नामुमकिन इश्क - एपिसोड 9 kajal jha द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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नामुमकिन इश्क - एपिसोड 9

एपिसोड – नया मोड़
अगली सुबह लखनऊ की हल्की ठंडी हवा पूरे शहर में ताज़गी घोल रही थी। मेडिकल कॉलेज का विशाल परिसर हमेशा की तरह छात्रों की चहल-पहल से गूंज रहा था। कोई अपनी किताबों में खोया हुआ था, कोई दोस्तों के साथ हँसी-मज़ाक कर रहा था, तो कोई आने वाले इंटरनल एग्जाम की चिंता में डूबा हुआ था।
कॉरिडोर में फर्स्ट ईयर और सेकंड ईयर के छात्र अपनी-अपनी क्लास की तरफ़ जा रहे थे। किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि आज होने वाली एक घोषणा उनकी ज़िंदगी की दिशा बदलने वाली है।
कुछ ही देर बाद कॉलेज की घंटी बजी और सभी छात्र अपनी-अपनी सीटों पर बैठ गए।
अचानक क्लास का दरवाज़ा खुला।
अंदर कॉलेज के प्रिंसिपल, डॉ. आर.के. शर्मा, कुछ वरिष्ठ प्रोफेसरों के साथ आए।
उन्हें देखते ही पूरी क्लास एक साथ खड़ी हो गई।
"गुड मॉर्निंग, सर!"
प्रिंसिपल मुस्कुराए।
"गुड मॉर्निंग, स्टूडेंट्स। बैठ जाइए।"
सभी बैठ गए, लेकिन हर किसी के चेहरे पर उत्सुकता साफ़ दिखाई दे रही थी।
प्रिंसिपल ने क्लास पर नज़र दौड़ाई और बोले,
"आज मैं आप सबसे एक ऐसी बात साझा करने आया हूँ जो आपकी मेडिकल लाइफ़ का सबसे महत्वपूर्ण चरण साबित होगी।"
पूरा कमरा शांत हो गया।
"आप सभी जानते हैं कि डॉक्टर बनना सिर्फ़ किताबें पढ़ लेने से संभव नहीं होता। असली डॉक्टर वही बनता है जो मरीजों के बीच रहकर सीखता है, उनकी तकलीफ़ समझता है और मुश्किल परिस्थितियों में सही निर्णय लेना सीखता है।"
उन्होंने कुछ पल रुककर सभी छात्रों की तरफ़ देखा।
"इसीलिए कॉलेज प्रबंधन और सिटी हॉस्पिटल के बीच एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है।"
अब सभी छात्रों की उत्सुकता और बढ़ गई।
"अगले एक महीने तक फर्स्ट ईयर और सेकंड ईयर के सभी छात्र लखनऊ सिटी हॉस्पिटल में क्लिनिकल ट्रेनिंग करेंगे। वहाँ आप अनुभवी डॉक्टरों के साथ काम करेंगे, वार्ड देखेंगे, मरीजों की देखभाल सीखेंगे और मेडिकल प्रोफेशन की वास्तविक ज़िम्मेदारियों को समझेंगे।"
बस इतना सुनना था कि पूरी क्लास में फुसफुसाहट शुरू हो गई।
"सच में?"
"वाह... अब तो मज़ा आएगा!"
"पहली बार असली हॉस्पिटल में काम करने का मौका मिलेगा।"
एक लड़का बोला,
"यार, थोड़ा डर भी लग रहा है।"
उसके बगल में बैठा छात्र हँस पड़ा।
"डॉक्टर बनना है तो डर कैसा?"
प्रिंसिपल ने हाथ उठाकर सबको शांत किया।
"ध्यान से सुनिए। हॉस्पिटल में अनुशासन सबसे पहली शर्त है। वहाँ आपकी हर हरकत कॉलेज की प्रतिष्ठा से जुड़ी होगी। किसी भी छात्र की लापरवाही या अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।"
उन्होंने आगे कहा,
"सभी छात्रों को कल सुबह ठीक आठ बजे सिटी हॉस्पिटल पहुँचना होगा। वहाँ आपकी टीम बनाई जाएगी और अलग-अलग विभागों में प्रशिक्षण दिया जाएगा।"
इतना कहकर प्रिंसिपल और सभी प्रोफेसर क्लास से बाहर चले गए।
उनके जाते ही पूरा क्लासरूम चर्चा से भर गया।
कोई उत्साहित था, कोई घबराया हुआ, तो कोई आने वाले अनुभवों की कल्पना कर रहा था।
उधर आयत अपनी दोस्त रीवा के साथ कैंटीन की तरफ़ जा रही थी।
आयत ने धीमे स्वर में कहा,
"रीवा... सच बताऊँ? मुझे थोड़ा डर लग रहा है।"
रीवा मुस्कुराई।
"पहली बार है, इसलिए। लेकिन चिंता मत कर, हम दोनों साथ रहेंगे।"
आयत ने गहरी साँस ली।
"मैंने आज तक सिर्फ़ फिल्मों में हॉस्पिटल देखा है। अब असली मरीजों के बीच रहना होगा..."
रीवा ने हँसते हुए कहा,
"और कुछ दिनों बाद तू ही सबको समझा रही होगी।"
दोनों हँस पड़ीं।
उधर दूसरी तरफ़ अर्जुन अपने दोस्तों गौरव और विवेक के साथ खड़ा था।
गौरव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"क्या बात है डॉक्टर साहब... अब तो रोज़ सफ़ेद कोट पहनकर हॉस्पिटल जाना पड़ेगा।"
विवेक हँसते हुए बोला,
"और तेरी गुंडागर्दी भी वहीं खत्म हो जाएगी।"
अर्जुन मुस्कुराया।
"गुंडागर्दी नहीं... अब असली ज़िम्मेदारी शुरू होगी।"
इतना कहने के बाद उसकी नज़र अनायास ही दूर खड़ी आयत पर चली गई।
आयत रीवा से बातें कर रही थी।
उसे देखकर अर्जुन के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
उसने मन ही मन सोचा—
"मतलब... अब रोज़ मुलाकात होगी। पता नहीं क्यों, उसे देखे बिना दिन अधूरा-सा लगता है..."
उधर आयत ने भी एक पल के लिए नज़र उठाई।
उसकी आँखें अर्जुन से मिलीं।
दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर दोनों ने हल्की-सी मुस्कान के साथ नज़रें झुका लीं।
उन्हें खुद समझ नहीं आ रहा था कि यह एहसास आखिर क्या था।
लेकिन इतना ज़रूर था कि दोनों अब एक-दूसरे की मौजूदगी महसूस करने लगे थे।
उधर कॉलेज के दूसरे कोने में रोहन मेहरा अपने दोस्तों समर और करण के साथ खड़ा था।
रोहन के चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी।
वह बोला,
"समर... लगता है किस्मत खुद मेरा साथ दे रही है।"
समर ने पूछा,
"क्यों?"
रोहन ने दूर खड़ी आयत की तरफ़ इशारा किया।
"पूरा महीना एक ही हॉस्पिटल... अब रोज़ मुलाकात होगी।"
समर मुस्कुराया।
"बस अर्जुन बीच में नहीं आना चाहिए।"
रोहन की आँखों में चुनौती चमक उठी।
"इस बार अगर अर्जुन बीच में आया... तो हिसाब बराबर करके रहूँगा।"
पास खड़ा करण उनकी बातें सुन रहा था।
उसने सिर्फ़ इतना कहा,
"बेहतर होगा कि हॉस्पिटल को पढ़ाई की जगह ही रहने दो।"
रोहन ने उसकी तरफ़ देखा, लेकिन कुछ नहीं बोला।
किसी को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था...
कि यह एक महीने की ट्रेनिंग सिर्फ़ मेडिकल सीखने का सफ़र नहीं होगी।
यहीं से अर्जुन और आयत की नज़दीकियाँ बढ़ेंगी...
रोहन की दुश्मनी और गहरी होगी...
करण और सनाया की कहानी नया मोड़ लेगी...
और सिटी हॉस्पिटल की दीवारों के बीच ऐसे राज़ सामने आएँगे जो कई ज़िंदगियाँ हमेशा के लिए बदल देंगे।
यहीं से शुरू होने वाला था "नामुमकिन इश्क" का सबसे यादगार अध्याय।