नैन छिन्दन्ति शस्त्राणि Sudarshan Vashishth द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
शेयर करे

नैन छिन्दन्ति शस्त्राणि

नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि

कथा कहती कहानियां

सुदर्शन वशिष्ठ



© COPYRIGHTS

This book is copyrighted content of the concerned author as well as Matrubharti.
Matrubharti has exclusive digital publishing rights of this book.
Any illegal copies in physical or digital format are strictly prohibited.
Matrubharti can challenge such illegal distribution / copies / usage in court.

सुदर्शन वशिष्ठ

1ण्जन्मः 24 सितम्बर, 1949. पालमपुर हिमाचल प्रदेश (सरकारी रिकॉर्ड में 26 अगस्त 1949)। 125 से अधिक पुस्तकों का संपादन/लेखन। नौ कहानी संग्रहः (अन्तरालों में घटता समय, सेमल के फूल, पिंजरा, हरे हरे पत्तों का घर, संता पुराण, कतरनें, वसीयत, नेत्र दान तथा लघु कथा संग्रह : पहाड़ पर कटहल)।

2ण्चुनींदा कहानियों के चार संग्रह : (गेट संस्कृति, विशिष्ट कहानियां, माणस गन्ध, इकतीस कहानियां)।

3ण्दो लघु उपन्यास : (आतंक, सुबह की नींद)। दो नाटक : ( अर्द्ध रात्रि का सूर्य, नदी और रेत)।

4ण्एक व्यंग्य संग्रह : संत होने से पहले।

5ण्चार काव्य संकलन : युग परिवर्तन, अनकहा, जो देख रहा हूं, सिंदूरी सांझ और खामोश आदमी।

6ण्संस्कृति शोध तथा यात्रा पुस्तकें : ब्राह्‌मणत्वःएक उपाधिःजाति नहीं, व्यास की धरा, कैलास पर चांदनी, पर्वत से पर्वत तक, रंग बदलते पर्वत, पर्वत मन्थन, पुराण गाथा, हिमाचल, हिमालय में देव संस्कृति, स्वाधीनता संग्राम और हिमाचल, कथा और कथा, हिमाचल की लोक कथाएं, हिमाचली लोक कथा, लाहौल स्पिति के मठ मंदिर, हिमाचल प्रदेश के दर्शनीय स्थल, पहाड़ी चित्रकला एवं वास्तुकला, हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक संपदा।

7ण्हिमाचल की संस्कृति पर छः खण्डों में ‘‘हिमालय गाथा‘‘ श्रृंखलाः देव परम्परा, पर्व उत्सव, जनजाति संस्कृति, समाज—संस्कृति, लोक वार्ता तथा इतिहास।

8ण्सम्पादनः दो काव्य संकलन : (विपाशा, समय के तेवर) ; पांच कहानी संग्रह : (खुलते अमलतास, घाटियों की गन्ध, दो उंगलियां और दुष्चक्र, काले हाथ और लपटें, पहाड़ गाथा)। हिमाचल अकादमी तथा भाषा संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश में सेवा के दौरान लगभग सत्तर पुस्तकों का सम्पादन प्रकाशन। तीन सरकारी पत्रिकाओं का संपादन।

1ण्सम्मानः जम्मू अकादमी तथा हिमाचल अकादमी से ‘आतंक‘ उपन्यास पुरस्कृत; साहित्य कला परिषद्‌ दिल्ली से ‘नदी और रेत‘‘ नाटक पुरस्कृत। हाल ही में ‘‘जो देख रहा हूं'' काव्य संकलन हिमाल अकादमी से पुरस्कृत। कई स्वैच्छिक संस्थाओं से साहित्य सेवा के लिए सम्मानित।

1ण्देश की विगत तथा वर्तमान पत्र पत्रिकाओं : धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिन्दुस्तान से ले कर वागर्थ, हंस, साक्षात्कार, गगनांचल, संस्कृति, आउटलुक, नया ज्ञानोदय, समकालीन भारतीय साहित्य आदि से रचनाएं निरंतर प्रकाशित। राष्ट्रीय स्तर पर निकले कई कथा संकलनों में कहानियां संग्रहित। कई रचनाओं के भारतीय तथा विदेशी भाषाओं मेें अनुवाद। कहानी तथा समग्र साहित्य पर कई विश्वविद्‌यालयों से एम फिल तथा पीएचडी.।

1ण्पूर्व सचिव/उपाध्यक्ष हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी ; उपनिदेशक/निदेशक भाषा संस्कृति विभाग हिप्र।

2ण्पूर्व सदस्य : साहित्य अकादेमी दिल्ली, दुष्यंत कुमार पांडुलिपि संग्रहालय भोपाल।

3ण्वर्तमान सदस्य : सलाहकार समिति आकाशवाणी; हिमाचल राज्य संग्रहालय सोसाइटी शिमला, विद्याश्री न्यास भोपाल।

4ण्पूर्व फैलो : राष्ट्रीय इतिहास अनुसंधान परिषद्‌ भारत सरकार

5ण्सीनियर फैलो : संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार।

1ण्संपर्क : ‘‘अभिनंदन‘‘ कृष्ण निवास लोअर पंथा घाटी शिमला—171009 हि प्र

2ण्फोन : 094180—85595 (मो) 0177—2620858 (आ)

3ण्ई—मेल : अेंीपेीजीेंनकंतेींद/लींववण्बवउ

प्रकाशक की कलम से

हिन्दी कहानी आज अपने पुराने और वास्तविक स्वरूप में लौटती प्रतीत हो रही है। वास्तविक स्वरूप यानि कहानी, कहानी बनती जा रही है। कहानी में यदि कथा तत्व नहीं है तो वह संस्मरण, रिपोर्ताज, निबन्ध कुछ भी हो सकता है, कहानी नहीं हो सकती। कथा तत्व ही कहानी का मूल है।

पिछली सदी के अंतिम दशक तक कहानी से कथा दूर होने लगी और एक एब्स्ट्रेक्ट सी चीज़ सामने आई। जादूई यथार्थ के नाम पर कुछ कहानियां ऐसी भी आईं जिनमें न जादू था न यथार्थ। सरल और सीधी भाषा या शिल्प में कही जाने वाली कथा गायब होने लगी। ऐसी भी स्थ्िति आ गई कि कई पत्रिकाओं में उलझा सा संस्मरण, भाषण का मसौदा भी कहानी कह कर परोसा जाने लगा। लगभग ऐसा ही कविता के साथ भी हुआ। एक गद्य के पैरे को कविता कह कर छापा जाने लगा।

शिल्प की अत्यधिक कसरत; कथा से दूर उलझावदार, पेचदार कथानक ने एक बार तो पाठकों को चमकृत कर दिया किंतु जल्दी ही इससे मोहभंग होने लगा। स्वयं कहानीकार भी इसका निर्वाह देर तक नहीं कर पाए। उन्हें कथा की ओर लौटना ही पड़ा। इस सदी के पहले दशक के अंत तक कहानी, फिर कहानी की ओर लौटी है। आज पत्रिकाओं में फिर से कहानी दिखलाई पड़ती है।

सारिका और धर्मयुग ने सशक्त कहानियां देने के साथ एक कहानी आन्दोलन भी खड़ा किया। सारिका ने प्रतियोगिताओं के माध्यम से प्रत्यक्ष रूप से तो धर्मयुग ने अप्रत्यक्ष तौर कहानी का एक आन्दोलन चलाया। इसी तरह की कहानी प्र्रतियोगिताएं साप्ताहिक हिन्दुस्तान ने भी कराईं।

धर्मयुग के माध्यम से कहानी का जो भीतर ही भीतर एक आन्दोलन चला उसने कई कहानीकार दिए। यहां पुराने और स्थापित कहानीकाराें के बराबर में नये कहानीकार भी आए। जैसाकि होता रहा है, शिवानी जैसे कुछ ऐसे भी कहानीकार थे जिनकी तरफ आलोचकों ने ध्यान नहीं दिया। बहुत से सम्भावनाशील कथाकार न जाने कहां लुप्त हो गए। अस्सी के उस दौर में से0रा0 यात्री, राकेश वत्स, स्वदेश दीपक, पानू खोलिया, देवेन्द्र इस्सर, चन्द्रमोहन प्रधान, सुदर्शन नारंग, डा0 सुशीलकुमार फुल्ल, संजीव, शिवमूर्ति, मनीषराय, सुदर्शन वशिष्ठ, रूपसिंह चंदेल, केशव, बलराम, चित्रा मुद्‌गल, राजकुमार गौतम, मालचंद तिवारी, प्रभुनाथ सिंह आज़मी आदि कितने ही कहानीकारों ने ध्यान आकर्षित किया। यह भी सत्य है कि इन में कुछ तो जम कर स्थापित हुए, कुछ का स्मरण कभी कभार किया जाने लगा और कुछ का किसी ने नाम नहीं लिया। किंतु उस युग में धर्मयुग में छपने का अर्थ था एकाएक लाखों पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होना।

यूं तो सुदर्शन वशिष्ठ की पहली कहानी 1969 में छपी और पहला कहानी संग्रह 1979 में आया किंतु आठवें दशक में भौगोलिक सीमाओं को तोड़ते हुए वशिष्ठ ने राष्ट्रीय मंच में दस्तक दी और तमाम शीर्षस्थ राष्ट्रीय पत्रिकाओं मे यह नाम एकाएक उभर कर सामने आया। सारिका की ‘‘ऋण का धंधा'' हो या धर्मयुग की ‘‘सेमल के फूल‘‘, ‘‘पिंजरा'', ‘‘घर बोला'', ‘‘सेहरा नहीं देखते'' या साप्ताहिक हिन्दुस्तान की ‘‘माणस गन्ध'', योजना की ‘‘सरकारी पैसा''; एकाएक सभी पत्रिकाओं में यह नाम देखा जाने लगा।

धर्मयुग में पहली कहानी ‘‘सेमल के फूल'' 22—29 जून 1980 के अंक में प्रकाशित हुई जिसके बाद लगातार कहानियां लगभग हर वर्ष धर्मयुग के बंद होने तक आती रहीं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान में ‘‘माणस गन्ध'' का प्रकाशन 31 मार्च—6 अप्रैल 1991 अंक में हुआ।

गत पैंतालीस बरसों से लगातार कहानी लेखन में सक्रीय वशिष्ठ ने एक लम्बा सफर तय किया है। अतिसंवेदनशील मानवीय मूल्यों की कोमल छुअन, घर और गांव का मोहपाश, शहर और गांव के बीच आकर्षण और बढ़ता हुआ विकर्षण, घर परिवार से दफतर तक का संसार, निर्मम सरकारी तन्त्र, राजनीति की विभिषिका, सब इनकी कहानियों में देखने को मिलता है। सम्बन्धों की रेशमी डोरियों से ले कर गहन और जटिल मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों तक कथाकार ने एक यथार्थवादी किंतु अद्‌भुत और रोमांचक संसार का निर्माण किया है।

वरिष्ठ कथाकार वशिष्ठ का कथा संसार उनके लेखन की तरह बहुआयामी विविधताओं से भरा हुआ है। यह किसी सीमित दायरे में बन्ध कर नहीं रहता। वे कहानी, उपन्यास, कविता, च्यंग्य, निबन्ध, सांस्कृतिक लेख आदि कई विधाओं में एक साथ लिखते हैं। इसी तरह उनकी कहानियों की भावभूमि और ज़मीन अलग अलग रही है। वशिष्ठ की कहानियां बोलती है, कहानीकार नहीं। कहानी में कहानीकार होते हुए भी नहीं होता। परिवेश और परिस्थितियों के अनुरूप संवेदना, कोमलता, सादगी के साथ ताज़गी, धारदार व्यंग्य के साथ एक तीख़ापन इनकी कहानियों में दिखलाई पड़ता है।

अव्यक्त को व्यक्त करना और व्यक्त को अव्यक्त करना, पात्रों को चरम तक उभार कर रहस्यमयी परिस्थितियों में छोड़ देना इन की कला है। कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक और बड़ी से बड़ी बात करना, प्रतीकात्मक ढंग से इशारे में कहना, कथ्य के अनुरूप वातावरण तैयार करना और काव्यमयी भाषा का निर्माण इन की कहानी कला में आता है। कहानियों के अंत प्रायः खुले छोड़ दिए जाते हैं जो पाठक को देर तक सोचने पर विवश करते हैं।

गुलेरी सा शिल्प का नयापन, यशपाल का लेखन का विस्तार, मोहन राकेश सी कसावट, निर्मल वर्मा सी कोमलता और दक्षता इनकी कहानियों में देखने को मिलती है।

शब्दों की मितव्ययता और कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक बात कहने की क्षमता, निरर्थक संदर्भों के बखान से परहेज, अनावश्यक विस्तार से बचाव इनकी कहानियों की विशेषता रही है। पात्रों को परिस्थ्ििात के अनुरूप रिएक्ट करने के लिए खुला छोड़ना, कहानी में उपस्थित हो कर भी अनुपस्थित रहना, कहानियों की एक ओर विशेषता कही जा सकती है।

विषयों की विविधता के साथ बाल मनोविज्ञान, वृद्धों की मानसिकता, नारी मन की कोमल भावनाएं, मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग की ऊहापोह; इन सब का विवेचन बदलते हुए मूल्यों और परिस्थितियों के साथ कहानियाें में नये नये आयामों के साथ परिलक्षित होता है।

सारिका, धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाओं का एक एक कर बंद होना साहित्य में एक दुखांत घटना थी। इस दुर्घटना के बाद साहित्य जगत में अन्धेरा सा छाया रहा। उस युग के बाद आउटलुक, कहानीकार, पश्यन्ति, पल प्रतिपल, विपाशा, साहित्य अमृत, हरिगन्धा, हिमप्रस्थ, मधुमति, साक्षात्कार, से ले कर सण्डे ऑब्जर्बर, जनसत्ता, अमर उजाला, नवभारत टाईम्ज, हिन्दुस्तान, दैनिक ट्रिब्यून, नई दुनिया जैसे पत्रों तक इनकी कहानियां छपती रहीं।

वशिष्ठ की कथायात्रा अब भी निरंतर जारी है। समकालीन भारतीय साहित्य हो या हंस, कथादेश या नवनीत, कादम्बिनी हो या वागर्थ इनकी कहानियां निरंतर देखी जा सकती हैं।

एक लम्बे समय और स्पेस में निरंतर लेखन के कारण इनकी कहानियों में पुरातन और नवीन का सामंजस्य स्थापित हुआ। समय और समाज के परिवर्तन के साथ आए भौतिक और मनावैज्ञानिक बदलाव इन कहानियों में सौ वर्ष से अधिक के कालखण्ड को अपने में समोए हुए है। इस दृष्टि से यह कथायात्रा, जो अभी भी जारी है, एक दस्तावेज के रूप में सामने आती है।

कहानी को किसी खांचे में कस कर खरीदे हुए धागों से बुनना कथाकार का अभीष्ट नहीं रहा। इन का धागा भी अपना है, रंग भी अपना है, खड्‌डी भी अपनी है और बुनावट का डिजायन भी अपना है। इन की ऊन में सिंथेटिक की मिलावट नहीं है कि ओढ़ते ही चिंगारियां निकलने लगें या किसी रंगरेज़ ने नकली और कच्चे रंग से रंगा भी नहीं कि एक बार धो पहन कर रंग फीेके पड़ जाएं । इन में असल ऊनी धागा है, असली और पक्के रंग है। कोई भी पाठक इसे सहजता से ओढ़ बिछा सकता है। इससे स्वाभाविक गर्माहट मिलेगी जो देर तक धीमे धीमे असर करती रहेगी।

यहां कहानीकार की नारी संवेदना को ले कर कुछ विशिष्ट कहानियां दी जा रही हैं जो अपने कथ्य और काव्यमयी भाषा के कारण विशेष ध्यान आकर्षित करती हैं। सभी कहानियों में समाज में नारी के प्रति संस्कार, संबंन्धों की जटिलता, का बड़ी सूक्ष्मता से वर्णन किया गया है।

नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि

टूं......टूं.....टूं......टीं....टीं.....टीं.....टूं......आवाजें हमेशा कानों में गूंजती रहतीं। बाहर आ जाओ या कहीं भी जाओ, ये आवाजें कानों में बजती रहतीं। इन आवाजों में एक ग़जब की लय थी, संगीत था। लगता, इन आवाजों से ही जीवन है। जब तक टूं.... आवाज यन्त्र से निकलती रहेगी, जीवन है। जब एक लम्बी टूं..... करती बंद हो जाए, जीवन समाप्त।

यन्त्र में जीवन की रेखाएं खिंचती हैं, एक ग्राफ बनता है। यह ग्राफ निश्चित गति से, निश्चित आकार में बनता जाता है। जीवन का ग्राफ टेढ़ा मेढ़ा है, सीधा नहीं। यह ग्राफ सीधा हो जाए या सीधा होता हुआ टूट जाए तो भी जीवन समाप्त समझो। देह में हलचल, हरकत, ताज़गी, स्फूर्ति, प्राण इसी ग्राफ से है।

टेढ़ी मेढ़ी, ऊंची नीची होती जीवनरेखा चलती है धीरे धीरे। रूकते रूकते चलती है। कभी रूकती है, कभी चलती है। कभी जुड़ती, टूटती, फिर जुड़ जाती।

नन्हीं सी ट्रॉली के नीचे लटकी पॉलिथिन की एक थैली में पानी के बुलबुले आवाजें करते हुए बनते हैं। जैसे कुछ ख़ौल रहा हो ठण्डे पानी में। ये बुलबुले बंद हो जाएं तो भी जीवन गहरी ख़ामोशी में डूब जाता है।

तभी ये ध्वनियां, जो निरंतर कानों में गूंजती हैं, मधुर लगने लगती हैं। ‘‘नवजात शिशु वार्ड'' एक सुनहरे भविष्य की इन ध्वनियों के बीच किलकारियां मारता हुआ लगता है। हालांकि यहां कोई नवजात किलकारी नहीं मार सकता। हां, कभी एक बच्चा रोने लगता है तो एकसाथ तीन चार रोने लग जाते हैं। जो रो नहीं पाते, वे धीरे धीरे सुबकते रहते हैं। सभी अभिभावक इन्हें धीरे धीरे थपथपा कर चुप कराने की कोशिश करते हैं। कभी सब एकाएक चुप हो जाते हैं। यह चुप्पी बहुत बार असहनीय हो जाती है।

इनके रोने का कारण पता नहीं चलता तो इनके चुप होने का कारण भी पता नहीं चलता।

तभी ये ध्वनियां, जो निरंतर कानों में गूंजती हैं..... संतूर की तरह लगती हैं। जल तरंगों की तरह या कभी मंदिर में आरती की घण्टियों की तरह। नीचे लटकी थैली में पानी के बुलबुले बनते रहना कितना सुहाना लगता है। जैसे ग्लास टैंक में मछलियों के बीच पानी के बुलबुले निकलते रहते हैं, बीच में नन्हीं मछलियां मुंह से बुलबुले निकालते हुए तैरती हैं।

......इन बुलबुलों का ध्यान रखना, बंद हो जाएं तो फौरन नर्स या डॉक्टर को बुलाओ.... एक बुजुर्ग ने चेताया था। तब लगा जैसे वह कह रहा हो....पानी केरा बुलबुला अस मानुष की जात, देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा प्रभात।

अपने अपने बेबी के पास कोई न कोई खड़ा रहता, दिन रात। मासी, चाची, पिता, चाचा, दादा या कोई और निकट सम्बन्धी। दिन तो हलचल में निकल जाता, रात बहुत लम्बी हो जाती। पूरी रात कोई कैसे जाग सकता है! कोई स्टूल पर बैठा ऊंघता, कोई ट्रॉली पर सिर रखे लेट जाता। कभी एकदम चैतन्य हो इधर उधर घूमने लगता। ख़ासकर सुबह का समय बहुत कठिन था। कहीं गले में लगी नाली न खिच जाए,,,कहीं नाक से सांस की नाली न हट जाए। इन की माएं तो पड़ीं थी अपने अपने वार्डों में। वे उन गायों की तरह थीं जिनके नवजात बछड़े उन से दूर ले जाए गए हैं। जब बछड़ा दूर जाता है तो वे आंखें फाड़े नाक से सूं सूं की आवाजें निकाल व्याकुल हो जाती हैं और खूंटा तोड़ने पर आमादा हो जाती हैं। गाएं और माएं एक सी होती हैं। तभी उनके नाम भी एक से हैं।

यहां उनका नाम बेबी के साथ जुड़ा है.... बेबी ऑफ अर्चना, बेबी ऑॅफ आरती, बेबी ऑफ पूजा। बेबीज़ के अभी कोई नाम नहीं हैं।

साथ की ट्रॉली में एक बच्चे को रखा गया तो उसकी नानी, जो दूर किसी गांव से आई थी, परेशान हो गई.....इसे यहां क्यों ले लाए! मां के पास कब ले जाएंगे...उधर मां परेशान है कि मेरा बच्चा कहां गया.....ये यहां अकेला कैसे रहेगा! यहां तो इसे बान्ध दिया। कब छोड़ेंगे इसको....! मैंने तो मां के पास छोड़ना इसको.....।

केवल दो बार आंखें खोलीं उसने।

एक बार शुरू में ही, शायद दूसरे दिन सुबह, जमुहाई लेते हुए एक क्षण के लिए.....इसकी आंखें कितनी सुंदर है, किसी ने कहा।...और देखो हाथ पैर कितने सलोने जैसे घड़े हुए! दूसरी बार, तीसरे दिन आंखें खोलीं थी, शायद देर तक रोने के बाद चुप होने पर।

‘नईं देखना....नईं देखना.....क्यूं......! हौले से सिर थथपाते हुए बार बार कहता वासुदेव। वैसे भी यहां सभी बच्चों की आंखें बंद थीं। जैसे पक्षियों के बच्चों की आंखें बंद होती हैं।.....यहां कुछ नहीं है देखने को...मन ही मन जबाब भी देता...सफेद चोगे पहने नर्स, डॉक्टर। हरे चोगे पहने अभिभावक। सुबह जब बड़े डॉक्टर का राउंड होता तो सभी को नाक में बान्धने के लिए पटि्‌टयां भी दे दी जातीं।

उसने क्या क्या देखा आंखें खोल कर। कैसा लगा यह प्रपंचभरा संसार। छोटे टीवी में बजते बेहूदा समाचार। शाम को रद्‌दी बनते अख़बार। चारों ओर रोते बच्चे। रात रात भर जागती नर्सें। उन्नींदे से, अनमने से, उठते डॉक्टर। परेशान खड़े अर्िभभावक। अच्छा है ये आंखें बंद रखे। यहां सभी अच्छे बच्चे आंखें बंद रखते हैं। यहां क्या देखना!

लगता था, उसे नहीं है अभी जीने की इच्छा या अनिच्छा भी। उसे नहीं है मोह ममता हमारी तरह। न राग, न विराग। इन सब से विरक्त, उदासीन है वह।

बेसुध हैं सब अपने अपने संसार में। किसी की चिंता नहीं, सुध नहीं किसी की। यहां तक कि अपनी भी नहीं। इतना कुछ घट रहा यहां। हर पल, हर क्षण। कोई रोता है तो रोता ही चला जाता है। पता नहीं क्यों! एक रोया तो तीन चार और रोने लग जाते हैं। कई दिनों से चुप है कोई, तो बस चुप है। कुछ के हाथ पांव में भी हरकत नहीं। एकदम सुन्न पड़े हैं रबड़ की गुडि्‌डयों की तरह। कोई जैसे चाहे, मरोड़ दे।

बच्चे कहां रहते हैं गुपचुप गुमसुम! हाथ पांव मारे बिना तो एक क्षण भी नहीं रह सकते। कभी मंद मंद मुस्कराते हैं। कभी जोर जोर से किलकारियां मारते हैं। एकदम चीख कर रोते हैं तो एकाएक चुप भी हो जाते हैं। कभी मुंह में हाथ डाल लेेते है,ं कभी पैर। कभी एकदम बांहें और पैर एकसाथ उछालते हैं। कहते है, वे किसी दूसरे ही लोक में होते हैंं। पता नहीं किसे देख मुसकाते हैं, किसे देख हंसते हैं। किसे देख रोते हैं। किससे बातें करते हैं।

वासुदेव छोटे छोटे खिलौने, झुनझुने ला कर धीरे से बजाता और फुसफुसाता : ‘‘आंखें खोलो....देखो तो क्या लाया हूं.....नईं देखना....नईं देखना.....क्यूं! मुझ से नाराज हो!...क्यूं....!''

जन्म के तुरंत बाद बेटी ने लगभग दौड़ते हुए उसे ‘नवजात शिशु वार्ड' के इन्क्यूबेटर में लिटा दिया। वहां उपस्थित डॉक्टर ने न आव देखा न ताव; फुर्ती से नाक के दोनों छेदों में एक दोमुंही नाली फंसा कर गले में बान्ध दी। उधर आक्सीजन का सिलेंडर ऑन कर दिया। दूसरी नाली गले के रास्ते पेट में घुसेड़ दी जिस के बाहरी सिरे पर ढक्कन लगा बंद कर दिया। कोमल बांह में सूई चुभो कर एक और नली और बान्ध दी जिसे ग्लूकोस की छोटी बोतल में फंसा दिया। बाहर जनवरी की ठण्ड थी। भीतर पूरा कमरा अंदर से बहुत गर्म था, ट्रॉली के ऊपर लगा हीटर भी चला दियाः....इसे गर्म रखना, हाथ पैर टोहते रहना...ज्यादा गर्म लगे तो हीटर बंद कर दो, नाली नाक के पास से न हटे....हिदायत दे कर उसे सब तरफ से बान्ध बूंध कर नर्स और डॉक्टर निश्चिंत हो बीच के कमरे में सुस्ताने बैठ गए।

सुबह वासुदेव आया तो वह सो रही थी। थोड़ी देर में वह जोर जोर से हाथ पांव मारने लगी। नाक वाली नाली कस कर हाथ में पकड़ ली और झटके से नाक से बाहर कर दी। दूसरी बार मुंह की नाली हाथ में आ गई जो बड़ी कठिनाई से छुड़ाई वासुदेव ने। वह कभी भी, कोई भी नाली हाथ में जोर से पकड़ खींच देती। वासुदेव उसके नन्हें और कोमल हाथ में अपनी उंगली दे देता।

पहले घरों में जन्म के तुरंत बाद मामा द्वारा बच्चे को शहद चटाया जाता था। अब घर में डिलीवरी तो बहुत रिस्की हो गई है, समय से पहले ही प्राब्लम्ज आ खड़ी होती हैं। तभी तो इस की मां को इतनी जल्दी अस्पताल लाना पड़ा।

पहली रात और अगला पूरा दिन वह बहुत एक्टिव रही। जोर जोर से हाथ पांव मारती। जोर जोर से रोती। वासुदेव के अलावा कोई भी वहां पांच मिनट खड़ा नहीं रह पाया।

‘‘जी जाएगी ये.....चिंता मत करिए.....जी जाएगी।'' साथ की ट्रॉली वाले एक बुजुर्ग ने दिलासा दिया।

‘‘कौन होते हैं आप इसके!'' ‘‘मैं!...दादा...।''

‘‘अच्छा!....जी जाएगी। चिंता न करिए।......पर यहां रहना पड़ता है बे बोह्‌त दिन...मुझे दस दिन हो गए.... क्या करना बे अब। ''

इन सज्जन के जुड़वां टेस्ट ट्‌यूब बेबीज़ थे। एक पोता, एक पोती। लड़की एक्टिव थी, लड़का पड़ा रहता गुमसुम। उन्होंने बताया : ‘‘बहु के कोई बच्चा नहीं जिया। तीन हुए, बचा एक भी नीं। बड़ी मुश्किल ये दोनों चण्डीगढ़ में ट्‌यूब से हुए हैं। देखो बे अब... ये तो जी जाएगी, देख लेणा।''

दूसरे दिन उन दोनों के कपड़े उतार, आंखों में पटि्‌यां बान्ध एक शीशे के बक्से में डाल दिया जहां नीली रोशनी छोड़ी गई। अब इन्हें क्या हुआ होगा, पहले पता नहीं चला। फिर ज्ञात हुआ उन्हें पीलिया हो गया था।

‘‘प्रीेमेच्यूर बेबी का कुछ नहीं कह सकते। सात महीने में बेबी के भीतरी ऑरगन विकसित नहीं हो पाते। बहुत बार लंग्ज कमजोर रह जाते हैं। ऑक्सीजन तो लगानी ही पड़ती है, एक इंजेक्शन भी देना पड़ सकता है जो बीस हजार का आता है।'' लेडी डॉक्टर ने कहा था।

‘‘ऐसी ही जरूरत पड़े तो हम ले लेंगे। यहां तो मिल जाता होगा।'' पूछा था वासुदेव ने।

‘‘यहां तो नहीं मिलता, चण्डीगढ से लाना पड़ता है। पर हमारे पास एक दो पड़े रहते हैं।....लंग्ज के साथ दिमाग भी पूरी तरह डवलॉप नहीं होता। बाद में ऐसे बच्चे विकलांग या एब्नॉर्मल भी हो जाते हैं।''

वासुदेव को तमाम विकलांग बच्चों के चेहरे याद आने लगे जो प्रायः बड़े बड़े किंतु देखने में ही बुद्धू लगते हैं।़ कई जवान तो हो जाते हैं, ठीक से चल नहीं पाते, बेलैंस नहीं बनता। उनकी टांगें घिसटती रहती हैं, सिर इधर उधर लुढ़कता सा रहता है। बहुत से अमीरों के ऐसे बच्चे देखे हैं उसने जो नौकरों के सहारे चले होते हैं।

अनेकानेक आशंकाओं से घेर दिया डॉक्टर ने जन्म से पहले ही : ‘‘..... इसलिए जितने ज्यादा दिन अस्पताल में निकल जाएं, उतना ही अच्छा है। बीच में कोई प्राब्लम न हो, इंफेक्शन ज्यादा न बढे़, नेचुरल पैन्ज न आ जाएं तो ठीक है। इस स्टेज में भी यहां से लोग बच्चे ले कर घर गए हैं, ऐसी बात नहीं है। हां, कोई प्राब्लम आ गई तो डिलीवरी तुरंत करवानी पड़ेगी।''

ज्यादा दिन नहीं निकल पाए। यह डॉक्टरों के हाथ में नहीं था। समय से पहले ही बहु को नॉर्मल डिलीवरी हो गई।

इस ‘नवजात शिशु वार्ड' में अधिकांश प्रीमेच्यूर डिलिवरी केसिज़ ही थे। जो सात महीने में ही इस नश्वर संसार में आने को आतुर हो गए, वे सब यहां इकट्‌ठे हो गए। हां, कुछेक आठवें महीने वाले भी थे, जो किसी न किसी कारण नॉर्मल नहीं रह पाए। सभी के नाक में नाली, गले में नाली, ड्रिप, बहुतों को ऑक्सीजन। बहुत से वी0पी0, धड़कन के यन्त्रों से लैस। हार्ट बीट जानने वाले यन्त्र कम थे अतः उन्हें ही लगाते जिन्हें ज्यादा जरूरी समझा जाता। वेंटीलेटर तरह की मशीन एक ही थी। जो ज्यादा सीरियस हो जाता उसे उस मशीन के हवाले कर दिया जाता।

दूसरी रात वह सुस्त हो गई। बस सोयी ही रहने लगी।.....ये शॉक में चली गई है, डॉक्टर ने बताया। शॉक में जाने का अर्थ था सारी एक्टिविटी का मंद पड़ना, शिथिल हो जाना। एक सुस्ती और बेहोशी सी छा गई थी। बहुत बार झुक कर देखना पड़ता कि सांस भी चल रही है या नहीं।

इस बीच तरह तरह के टेस्टों के लिए उसका खून निकाला जाने लगा। दो तीन टेस्ट तो यहां आते ही हो गए। उसकी नन्हीं बांह से झट खून निकाल लिया जाता। अब ये टेस्ट, अब वो टेस्ट। एक एक टेस्ट के लिए बार बार डॉक्टर सीरिंजें लिए आ जाते। दो ही दिन में नाजुक बांह में जगह जगह घाव हो गए। कोई जगह न बची तो पांव के पास से खून निकाला जाने लगा।

उस वार्ड में डॉक्टर बदलते रहते थे। एक दिन एक टीम आती तो दूसरे दिन दूसरी। लेडीज अस्पताल का यह नवजात शिशु वार्ड मुख्य मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल का विंग था। अतः मुख्य अस्पताल से ट्रेनी डॉक्टर और स्टुडेंट्‌स आते। एक बार सुबह एक नये डॉक्टर ने उसके पैर की ऊंगली में एक चिमटी लगाई। यन्त्र में कोई हरकत नहीं हुई। फिर दूसरे पैर की ऊंगली में लगाई, तब भी सूई नहीं हिली। उसने दूसरे बच्चे के पैर में लगाई तब भी सूई ज्यों की त्यों ही रही। वह फायलों में कुछ लिखता भी जा रहा था। असल में वह यन्त्र ही खराब था। ग्लूकोस चलना बंद हो गया था अतः एक युवा लेडी डा्‌क्टर ने बांह में सूई चुभोई। वहां नस न मिल पाने पर दूसरी बांह में चुभोई। यहां भी कुछ न लग पाया। नाकाम रहने पर वह सीनियर डॉक्टर को बुला लाई। वह भी उतना सीनियर लग नहीं रहा था। वह भी बांहों में इसे लगाने में कामयाब नहीं हुआ। फिर वह जैसे खुंदक में आ गया। पैर को पूरी तरह मरोड़़ कर उसने पैर में सूई घुसेड़ दी। इस सारी प्रक्रिया में पहले वह जरा भी नहीं रोई थी, पैर में सूई हिलने पर वह सुबकने लगी। ड्रिप लगाने में हर बार दिक्कत आती थी। ड्रिप बंद हो जाने पर डर लगने लगता। डॉक्टर एक बारीक सूई मंगवाते थे, जो यहां मार्केट में नहीं थी। इस ईलाज में उसकी कोमल बांहें, पैर, टांगें जख्मी हो गईं।

दो दिनों में ही पता नहीं कितना ख़ून सिरिंजों में भर भर कर निकाल दिया। जब टेस्ट के लिए खून निकालना कठिन हो गया तो डॉक्टर एक बार नस मिलने पर ज्यादा खून निकालने लगे कि क्या पता दोबारा नस मिले, न मिले। सुबह बड़े डॉक्टर जब राउंड पर आते कोई न कोई टेस्ट सुझा जाते।

दूसरी शाम नर्स ने उसे दूध पिलाने का हुक्म कर दिया। गले में नाली का कुछ तो उपयोग होना चाहिए था। उसमें दो समय मां का दूध डालना शुरू किया। एक नेगी जिसका बच्ची कई दिनों से ख़ामोश पड़ी थी, कटोरी भर दूध लाता था। बच्ची को पिलाने के बाद वह दरवाजे पर खड़ा हो आवाज लगाता :‘‘दूध चाईए जी... दूध चाईए...।'' जिन माताओं के दूध नहीं निकल पाता था, वे उससे दूध ले कर बच्चों को पिलाते।

साथ की ट्रॉली में एक मोटा तगड़ा बच्चा बेसुध पड़ा था। उसे वार्ड में उपलब्ध एकमात्र बड़ा यन्त्र लगा था। या एक तरह से उस यन्त्र में ही रखा था। उसके पास एक लड़की, जो उसकी मासी थी, मुसतैदी से खड़ी रहती। रोज सुबह उसे उबले पानी से स्पंज करती, साफ करती। यहां बच्चों को हाथ लगाने से पहले एक डिस्इनफेक्टेंट हाथों में मलना पड़ता था। जूते, चप्पल वार्ड के बाहर ही खोल कर भीतर प्रवेश होता।

नेगी की बच्ची पिछले पन्द्रह दिनों से चुपचाप लेटी थी। न हिलती थी, न डुलती थी। न रोती थी, न हंसती थी। नेगी दिनरात उसकी सेवा में लगा रहता। बीच बीच में वह बाहर जाता तो साथ वाले को बोल जाता। एक दिन उसने जरा सी एक बांह हिलाई तो वह बहुत खुश हुआ।

तीसरी दोपहर एक डॉक्टर ने उसे पीलिया घोषित कर दिया। नर्स ने उसके सारे कपड़े उतार दिए, केवल एक पोतड़ा रहने दिया। आंखों में पट्‌टी बान्ध दी और शीशे के बक्से में डाल दिया जिससे नीली रोशनी निकल रही थी।

शीशे के उस बॉक्स में वह कई बार बिदकने लगी। बीच बीच में बांहें और टांगें फैला कर अकड़ा देती जो थोड़ी देर बाद नरम पड़ते। जिस ओर उसे लिटाया था, उस ओर के गाल भी लाल लाल हो गए। नर्स को पूछा तो उसने बताया बच्चे ऐसे ही बिदकते हैं। थोड़ी थोड़ी देर बाद इसे गोद में उठा लिया करो। इतने छोटे बच्चे को उठाना कितना कठिन होता है। कोई कोई तो हाथ लगाने से भी कतराते। अपने बच्चों को नर्स या दूसरों से उठवाते। इतने छोटे, इतने कोमल, इतने नाज़ुक को कैसे पकड़ें, कहां से पकड़ें, कैसे उठाएं....बड़ा कठिन था। बेटा तो एक बार आ कर यहां पांच मिनट भी खड़ा नहीं रह सका। हां, बेटी ने पहली रात को सुबह तक ड्‌यूटी निभाई। उसके बाद वह रोज रात दस बजे से सुबह पांच बजे तक ड्‌यूटी देने लगी।

शाम होते होते डॉक्टर ने घोषणा कर दी कि पीलिया ऐसे ही बढ़ता रहा तो पूरा ब्लड बदलना पड़ेगा। ब्लड का इंतजाम कर लो। इतनी बार, कितनी ही तरह के टेस्ट हो चुके मगर उसका ब्लड ग्रुप पता नहीं था। अब बड़ी कठिनाई से उसका ब्लड ग्रुप जानने के लिए ब्लड निकाला गया। ब्लड के लिए एक मित्र को फोन किया वासुदेव ने। मित्र ने बताया कि पांच बजे से पहले बता देना, तभी इंतजाम हो पाएगा। अब एक बार और ब्लड लिया गया। अस्पताल की लेबोरेटरी अब बंद हो चुकी थी अतः तुरंत टेस्ट रिपोर्ट लेने के लिए मुख्य अस्पताल ले जाना पड़ा। इस बीच दो बच्चे और भी आ गए जिन्हें पीलिया हो गया था। उन्हें भी उसी बक्से में डाल दिया। इन में एक बच्चा बहुत बड़ा था और बार बार हाथ पैर चला रहा था। रिपोर्ट आने पर पता चला कि पीलिया अब कम हो रहा है अतः ब्लड बदलने की बात टल गई।

पूरी रात उस छोटे से बॉक्स में, जिस में एक बच्चे की जगह थी, तीन बच्चे पड़े रहे। एक बच्चा बहुत रो रहा था। उन दोनों को बार बार दूध पिलाने के लिए माओं के पास ले जाते। फिर वापिस ले आते। बैठने के लिए एक ही स्टूल था। एक आदमी कहीं से थर्मोकोल का एक खाली डिब्बा ले आया जिस पर बैठ कर उसने सारी रात किसी तरह गुजारी। सुबह एक की रिपोर्ट ठीक आई, वह तुरंत उसे घर ले गया। दूसरे को भी ले कर गए तो वापिस नहीं आए।

सुबह जब सफाई करने जमादारिन आई तो उस थर्मोकोल के डिब्बे को वहां देख बहुत नाराज हुई ‘‘..... ये डिब्बा यहां कौन लाया!'' ‘‘रात को बैठने के लिए एक लाया था।'' वासुदेव ने बताया।

‘‘यह मरे हुए बच्चों को डालने के लिए है... कहां से ले आए इसे...।'' उसने धीमे से कहा।

सन्न्‌ रह गया वासुदेव।

दोपहर को फिर उसे कपड़े पहना इन्क्यूबेटर में डाल दिया। अभी भी थोड़ी थोड़ी देर बाद वह बांहें टांगें अकड़ा रही थी जैसे कोई दौरा पड़ रहा था। टेस्ट हुआ तो शूगर बहुत बढ़ गई गई थी। इंजेक्शन दिया तो एकदम नीचे आ गई। आज यही खेल चलता रहा। फिर वी0पी0 एकदम हाई हो गया। मशीन लगा दी गई। कभी एकदम हाई हो जाता तो कभी एकदम डाऊन चला जाता।....बहुत हाई हो जाए तो भी एकदम डॉक्टर को बताओ और डाऊन चला जाए तो भी।

शाम तक ऐसे लगा कि खाने वाली नाली में खून सा वापिस आ रहा है। डॉक्टर ने दिमाग की कोई नस फटने की आशंका जाहिर की ‘‘.....ऐसे बच्चों की दिमाग की नसें फट जाती हैं। ये ठीक भी खुद ही हो जाती हैं। शाम तक देखते है। यदि आप कहें तो इसकी रीढ़ की हड्‌डी का पानी निकाल टेस्ट के लिए भेज देंगे।''

रात फिर आ गई। पिछली रात पीलिया था तो आज कुछ और आ गया। आज कोई और ही डॉक्टर था। उसने रीढ़ की हड्‌डी से पानी निकालने की जैसे ठान रखी थी। उसने फिर कहा ‘‘.... आप कहें तो टेस्ट करवा लें।'' रीढ़ की हड्‌डी से पानी नहीं निकलवाना चाहिए, सुन रखा था वासुदेव ने। फिर भी कहा :

‘‘मुझे क्या है भाई! ये ठीक होनी चाहिए। टेस्ट जरूरी है तो करना ही पड़ेगा।''

डॉक्टर ने एक कागज पर लिखवा लिया।

उसने बड़ी सी सिरिंज ले कर उसे पीठ के बल लिटा दिया और रीढ़ की हड्‌डी में चुभो कर पानी निकालने की कोशिश की। इस बार वह बहुत समय बाद जोर से रोई। इतनी कि पेशाब हो गया। सिरिंज में सफेद पानी की जगह खून के रंग का पानी आया। उसे खटका तो हुआ, कहना क्या!

अब उसे लगने लगा, यह एक प्रयोगशाला है जिसमें करीब बीस बच्चे रखे गए हैं। जैसे वैज्ञानिक चूहे, गिलहरियों जैसे जानवराें पर तरह तरह के प्रयोग करते हैं, वैसे यहां बच्चों पर किए जा रहे हैं। बच्चे भी जानवरों की तरह कुछ बोल नहीं सकते। ज्यादा से ज्यादा रो सकते हैं। कईयों की तो रोने की शक्ति भी चुक गई है। इस प्रयोगशाला में क्या कोई बच भी पाएगा, यह कहना कठिन है। तीन दिनों में अभी तक कोई बच्चा चंगा हो कर बाहर नहीं निकला।

पुराने समय में बच्चे घरों में जन्म लेते थे। बहुत बार सातवें महीने भी डिलीवरी हो जाती। उन चूहे जैसे कमजोर बच्चों को रूई में रखा जाता। रूई से ही मां के दूध की दो तीन बूंदें पिलाई जातीं। इन में बहुत जी जाते और बड़े हो कर बहुत एक्टिव और कुशाग्रबुद्वि होते। यदि न भी जीएं तो कोई उन्हें ईलाज के नाम पर छलनी नहीं करता। कहते हैं मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है।

चौथे दिन उसकी कुण्डली बन कर आ गई।....ग्रहों की चाल पता चले तो कुछ उपाय ही करें। कुछ धागा डोरी। कुछ दान पुन्न। पण्डितजी ने पूरी जन्मपत्री बना दी थी। बाहर नाम भी लिख दिया था : तुष्टि भारद्वाज.....कन्या को साढ़ेसती है जो शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कष्ट दे किंतु उन्नति भी कराए। शनि के लिए काला कपड़ा, तिल, लोहा दान कराएं। कन्या तेजस्वी, साहसी और पराक्रमी होगी। व्यक्तित्व आकर्षक रहेगा। उदार, स्नेहिल होगी। स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। वैभव, ऐश्वर्यशालिनी होगी। पति तेजस्वी, पराक्रमी और शिक्षित होगा। स्वयं उच्च पद अर्जित करने में समर्थ। अभी गुरू महादशा है जो सोलह वर्ष अर्थात्‌ छब्बीस अप्रैल दो हजार इक्कीस तक चलेगी। यह दशा मान सम्मान और यश देगी। इसके बाद शनि, बुध की दशाएं आएंगी।

.... सन्‌ इक्कीस तक मैं तो जीवित नहीं रहूंगा। तुम तो जियो। हंसो, खेलो। पढ़ो, लिखो। बी0ए0, एम0ए0 करो। डॉक्टर, अफसर बनो। एच.ए.एस., आई.ए.एस. करो। एयर होस्टेस न बनो, खुद जहाज उड़ाओ। वकील न बनो, खुद जज बनो। पी.डब्ल्यू.डी. का नहीं, कम्प्यूटर इंजीनियर बनो। तुम वह बन कर दिखाओ जो मेरी बेटी न बन सकी। वह तो मेधावी होते हुए भी बिना गाइडेंस के कम्पनियों में भटकती रही। तुम वह बन कर दिखाओ जो किसी की भी बेटी न बन सकी। तुम खुद अपने रास्ते चलो। अपने पैरों से पूरा ब्रह्‌माण्ड मापो। अपने हाथों से पहाड़ों को ठेलो। तुम खुद अपनी दिशाएं खोजो। अपनी मंजिलें तलाशो।

आत्मविश्वास से भर गया वासुदेव।

उसी दिन काला कपड़ा, तिल, लोहा एक झोले में डाल सबकी नजर बचाते हुए तुष्टि का हाथ लगवा कर दान करवा दिया।

साथ का बुजुर्ग भी उसे देखता रहता। वह कहता : भोग तो इस संसार में भोगना ही पड़ेगा। कर्मों की गति न्यारी है।

करम गति टारे न टरि।

मुनि वसिष्ठ से पण्डित ज्ञानी, सोधि के लगन धरि।

सीता हरण मरण दसरथ को, बन में बिपत्ति परि।।

..........अभी तो कोई पाप नहीं किया। अभी तो संसार में आए भर हैं। किसके और किन पापों का फल मिल रहा है इन्हें! जन्म लेते ही नाक मुंह में नालियां लग गईं। शरीर अभी पूरी तरह बना ही नहीं और सूईयां चुभने लग गईं। बीमार और बूढ़े तो कह सकते हैं कि पापों का फल भोग रहे हैं। इन्हें कौन से पाप लग गए! बच्चे तो वैसे भी निष्पाप माने जाते हैं। इन्होंने ऐसे कर्म कब किए जो इन्क्यूबेटर में पड़े हैं बेसुध। जो आ रहा है सूईयां चुभोए जा रहा है।

जीवन मिला ही क्यों.....ऐसी जिंदगी भी अच्छी नहीं तो ऐसी मौत भी अच्छी नहीं।

कभी लगता, इनमें से कोई बच्चा नहीं बचेगा। कभी लगता, सब चंगे हो कर दौड़ते हुए, किलकारियां मारते घरों को जाएंगे।

कोई इम्प्रूवमेंट न होते जान उस दिन चण्डीगढ़ ले जाने का प्रस्ताव रखा वासुदेव ने। डॉक्टर ने ने तुरंत कहा :‘‘अफोर्ड कर सकते हैं तो ले जाइए। यहां से तो वहां बेहतर होगा ही। जो टेस्ट रिपोर्ट यहां तीसरे या सातवें दिन आती है, वह वहां उसी समय मिल जाएगी। मां को भी साथ ले जाने की जरूरत नहीं। वे अस्पताल का ही दूध पिलाते हैं। किसी प्राईवेट में न ले जाना। वे तो आपको एक हफ्‌ते तक दूर से दिखाएंगे, देखो वह सोई है। सरकारी में ही ले जाना ....अभी कुछ समय देख लेते हैं, जरा स्टेबल हो जाए तो रेफर कर देंगे। स्क्यूरिटी देने पर ऑक्सीजन का सिलेण्डर भी साथ देंगे जो वापिस करना होगा।''

दोपहर बाद नर्स ने उसकी जख्मी बांहों में एक ट्‌यूब लगा कर पटि्‌टयां बान्ध दीं। ऐसी ही पटि्‌टयां पैरों, टांगों में भी बान्ध दीं।

चण्डीगढ़ के बड़े और नामी अस्पताल का सुनहरा चित्र आंखों के सामने आने लगा। यहां इतने दिन फिजूल ही खराब किए...... वहां पहुंचते ही उसे एक शीशे के बक्से

में निश्चित तापमान में रखा जाएगा। हाई तकनीक वाला इन्क्यूबेटर होगा वहां। इन्क्यूबेटर के चारों ओर कई तरह के यन्त्र लगे होंगे। सब अंगों को जिंदा रखने के लिए यन्त्र हैं वहां। आदमी के सब अंग काम करना बंद कर दें तो भी यन्त्रों से जिंदा रखा जाता है। वहां तो ड्रिप देने के लिए परमानेंट ट्‌यूब लगा दी जाती है। डॉक्टरों की पूरी टीम उसका मुआयना करेगी। वहां पन्द्रह दिन रहे, बीस दिन रहे, चाहे महीना रहे, कोई बात नहीं।

जैसे कोई अजूबा होगा.... कोई चमत्कार। एक कथा याद आई वासुदेव को। किसी साहूकार का बेटा मर गया। उसे बाहर मंजे पर सीधा लिटाया हुआ था। तभी आंगन में एक साधु आया। साधु ने पूछा, ‘ये कौन सोया हुआ है!' साहूकार ने दुखी मन से बताया, ‘महाराज! ये मेरा बेटा है। ये सोया नहीं, मर गया है।' ‘अरे! मैं हम कह रहे हैं, ये सोया है तो सोया है।' साधु ने गुस्से में जोर पुकारा, ‘उठो बच्चा! सोये क्यों हो!'

वह मुंह से चादर हटा राम!राम!! करता उठ बैठा।

.....क्या कोई डॉक्टर ऐसा ही करेगा.... हालांकि अभी अभी डॉक्टर ने कहा था, ‘देखिए डॉक्टर तो पूरी कोशिश करता है। डॉक्टर भगवान तो नहीं होता।'

निकलते निकलते शाम हो गई। लगभग तीन घण्टे के सफर के बाद रात लगभग आठ बजे बड़े अस्पताल पहुंचे। एम्बुलेंस वाला चिल्ड्रन वार्ड की ‘एमरजेंसी' जानता था, अतः सीधा वहीं ले गया।

बड़े से हॉल में कुछ डॉक्टर बैठे थे। बैठे क्या थे, कमर में बड़े पर्स बान्धे जैसे मार्च पास्ट कर रहे थे। एक बाहर भागता तो दूसरा आ जाता। बीमार बच्चों को आते ही चारपाईयों पर लिटा दिया जाता। हमारे सामने ही एक बच्चा लाया गया जिसके मुंह से खून आना शुरू हो गया था। उसे फट से देख कर दवाईयों और सामान लाने की चिट पकड़ा वार्ड में एडमिट कर दिया। हम ने सोचा था ऑक्सीजन सिलेण्डर देख सब एक उसे एकदम घेर लेंगे। किंतु ऐसा नहीं हुआ। किसी ने हमारी ओर ध्यान नहीं दिया। हमने उस डॉक्टर को, जो सीनियर लग रहा था, रेफर की हुई डिस्चार्ज स्लिप आगे की। उसने तुष्टि को देखा। पूरे रास्ते बेटी उसे गोद में रखे लाई थी। मैंने उसे टोहा था तो जबड़ा अकड़ा हुआ लगा। डाक्टर उसे टोह कर पीछे हट गया और दूसरे बच्चे को देखने लगा। जब डॉक्टर का ध्यान फिर उसकी ओर खींचना चाहा तो वह उपेक्षा से बोला :‘‘क्या इसे निमोनिया हुआ था!''

‘‘निमोनिया तो किसी ने नहीं बताया। और तो कई कुछ हुआ था।''

‘‘निमोनिया भी हुआ था।'' वह जोर दे कर बोला।

‘‘जी, निमोनिया भी हो सकता है। होने को तो दुनिया में जितनी भी बीमारियां हो सकती हैं वे सब हुई हैं इसे।'' वासुदेव ने खीज कर कहा।

‘‘इसे आप घर ले जाइये।......कोई फायदा नहीं।'' उसने सिर हिलाया।

हम ख़ामोश हो गए। यहां का इंचार्ज सीनियर डॉक्टर किसी का जानने वाला था और उसे फोन भी करवाया था। उसका रेफरेंस दिया तो वह पुनः बोला :‘‘एडमिट करने का फायदा नहीं है न, बस अब कुछ घण्टे बचे हैं।''

ख़ुशकिस्मती से वह सीनियर डॉक्टर आ गया जिसे फोन करवाया था। डॉक्टर ने बिना उसे देखे ‘एडमिट' लिख कर दे दिया।

जब टेस्ट के लिए फिर से खून निकाला तो वह हल्की सी रोई। उसके रोने से ख़ुशी हुई।

जहां उसे एडमिट किया गया, वहां तो नजारा ही दूसरा था। एक बरामदे जैसे कमरे में दीवार में बैंच सा लगा कर एक पंक्ति में बच्चे लिटाए थे। इन्क्यूबेटर तो कहने भर को थे। पूरे हॉल में केवल एक इन्क्यूबेटर में हीटर चल रहा था। ऑक्सीजन की एक नाली से सब को कनेक्शन दे रखे थे। पता नहीं ऑक्सीजन आ भी रही थी या नहीं। बीच में लोगों का जमावड़ा था हालांकि बच्चे के पास एक ही व्यक्ति को खड़े रहने की घोषणा बार बार की जा रही थी। एक तंग सी जगह में उसे लिटाया गया जहां आसपास कई बच्चे बेसुध लेटे थे। एक कोने डॉक्टर अपने औज़ार लिए तैयार बैठा था जो प्राब्लम होने एकदम वहां पहुंच रहा था।

सुबह चार बजे का समय होगा जब डॉक्टर ने बेहरमी से उसकी सब नालियां खींच कर निकाल दीं। वासुदेव को रूई ले कर उस जगह दबाए रखने को कहा जहां नीली पड़ी देह से अब भी खून निकल रहा था। मुंह से नाली निकाल लेने पर उसका छोटा सा मुंह खुला का खुला रह गया। आंखें सूज गईं थीं। नन्हीं देह क्षत विक्षत। यह दृश्य हर मरीज के अंत में आता है जब डॉक्टर तमाम नालियां, ट्‌यूबें खोल कर परे फैंकता है।

फॉर्म ले कर उसे मॉरचुरी ले जाना पड़ा। मॉरचुरी के बड़े हॉल में भरे पूरे, जिंदगी का सफर पूरा कर चुके इन्सान चादरें ओढे़ आराम से सोये थे। सुबह हो गई थी, कोई उठ नहीं रहा था।

‘‘बाबूजी! थोड़ी देर वहां रख दो। हम फार्म वापिस देते हैं.....कहीं जाना हो तो बता देना, हम टेक्सी, स्कूटर का प्रबन्ध कर देंगे।'' वहां तैनात एक व्यक्ति ने कहा। फूलों वाले नये कम्बल से ढांप उसे बड़े से टेबल पर रख दिया आहिस्ता से लिटा दिया वासुदेव ने। जैसे यह भी एक रस्म थी जो पूरी होनी शेष थी।

‘‘अब ले जाईये।'' उसने फार्म पकड़ाते हुए कहा। फार्म पढ़ा वासुदेव ने। उस में कॉज ऑफ डेथ लिखा थाः नीयोनेेटल सीज़रर्ज़ और सेप्टिक शॉक।

नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारूतः ।।

मन्त्र में मिट्‌टी का उल्लेख नहीं था। लोक में तो कहा जाता हैः माटी का खिलौना है। माटी से बना है, माटी में ही मिलना है।

क्या इतने से जीव की आत्मा भी उतनी ही बड़ी होती होगी!

विश्वंभरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्यवक्षा जगतो निवेशनी..... हे पृथिवी!.........मैं तुम्हें पृथिवी को सौंपता हूं।.....एक अनजान जगह, अनजान लोगों के बीच, अनजान देश में, जिसे मैं जानता नहीं, पहचानता नहीं। वहां तुम्हें छोड़ने को विवश हूं। पृथिवी, जिसमें सब सहने और समोने की शक्ति है। पृथिवी तुम्हें अपने में समाहित कर लेगी.... इसलिए मैं तुम्हें पृथिवी को सौंपता हूं।

मेरे सारे गुनाह माफ करना मेरी बच्ची!

माटी पर माटी डाल प्रणाम किया वासुदेव ने।