्लव-सुमित्रानंदन पंत प्रवेश पृ. 37
49- छन्दः प्रभाकर-जगन्नाथ प्रसाद भानु पृ. 177
50- आधुनिक हिन्दी काव्य में छन्द योजना-डॉ. पुत्तूलाल शुक्ल पृ. 261
51- ........वही........पृ. 331
52- आधुनिक हिन्दी काव्य में छन्द योजना-डॉ. पुत्तूलाल शुक्ल, पृ. 266