यह एक पूर्णतः काल्पनिक (Fictional) कहानी है। इस कहानी के सभी पात्र, घटनाएँ, स्थान (जहाँ विशेष रूप से वास्तविक स्थान का केवल पृष्ठभूमि के रूप में उल्लेख न हो), संवाद और प्रसंग लेखक की कल्पना पर आधारित हैं। इस कहानी का उद्देश्य केवल मनोरंजन और एक काल्पनिक प्रेम कथा प्रस्तुत करना है। किसी भी धर्म, जाति, समुदाय, संस्कृति, परंपरा या व्यक्ति का समर्थन, विरोध, अपमान, आलोचना या भावनाएँ आहत करना हमारा उद्देश्य नहीं है। यदि इस कहानी का कोई पात्र, घटना या परिस्थिति किसी वास्तविक व्यक्ति, संस्था या घटना से मिलती-जुलती प्रतीत होती है, तो उसे केवल संयोग माना जाए। कृपया इस कहानी को केवल एक काल्पनिक रचना के रूप में पढ़ें।
नामुमकिन इश्क - एपिसोड 1
यह एक पूर्णतः काल्पनिक (Fictional) कहानी है। इस कहानी के सभी पात्र, घटनाएँ, स्थान (जहाँ विशेष रूप से वास्तविक का केवल पृष्ठभूमि के रूप में उल्लेख न हो), संवाद और प्रसंग लेखक की कल्पना पर आधारित हैं।इस कहानी का उद्देश्य केवल मनोरंजन और एक काल्पनिक प्रेम कथा प्रस्तुत करना है। किसी भी धर्म, जाति, समुदाय, संस्कृति, परंपरा या व्यक्ति का समर्थन, विरोध, अपमान, आलोचना या भावनाएँ आहत करना हमारा उद्देश्य नहीं है।यदि इस कहानी का कोई पात्र, घटना या परिस्थिति किसी वास्तविक व्यक्ति, संस्था या घटना से मिलती-जुलती प्रतीत होती है, तो उसे केवल संयोग माना जाए।कृपया इस कहानी ...और पढ़े
नामुमकिन इश्क - एपिसोड 2
एपिसोड 2: पहली टक्करसुबह के लगभग नौ बजे थे।लखनऊ की सड़कें रोज़ की तरह चहल-पहल से भरी हुई थीं। अपने दफ़्तर जा रहा था, कोई दुकान खोल रहा था, तो कोई कॉलेज की ओर भाग रहा था।उधर अर्जुन वशिष्ठ अपनी काली बाइक पर तेज़ रफ़्तार से मेडिकल कॉलेज की ओर बढ़ रहा था। गले में रुद्राक्ष की माला, दाहिने हाथ में लाल कलेवा, हल्की दाढ़ी और चेहरे पर वही बेपरवाह अंदाज़।कॉलेज के गेट पर पहुँचते ही कई छात्रों की नज़र उस पर पड़ी।"भाई... अर्जुन आ गया।""आज फिर किसी की शामत आने वाली है।"कुछ लड़कियाँ मुस्कुराकर उसे देखने लगीं, लेकिन ...और पढ़े
नामुमकिन इश्क - एपिसोड 3
एपिसोड 3 नामुमकिन इश्कअर्जुन अभी उस लड़की को बचाकर अपनी क्लास की ओर जा ही रहा था कि तभी के मुख्य गेट पर एक सफ़ेद कार आकर रुकी।दरवाज़ा खुला।धीरे-धीरे एक लड़की कार से नीचे उतरी।हल्के फ़िरोज़ी रंग का सूट, सिर पर सलीके से रखा सफ़ेद दुपट्टा, हाथों में कुछ किताबें और चेहरे पर ऐसी सादगी कि जो भी देखे, एक पल के लिए ठहर जाए।उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखों में हल्की-सी घबराहट थी। आखिर आज इस कॉलेज में उसका पहला दिन था।वह इधर-उधर देखते हुए आगे बढ़ी, लेकिन उसे रास्तों का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था।उधर अर्जुन अपनी ही धुन में ...और पढ़े
नामुमकिन इश्क - एपिसोड 4
एपिसोड 4: एक अजीब-सी बेचैनीकॉलेज की छुट्टी हुए लगभग एक घंटा बीत चुका था।शाम की हल्की सुनहरी धूप पूरे शहर को अपनी नरम रोशनी से ढक रही थी। सड़कों पर लोगों की भीड़ बढ़ने लगी थी। कहीं चाट की दुकानें सजी थीं, कहीं कुल्हड़ वाली चाय की महक हवा में घुल रही थी। बाज़ार अपनी पूरी रौनक पर था।उधर आयत अपनी छोटी बहन हया का हाथ पकड़े अमीनाबाद बाज़ार की गलियों में धीरे-धीरे चल रही थी।"आपा... जल्दी चलिए ना, मुझे नई चूड़ियाँ भी लेनी हैं और अम्मी ने कपड़ा भी मंगवाया है।" हया ने मासूमियत से कहा।आयत मुस्कुराई।"अच्छा बाबा... ...और पढ़े
नामुमकिन इश्क - एपिसोड 5
एपिसोड 5नई सुबह... नई हलचलअगली सुबह लखनऊ का आसमान हल्की सुनहरी धूप से जगमगा रहा था। शहर की सड़कों रोज़ की तरह चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। कुछ ही देर में किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज का विशाल कैंपस भी छात्रों की भीड़ से भर गया।उसी समय कॉलेज के मुख्य गेट से अर्जुन वशिष्ठ अपने दो दोस्तों के साथ अंदर दाखिल हुआ। सफेद शर्ट के ऊपर काली जैकेट, गले में रुद्राक्ष की माला, हाथ में लाल कलेवा और चेहरे पर हमेशा की तरह बेफिक्र मुस्कान।उसे देखते ही कई छात्रों ने आवाज़ लगाई—"अर्जुन भाई... गुड मॉर्निंग!"अर्जुन मुस्कुराया।"गुड मॉर्निंग... पढ़ाई पर ध्यान ...और पढ़े
नामुमकिन इश्क - एपिसोड 6
एपिसोड 6 अर्जुन कॉलेज रस्टिकेट हो गयाआयत और सावी अभी भी गार्डन की बेंच पर बैठी बातें कर रही दूसरी ओर अर्जुन अपने दोस्त गौरव के साथ खड़ा था, लेकिन उसकी नज़र बार-बार अनायास ही आयत की ओर चली जाती।गौरव ने मुस्कुराकर उसकी कोहनी में हल्की-सी टक्कर मारी।"क्या बात है अर्जुन? आजकल किसी को बड़े गौर से देख रहा है।"अर्जुन जैसे अचानक ख्यालों से बाहर आया।"कुछ भी मत बोल।""अच्छा? फिर पिछले पाँच मिनट से तेरी नज़र उसी तरफ़ क्यों है?"अर्जुन ने एक गहरी साँस ली।"पता नहीं यार... समझ नहीं आ रहा। जब तक एक बार उसे देख न लूँ, ...और पढ़े
नामुमकिन इश्क - एपिसोड 7
एपिसोड 7बेचैनी का नाम... शायद मोहब्बतअर्जुन को कॉलेज से निलंबित हुए तीन दिन हो चुके थे।इन तीन दिनों में मेडिकल की किताबें तो कई बार खोलीं, लेकिन हर बार कुछ ही मिनटों में बंद कर देता।वह खुद से ही परेशान था।कमरे की बालकनी में खड़ा उसने गहरी साँस ली।"ये मुझे हो क्या गया है...?"उसके दिमाग में बार-बार एक ही चेहरा घूम रहा था...आयत।उसने खुद से कहा,"मैं तो उसे ठीक से जानता भी नहीं... फिर भी बार-बार उसी का चेहरा क्यों याद आता है?""जब तक उसे देख नहीं लेता... मन बेचैन-सा रहता है।""ये आखिर कैसा एहसास है?"उसे अपने ही सवालों ...और पढ़े