सहारा Namita Gupta द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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सहारा

सहारा

रात के दस बज रहे थे | विपुल को ऑफिस में आज काफी देर हो गई थी,कुछ आवश्यक कार्य के आने की वजह से उसे ऑफिस में काफी देर हो गई थी | विपुल कम्पनी का मैनेजर था इससे उसकी जिम्मेदारी और भी अधिक थी | दो बार पत्नी का फोन आ चुका था | नवम्बर का महीना था हल्की-हल्की ठंढक होने लगी थी | बाहर आकर गाड़ी निकलने में ही उसे ठण्ड का अहसास होने लगा, बदन में झुरझुरी सी होने लगी | सड़के भी वीरान होने लगती है ठंडी में सड़क पर सन्नाटा पसरा था | बस बीच-बीच में एक दो गाड़ियाँ दिखाई पड़ जाती | उसके एक्सीलेटर पर पैर गाड़ी ने अपनी स्पीड बढ़ा दी गाड़ी अपनी गति से भागी जा रही थी अचानक उसने रोड पर देखा कि एक वृद्ध हाथ हिलाकर गाड़ी को रोकने कि कोशिश कर रहा था लेकिन कोई भी गाड़ी न रोककर अपनी ही धुन में निकल जाता था| विपुल की गाड़ी को आते ही उसने रुकने का इशारा किया उस से रहा न गया | विपुल ने एकाएक ब्रेक लगाये तो गाड़ी तेज़ आवाज के साथ गाड़ी रुक गयी | गाड़ी का शीशा नीचे खिसकाते हुए बोला “बाबा, क्या बात है, आप गाड़ी क्यों रोक रहे हैं |

“कुछ चाहिए आपको क्या ?”

वह सर हिलाते हुए बोला- “ नही बेटा, मुझे कुछ नही चाहिए बस मेरी पत्नी की हालत बहुत खराब है, हाथ जोडते हुए- बेटा ! उसे होस्पिटल तक पहुँचा दो, तुम्हारी बड़ी मेहरबानी होगी |”

विपुल को दया आ गयी | उस से घर जाने कि दिर हो रही थी , फिर भी वह बोला- “कहाँ हैं आपकी पत्नी बाबा?

उस वृद्ध ने सामने पार्क की बेंच की ओर इशारा किया | उसे वहां पर एक स्त्री को पड़े देखा |

उसने पास जाकर देखा तो वो वृद्धा बेहोश पड़ी थी उसकी हालत काफी सीरियस लग रही थी | विपुल और वृद्ध ने उन्हें सहारा देकर गाड़ी में लिटा दिया और विपुल ने गाड़ी अब घर के बजाय अस्पताल कि तरफ मोड़ दी |

अस्पताल के गेट पर गाड़ी रोककर उसने शीघ्र ही गेट खोलते हुए कहा – “बाबा जी बहर आइए अस्पताल आ गया |”

उसने दो तीन बार आवाज डी लेकिन न कोई आवाज आई और न ही कोई हरकत होते देख उसने उन्हें हिलाया तो देखा कि वो वृद्ध भी बेहोश हो चुके थे | विपुल अब घबरा गया उसने शीघ्र ही डॉक्टर को सूचित किया उन्होंने उन दोनों को देखते ही तुरंत भर्ती करके उनका इलाज़ शुरू कर दिया |

डॉक्टर साहब के बाहर आते ही वह बोला – डॉक्टर साहब इन्हें बचा लीजिए जो भी खर्चा होगा, मैं दूंगा |

डॉक्टर ने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा-“तुम्हारे माता पिता की हालत काफी सीरियस है | और दुःख के साथ कहना पद रहा है कि माँ की भूख, कमजोरी और ठण्डक कि वजह से देहांत हो गया है और तुम्हारे पिता को आई०सी०यू० में शिफ्ट कर दिया है | “उसे धैर्य बंधाते हुए कहा- उस वृद्ध कि मौत की खबर सुन कर उसे दुःख हुआ | विपुल ने यथोचित व्यवस्था करके वह घर वापस आ गया | पत्नी को उसने बताया तो उसे भी पति के इस कार्य में गर्व महसूस हुआ | किन्तु वो कौन? कहाँ से आए थे , कैसे यहाँ आये , इनका यह हाल कैसे हुआ | इन सारे सवालों के जवाब उसके दिमाग को मथते थे वो सोचता वृद्ध के सज्ञान होने पर उनसे उनके घर का पता लेकर उनके घर पर सूचित कर दें , वो लोग भी परेशान हो रहे होंगे |

दूसरे दिन पत्नी भी अस्पताल गयी उस वृद्ध कि हालत देखकर उसे बड़ा तरस आया वो अभी भी बेहोश थे | विपुल ऑफिस जाते समय व वापसी दोनो वक्त अस्पताल जाता और डॉक्टर से मिलकर उन्हें सारी सुविधाए, उपलब्ध करा देता |

आज एक हफ्ते हो गया था | आज जब विपुल अस्पताल पहुँचा तो देखा- बाबा जी पलंग पर गुमसुम से बैठे थे पास ही नर्स बैठी उन्हें फल खिला रही थी, जिसे वो यन्त वत खा रहे थे | पास पहुँचकर उसने फल व दवाइयाँ टेबल पर रखते हुए | विपुल ने उन वृद्ध के सर पर हाथ से सहलाते हुए बोला – दादा जी अब आपकी तबियत कैसी हैं ?

वृद्ध ने चौंककर उसे पहचानते हुए बोले- ओह बेटा तुम आये हो | “फिर मै ठीक हूँ बेटा” फिर हाथ जोड़ते हुए, उसकी तरफ मुखातिब होकर भरमराए गले से – “बेटा तुम उस दिन न होते तो आज हम जीवित न होते |” फिर अचानक- “मेरी पत्नी कहाँ है ? वो दिखाई नहीं दे रही है ?”

नर्स ने तुरन्त कहा- “दादा जी वो दुसरे कमरे में है, वो अभी पूरी तरह से ठीक नहीं है | इसलिए अभी वो वही पर है, आप ठीक हो जाइये फिर आपको वहाँ ले चलेंगे |” “ठीक है” आश्वस्त होते हुए बोले |

विपुल ने उनसे हाल चाल जानकर एकाएक वो पूछ बैठा- दादा जी आप कौन है ? कहाँ के रहने वाले है और वहाँ कैसे आए ? आप हमें बताइए और अपने बेटे का नम्बर दे दीजिए जिससे मै उन्हें खबर कर सकु और वो आपको आपके घर ले जाए |

पहले तो वह वृद्ध गुमसुम से बैठे रहे फिर एकाएक फफक कर रो पड़े | विपुल ने उनके आँसू पोछते हुए समझाया- “ठीक है दादा जी यदि आप नहीं चाहते तो मै आपसे नहीं पूछूँगा, जब आपका मन ठीक हो तब बताइएगा |” वह उनको सनवना देकर और नर्स को कुछ हिदायत देकर चलने लगा तब उस वृद्ध ने उसका हाथ पकड़ कर कहने लगा – “बेटा तुमने मुझे अंजान पर भरोसा करके मेरी सहायता की मेरा इलाज करवाया कि मै फिर से जीवन जीने लायक बना दिया | इतना तो मेरा सगा बेटा भी नहीं करता |

“ठीक है दादा जी” इन्सानियत के नाते जो मुझे उचित लगा वो मैंने किया | आपके बच्चे होते तो वो भी मुझसे ज्यादा करते खैर - |

रोते हुए – “बेटा इसी बात का तो रोना है | मै भी एक सम्राट प्रतिष्ठित धनि व्यक्ति था | मैंने भी अपनी मेहनत व लगन से काफी पैसा कमाया और काफी प्रापर्टी बनाई | फिर संयत होते हुए बोला- “मेरा एक बेटा व एक बेटी है | बेटी की शादी कर दी उकसे पति को विदेश में नौकरी मिल गई वो वही बस गए उनके बच्चों को यह देश नहीं भाता वो वही विदेश में रहते है यहाँ आना नहीं चाहते | बेटी कभी-कभी मिलने आ जाती थी | बेटा भी इन्जीनियर है बैंगलौर में कार्यरत था | दो साल पहेल उसे बहुत अनुनय करके यही बुला लिया कि इतना पैसा है दोनों लोग यही रहकर नौकरी करो मेरे साथ रहो, तो तुम लोग और पोता-पोती के साथ रहकर हम लोगों को भी अच्छा लगेगा और हम लोगों का बुढ़ापा भी आसानी से कट जाएगा | आखिर हम दोनों अकेले ही तो रहते है | बहुत कहने पर बेटा- बहू साथ रहने को राजी हो गये किन्तु इस शर्त पर कि सारी अचल सम्पत्ती उनके नाम कर दी जाए | मै राजी हो गया- मुझे बचा मेरे न होने पर दोनों तो बेटे को ही था | मैंने सारी प्रोपर्टी उनके नाम कर दी |”

कही गहरे अतीत में खोते हुए बोले- “शुरू में तो सब ठीक रहा, बच्चे भी हमारे साथ खेलते व रहते, धीरे-धीरे करके हमारी जमा पूँजी भी बैंक बैलेंस भी कुछ अपने नाम करवा लिया कुछ खर्च करवा दिया | मैंने भी सब बच्चों के नाम करके निश्चित हो गया | सब कुछ अपने हाथ में आते ही बेटे-बहू ने हमें प्रताड़ित करने लगे | खाने-पीने को भी ढंग से नहीं देते थे और पैसे माँगने पर मरते-पीटते और घर से निकल जाने को कहते मगर हम दोनों ने घर नहीं छोड़ा |

एक दिन बेटे ने कहा- पिता जी चलिए आपको घुमा लाता हूँ और घुमाने के नाम पर यहाँ पता नहीं कहाँ ले आया ? फिर खाने का सामान लाने की बात कहकर गया तो फिर वापस ही नहीं लौटा |

हम लोग वही पर एक दिन बैठे राह देखते रहे, जब भूख लगी तो खाने की तलाश में भटकने लगे, लेकिन बिना पैसे खाना कौन देता | किसी से पैसे माँगता तो किस बात का भरोसा करके कोई पैसा देता | हम लोग किसी के यँहा थोड़ा बहुत काम कर देते तो खाने को मिल जाता, तीन दिन से पत्नी को बुखार था, तो हम काम न कर सके और बिना पैसे इलाज भी नहीं हो सका | मैंने लोगों से बहुत प्रार्थाना अस्पताल पहुँचाने की लेकिन किसी ने नहीं सुनी तो बेटा तुम देवता बनकर आ गए और आज हम ठीक है |

“विपुल के मुँह से ओह ! एक आह निकली कोई ऐसा भी कर सकता है वो भी अपना सगा बेटा |”

बेटे मैंने लोगों के सामने हाथ फैलाकर भीख मांगी | सब कुछ होते हुए भी बेटा बेटा-बहू ने हमें दर-दर का भिखारी बना दिया | दो दिन से हमने कुछ भी खाया नहीं था सिर्फ पानी पीकर ही गुजारा किया | मेरे पास इतना पैसा भी नहीं था कि मै घर वापस जा सकूं या अपना पेट भर सकूँ |

“दादा जी फोन का नम्बर बताइए” मै आपके घर फोन करके उनसे बात करता हूँ और शीघ्र ही आपके जाने का इन्तजाम करता हूँ |

वो वृद्ध फिर फफक-फफक कर रो पड़े- “बेटा मैंने डा० से कहकर फोन पर बात की थी | लेकिन बेटे, बहू ने तो पहचानने व मानने से भी इंकार कर दिया है, उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया मेरे माता-पिता एक दुर्घटना में मर गए अब मेरा कोई नहीं है |” कहकर वो फफक-फफक रोने लगे- “बेटे उसने तो मुझे जीते जी मार दिया |” बेटे तुम मुझे किसी ब्रद्द्श्रम में पहुँचा दो, हम वही पर लोगों के साथ रहकर अपना शेष जीवन व्यतीत कर लूँगा | तुमने मुझे नया जीवन दिया, भगवान तुम्हारी दिन पूनी रात चौगनी तरक्की करें | कहकर ढेरों आशीर्वाद देने लगे | उन वृद्ध की यह कहानी सुनकर मेरा दिल तड़प उठा- “कैसे बच्चे है जो अपने ही माता-पिता के साथ ऐसा सुलूक करते है | “और जिनके माता-पिता नहीं है वो माता-पिता के प्यार व छाँव को तरसते हैं | यह कैसी विडम्बना हैं प्रभु तेरी ?

शाम को ऑफिस से लौटते समय विपुल ने कुछ नए कपड़े व कुछ अन्य सामान खरीद कर अस्पताल आया | विपुल ने डा० से बात की तो उन्होंने बताया कि दादा जी अब बिल्कुल स्वस्थ है, आप उन्हें ले जा सकते है | उसने दादा जी की छुट्टी लेकर वह उनके पास आया देखा तो दादा जी बहुत ही गम्भीर मुद्रा में आँसू बहा रहे है | पता करने पर ज्ञात हुआ कि उनकी पत्नी की मृत्यु का समाचार जबसे उन्हें पता चला तबसे वह यूँ ही मुद्रा में बैठे है | विपुल ने उन्हें बहुत समझा-बुझा कर शान्त किया और देते हुए कहा- “दादा जी कपड़े बदल लीजिये आप आपको चलना है |”

“बेटा कहाँ ले जा रहे हो ? हमें रास्ते में किसी वृद्दाश्रम में छोड़ना |” वह बोला- “ठीक है |”

तभी गाड़ी एक बड़े से काले के सामने रूकती है | उसने वृद्द को प्यार से सहारा देकर नीचे उतार कर, गेट की घन्टी बजाई |

एक सुन्दर सी स्त्री ने दरवाजा खोला | उसे देखते हुए यह वही अंकल जी है जिन्हें अस्पताल में भर्ती किया था | इतना सुनते ही झट से पत्नी ने उनके पॉव छुए और हाथ का सहारा देकर अन्दर ले जाने लगी | वह वृद्द भौचक्के से सब देख रहे थे |

उनकी इस उलझन को सुलझाते हुए विपुल बच्चों की तरफ इशारा करते हुए बोला- “बच्चों देखो तुम लोग रोज पूछते थे | मेरे दादा जी कहाँ है ? यह देखो मै आज तुम्हारे दादा जी को घर ले आया | बच्चों दौड़कर उनके चिपक कर खुशी से उनसे लाड़ करने लगे |

विपुल की पत्नी तुरन्त बोल उठी- अंकल जी अब आज से आप हमारे साथ रहेंगें | अब आप कहीं नहीं जायेंगे | यह देखकर वो आश्चर्यचकित हो गए | एक नया घर नया भरा पूरा परिवार पाकर उनके अविरल आंसू बहने लगे | उन्होंने तड़पकर झट से विपुल को सीने से लगाते हुए बोल उठे- यदि तुम जैसा बेटा सबके होने लगें तो बेटे वृद्दाश्रम की जरुरत ही क्यों पड़े ?