नया सफ़र
अगली सुबह ठीक दस बजे का समय था।
लखनऊ मेडिकल कॉलेज का कैंपस हमेशा की तरह छात्रों की चहल-पहल से भरा हुआ था। कोई अपनी क्लास की तरफ़ जा रहा था, कोई कैंटीन में बैठकर चाय पी रहा था, तो कोई दोस्तों के साथ हँसी-मज़ाक में लगा था।
तभी कॉलेज के एडमिन ब्लॉक से एक कर्मचारी हाथ में सफेद रंग की फाइल लेकर बाहर निकला। उसके हाथ में एक नोटिस था।
वह बिना कुछ बोले सीधे नोटिस बोर्ड के पास पहुँचा और बड़े आराम से वह नोटिस बोर्ड पर चिपका दिया।
नोटिस लगते ही उसने सिर्फ इतना कहा—
"जो भी छात्र क्लिनिकल ट्रेनिंग के लिए आवेदन किए थे... उनकी फाइनल लिस्ट जारी कर दी गई है।"
इतना कहकर वह वहाँ से चला गया।
बस फिर क्या था...
पूरा कॉलेज नोटिस बोर्ड की तरफ़ दौड़ पड़ा।
"अरे जल्दी चल... कहीं मेरा नाम हो!"
"यार, धक्का मत दे!"
"जरा हटो... मुझे भी देखने दो!"
कुछ ही सेकंड में नोटिस बोर्ड के सामने सैकड़ों छात्रों की भीड़ लग गई।
हर कोई अपनी साँस रोके उस लिस्ट में अपना नाम ढूँढ़ रहा था।
लेकिन अगले ही पल...
"अरे... इसमें तो सिर्फ दस नाम हैं!"
"क्या...? सिर्फ दस?"
"सर ने तो कहा था कि ट्रेनिंग का मौका मिलेगा... लेकिन यहाँ तो सिर्फ दस स्टूडेंट चुने गए हैं!"
एक छात्र ने निराश होकर कहा।
तभी पीछे खड़ा दूसरा लड़का बोला,
"भाई... ये कोई साधारण हॉस्पिटल नहीं है। लखनऊ का सबसे बड़ा सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल है। वहाँ हर किसी को ट्रेनिंग थोड़ी मिलेगी। कॉलेज ने उन्हीं छात्रों को चुना होगा जिनकी परफॉर्मेंस सबसे अच्छी है।"
पास खड़ी एक लड़की भी बोली,
"बात तो सही है। अगर पंद्रह सौ स्टूडेंट में से सिर्फ दस चुने गए हैं... तो सोचो ये कितनी बड़ी बात है।"
धीरे-धीरे यह खबर पूरे कॉलेज में फैल गई।
जो जहाँ था, वहीं से नोटिस बोर्ड की तरफ़ भागने लगा।
उधर अर्जुन वशिष्ठ भी अपने दोस्तों गौरव और विवेक के साथ वहाँ पहुँचा।
गौरव हँसते हुए बोला,
"चल भाई... देखते हैं कॉलेज वालों ने तेरे नाम के आगे क्या लिखा है।"
तीनों भीड़ को हटाते हुए नोटिस बोर्ड के सामने पहुँचे।
सबसे ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था—
सिटी सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल – क्लिनिकल ट्रेनिंग टीम
टीम लीडर – अर्जुन वशिष्ठ (सेकंड ईयर)
उसके नीचे बाकी छात्रों के नाम लिखे थे—
अर्जुन वशिष्ठ (टीम लीडर)
रोहन मेहरा
गौरव अंसारी
विवेक तिवारी
करण सिंह
समर खान
आयत खान
रीवा शर्मा
सनाया खन्ना
सावी चौधरी
गौरव खुशी से उछल पड़ा।
"अबे... हम दोनों का भी नाम आ गया!"
विवेक भी मुस्कुराया।
"यार... पंद्रह सौ स्टूडेंट में से सिर्फ दस... और हम उनमें हैं!"
दोनों ने खुशी से अर्जुन को गले लगा लिया।
लेकिन अर्जुन का चेहरा बिल्कुल शांत था।
जैसे उसे पहले से ही इस बात का अंदाज़ा हो।
गौरव ने हँसते हुए पूछा,
"क्या बात है भाई... तू खुश नहीं हुआ?"
अर्जुन हल्की-सी मुस्कान के साथ बोला,
"खुश हूँ... लेकिन टीम लीडर बनने से ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। अब अगर टीम का कोई भी सदस्य गलती करेगा तो जवाब मुझे देना होगा।"
गौरव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"तू है ना... सब संभाल लेगा।"
उधर कुछ ही दूरी पर खड़ा रोहन मेहरा भी लिस्ट देख चुका था।
उसकी नज़र बार-बार सिर्फ एक लाइन पर जाकर रुक रही थी—
टीम लीडर – अर्जुन वशिष्ठ।
उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
उसने मुट्ठियाँ भींच लीं।
समर ने उसके चेहरे की तरफ़ देखा और बोला,
"क्या हुआ भाई? हमारा नाम तो आ गया। इतनी बड़ी बात है।"
रोहन ने दाँत भींचते हुए कहा,
"नाम आने से क्या होगा?"
समर हैरान होकर बोला,
"मतलब?"
"मुझे टीम लीडर बनना था... अर्जुन नहीं।"
समर ने समझाने की कोशिश की।
"अरे यार... पूरे कॉलेज में करीब पंद्रह सौ स्टूडेंट हैं। उनमें से सिर्फ दस चुने गए हैं। सोच... हमारा नाम भी उनमें है। ये क्या कम है?"
लेकिन रोहन का गुस्सा कम होने का नाम नहीं ले रहा था।
"मुझे फर्क नहीं पड़ता। जब तक अर्जुन वशिष्ठ मुझसे आगे रहेगा... मुझे कोई खुशी नहीं हो सकती।"
समर ने गहरी साँस ली।
वह जानता था कि रोहन की सबसे बड़ी दुश्मनी अर्जुन से ही है।
रोहन ने आख़िरी बार नोटिस बोर्ड की तरफ़ देखा।
उसकी नज़र फिर अर्जुन के नाम पर जाकर टिक गई।
उसने मन ही मन कहा—
"अर्जुन... कॉलेज में फिर एक बार तू मुझसे आगे निकल गया। लेकिन याद रख... हॉस्पिटल की ये ट्रेनिंग तेरी जीत नहीं, तेरी हार की शुरुआत बनेगी। मैं ऐसा खेल खेलूँगा कि सबके सामने तेरी इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी..."
इतना सोचकर वह गुस्से में वहाँ से चला गया।
उसे नहीं पता था...
कि किस्मत ने उसके लिए कुछ और ही लिख रखा था।