नामुमकिन इश्क - एपिसोड 8 kajal jha द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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नामुमकिन इश्क - एपिसोड 8

नामुमकिन इश्क एपिसोड 8

कॉलेज की छुट्टी की घंटी बज चुकी थी। कैंपस में छात्रों की भीड़ धीरे-धीरे मुख्य गेट की ओर बढ़ रही थी।


आयत अपनी नई दोस्त रीवा के साथ बातें करते हुए बाहर निकल रही थी।


रीवा मुस्कुराकर बोली,"तो... अब लखनऊ कैसा लग रहा है?"


आयत भी मुस्कुरा दी।


"शुरुआत में लगा था कि यहाँ एडजस्ट करना मुश्किल होगा... लेकिन अब थोड़ा-थोड़ा अच्छा लगने लगा है।"


"और कॉलेज?"


"कॉलेज भी अच्छा है। बस... अभी सब नए हैं।"


दोनों हँसते हुए आगे बढ़ ही रही थीं कि अचानक उनके सामने रोहन मेहरा आकर खड़ा हो गया।


उसके साथ समर भी था।


रोहन ने मुस्कुराते हुए कहा,


"हैलो, मिस आयत खान।"


आयत ने बिना रुके जवाब दिया,


"जी?"


"मैं रोहन मेहरा हूँ। शायद मेरा नाम सुना होगा।"


आयत ने शांत स्वर में कहा,


"नहीं... और अगर सुना भी होता, तब भी मुझे अभी घर जाना है।"


रोहन हल्का-सा हँसा।


"इतनी जल्दी क्या है? पाँच मिनट बात कर लो।"


रीवा ने धीरे से कहा,


"आयत... चलो।"


लेकिन रोहन फिर उनके सामने आ गया।


"दोस्ती करने में क्या बुराई है?"


आयत ने पहली बार उसकी आँखों में देखते हुए कहा,


"दोस्ती माँगी नहीं जाती... निभाई जाती है। और मुझे आपसे कोई दोस्ती नहीं करनी।"


समर हँस पड़ा।


"भाई... लगता है भाव नहीं दे रही।"


रोहन ने मुस्कुराकर कहा,


"कोई बात नहीं। आज नहीं तो कल मान ही जाओगी।"


आयत का चेहरा सख्त हो गया।


"आप शायद मेरी बात समझ नहीं रहे हैं।"


"मैंने साफ़ कहा है कि मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है। कृपया रास्ता छोड़ दीजिए।"


रोहन बोला,


"पूरे कॉलेज में किसी ने मुझे आज तक मना नहीं किया।"


आयत ने बिना डरे जवाब दिया,


"तो आज सुन लीजिए।"


"हर लड़की आपकी दोस्त बनना चाहे, यह ज़रूरी नहीं है।"


रोहन के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।


"तुम्हें अपने इस जवाब पर पछताना पड़ सकता है।"


आयत ने दृढ़ आवाज़ में कहा,


"धमकी देना बंद कीजिए।"


"अच्छे घर के लोग किसी से इस तरह बात नहीं करते।"


रोहन ने फिर उनका रास्ता रोक लिया।


"पहले मेरी बात पूरी सुनो..."


आयत ने एक पल भी देर नहीं की।


चटाक!


उसका थप्पड़ सीधे रोहन के गाल पर पड़ा।


पूरा कैंपस कुछ पल के लिए शांत हो गया।


आयत ने गुस्से में कहा,


"इज़्ज़त से बात करना सीखिए।"


"किसी का रास्ता रोकना और उसे बार-बार परेशान करना बहादुरी नहीं होती।"


रोहन ने गुस्से से मुट्ठियाँ भींच लीं।


"तुमने मुझे थप्पड़ मारा है..."


"इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।"


तभी पीछे से एक सख्त आवाज़ आई—


"कीमत तो तुम्हें अपने व्यवहार की चुकानी पड़ेगी, रोहन।"


सबने मुड़कर देखा।


वहाँ करण खड़ा था।


उसकी आँखों में गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था


...तभी पीछे से एक सख्त आवाज़ गूँजी—


"कीमत तो तुम्हें अपने व्यवहार की चुकानी पड़ेगी, रोहन।"


सभी ने पलटकर देखा।


सामने करण खड़ा था।


उसके चेहरे पर गुस्सा था, लेकिन आवाज़ पूरी तरह शांत थी।


वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और रोहन के सामने आकर खड़ा हो गया।


"रोहन... बस बहुत हो गया।"


रोहन ने तिरछी नज़र से उसे देखा।


"तू फिर बीच में आ गया?"


करण ने बिना डरे जवाब दिया,


"हाँ। क्योंकि जब कोई गलत करेगा, तो मैं चुप नहीं रहूँगा।"


समर झुंझलाकर बोला,


"करण, तू अपना काम कर। ये हमारे बीच की बात है।"


करण ने समर की तरफ़ देखे बिना कहा,


"जब किसी को बेवजह परेशान किया जाता है, तब वह सिर्फ़ दो लोगों की बात नहीं रह जाती।"


रोहन ने हँसते हुए कहा,


"बहुत बड़ा समाज सुधारक बन रहा है?"


करण एक कदम और आगे बढ़ा।


"समाज सुधारक नहीं... बस इतना जानता हूँ कि किसी का रास्ता रोकना और उसे बार-बार परेशान करना गलत है।"


दोनों की नज़रें एक-दूसरे से टकरा गईं।


कुछ पल तक माहौल बिल्कुल शांत रहा।


फिर करण ने आयत की तरफ़ देखा।


उसकी आवाज़ पहले से बिल्कुल अलग, नरम थी।


"आप ठीक हैं?"


आयत ने हल्के से सिर हिलाया।


"जी... मैं ठीक हूँ।"


"अगर आप ठीक हैं, तो अब यहाँ रुकिए मत। भीड़ बढ़ती जा रही है। आप अपनी दोस्त के साथ घर चली जाइए।"


आयत ने एक पल के लिए करण की तरफ़ देखा।


"थैंक यू... आपने सही समय पर मेरी मदद की।"


करण मुस्कुरा दिया।


"थैंक यू की कोई ज़रूरत नहीं। सुरक्षित घर पहुँचिए, बस यही ज़रूरी है।"


रीवा ने भी कहा,


"थैंक यू, करण।"


करण ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिला दिया।


आयत और रीवा वहाँ से आगे बढ़ गईं।


उधर रोहन गुस्से से करण को घूर रहा था।


"आज तूने बीच में आकर ठीक नहीं किया।"


करण ने शांत स्वर में कहा,


"अगर आगे भी किसी के साथ गलत होगा, तो मैं फिर बीच में आऊँगा।"


इतना कहकर वह भी वहाँ से जाने लगा।


उसी समय कॉलेज की दूसरी तरफ़ से सनाया खन्ना अपनी सहेलियों के साथ वहाँ पहुँची। उसने दूर से पूरी घटना का आख़िरी हिस्सा देखा था।


उसने देखा कि करण बिना किसी डर के आयत की मदद करके चुपचाप वहाँ से चला गया।


सनाया अनायास ही उसे जाते हुए देखती रह गई।


उसकी एक सहेली ने पूछा,


"क्या हुआ? कहाँ खो गई?"


सनाया ने नज़रें हटाईं और बोली,


"कुछ नहीं..."


लेकिन उसके मन में पहली बार करण के लिए एक अलग-सी सोच पैदा हुई।


"यह लड़का वैसा बिल्कुल नहीं है, जैसा मैं समझती थी..."


वह हल्का-सा मुस्कुराई और अपनी सहेलियों के साथ कॉलेज के बाहर निकल गई।


उसे अभी नहीं पता था कि किस्मत बहुत जल्द उसकी और करण की राहें फिर से मिलाने वाली है।