समकालीन कहानी का यथार्थ कृष्ण विहारी लाल पांडेय द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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समकालीन कहानी का यथार्थ

समकालीन कहानी का यथार्थ

साहित्य के संदर्भ में अनेक अन्तों और संकट की चिन्ताजनक घोषणाओं के बाद भी आज रचना-परिमाण की विपुलता ही नहीं विशदता भी बढ़ी है। इतने अधिक के साथ इतना विविध और वह भी अपने समय से प्रासंगिक बने रहकर, सचमुच चमत्कारी आह्लाद पैदा करता है। यह प्रासंगिकता समय के अनुवादक के रूप में नहीं है बल्कि आज रचनाकार और प्रस्तुत संदर्भ में कथाकार अपने समय का मूल पाठ प्रस्तुत कर रहा है। इस मूल पाठ की खूबी यह है कि गहरे विमर्श की भूमिका को वह संवेदना की पूरी आत्मीयता के साथ प्रस्तुत करता है। इस तरह के रचनागत सरोकारों या यथार्थ के लिये अभिव्यक्ति के बदलते ढंगों और माध्यमों का होना स्वाभाविक जरूरत है।

यथार्थ के प्रति यह आग्रह रचनात्मक दायित्त्व बोध से प्रेरित हो या संवेदना के तौर पर उसकी अधिक स्वीकार्यता इसका कारण हो पर यथार्थ आज केन्द्र में है। यह अकादमिक रूप से इतिहास में जाना भर नही है जब हम प्रेमचन्द्र के समय से निरन्तर विस्तृत यथार्थ के स्वरूप का लेखा जोखा करते हैं। उसमें परिवर्तित स्थितियाँ भी अपनी जटिलता और नये बनते सरोकारों के साथ दिखायी देती हैं पर यथाथर््ा चूंकि हमारे सामने उपस्थित चीजें या आदमी नही है इसलिये उसकी सही शिनाख्त तभी हो पाती है जब यथार्थ को देखने की दृष्टि हो। स्थूलता में या तो वह विवरण बन जाता है या किसी भी तस्वीर को जड़ने का चौखटा। इसी तरह सूक्ष्मता के अमूर्तन में वह किसी भी दूरसंवेदी उपकरण की क्षमता के परे चले जाता है।

यथार्थ नयी कहानी के समय भी कहानी का सरोकार था पर उसके आयाम सीमित थे। सम्बन्धों के टूटते बदलते स्वरूप परिवार और परम्परा के चौखटे तोड़ते त्रिकोण और व्यक्ति के निर्णयों की आजादी जैसी खोयी हुई दिशाओं को तलाशती इन कहानियों को राजेन्द्र यादव ने हाल ही में ‘कथाक्रम’ में व्यक्तित्व की कहानियाँ कहा है और उनकी तुलना में आज की कहानी को अस्मिता की कहानी कहा है। यह व्यक्तिगत यथार्थ जब जीवन के और गहरे तथा ज्यादा संदर्भो को समेट कर स्थितियों और मनःस्थितियों के भीतर देखने लगा तो विसंगतियों और विडम्बनाओं के अनेक करूण अनुभव सामने आये। पर यथार्थ ने ‘डिप्टी कलेक्टरी’, ‘चीफ की दावत’, ‘दोपहर का भोजन’, ‘जिन्दगी और जौंक’, ‘यही सच है’ और ‘वापसी’ जैसी कहानियों को नयी विश्वसनीयता प्रदान की।

आज के यथार्थ की निर्मिति में वैश्विकता और भूमण्डलीय प्रभाव और दबाब की जाँच करते समय एक महत्त्वपूर्ण बात की तरफ भी ध्यान जरूरी है कि नये उदय के और एकरैखिक समाजों से अलग अतीत वाले और बहुलताओं के हमारे जैसे समाज में यथार्थ के बहुत से मुद्दे अलग होते हैं। यहाँ परम्पराओं और अतीत के आग्रह प्रबल हैं। उन्हें निरन्तर बनाये रखने वाली मान्यताएँ हैं, अमानवीय हो चुकी अटल आज्ञाएँ हैं। यहाँ विचार तर्क, न्याय और आधुनिकता का परम्परा से द्वन्द्व ज्यादा कठिन है। नैतिकता की नयी परिभाषाएँ यहाँ आसानी से स्वीकृति नहीं पातीं। यहाँ हर नये और बदलते प्रतिमान् विजातीय होते हैं। यहाँ समय बहुत पहले ठहर चुका है, आदर्श बन चुके हैं, भाषा ढाली जा चुकी है। अब बदलाव की नहीं बिना सोचे दुहराव की जरूरत है। यहाँ मुक्ति के लिये मरना जरूरी है। एक तरफ दूसरों का निषेध करती अनुदारता है दूसरी तरफ विकल्प के तौर पर भूमण्डलीय उदारता है जहाँ बाज़ार ने ऐसी भाषा विकसित कर ली है जिसमें मनुष्यता से जुड़े शब्द नदारद हैं। व्यक्ति या तो अमूर्त है या बेहद स्थूल । वैश्विकता के संदर्भ संचार और बाजार के रूप में बड़े हुए हैं। उसमें सुखी लोगों के कॉरपोरेट हैं। करूणा और संवेदना का भूमंडलीकरण नहीं हुआ। यह अजीब बात है कि जब नये प्रस्थानों की जरूरत होती है तभी पुनरूत्थान नयी शक्लों में लौट आता है। वर्गों और विभाजनों के इस समाज में यथार्थ की कोई सरल सामान्य पहचान नहीं बनती। मानवीय व्यवहार, सम्बन्धों और विचार को प्रभावित करते इस जटिल यथार्थ के पास रचनात्मकता के लिये असीम सामग्री है। जरूरत है उसे देखने की दृष्टि की और उसकी अभिव्यक्ति के लिये सही फॉर्म की तलाश की। कहानी ने इसे काफी जिम्मेदारी से किया है फिर भी उत्खनन की सम्भावनाएँ खत्म नहीं हुई। मोटे तौर पर सम्बन्धों का निर्ममता से टूटता स्वरूप, जातिवाद और साम्प्रदायिकता के उभार, दलित विमर्श, अपने लिये नये मानचित्र की माँग करती स्त्री, अपनी पारंपरिक सूरत बदलते गाँव, संघर्षरत आम जन और भीड़-भाड़ के शोर के बीच अपने भीतर संवेदनात्मक स्पन्दन सुनने के लिये मनोभूमि तलाशता व्यक्ति, वे कुछ दिशाएँ हैं जिनकी तरफ कहानी ने लम्बा सफर तय किया है।

आज की कहानी में जितने विषय, जितनी स्थितियाँ और जितने चरित्र आये हैं उनके आधार पर अच्छा खासा समाजशास्त्र लिखा जा सकता है। झोपड़ों, प्लेटफार्मांे, नालों, फुटपाथों की आबादियों से लेकर कॉरपोरेटों, कॉल सेंटरों, मॉलों, साइबर-हटांे तक फैले विविध लोक और लोग आज की कहानी में सब मिल रहे हैं। यथार्थ की विविधता एक और तरह की भी है। आज एक ही समय में लगभग तीन पीढ़ियाँ अपने यथार्थ बोध के साथ लिख रही हैं। इनके अनुभव, इनकी दृष्टि और इनकी अभिव्यक्ति से एक ही समय में हमें कई स्तरों का बोध मिलता है। यह समकालीनता में ऐतिहासिक क्रमिकता की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है।

एकाध आलोचनात्मक टिप्पणी में यह कहा गया है कि हिन्दी कहानी से गाँव का यथार्थ ओझल हो रहा है। क्या ऐसा है ? अनेक रूढ़ियों की तरह गाँव भी कुछ लेखकों में रूढ़ और टाइप हो गया है, यह तोे देखा गया है पर अनेक कहानीकार गाँव के बदलते स्वरूप और उसकी द्वन्द्वात्मक स्थितियों का बहुत निकट से देखा गया वृत्तान्त प्रस्तुत कर रहे हैं। कई कहानीकार विशेष रूप से हिन्दी की पूर्वी बोलियों के क्षेत्र के गाँवों से नगरों में भले आ गये हैं लेकिन गाँव से उनका सहज अपनापन तनिक भी नहीं छूटा। उनमें गाँव का खंडित होता, आधुनिकता से प्रभावित रूप भी है और उसकी मौलिक निरीहता भी। इधर की कहानी गाँव की पारम्परिक तस्वीर से आगे वहाँ हो रहे परिवर्तनों को देख रही है, नये यथार्थ के रूप में। ‘बाजार में रामधन’ और एक सहज बदलाव के रूप में ‘कोंइछा’ कहानी बहुत प्रभावित करती है। गाँव के कुछ स्त्री पात्रों के द्वारा कुछ कहानियाँ स्त्री विमर्श का जो पाठ या नैतिकता की रूढ़ अवधारणा से अलग जो स्वरूप प्रस्तुत करती हैं वह इस पर हो रही अकादमिक बनावटी बहसों से बिल्कुल अलग हैं। मैत्रेयी पुष्पा की ‘‘गोमा हँसती है’’ और महेश कटारे की ’’छछिया भर छाँछ’’ जैसी स्वाभाविक गाँव की कहानियाँ इस तरह का विश्वसनीय और प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत करती हैं।

यह टिप्पणी भी की गयी है कि बदलते यथार्थ की इन बाह्य स्थितियों के बीच प्रेम अथवा आंतरिकता के अहसास छूट रहे हैं। जीवन का यह महत्त्वपूर्ण विषय ’’बैक बर्नर’’ पर कैसे रखा जा सकता है? इतना जरूर है कि आज के दबावों और बदलते हुए अनुरागों में अत्यन्त व्यक्तिगत तत्त्व भी वैसा ही रोमानी और गुहालोकों में छिपे दफीने ढँूढने वाला नहीं रह गया है। वहाँ भी अन्तर्द्वन्द्व की स्थितियाँ बदली हैं। प्रियवंद की आन्तरिकता उनकी प्रेम कहानियों में बाहर का दरवाजा कभी बन्द नहीं करती। प्रेम में नैतिकता की बदली हुई परिभाषा और स्त्री के अपने अनुभवों का अहसास पूरी जैविकता के साथ कई कहानियों में अभिव्यक्त है। जया जादवानी और बिलकुल नयी उपस्थिति के रूप में स्नोवा वार्नो, प्रत्यक्षा वगैरह के सरोकार भी यथार्थ से मुँह चुराने के नहीं है, सिर्फ एरिया या क्षेत्रों का फर्क है।

नये लेखक के रूप में कविता की तरह कहानी की भी यह शिकायत रही है कि उसका आलोचनाशास्त्र विकसित और स्थिर नहीं हुआ। कहानी या उपन्यास का जो आवयविक समीक्षा शास्त्र चला था उसकी सार्थकता अब नहीं रही और नयी समीक्षा के कोई निकश नहीं बने। जितने समीक्षक उतनी तरह की व्यवस्थाएँ। जितनी कृतियाँ उतनी तरह की समीक्षाएँ।

कृति या लेखक का तिलिस्म तोड़ता और अपनी विलक्षण शब्द-संपदा से जटिल बौद्धिकता का नया शास्त्र रचता समीक्षक प्रायः यह भूल जाता है कि रचना के संदर्भ में पाठक भी एक पक्ष होता है। समीक्षक की भी अपनी मजबूरी है। उसे नयी रचनानुभूति तक पहुँचने में आस्वाद की प्रक्रिया के बदलाव के साथ होना पड़ता है। दूसरी ओर अगर समीक्षक थोड़ा सा भी ‘कथानकीय’ या ‘चारित्रिक’ हुआ या उसने पृष्ठभूमि पर एक नजर डाल ली तो वह परम्परावादी हो गया। इसलिये वह आलोचना का ऐसा प्रतिसंसार रचता है जहाँ या तो लेखक पहुँचे, या प्रोफेशनल पाठक। किताबों की जाकिटों के अन्तःपटों पर भाषा की जो कलाकारी होती है कभी कभी उसे पढ़कर ’’आह’’ भी निकलती है और ’’ओह’’ भी।

इसके विपरीत किसी न किसी रूप में मुद्रित पन्नों पर बने रहने की समीक्षकीय आतुरता कभी कभी इतनी त्वरा में प्रकट होती है कि वह कल छपी किसी कहानी पर आज ऐसी लघु टिप्पणी या फैसले जैसा निष्कर्ष देती लगती है जैसे कोई बड़ा अतिथि उपस्थित भीड़ को नमस्कार करता हुआ गुजर गया हो। युवा रचनाशीलता की महत्त्वपूर्ण संभावनाएँ आज के परिदृश्य में पूरी विज़िबिलिटी के साथ उपस्थित हैं। यह विभिन्न पत्रिकाओं के नवलेखन और युवापीढ़ी जैसे विशेषांकों से प्रमाणित हैं। समीक्षा ने जहाँ उनके रचना-संसार को भूगोल और इतिहास की समग्रता में देखा है वहाँ समीक्षा के खाते में कुछ नया जुड़ा है पर जहाँ स्फुट तौर पर स्थापित समीक्षक भी दो चार कहानियों की कथावस्तु बता देने को ही समीक्षा मान लेते हैं वहाँ न रचना के साथ न्याय होता है, न आलोचना के साथ। कुछ त्वरित टिप्पणीकार तो सर्वव्यापी हैं।

बदलते यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिये कौन सा स्वरूप बेहतर है, वह लेखक खुद ज्यादा अच्छी तरह सोच सकता है। वैसे तो रचना अपना रूप खुद ढूँढती है लेकिन अक्सर कुछ स्वीकृत रूप भी बन जाते हैं और उन्हीं के बीच से कुछ प्रयोग भी होते रहते हैं। आदमी के अचानक एक रात कीड़े में हुए मैटामॉर्फोसिस ने फंतासी की जो अपार संभावनाएँ अभिव्यक्ति को सुझायी वे ‘सौ वर्षो के एकान्त’ में जादुई यथार्थवाद बनीं, कभी माया और यथार्थ का अद्भुत सम्मिश्रण बनीं। ऊपर से नितान्त विरोधी लगते फंतासी और यथार्थ को एक साथ ’’डील’’ करना और वह भी सार्थकता के साथ बहुत मुश्किल काम होता है क्योंकि जरा भी कुशलता कम हुई और फंतासी केवल शाब्दिक प्रतीक या रूपक रह जायेगी और यही उसकी असफलता है।

यह तो अंतों की मुनादी करने वाले ही जानें कि कथा का अंत हो गया है या उसमें अभी प्राण हैं, कहानी का पी.एम. हो चुका है या वह जीवित है, वृत्तान्त की वापसी हो गयी है या वह हिन्दी कहानी से कहीं गया ही नहीं था, किस्सा गोई के लिये कोई अथाई या चौपाल बची है या नहीं पर इतना सच है कि विभिन्न कहानियों में हमें यह सब मिल रहा है और जीभर कर मिल रहा है। यह बात अवश्य है कि आज की कहानी विमर्श और वैचारिकता का कार्य भी कर रही है। इसलिये उसकी संरचना बदली है। कहानी अब सिर्फ नैरेशन या स्टोरी टैलिंग नहीं है। वह संस्मरण भी है, डायरी भी है पत्राचार भी है संवाद भी है, रिपोर्ताज भी है निबन्ध भी। अकेले में किसी व्यक्ति को या समय को याद करना भी है। उसमे फिक्शन और वास्तविकता का चमत्कृत करता उपयोग है। आज कहानी यथार्थ के प्रभाव के लिये इतिहास अर्थात् वास्तविक नामों, घटनाओं और तिथियों का उल्लेख कर रही है। यह प्रविधि हमें यथार्थ का आभास कराती है और हमें बोध होता है कि कहानी अब ’’था’’ नहीं बल्कि ’’है’’ की तरह भी कहीं जा सकती है। तरूण भटनागर की कहानी ‘‘श्रद्धांजलि एक अमेरिकी मौत पर’’ ऐसी ही कहानी है।

औपन्यासिक शिल्प की तरह आज कहानी ने एक और प्रविधि का प्रयोग किया है, वह है आकार में लम्बी न होने पर भी उसका उपशीर्षकों में कहा जाना। ये उपशीर्षक कालखण्ड का आभास भी देते हैं और घटित का मर्म भी उद्घाटित करते हैं। कहा जा रहा है कि आज कहानीकार विमर्शों के चक्कर में नहीं पड़ रहा। यह तो सच हेै कि वह इतना रचनात्मक और संवेदनात्मक है कि विमर्शो पर स्थूल निबंधात्मक लेखन नहीं कर रहा है लेकिन आज की कहानी में विमर्श और चिन्तन की बौद्धिकता भी है । बौद्धिकता के आवश्यक उपयोग को कहानीकार उचित भी मान रहे हैं।

प्रौद्योगिकी और आधुनिकता ही क्या उत्तर आधुनिकता के आज के समय में जीवन के बदलते स्वरूप को बदले हुए भाषा संकेतों की जरूरत पड़ रही है। अब एक ही समय में भाषा के अनेक रूप हैं। आंचलिक बोली भी, नागर भी और अंग्रेजी भी। ’’मिड डे मील्स’’ ‘‘मेटिंग रिचुअल्स’’, ‘‘फेट’’ जैसे शीर्षक तथा प्रत्यक्षा की कहानी में प्रयुक्त अंग्रेजी भाषा आज के एक वर्ग के बारे में यथार्थ का आभास कराती है। आज की कहानी में भाषा चीख के रूप में भी है, मधुर पुकार के रूप में भी है और निर्लिप्त बयान के रूप में भी है। सत्यनारायण पटेल जब ’’भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान’’ या ‘‘बिरादरी मदारी की बँदरिया’’ लिखेंगे तो स्वाभाविक है कि आदिम समाजों की बोली के शब्द ही नहीं उसका विन्यास भी आयेगा, विन्यास ही नहीं, बोलने वाले के सारे अनुभाव मूर्त होने की कोशिश करेंगे।

सच बोलना मनुष्य का स्वभाव है। उसने बोलना सीखने के बाद बताना या कहना सीखा। कहना यानी जो है वह बताना। झूठ बोलना अर्जित है। लेकिन वह इतना लाभदायक और सुविधाजनक लगा और सच बोलना इतना खतरनाक तथा हानिकारक लगा कि आदमी सच बोलना भूलता गया। कहानी आदमी को इसी सच की ओर प्रेरित करने का काम करती है यानी वह झूठ का प्रतिरोध करती है।

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