मुख़बिर - 21 राज बोहरे द्वारा जासूसी कहानी में हिंदी पीडीएफ

मुख़बिर - 21

मुख़बिर

राजनारायण बोहरे

(21)

कृपाराम का पुश्तैनी गांव

अगले दिन मैने किस्सा सुनाना शुरू किया कि एक बार मैने अजयराम के साथ जाकर कृपाराम का पुश्तैनी गांव देखना चाहा था ।

हुआ ये था कि एक दिन कृपाराम ने मुझसे सिलक गिनवाई तो पता चला था कि उनके पास तीन लाख से ज्यादा रूपये नगदी रखे हैं । अपनी सुरक्षा के साथ-साथ इतने सारे रूपये भी लादे रखने और रखाते फिरने के झंझट से बचने के लिए उसने अजयराम से कहा कि वह गांव जाकर सिलक लाला को संभलवा आये । तो मैंने इच्छा प्रकट की थी कि मैं भी अजयराम के साथ जाना चाहता है।

यह सुनकर कृपाराम विंहसा ‘‘ सारे मौका ढूढ़ रहो हैं कै अकेले में बीहड़ में समय देख के अजै के ऊपर चढ़ बैठे ।‘‘

मैंने चिरौरी की-‘‘ मुखिया, आप तो जानतु हो, कै अजै दाऊ के हम खास सेवक हैं वे हमते ही सेवा करावतु हैं । इनके हाथ-पांव हमही दबाबतु हैं, सो हमने कही के इत्ते बड़े बागी के संग एक सेवक भी जानो चहिये न !‘‘

‘‘ अब अजै लौटि आवे, तुम मनचाही सेवा कर लियो ‘‘ कह कर मुझको चुप रहने का इशारा कर कृपाराम ने अजयराम को सम्बोधित किया -‘‘ अजै संभल के जइयो ! आजकल पुलस बड़ी छटपटाइ रही होगी, सो घरे मत जइयो । लाला को सिलिक संभरवाइ अइयो और तनिक जल्दी लौटियो । मैंऊ घर न गयो बहुत दिनोते । मैं भी घर जावो चाहि रहो हों ।‘‘

कालीचरण और अजयराम ने कंधे पर बंदूकें टांगी और कृपाराम से गले मिले, फिर ‘जय कारसदेव‘ कहके तेज गति से चल पड़े । मैंने देखा कि कृपाराम की आँखें भर आईं उस क्षण । बीहड़ में मड़राती मौत से लुका छिपी के खेल में एक-दूसरे की कुशलता को लेकर बागी किस तरह चिंतित होते हैं, और अपने विछुड़ने के वक्त वे किस तरह विह्वल होते है, यह एक नया अनुभव था मेरे लिए । दूसरों को बिना देर करेे, मौत के घाट उतार देने को सदा तत्पर रहने वाले इन लोगों को मौत से बड़ा डर लगता है, यह तो उसी दिन पता चल गया था मुझे, जिस दिन मजबूतसिंह ने आकर बताया था कि नये एसपी और दरोगा ने उनके गिरोह को मिटा देने की कसम खाई है । चारो बागी विकट रूप से डर गये थे उस दिन भीतर ही भीतर, जो कि उनकी आँखों से प्रकट होता था ।

उसी दिन कृपाराम ने भावुक होते हुए अपने अधूरे छूटे किस्से को आगे बढ़ाया था ।

जब वे लोग फ़रार होके जंगल-दर-जंगल भागते फिर रहे थे, एक दिन अचानक ही डाकू समरथसिंह के गिरोह ने उन्हे घेर लिया था । वे चारों निहत्थे थे।

समरथ ने डरते-कांपते उन चारों भाइयों को अभयदान देकर अपने गिरोह में शामिल होने का निमंत्रण दिया था, तो वे खुशी-खुशी गिरोह में शामिल हो गये थे । समरथ उन्हे अपने साथ लेकर अपने ठिकाने पर लौट गया था । ठिकाना क्या था नदी किनारे का पतारा नाम का वह जंगल और उसमें बना वनरक्षक का खाली क्वार्टर, जो तीन-चार गांवों से सिर्फ दो-दो किलोमीटर दूर था ।

समरथ के साथ रहके उनने सीखा था कि यहां जीने के लिये जरूरी है रोजाना बीस-पच्चीस किलोमीटर पैदल चलने की आदत बनाये रखना और ऊंट की तरह एक साथ कई वक्त का खाना भकोस लेना ।

समरथ में एक ऐब था कि वो लंगोट का बड़ा कच्चा था । गिरोह में खुले आम लुगाइयें आती रहती थीं, और समरथ बिना लिहाज सबके सामने उन्हे अपने साथ लेकर बस तनिक सी ओट पकड़ के चला जाता था । वह खुद भी अपने एक-दो आदमी लेकर इसी काम के वास्ते आदिवासियों के टपरांेे पर जाता रहता था, और धोंस-दपट देकर उनकी चाहे जिस लुगाई को बेधड़क पकड़ लेता था । इसी आदत की वजह से भीतर-ही-भीतर आदिवासियों के मन में उसके प्रति नफरत पैदा होने लगी थी । बाद में इसी नफरत की आग मे समरथ को अपनी जान होम करना पड़ी थी । लेकिन यह बाद की बात है ।

उसके पहले यह हादसा हुआ कि औरत के लिए व्याकुल समरथ को जाने क्या सूझी कि जिस दिन वह कृपाराम वगैरह के साथ उनके गांव गया हुआ था, वहां कृपाराम की बीबी का ही हाथ पकड़ बैठा । अजयराम ने देखा तो वह अकड़ गया, फिर तो समरथ उसे पोटने-पुचकारने लगा । लेकिन अजयराम भढ़क गया, ? उसने वहां से उठके सीधे कृपाराम से समरथ की शिकायत कर डाली । कृपाराम किंकर्तव्यविमूढ़ था । श्यामबाबू और कालीचरण ने सुना तो पहले अपनी भाभी से इसका सत्यापन किया और जब यह वाकया सच साबित हुआ तो उन दोनों की भुजाऐं फड़क उठीं ।

समरथ सकपकाया । उसने झिझकते हुए कृपाराम और उसकी घरवाली से पांव छू केे माफी मांगी । मौका भांपकर कृपाराम ने उसे माफ कर दिया, लेकिन गिरोह में एक ऐसी गांठ पड़ गई कि जिसका परिणाम जल्दी ही गिरोह के दो फांक हो जाने के रूप में सामने आया । हालांकि गिरोह का यह बंटवारा बिना तकरार के शांति से हुआ, और इस बंटवारे के पीछे एक बहुत बड़ा कारण कृपाराम की समझ में यह बात आ जाना था कि अब समरथ उसे और उसके भाइयों को हथियार के रूप में प्रयोग करने ल्रगा है । कृपाराम के कंधे पर रख कर समरथ ने बंदूक चलाना ष्षुरू कर दिया था जिसे कृपाराम ने जल्दी ही भांप लिया । कहीं भी कोई वारदात करते वक्त समरथ हर जगह कृपाराम का नाम लेकर डांट-फटकार करने लगता । जहां सिर्फ चार आदमियों की जरूरत होती, समरथ कृपाराम को अपने भाइयों के साथ झोक देता । कृपाराम को समरथ के मन में छिपी वे सबर्ण भावनाएं नजर आने लगीं थी, जिनके तहत हमेषा से ये लोग पिछड़े वर्ग को लट्ठ मारने वाले के रूप में प्रयोग करते रहे हैं । कृपाराम को यकायक लगा था कि अगर उसी के दम पर समरथ का गिरोह चल रहा है तो कृपाराम अपना अलग गिरोह क्यों नही चला सकता ! कृपाराम खुषी-खुषी अलग हो गया ।

कृपाराम के गिरोह को हिस्से में चार बन्दूकें और एक लाख रूपया नगद मिला था और दोनों गिरोह के लोग एक-दूसरे से गले लग के विदा हो गये थे ।

दोनों गिरोहों ने अपना-अपना इलाका चुन लिया था । ऐसे विपरीत समय में बीहड़ में भटकते कृपाराम को अपना एक विरादरी भाई मिल गया था-गिरवर गड़रिया । एक लम्बे समय से छुटपुट वारदातें करने के बाद भी पुलिस से दूर बने रहे गिरवर ने छह महीने में उन्हे दर्जनों लोगों से मिलवा कर चम्बल के गांवों में भीतर ही भीतर सुलग रहे दलित जाग्रति के ऐसे दावानल से परिचत कराया था, जिसने कृपाराम और उसके भाइयों को नया जीवन मंत्र दिया था, कि बीहड़ में छिप के सुरक्षित रहना है तो अपनी विरादरी और उसकी बराबरी के लोगों को संगठित करो और उनसे मिल के रहो । वे लोग अब तक मन में दबाये रखे अपने उत्पीड़न और दमन का बदला खुल के लेने लगे थे, रस्ता चलते कोई सुबरन कहलाने वाले वर्ग का आदमी उन्हे दिख जाता तो वे उसकी खूब कुटम्मस करते, फिर नंगा-उघारा करके भगा देते । नंग-धड़ंग आदमी को भागते देख कर उन्हे बड़ा मजा आता था ।

बाद में एक दिन पता लगा था कि आदिवासियों के टपरे पर पुलिस ने छापा मारा और समरथ को दो साथियों के साथ एनकाउण्टर में मार गिराया था । पता नहीं चला कि आखिरकार पुलिस को आदिवासियों के यहां समरथ के उस दिन आने की पक्की खबर कैसे मिली, अलबत्ता लुगाई के चक्कर में गिरोह ने अपने मुखिया और दो आदमियों को खो दिया था ।

जिस दिन कृपाराम वगैरह को यह खबर मिली उन सबने उपास रखा और समरथ को खूब याद किया । समरथ सचमुच समरथ था-समर्थ भी और सक्षक भी । दिन भर वे लोग समरथ के साथ बिताये खूब अच्छेे दिन, लमहे और वारदातें याद करते रहे ।

समरथ के जाने के बाद से उनने अपनी विरादरी कीे संगाती जातियों यानीकि गड़रिया, मारवाड़ी-चारवाहे आदि के मुअज्जिज आदिमियों के साथ और ज्यादा घने प्रेम संबंध बनाने शुरू कर दिये थे ।

श्यामबाबू उनके गिरोह का कोतवाल था । उसने सबकेा चेतावनी दी थी कि अगर जिंदा रहना है तो उन सबको कुछ नियम मानना होंगे । समरथ के विनाश की वजह लुगाई थी, इसलिये वे सब औरतो से दूर रहेंगे, न उन्हे गलत नजर से देखेंगे न उन्हे लूटेगे, खास तौर पर आदिवासियों और दूसरे मुख़बिरों के घर की औरतों के बारे में यह बात ध्यान रखेंगे । दूसरा नियम यह बनाया उन सबने कि इस इलाके में रहना है तो आदिवासियों को ही वे अपना मुखबिर बनाऐंगे, क्योंकि इस इलाके के जंगलों और बीहड़ों में इन आदिवासियो के तमाम कबीले फैले पड़े हैं, इसलिए मुखबिरी के मामले में उनसे अच्छा कोई दूसरा हो ही नही सकता । मुखबिरी के बदले में आदिवासी जो मांगे वो उन्हे देंगे, पर उन्हे असंतुष्ट नही रखेंगे ।

समरथ के गिरोह का नया मुखिया बना था सिंगराम रावत ! बंटवारे के समय की जाने कौन सी बात उसे अखरी थी कि उसने कृपाराम गिरोह को अपना दुश्मन मानना शुरू कर दिया । कृपाराम को यह अच्छा नहीं लगता था, अगर बागी आपस में लड़ेेंगे तो फायदा तो पुलिस का ही होगा । इस वजह से उसने खुद सुलहनामे की खबर भेजी । लेकिन सिंगराम व्यवहार का बड़ा खराब था-वह उस संदेश वाहक को ही मार बैठा, जिसके मार्फत सुलह-सफाई का संदेशा भेजा गया ।

सिंगराम ने कृपाराम को ही नहीं, पूरी घोसी-गड़रिया विरादरी को अपना दुश्मन मानना शुरू कर दिया था । वह डाके डालता तो केवल घोसी-गड़रियों के यहां, पकड़ करता तो केवल घोसी-गड़रियों की । जो आदमी कृपारम का नाते-रिश्तेदार होता उसे तो वह बहुत सताता, घोसी-गड़रिया होना ही सबसे बड़ा गुनाह हो गया था सिंगराम की नजर में ।

इसकी प्रतिक्रिया कृपाराम ने भी लगभग उसी तरह की । वह यूं तो खास तौर पर सवर्णेों का दुश्मन था, लेकिन अब रावत विरादरी उसकी पहली दुश्मन बन गई थी ।

एक आदमी की गलती की वजह से घाटी में जातीय-लड़ाइयों की नई शुरूआत हो गई ।

कृपाराम बातूनी और गुस्सैल तो था, पर स्वभाव से कपटी नहीं था, इस वजह से वह वे बातें भी बताता चला गया था, जो बागी लोग हमेशा गुप्त रखते हैं ।

गिरोह किस प्रकार महीने के महीने इलाके के थानेदार को चंदी भेजता था । किस प्रकार वह इलाके के विधायक से बात बना कर रखता था और किस प्रकार वह चुनावों के समय अपनी विरादरी की पारटी का प्रचार करता था, इसका सूक्ष्म विवरण वह उस दिन हमको बड़ी देर तक सुनाता रहा था ।

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