अनंत यात्रा.. Arpan Kumar द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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अनंत यात्रा..

अनंत यात्रा...

अर्पण कुमार

माधुरी सांगवान हरियाणा में पली-बढ़ी एक महिला हैं। इन दिनों वे दिल्ली में रह रही हैं। अपने दोनों बच्चों को अपने साथ रखकर। वे एक महत्वाकांक्षी और सजग महिला है जो अपने बल-बूते दिल्ली के भीड़-भाड़ वाले इलाके ' पालम' में रह रही है। उनकी बेटी सृष्टि सांगवान छोटी है और इस समय बारहवीं में पढ़ रही है। बेटापल्लव सांगवान बी.ए. थर्ड इयर में है। पति कौशल सांगवान फौज में है और वर्तमान में कश्मीर में बोर्डर पर तैनात हैं।

एक शाम सृष्टि ने अपनी माँ से कहा, " मम्मी, आज स्कूल में हमें एक मॉडल बनाने को दिया गया है। संवहनीय विकास पर। मुझे अपने ग्रुप का हेड बनाया गया है।"

दोनों बच्चे माधुरी से बहुत जुड़े हुए थे। ऐसे भी इनके पिता इनके साथ कम ही रहा करते थे। सो दोनों भाई बहन न सिर्फ़ अपनी माँ को बहुत प्यार करते थे बल्कि उसका अपने हिसाब से ध्यान भी ख़ूब रखते थे। माधुरी भी सुबह से लेकर देर रात तक इनकी देखभाल में लगी रहतीं। एक दिन पड़ोस की विमला बिष्ट, माधुरी के पास अपनी बेटी प्रतिभा बिष्ट को लेकर आई। दसवीं के बाद इस मुहल्ले में लड़कियाँ बाहर खेलना-कूदना बंद कर देती हैं। वे अपने स्कूल का काम करती हैं या फिर अपनी माँ के घरेलू कार्यों में हाथ बंटाती हैं। दोनों एक ही स्कूल और क्लास में पढ़ती थीं मगर इस तरह एक-दूसरे के यहाँ आना-जाना कम ही था। दोनों ही लड़कियाँ काफ़ी लायक थीं और पढाई में भी अव्वल थीं। यह सृष्टि के लिए चौंकानेवाली ख़बर थी कि उसकी सहेली प्रतिभा उसके घर आई थी। सृष्टि चिहुँकती हुई प्रतिभा को अपना घर दिखला रही थी। घर तो किराए का ही था मगर हर सामान करीने से रखा हुआ था। एक निम्न-मध्यमवर्गीय घर की तरह की साज-सज्जा चारों तरफ़ दिख रही थी। एक कमरे में पल्लव बैठा हुआ अपने मोबाइल पर कुछ काम कर रहा था। सृष्टि निःसंकोच उसकी ओर बढ़ती हुई आई और अपनी सहेली से परिचय कराते हुए बोली, "भइया, यह प्रतिभा है। प्रतिभा बिष्ट। मेरी क्लासमेट।"

"हैलो", कुछ सकुचाते हुए पल्लव ने उसका स्वागत किया।

प्रतिभा ने सहज ही पल्लव की आँखों की ओर देखा। वह उन गहरी आँखों के समंदर में डूबने लगी थी, मगर किसी तरह उसने खुद को संयत कर लिया। उदासी के कुछ घने बादल भी उसे वहाँ तैरते नज़र आए। उस समय वह नोटिस करके रह गई। बाद में प्रतिभा अपनी सहेली से कहने लगी, "यार सृष्टि, तुम्हारे भइया तो बहुत उदास दिखते हैं। कोई ख़ास बात!"

सृष्टि क्या बोलती। वह जानती थी अपने भाई के दिल का हाल। उसका कुछ महीने पहले ही अपनी एक क्लासमेट से दो वर्षों के सीरिअस अफेयर के बाद ब्रेक-अप हुआ था। मगर इस बात को टालने की कोशिश करती हुई वह बोली, "अरे नहीं रे। तुम्हें यूँ ही लग गया होगा। वे तुरंत टी.वी. देखकर उठे थे न! इसलिए ऐसा लगा होगा।"

"क्या आज क्रिकेट का कोई मैच है?" प्रतिभा ने पलटवार करते हुए कहा।

"नहीं, मगर मेरे भइया को डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफिक, हिस्ट्री चैनल आदि देखना पसंद है।" सृष्टि ने अपने भाई का बचाव करते हुए कहा।

"अरे वाह!" प्रतिभा को यह सुनकर बड़ा अच्छा लगा। वह चहकती हुई सृष्टि के गले लग गई।

"मेरा भाई तुमको पसंद आ गया है क्या?" सृष्टि ने उसे छेड़ते हुए कहा।

"तू भी कैसी बात करती है सृष्टि! पागल हो गई है क्या?" अचानक से प्रतिभा शरमा गई।

"जानती हो, यह जो संवहनीय विकास पर स्कूल की ओर से प्रोजेक्ट बनाने के लिए कहा गया है न, उसमें मेरे भैया मेरी ख़ूब मदद कर रहे हैं।" सृष्टि ने विषय बदलते हुए कहा।

"अच्छा!! वो कैसे?"

" दरअसल मेरे भैया अपने कॉलेज में ऐसे किसी प्रोजेक्ट से जुड़े हुए हैं। इनके किसी प्रोफेसर का एक ट्रस्ट है जो इनके कॉलेज के साथ जुड़कर दिल्ली के समीपवर्ती गाँवों में कई सारे सामाजिक कार्य कर रहा है। उसमें ये लोग बड़े पैमाने पर सोलर एनर्जी का काम भी कर रहे हैं। उसके पैनल, बैटरी लगाने से लेकर अंततः उसके विद्युत उत्पादन तक।"

"मैं तो इसी सोलर एनर्जी पर प्रोजेक्ट कर रही हूँ। अपने भैया के साथ यहीं पालम के समीप एक कच्ची बस्ती में मुझे जाना भी है। सब कुछ स्वयं अपनी आँखों से देखना है।" सृष्टि की आँखों में उत्साह की चमक देखने लायक थी।

"मेरी भी सहायता करवा दो न!" प्रतिभा की आँखों में निवेदन का संकोच स्पष्ट झलक रहा था।

"ठीक है, मैं बात करती हूँ।"

"लेकिन क्या हमदोनों का प्रोजेक्ट एक ही आइडिया पर नहीं हो जाएगा!" प्रतिभा की इस बात पर दोनों सहेलियाँ सोचने लगीं।

तभी उधर से पल्लव निकला। इन्हें सोचता देख रुक गया और पूछा, " क्या बात है! क्या किसी तीसरे विश्वयुद्ध की प्लानिंग हो रही है!"

"जी हाँ, 12वीं को सही सलामत और अच्छे अंकों से पास करना थर्ड वर्ल्ड वार में विजयी होना सरीखा ही है।"यह प्रतिभा थी, जो अपने प्रोजेक्ट को लेकर चिंतित थी।

"आप तो ऐसे कह रही हैं मोहतरमा जैसे कि हम बारहवीं दिए बगैर कॉलेज में आ गए हों! ख़ैर छोड़िए लड़कियाँ होती ही ऐसी हैं। उन्हें हरदम सिर्फ़ अपना ऐंगल दिखता है। दूसरे के दृष्टिकोण से तो मानो उन्हें कोई मतलब ही नहीं।" पल्लव न चाहते भी कुछ-कुछ उखड़ सा गया।

"माफ़ कीजिएगा पल्लव जी, मगर बड़े ही दकियानूस और बोरिंग से आपके विचार हैं।" प्रतिभा अंदर से मानो घायल शेरनी सरीखी हो गई।

"अरे वाह! अभी स्कूल से तो बाहर निकली ही नहीं हैं और मेरे विचारों पर कमेंट करने चली हैं!" पल्लव भी आवेश में आ रहा था।

"ऐसी बात नहीं है भैया, आपके समय ये प्रोजेक्ट वगैरह नहीं होते थे न! और तब इनके नंबर भी कहाँ ऐड हुआ करते थे!" सृष्टि ने अपनी सहेली और अपने भाई के बीच शुरू होते इस तू-तू मैं-मैं में किसी तरह बीच-बचाव करना चाह रही थी।

जाते-जाते प्रतिभा बोली, " छोड़ो यार, तुम ही अपने भाई की सहायता लो। मैं अकेला ही मैनेज कर लूँगी। मेरा इनका जमने वाला नहीं है। ट्रेलर तो तुमने आज देख ही लिया।"

सृष्टि ने प्रतिभा को उस दिन ख़ूब समझाया। अपने भाई के चिड़चिड़ेपन की वज़ह भी न चाहकर उसे बतानी पड़ी । ख़ैर, किसी तरह उसने अपनी सहेली को अपने साथ रहने के लिए राजी कर लिया।

***

पल्लव अपनी बहन और उसकी सहेली को पहले अपने कॉलेज ले गया। तीनों ने रास्ते भर इस विषय पर ख़ूब चर्चा की और साथ में मौज़-मस्ती भी।

एकांत पाकर पल्लव ने कुछ संकोच के साथ प्रतिभा से कहा, " आई ऐम सॉरी प्रतिभा, मुझे उस दिन आपसे वैसे नहीं बोलना चाहिए था।किसी और का गुस्सा शायद मैं तुमपर निकालना चाह रहा था।"

प्रतिभा कुछ मुस्कुराते हुए बोली, "छोड़िए इन बातों को। मैंने भी तो पलटकर जवाब दे ही दिया था। हिसाब बराबर। अब दोस्ती का नया चैप्टर शुरू होना चाहिए।क्यों!"

दोनों मुस्कुरा पड़े। चमकते सूरज के प्रकाश में आज दिल्ली के पेड़ बड़े स्वस्थ और मनोरम दिख रहे थे। प्रतिभा का गुस्सा समानुभूति की आँच में कब का पिघल चुका था।

कॉलेज के स्टॉफ रूम में पल्लव के प्रेरणास्रोत उसकेप्रोफेसर अनंत सिंह ने सभी को संवहनीय विकास की अवधारणा पर कुछ मूलभूत बातें बताईं। बीच बीच में उन्हें काफ़ी तेज खाँसी आई, मगर उसे नियंत्रित करते हुए उन्होंने बात जारी रखी। उन्होंने इस विषय को आसान बनाते हुए कहा, " देखो बच्चों, यह एक ज्वलंत मुद्दा है। जानते हो, दुनिया के सारे वैज्ञानिक और पर्यावरणविद इसे लेकर काफ़ी चिंतित हैं। और यह चिंता की बात है भी तो। अगर हम प्राकृतिक संसाधनों का दोहन यूँ ही करते रहें तो संभव है कि इस धरती पर से प्राणी-जगत का अस्तित्व ही समाप्त न हो जाए। और मज़े की बात तो देखो कि यह एक ऐसा विषय है जहाँ दोनों पीढ़ियों के लोगों की चिंता एक जैसी होनी चाहिए।"

"वो कैसे सर?" सृष्टि ने अपनी बड़ी आँखों को और बड़ी करते हुए पूछा।

कैंटीन वाला राजू अबतक चाय और बिस्कुट लाकर मेज पर सजा चुका था। सभी को चाय-बिस्कुट लेने का निदेश देते हुए सृष्टि की शंकाओं का समाधान करने के उद्देश्य से प्रोफेसर सिंह ने आगे बोलना शुरू किया, " सुनो सृष्टि बिटिया। तुम तो ख़ुद ही सृष्टि हो और मेरी पुत्री सरीखी हो। तुम्हें क्या समझाना! फिर भी बताता हूँ। यह जो हमारा परिवेश है न और यह जो सृष्टि हमें विरासत मिली है, अगर हमारे बाल-बच्चों को वह आगे सुरक्षित और उपयोग के लायक स्थिति में हस्तांतरित नहीं होती है तो तुम्हीं बताओ कि हम उन्हें क्या मुँह दिखाएँगे! ये जो घर-गाड़ी, बैंक-बैंलेस और दूसरी भौतिक वस्तुएँ हम उनके लिए छोड़ के जाते हैं, एक असुरक्षित पर्यावरणीय माहौल में भला उनका क्या महत्व है! नई पीढ़ी को चिंता यह है कि उन्हें शुद्ध हवा, पानी और भोजन कैसे मिलेगा और हमारी चिंता यह होनी चाहिए कि एक असुरक्षित पारिस्थितिकि में हम अपनी संतति को क्यों छोड़े जा रहे हैं!"

इस बार खाँसी इतनी तेज आई कि प्रोफसर सिंह को वाश रूम की तरफ़ जाना पड़ा। इस लगातार खाँसी से उनकी आँखें लाल हो गईं और उनमें पानी आ गए। सृष्टि और प्रतिभा एकबारगी डर गई। स्टॉफ रूम में ज्यादा शिक्षक नहीं थे, सो बड़े से हॉल में उनकी खाँसी का इको भी कुछ अधिक डरवना हो चुका था। दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में प्रश्नवाचक निगाहों से देखा} दोनों के मन में एक ही सवाल थे- क्या खाँसी इतनी डरवनी और पीड़ादायक भी हो सकती है!

ख़ैर, कुछ देर में नॉर्मल होते हुए प्रोफेसर सिंह वापस आए। उन्होंने पल्लव से आगे कहा, "देखो पल्लव, यह कोई मामूली बात नहीं है। स्कूल की ये लड़कियाँ सचमुच में इस काम को या कहो आंदोलन को समझ रही हैं। अन्यथा लोग एक स्कूल-प्रोजेक्ट के लिए इतना कहाँ भटकते हैं! इंटरनेट के इसे जमाने में आज सबकुछ एक क्लिक पर निर्भर हो गया है।" लगा ही नहीं कि इतनी मधुर आवाज़ के धनी प्रोफेसर सिंह अभी कुछ देर पहले बुरी तरह से खाँसे जा रहे थे और उनसे बोला नहीं जा रहा था।

सृष्टि ने गर्व भरी आँखों से प्रतिभा की ओर देखा और प्रतिभा ने पल्लव की ओर। पूरी युवा-पीढ़ी में'पोजिटिविटी' की एक लहर समान रूप से बहने लगी थी।

तभी सहसा प्रोफेसर सिंह अपनी सीट से उठे और उठते हुए पल्लव से कहा, "ठीक है, पल्लव! मेरा आज सिटी हॉस्पीटल में 'अप्वाइंटमेंट' है। मैं निकलता हूँ। तुम इन दोनों सहेलियों को पालम का अपना प्रोजेक्ट ज़रूर दिखा लाना। और हाँ, हमने गुड़गाँव में तालाब निर्माण और वृक्षारोपण का जो काम शुरू किया है, कभी समय निकाल कर इन्हें वहाँ भी ले जाना।"

पल्लव ने हाँ में सिर हिलाते हुए कहा, " सर, आपको हॉस्पीटल तक छोड़ दूँ!"

"नहीं, तुम जाओ। योगेश अभी आ रहा है। मैं उसी के साथ जाऊँगा।"

.........

"भैया, प्रोफेसर साहब तो इतने हँसमुख, दुबले-पतले और स्वस्थ दिखते हैं। फिर उन्हें क्या बीमारी है?" सृष्टि ने सहज भाव से पूछा।

"अरे, कुछ नहीं। चलो पालम चलते हैं।" पल्लव टालना चाह रहा था।

"क्या कोई बुरी बात है!" प्रतिभा सकुचाते हुए पूछी।

"और नहीं तो क्या! बीमारी भला कभी अच्छी होती है!"पल्लव खीझता हुआ आगे बस स्टैंड की ओर बढ़ा।

सभी को ज़ल्दी पालम पहुँचना था। पहले कच्ची बस्ती और फिर घर। तीनों बस में सवार हो गए। दिल्ली की सड़क पर भीड़ ही भीड़ नज़र आ रही थी। जिस रूट की बस में जाओ, लोग ही लोग। इन दोनों लड़कियों को लेडीज सीट पर जगह मिल गई। पल्लव उनके पास खड़ा हो गया।

..........

पल्लव कच्ची बस्ती के प्रोजेक्ट सुपरवाइजर नीरज त्यागी से इन दोनों लड़कियों को मिलाया। नीरज ने उन्हें सोलर पैनल के बारे में जानकारी देते हुए कहा, "देखिए,ये जो नीले रंग के इतने सारे सोलर पैनल आप देख रही हैं न, ये सूर्य के प्रकाश का अवशोषण करती हैं जिससे बिजली पैदा होती है। इसके अधिक प्रयोग से हम कोयले के उत्खनन को रोक सकते हैं और धरती को धँसने से बचा सकते हैं। पेड़ों का बचाव होगा और थर्मल एनर्जी के कम इस्तेमाल से हवा में धुएँ के उत्सर्जन पर भी कुछ विराम लगेगा। इससे हमारी श्वास संबंधी बीमारियों पर रोकथाम भी होंगी। इन पैनलों को फोटोवोल्टैटिक(पी.वी.) सोलर सेल कहते हैं और जब समूह में इन्हें जोड़ दिया जाता है, तो इसे ही फोटोवोल्टैटिक मॉड्यूल कहते हैं। हर मॉड्यूल की उसके डीसी आउटपुट पावर के हिसाब से रेटिंग की जाती है। इसके लिए इन्हें मानक परीक्षण स्थितियों से गुजरना होता है जिन्हें अंग्रेजी में एस.टी.सी. कहते हैं। फिर फोटोवोल्टैटिक सिस्टम के अंतर्गत इनसे ऊर्जा पैदा होती है।"

सृष्टि ने सहज उत्सुकता में पूछा, " ये एस.टी.सी. का फुल क्या हुआ!"

नीरज ने हँसते हुए कहा, " आप शायद मेरा टेस्ट ले रही हैं। एनीवे, इसे स्टैंडर्ड टेस्ट कंडीशन कहते हैं। शार्ट में एस.टी.सी.। एक फोटोवोल्टैटिक मॉड्यूल से अमूमन 100 से 365 वाट की एनर्जी पैदा होती है।"।

"ये फोटोवोल्टैटिक सिस्टम क्या हुआ?", प्रतिभा ने पूछा।

"फोटोवोल्टैटिक मॉड्यूल, इनवर्टर, स्टोरेज के लिए बैटरी पैक, इन्हें आपस में जोड़नेवाली वायरिंग, सोलर ट्रैकिंग मैकनीज्म को मिलाकर फोटोवोल्टैटिक सिस्टम बनाया जाता है।"

नीरज ने पूरा प्रोजेक्ट घुमाते हुए उन्हें एक-एक चीज़ विस्तार से समझाया। दोनों लड़कियों ने अपने मोबाइल से उनके चित्र भी खींचे।

नीरज ने सौर ऊर्जा के सिद्धांत और उसके निर्माण,उसकी क्षमता, तकनीक, उसके कार्य-निष्पादन और डिग्रेडॆशन, उसका अनुरक्षण , रिसाइकलिंग़, मानक,उसकी माउंटिंग और ट्रैकिंग पर विस्तार से बातें की।

रास्ते में लौटते हुए सृष्टि ने प्रतिभा से कहा, " यार, नीरज जी को तो काफ़ी जानकारी है।"

"अच्छा जी!" प्रतिभा ने उसे छेड़ते हुए उसकी आँखों में झाँका।

......

अगले दिन ये चारो गुड़गाँव के तालाब और वृक्षारोपण वाले प्रोजेक़्ट को देखने गए। वहीं पर इन्होंने पिकनिक भी मनाई। उस पूरे प्रोजेक्ट के भी कई सारे चित्र खींचे। इसके बाद ये चारों पल्लव के घर पर भी नियमित रूप से मिलने लगे। सृष्टि ने सोलर एनर्जी पर और प्रतिभा ने तालाब खुदाई और वृक्षारोपण पर अपने प्रोजेक्ट पूरा किए और इनके महत्व को संवहनीय विकास से जोड़ा। इन चारों के बीच सीनियर-जूनियर का फर्क अबतक मिट चुका था। सभी अच्छे दोस्त बन गए थे।

दोनों सहेलियाँ अपने बोर्ड की परीक्षाओं में जुट गईं। लगभग दो महीनों तक किसी की कोई मुलाक़ात नहीं हुई।

.......

एक दिन सृष्टि ने अपने भाई से कहा, "भैया, बहुत दिन हुए। हमारी गैंग को पुनः जमा होना चाहिए।"

पल्लव भी कुछ उत्साहित हो आया। जोश-ओ-खरोश में कार्यक्रम बने और अगले दिन सभी ने गुड़गाँव के उसी तालाब किनारे मिलने और पिकनिक मनाने का प्रोग्राम बनाया।

पल्लव ने कहा, "देखो दोस्तो, यह हमारे प्रोफेसर साहब का कितना बड़ा योगदान है कि इस दो एकड़ की जमीन को उन्होंने इतना मनोरम और प्रकृति-संपन्न बना दिया।"

तभी पल्लव का मोबाइल बजा। उधर से एसोशिएट प्रोफेसर योगेश जी का फोन था। उनकी आवाज़ में गोया सदियों की उदासी आ पैठी थी। इधर से पल्लव बेचैनी में लगभग चिखता हुआ बोला, " क्या हुआ सर! कुछ बोलिए सर!"

योगेश जी फोन पर ही किसी बच्चे की तरह फूट फूट कर रो पड़े, " सर नहीं रहे पल्लव!"

पल्लव के हाथ से मोबाइल गिर पड़ा। वह जैसे अपनी सुध-बुध पूरी तरह से भुला चुका हो। निराशा के चरम में वह घास पर ही पसर गया। उसे इस ख़बर ने अंदर तक तोड़ कर रख दिया था। दोनों सहेलियों ने किसी तरह पल्लव को संभाला। नीरज ने उसका फोन लेकर आगे बात करना शुरू किया। तब सारा मामला समझ में आया।

............

तेरहवीं के बाद उसी कॉलेज में योगेश जी ने इन चारों को बुलाया और उन्हें एक बुकलेट, एक मोटी फाइल और एक डायरी दिखाते हुए बोले, " देखो बच्चों, जैसा कि तुमलोग जानते ही हो, प्रोफेसर सिंह ने यह 'नवोदय चेतना ट्रस्ट' बनाया था, जिसके देख-रेख की जिम्मेदारी अब मुझपर डाली गई है और तुम चारों को इसका प्रचार-दूत बनाया है। उन्हें युवा-पीढ़ी पर शुरू से ही बहुत भरोसा था। वे तुमलोगों को अपनी अंतिम साँस तक याद करते रहे। अब तुमलोगों को ही इस काम को आगे बढ़ाना है। इसे देश के दूसरे हिस्सों तक पहुँचाना है। मैं तुम्हारे साथ हूँ। और हाँ, प्रोफेसर सिंह का वरदहस्त तो हमारे ऊपर हमेशा रहेगा ही।"

प्रोफेसर अनंत सिंह को याद करते हुए एसोशिएट प्रोफेसर योगेश भी भावुक हो गए। ऐसा लगा कि अभी वापस अनंत सिंह कहीं किसी क्षितिज से आकर पूर्ववत बोलना शुरू कर दिए हों। उनकी बातें उस स्टॉफ रूम में गूँज रही थी, " मेरे माता-पिता ने मेरा नाम यूँ ही अनंत नहीं रखा है। कोयले से उगलते जिन धुंओं ने मेरे फेफ़ड़े को खराब किया, कई वर्षों तक दमघोंटू खाँसी के जिन मारक 'अटैक्स' को न चाहते हुए भी मुझे बर्दाश्त करना पड़ा, जिसके कारण मुझे अकाल मृत्यु मिल रही है, मैं नहीं चाहता कि किसी और को साँस की ऐसी बीमारी हो। मैं जानता हूँ, मनुष्य की ज़रूरत कभी कम नहीं हो सकती है। बिजली के बग़ैर उसका काम भी नहीं चल सकता है। इसलिए 'नवीकरणीय ऊर्जा' पर ताज़िंदगी मेरा ज़ोर रहा। मेरे बचपन और मेरी किशोरावस्था ने कोयले से निकलते जितने धुँए पिए हैं, मैं नहीं चाहता कि कोई और बच्चा और किशोर इस ज़हर को पिए और निरपराध होकर किसी और की करतूत की सजा भोगे। ये बेकार हुए मेरे फेफड़े अपने साथ मेरे पूरे शरीर को मार सकते हैं, मेरी जान ले सकते हैं मगर मेरे स्वप्न और संकल्प मेरे युवा साथियों में हमेशा जाग्रत रहेंगे।"

ऐसा लगा कि उस पवित्र आत्मा की शक्ति उन सबमें समा गई है।

***